गुरुवार, 8 जून 2023

निर्वस्त्र करा कर लूटना आज का प्रमुख धन्धा बना।

शासन, प्रशासन कब कसेगा ऐसे गैंगों पर नकेल ?


- सुनील शर्मा ।


“निर्वस्त्र गैंग“ जो आजकल सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय है, इस गैंग के अपराध करने का तरीका बिलकुल अलग है। मथुरा के अनेक नव धनाण्य लोग इस प्रकार के गैंग का शिकार हुए हैं और अब तक लाखों की रकम गवां चुके हैं। इनके चक्कर में जो फंसा समझो एकाउन्ट खाली। बचने के लिए विशेष सावधानी ही महत्वपूर्ण है।

  इसलिए हम इस “निर्वस्त्र गैंग“ के लूटने के तरीके को आपको बता रहे हैं। जैसा कि नाम से जानकारी हो रही है कि यह गैंग निर्वस्त्र होकर तथा मर्दों को निर्वस्त्र करके देश के किसी भी कौने से लूट सकते है। अब आप सोच रहे होंगे कि यह किस प्रकार का अश्लील गैंग है जो मर्दों को ही निर्वस्त्र करके लूट सकता है। तो आइये बताते हैं कि कैसे लूटते हैं मर्दों को।

आजकल सोशल मीडिया पर एक गैंग बहुत ही सक्रिय है यह गैंग आपके वाट्सएप एकाउन्ट पर बिना किसी जान पहचान के एक महिला की आवाज के साथ प्रकट हो जायेगा और आपसे हाय-हेलो करने की कोशिश करेगा जैसे कि ‘‘आप कैसे हैं, किस शहर से हैं तथा नाम क्या है और क्या करते हैं’’ आदि- आदि प्रश्नों के साथ आपसे मित्रता बढ़ाने का प्रयास किया जायेगा। यदि आप उसके जवाब देने लगे और थोडी बहुत रूचि दिखाने लगे तो उधर से कहा जायेगा कि ‘‘मैं आपसे वीडियो कॉल करती हूँ’’ फिर आपके फोन पर एक कमसिन हसीन सी लड़की उधर से वीडियो कॉल करेगी आप न चाहते हुए भी कॉल रिसीव करते है तो उधर से आने वाली कॉल की स्क्रीन पर एक अर्ध नग्न कन्या आपसे वार्ता कर रही होगी। आपकी तरफ से भी आपकी वीडियो कॉल में आपका चेहरा दिख रहा होगा। आपने तुरन्त ही कॉल यदि काट भी दी तो कुछ मिनट के बाद ही आपके वाट्सएप पर दोनों के बीच की वीडियो कॉल की रिकार्डिंग भेज दी जायेगी, जिसमें आप सिर्फ बात ही करते दीख रहे होंगे मगर यह गैंग आपके वीडियो के साथ छोडछाड़ करते हुए किसी अन्य पुरूष का नग्न वीडियो लगा कर पुनः आपके पास भेज देते है। जिसे देखते ही आपके होश फाक्ता हो जायेंगे और तुरन्त ही दिन में चॉद-तारे नजर आने लग जाते हैं।

वाट्सएप में फिर मैसेज करके आपसे कहा जायेगा कि इसका क्या करना है ? आपने कोई उत्तर नहीं दिया तो वह धमकी भरे मैसेज बार - बार भेजेंगे। उसमें आपके इस वीडियो को शोसल मीडिया पर डालने और आपको बदनाम करने की धमकी भी दी जायेगी। और आपके वाट्सएप की पूरी लिस्ट कॉपी करके आपके सारे मित्रों तक आपकी वीडियो दिखाने की घमकी तक दी जायेगी, यदि आपने कोई उत्तर नहीं दिया तो दूसरे दिन आपके पास किसी अन्य नम्बर से फोन किया जायेगा उधर से फोन करने वाला कहेगा कि ‘‘मैं क्राइम ब्रांच दिल्ली से बोल रहा हूँ कल आपने एक लड़की के साथ अश्लील हरकत की है’’ क्या करना है इस मैटर को सुलझाना है या नहीं जल्दी बतायें, नही तो आपके विरूद्ध कानूनी कार्यवाही की जा रही है। इस प्रकार से डरा धमका कर झांसे में लेकर आपसे अच्छी खासी रकम की मांग की जा सकती है।

मथुरा-वृन्दावन के तमाम ऐसे दिल फैंक लोग हैं जो इस निर्वस्त्र गैंग का शिकार हुए हैं और अपनी मान प्रतिष्ठा की खातिर अपनी आप बीती को किसी को बताने से भी बचते रहे हैं और इस प्रकार के गैंग को मोटी रकम भी अदा कर चुके हैं।

ऐसे गैंग लूट की शुरुआत में आपके सोशल मीडिया एकाउंट पर एक चटक-मटक सी लड़की आपसे चैट करना शुरू करती है। अब मर्द तो मर्द ठहरे....वो बिना सोचे समझे उस हसीना को अपने सोशल मीडिया एकाउंट में ऐड करके अपना मित्र बना लेते है। अब आपके फेसबुक में घुसने के बाद वो शातिर हसीना आपके सभी परिवारजनों तथा जानने वाले मित्रों के बारे में जानकारी आसानी से हासिल कर लेती है यानी यों कहें कि कर लेते हैं क्यों कि यह एक सक्रिय गैंग है जिसमें कई लोगों द्वारा इस प्रकार के कार्य को अंजाम दिया जाता है।

इस सिलसिले बार एपीसोड में आपसे खट्टी-मीठी चैट होती रहेगी, आप बेसब्र होकर उस कन्या को अपना फ़ोन नंबर इस उम्मीद में दे देते है कि शायद कोई चांस मिल जायेगा। एक दिन अचानक आपके फ़ोन पर कॉल आती है और एक मनमोहक आवाज़ के साथ एक हसीना आपसे बातचीत करके आपके मन को मोह लेती है। वॉइस कॉल को काट कर वह आपके वाट्सएप पर वीडियो कॉल करती है। आप कुछ समझ पाते उससे पहले ही वो खूबसूरत बला, अपने आपको कैमरे पर निर्वस्त्र करके आपसे भी निर्वस्त्र होने का आग्रह करती है। बिना सोचे समझे यदि आपने भी अपने कपड़े बदन से हटा दिये तो समझिये कि उनका काम हो गया और बस 5 या 10 मिनट बाद वो वाट्सएप वीडियो कॉल कट जाती है। फिर शुरू होता है विलेन वाला सीन पांच मिनट बाद आपकी और उस कमसिन हसीना की बेशर्मी से भरी वीडियो की रिकॉर्डिंग आपको वाट्सएप पर लड़की द्वारा भेजी जाती है। अब इस वीडियो को दिखाकर आपसे पैसों की डिमांड होती है और पैसे ना देने पर इस वीडियो को आपके सोशल मीडिया एकाउंट में ऐड कर सभी परिवारजनों और दोस्तो को भेजने के साथ ही एडल्ट साइट्स पर डालने की धमकी भी दी जाती है। अब भले ही आप कैसे भी मर्द हैं परंतु ऐसी वीडियो आपका सामाजिक और पारिवारिक रूप से क्या हाल करेगी। इसकी कल्पना करते-करते ही आपकी मर्दानगी हवा हो जाएगी।

इसके बाद गैंग का दूसरा मेंबर पुलिस वाले का रूप धरकर क्राइम ब्रांच का अधिकारी बन आपको फ़ोन पर धमकाना शुरू करेगा और सब तरफ से दबाव बनाकर आपसे आपकी हैसियत के अनुसार पैसा ठगने का प्रयास जारी रखेगा। ऐसी स्थिति में यदि आपने पैसे दे भी दिए तो भी कोई गारंटी नही की गैंग वाले आपको बाद में परेशान या ब्लैकमेल नही करेंगे।

हाल ही में वृन्दावन के एक बिल्डर जो लम्बे समय से वृन्दावन में ही निवास कर रहे हैं के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ और लगभग 35 हजार गवां बैठे, रकम देने के वाद भी फिर से 80 हजार की डिमान्ड की जाने लगी। परेशान बिल्डर ने किसी मित्र को जब घटना से अवगत कराया तो मित्र ने उधर से मोबाइल पर आये फोन कॉल को रिसीब करके जब खूब हडकाया तब जाकर मामला शान्त हुआ। इस मामले में पुलिस भी आपकी चाहकर भी कोई मदद नहीं कर सकती है। यह गैंग इस समय इतना सक्रिय है कि इनके जाल में जो फंसा वह हजारों, लाखों से लुट गया। 

ये निर्वस्त्र गैंग वाले आपके निर्वस्त्र वीडियो को अपने पास रख लेते है और आपसे लोन की किश्तों की तरह हमेशा ब्लैकमेल करके पैसों की वसूली करते रहते हैं। इसलिए होशियार हो जाइए और अनजान वीडियो कॉल आने पर फ्रंट कैमरे पर अपनी उंगली रख लीजिये और उंगली हटाने से पहले वीडियो देख के पक्का कर लीजिए कि दूसरी तरफ क्या चल रहा है ? हमारा मकसद आपको सावधान करने का है, ताकि आप ऐसी किसी स्थिति में ना फंसे।

यहां आपको घबराना नहीं है और धैर्यता के साथ बिना डरे मांगी गई रकम खाते से ट्रांसफर नहीं करनी है। फोन काट कर आप तुरन्त अपने जनपद के साइबर सेल से सम्पर्क करें और उनको सारी घटना बतायें जिससे वह इसका समाधान निकाल कर आपको इस गैंग से आजाद कराने में मदद करेंगे।

ऐसे तमाम लोगों के विषय में जानकारी मिल रही है जो इस प्रकार के गैंग का शिकार हुए हैं, जिसमें लोगों ने लाखों रुपये अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए दे भी दिए हैं। हमने इस प्रकार के गैंग से पीड़ितों की कहानियाँ सुनी हैं। इन लुटेरों के अपराध करने के तरीके को बता कर आपको सचेत करने और आपको भी लुटने से बचाने का प्रयास हम कर रहे हैं। इसलिए सावधान रहिए सुरक्षित रहिए और किसी अंजान कॉल को रिसीव करते समय विशेष सावधानी बरतिए।


मंगलवार, 30 मई 2023

‘‘जब मैं राजीव गांधी के मंच से गिरा’’


21 मई 1991 का दिन भारतीय इतिहास का वह काला दिन था जिस दिन देश ने अपने एक युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी को हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया था। चुनावी दोरे करते-करते राजीव गांधी देश के विभिन्न हिस्सों में जा रहे थे। 17 मई 1991 को राजीव गांधी मथुरा के के. आर. डिग्री कॉलेज मैदान में रात्रि करीब 2 या ढाई बजे मथुरा पधारे थे। सुबह से ही लोग उक्त मैदान में आकर जम गये थे। कॉफी देर हो जाने पर भी बड़ी संख्या में उनके प्रसंशक वहां जमे हुए थे।

हर एक घन्टे के बाद सूचना मिल रही थी कि बस आने वाले हैं। आखिर वह समय भी आ गया जब राजीव गांधी एक विशेष हेलीकॉफ्टर से मथुरा पहुंचे। किसे पता था कि यह उनकी मथुरा में अंतिम यात्रा होगी और फिर चार दिन के वाद आज से 32 साल पहले राजीव गांधी की हत्या 21 मई 1991 की रात्रि करीब 10 बजकर 21 मिनट पर श्रीपेंरबदूर में तेज धमाके के साथ कर दी गयी।

मैं उस समय अमर उजाला के लिए फोटोग्राफी करता था। राजीव जी का मंच पर आना हुआ, मंच पर काफी भींड़ थी। धक्का मुक्की के बीच मैं मंच के पीछे की तरफ चला गया। एक तिरंगा कपड़ा मंच के पीछे लगाया गया था। मुझे उसका कोई अहसास न था, अचानक मैं मंच से करीब पन्द्रह फुट नीचे उपर से गिर गया, जो कैमरे आदि मेरे पास थे वह तो टूट ही गये, मुझे काफी चोटें आयीं मेरा दाहिना हाथ उस समय उपर की ओर उठ ही नहीं रहा था, मैं कॉफी गफलत में था मुझे बेहोसी सी छा गई थी। उपर से गिरने के कारण मेरा सर तो बच गया और मैं शौभाग्यशाली था कि वहां मंच के नीचे तमाम ईटें पड़ी थीं उन पर नहीं गिरा। मैं बच तो गया लेकिन मुझे तीन माह तक घर पर ही रहना पड़ा था।

उस समय जो पत्रकार साथी रिपोर्टिग में व्यस्त थे किसी ने मेरी तरफ देखा तक नहीं मुझे हॉस्पीटल पहुॅंचाना तो दूर की वात थी। उस समय पुलिस कप्तान विजय कुमार गुप्ता व जिलाधिकारी राजीव कुमार थे। उन्हें किसी ने बताया कि मंच के पीछे मंच से एक फोटोग्राफर नीचे गिर गया है। मैं इतने जोश में था कि चौटिल हो जाने के वाद भी पुनः मंच पर चढ़ गया। तब राजीव गांधी ने मेरी हालत देख, उन्होंने मुझसे पूछा कि ‘‘आपको क्या हुआ है’’  मुझे नहीं मालुम कि मैं कैसे मंच से नीचे गिर गया। उसके वाद एस पी विजय कुमार गुप्ता जो उस समय मेरे बहुत ही शुभचिन्तक थे, उन्होंने मुझे मंच से नीचे उतारा, मेरे नाक मुंह से खून वह रहा था व दाहिने हाथ में फैक्चर हो गया था, किसी भी वस्तु को पकड़ने के काबिल भी नहीं था।

तत्कालीन कप्तान श्री गुप्ता ने मुझसे पूछा कि क्या तुम्हें किसी ने मारा है या किसी ने जबरन धक्का दिया है। मैंने कहा कि नहीं मुझे पता ही नही चला कि मैं किस प्रकार से मंच से नीचे गिर गया। मुझे तत्काल सिटी मजिस्ट्रेट की गाड़ी से जिला अस्पताल भेजा गया। वहां उपस्थित डाक्टर ने कहा कि कुछ नहीं हुआ है एक इंजेक्शन लगाया और मेरे घर तक सिटी मजिस्ट्रेट ने मुझे छोड़ा। दूसरे दिन हाथ सूज गया और दरेसी हास्पीटल के बराबर में डाक्टर वी. के. अग्रवाल जो अब इस दुनिया में नहीं हैं ने मेरा तीन माह तक इलाज किया था।

अमर उजाला ने मुझ पर बहुत बड़ी कृपा की उस समय श्री अजय अग्रवाल भईयो जी ने लेन्डलाइन फोन पर आकर कहा कि इलाज में जो भी खर्च होगा वह अमर उजाला वहन करेगा। मगर उस समय के तत्कालीन ब्यूरोचीफ रहे सज्जन ने कोई हमदर्दी नहीं दिखाई किसी भी पत्रकार ने, फोटोग्राफर ने मदद तो दूर की बात सहानुभूति भी नहीं दिखाई। पत्रकारों को तो छोडिये किसी भी नेता ने भी सहानुभूति के दो शब्द भी नहीं कहे। अमर उजाला ने एक लाइन तक नहीं छापी थी। उस समय अमर उजाला के संस्थापक स्व0 श्री मुरारी लाल माहेश्वरी जी के मामा जी श्री मिश्री लाल माहेश्वरी जी उस मथुरा कार्यालय की पूरी कमान सम्हालते थे उनको जब पता चला तो उन्होंने तत्काल ब्यूरोचीफ को आदेश दिया कि एक समाचार बना कर छापना है। दूसरे दिन एक सिंगल कॉलम समाचार अमर उजाला में छापा गया ‘‘एक फोटोग्राफर राजीव के मंच से गिर कर घायल’’ उसी रात को राजीव गांधी शहर के धनाण्य देवीदास जी के डेम्पीयर नगर स्थित निवास पर गये थे वहीं रात्री में भोजन किया था प्रेस कॉन्फेन्स भी की थी।

इसके वाद या पहले मुझे याद है कि राजीव गांधी अलीगढ़ भी गये थे वहां ट्रेन के उपर से प्लेट फार्म पर राजीव गांधी का फोटो लेने के चक्कर में एक फोटोग्राफर इतने उत्साह में था कि उसने ट्रेन की छत पर जाकर राजीव गांधी के फोटो लेने का प्रयास किया और वह रेलवे ट्रेक के उपर हाईटेंशन लाइन की चपेट में आकर बुरी तरह झुलस गया था और उसकी तत्काल मौत भी हो गयी थी। समय ने सब कुछ भुला दिया। देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व0 राजीव गांधी जी को शत-शत नमन विनम्र श्रद्धांजलि।

पत्रकार दिवस पर सभी पत्रकार मित्रों को बहुत-बहुत बधाई, शुभकामनाएं


मंगलवार, 2 मई 2023

हनुमान जी ने मुसीबत में कैसे मदद की


 मैं एक सच्ची घटना से आपको परिचय कराना चाहता हूँ

हनुमान जी ने मुसीबत में कैसे मदद की

इस घटना को हालांकि काफी समय हो चुका है और इस घटना के हम तीन मुख्य किरदार हैं, एक मैं और मेरे दो अन्य साथी पेशे से हम एक ही फील्ड से आते हैं, हालांकि एक मित्र अब इस दुनिया में नहीं है। हम तीनों दोस्त किसी कार्य से मथुरा से दिल्ली गये थे, मेरा एक मित्र जो कुछ धनी भी था, उसने उस समय एक पुरानी मारूति 800 खरीदी थी और उसी को कार चलाना भी आता था, और काम भी उसी का ही था दिल्ली में, हम दोनों तो उसके साथ तफरी करने के लिए चले गये थे। दिल्ली में सभी काम निपटाने के बाद, जब हम तीनों मथुरा के लिए चल दिये तो ठीक-ठाक फरीदावाद तक सही सलामत आ गये और करीब 8 या 8.30 का समय रहा होगा, हमारी कार अचानक ही खराब हो गई।

हम लोगों ने एक रेस्टोरेन्ट में कुछ खाना खाया और बापस आकर तीनों कार में बैठे, कुछ दूर चलने के बाद कार के बोनट से अचानक धुंआ निकलने लगा, बोनट खोलने पर उसमें होने वाला कूलेन्ट बुरी तरह से उबल रहा था। किसी तरह से उसे ठन्डा करने का प्रयास भी किया, फिर जब उसे स्टार्ट किया तो वह स्टार्ट ही नहीं हुई, काफी कोशिश करने पर भी जब वह चालू नहीं हुई तो पास ही में एक कार मैकेनिक को दिखाई गई। उसने देखने के वाद बताया कि इसका रेडीएटर खराब हो गया है और इसमें काफी खर्चा आयेगा बदलने में, हम तीनों ने फैसला किया कि इसे धक्का मार कर कुछ दूर ले जाकर किसी अन्य मिस्त्री को दिखाया जाये, रास्ते में पडने वाले कई कार मैकेनिक को दिखाया किसी ने उसे ठीक करने का कोई तरीका नहीं बताया। उधर धीरे-धीरे रात का अंधेरा भी बढ़ रहा था और नेशनल हाईवे पर भी धीरे-धीरे लोगों का आवागमन कम होता जा रहा था और सड़कें सुनसान होती जा रही थी। 

हमारे पास कोई भी दूसरा रास्ता नहीं था कि हम न तो कार को कहीं छोड़ सकते थे और न वह रात में ठीक हो सकती थी और न ही पास में इतने पैसे थे कि उसे ठीक कराया जा सके। हमें यही उचित लगा कि कार चलाने वाला तो कार में बैठ कर स्टेयरिंग संभाले और हम दो कार को पीछे से धक्का मारते रहें और हम तीनों ने यही किया कुछ दूर धक्का मारते और फिर थक जाते तो कुछ देर आराम करके फिर धक्का मारने में लग जाते यह करते-करते रात करीब ग्यारह बज चुके थे, समय भी कैसे निकल गया पता ही नहीं चला।

पलबल से पाँच किलोमीटर से भी पहले एक गाँव दिखाई दिया। गाँव के मुहाने से अन्दर तलक सन्नाटा छाया हुआ था कुछ हिम्मत करके अन्दर जाने का प्रयास किया तो गाँव में मौजूद कुत्तों ने हम अंजान लोगों को देख भौंकना शुरू किया जो वह बन्द होने का नाम ही नहीं ले रहे थे, अचानक कुछ बुजुगों की आवाज उस अंधेरे के बीच से होकर आई ‘‘को ये’’ ‘‘को ये’’ हमने उन्हें अपनी बिना बुलाये आई मुसीबत को बताया तो उन्होंने कहा कि गाँव के बाहर ही एक बन्द दुकान में बल्व जल रहा होगा उससे पूछो। लौट कर उसके पास आये उसने अपनी दुकान खोली जो कि उसी में शायद रात में रहता होगा और रात्री में बाहन चालकों की मदद भी करता होगा, उसने भी काफी प्रयास किया लेकिन कार ठीक न हो सकी और अब हमारा आखिरी प्रयास भी बिफल हो गया। हम निराश और हताष होकर सड़क के किनारे बैठ गये। 

कुछ समय के बाद मुझे पास में ही एक मंदिर दिखाई दिया जो कि सड़क से कुछ उंचाई पर था यानी कि कुछ सीढ़ियां चढ़ कर मंदिर में कुछ चार पांच फुट के हनुमान जी बिराजमान थे, मैंने उनके दर्शन किये और जो कुछ जेब में था वह चढ़ाया और प्रार्थना की कि प्रभु इस मुसीबत के समय हमारी मदद करें और कोई रास्ता सुझायें। यह कह कर जब में नीचे आया तो सुनसान सड़क पर अचानक एक बड़ी सी गाड़ी जो कि आगरा नम्बर की थी आकर रुकी, चूंकी हमारी गाड़ी का नम्बर भी आगरा का ही था तो उस गाड़ी में बैठे व्यक्ति जो शायद किसी फैक्टरी के मालिक या कोई बहुत बड़े व्यवसायी थे। वह गाड़ी और पहनावे के अनुसार काफी धनी व्यक्ति प्रतीत हो रहे थे। उन्होंने पहले हमारा परिचय जाना फिर हमसे हमारे काम के विषय में जानकारी की, जब हमने उन्हें तीनों ही पत्रकार होना बताया तो उन्होंने आगरा के तमाम अखवारों के मालिक व उसमें काम करने वाले प्रमुख लोगों के नाम आदि पूछे और पूरी तस्ल्ली कर ली, वह गाड़ी का नम्बर आगरा का होने के चलते रुक गये थे, शायद आगरा का नम्बर न होता तो वह नहीं रुकते।

अब हमारे साथ समस्या थी कि गाड़ी को सुनसान सड़क पर कैसे छोड़ा जाये तो उस व्यवसायी ने सुझाब दिया कि पास के पेट्रोल पम्प पर कार को छोड दिया जाये और आप तीनों मेरे साथ मेरी गाड़ी में मथुरा तक चलें, मैं मथुरा तक छोड़ दूंगा। अब हमारे साथ समस्या थी कि गाड़ी को कैसे ले जाया जाये तो उन्होंने कहा कि कोई रस्सी हो तो मेरी गाड़ी के साथ बांध कर पेट्रोल पम्प तक छोड़ा जाये। मगर न तो हमारे पास कोई रस्सी थी न ही उनके पास रस्सी थी, कुछ समय तक सोच विचार कर ही रहे थे कि अचानक एक चमत्कार सा हुआ देखते ही देखते सड़क के बीचों बीच एक सस्सी का बंडल बंधा हुआ और वह भी बिलकुल नया गिरा हुआ देखाई दिया, हम सभी उस रस्सी के बंडल को देख आश्चर्य चकित रह गये कि अचानक हमारे ही सामने इतना बड़ा रस्सी का बंड़ल आखिर आया कहां से खेर जो भी हो शायद हनुमान जी महाराज ने हमारी सुन ली और शायद यह उन्हीं का चमत्कार था। हम लोगों ने उस व्यवसाई की एसयूवी गाड़ी के पीछे मारूति 800 को बांधा और कुछ दूरी पर ही पेट्रोल पम्प पर उसे छोड़ कर पेट्रोल पम्प मालिक को बता कर कि कल सुबह गाड़ी ले जायेंगे। हम उस व्यवसाई की गाड़ी में बैठ कर लगभग तीन बजे के आसपास मथुरा तक पहुंचे थे।


अगर हनुमान जी से प्रार्थना मन से न की होती तो शायद हमें रात भर उस गाड़ी के चक्कर में सुनसान सड़क पर ही गुजारनी पड़ती और न जाने क्या अनहोनी होती पता नहीं, मगर हनुमान जी महाराज बजरंग बली की कृपा कि एक गाड़ी वाले महानुभाव उस समय देवदूत बन कर आये और दूसरा वह रस्सी का बंडल जो कि बीच सड़क पर उसी समय गिरा दोनों घटना ने मुझे हमेशा-हमेशा के लिए हनुमान जी के प्रति आस्थावान बना दिया। जय बजरंग बली की, ।। जय श्रीराम।।


शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

विभाण्डक ऋषि कुमार श्रृंग ऋषि राम की बड़ी बहन शान्ता के पति थे

अतीत की कहानियाँ कहती संग्रहालय की मूर्तियां 
विभाण्डक ऋषि कुमार श्रृंग ऋषि राम की बड़ी बहन शान्ता के पति थे 

राजकीय संग्रहालय, मथुरा की प्रत्येक मूर्तियां अपनी अतीत की कहानियाँ कहती हैं और उसमें छिपे इतिहास को खोजने और उसे समझने का अवसर भी देती हैं। एक दिन वीथिकाओं का अवलोकन करते-करते अचानक एक मूर्ति पर नजर गयी, यह मूर्ति चार हिस्सों में एक वेदिका स्तम्भ के रूप में बनी हुई है। जिसमें चार चित्र उपर से नीचे तक दिखाये गये हैं उपर के प्रथम भाग में बोधिसत्व के मुकट का पूजा करते हुए दिखाया गया है जब कि बीच के एक हिस्से में एक साधु एक हिरनी को कुछ चारा खिला व पानी किसी पात्र से पिला रहा है, इसके ठीक नीचे के हिस्से में साधु गर्भवती हिरनी के प्रसव के समय उसके बच्चे को अपने दोनों हाथ में लिये हुए दिखाया गया है, इसी वेदिका स्तम्भ के नीचे अन्तिम हिस्से में साधु एक टोकरी से लड्डु बांटता हुआ दिख रहा है। यह मूर्ति गोविन्द नगर, मथुरा क्षेत्र से प्राप्त हुई थी यह मूर्ति प्रथम शती ई. की है लगभग 2100-2200 वर्ष की वेदिका स्तम्भ के रूप में मिली जिसके विवरण को पढ़कर ज्ञात हुआ कि यह श्रृंग ऋषि के जन्म का वर्णन करती है। आपने श्रृंग ऋषि का नाम अवष्य ही सुना होगा। श्रृंग ऋषि विभाण्डक मुनि के पुत्र थे विभाण्डक मुनि के विषय में महाभारत में बड़े विस्तार व रोचकता के साथ लिखा गया है। श्रृंग ऋषि विभाण्डक मुनि के पुत्र थे और मस्तक पर सींग होने के कारण इनका नाम श्रृंग पड़ गया।
कहा जाता है उन दिनों देवता व अप्सरायें पृथ्वी लोक में आते-जाते रहते थे। बस्ती मण्डल में हिमालय क्षेत्र का जंगल दूर-दूर तक फैला हुआ था। जहां ऋषियों व मुनियों के आश्रम हुआ करते थे। आबादी बहुत ही कम थी। आश्रमों के आस-पास सभी हिंसक पशु-पक्षी हिंसक वृत्ति और वैर-भाव भूलकर एक साथ रहते थे। परम पिता ब्रहमा के मानस पुत्र महर्षि कश्यप के पुत्र महर्षि विभाण्डक उच्च कोटि के सिद्ध सन्त थे। पूरे आर्यावर्त में उनको बड़े श्रद्धा व सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उनके तप से देवतागण भी भयभीत हो गये थे। इन्द्र को अपना सिंहासन डगमगाता हुआ दिखाई देने लगा था। महर्षि विभाण्डक की तपस्या भंग करने के लिए देवताओं ने अपनी प्रिय अप्सरा उर्वशी को महर्षि के आश्रम में भेजा, उर्वषी के प्रेमपाश में पड़कर महर्षि का तप खंडित हुआ और दोनों के संयोग से बालक श्रृंगी का जन्म हुआ। पुराणों में श्रृंग ऋषि को इन दोनों का संतान कहा गया है। चूकि बालक के मस्तक पर एक सींग था अतः उनका नाम श्रृंग या श्रृंगी कहा गया। बालक को जन्म देने के बाद उर्वशी का काम पूरा हो गया और वह स्वर्गलोक वापस लौट गई। इस धोखे से विभाण्डक इतने आहत हुए कि उन्हें नारी जाति से ही घृणा हो गई। वे क्रोधित रहने लगे तथा लोग उनके शाप से बहुत डरने लगे थे। उन्होंने अपने पुत्र को मां, बाप तथा गुरू तीनों का प्यार दिया और उसे तीनों की कमी कभी नहीं होने दी। एक अन्य जनश्रुति कथा के अनुसार एक बार महर्षि विभाण्डक इन्द्र की सबसे प्रिय अप्सरा उर्वशी को देखते ही उस पर मोहित हो गये तथा नदी में स्नान करते समय उनका वीर्यपात हुआ। एक शापित देवकन्या मृगी के रूप में वहां विचरण कर रही थी। उसने जल के साथ वीर्य को ग्रहण कर लिया। जिससे एक बालक का जन्म हुआ उसके सिर पर सींग उगे हुए थे। उस विचित्र बालक को जन्म देकर वह मृगी शापमुक्त होकर स्वर्ग लोक को चली गई। किन्तु यहां राजकीय संग्रहालय, मथुरा में स्थित वेदिका स्तम्भ जिसका पंजीयन संख्या 76.40 का जिक्र करना ही पड़ेगा क्यों कि करीव 2200 वर्ष पूर्व यानी कि प्रथम शती ई. पूर्व की इस वेदिका स्तम्भ का मथुरा नगर के बीचों बीच गोविन्द नगर क्षेत्र से प्राप्ति और उसमें अंकित मूर्ति के चित्र इस इतिहास को सच साबित करती हुई दिख रही है, संग्रहालय में संरक्षित मूर्ति के विवरण के अनुसार विभाण्डक मुनि के आश्रम में एक हिरणी रहती थी मुनि को उससे प्रेम हो गया तत्पष्चात मुनि ने इस हिरणी के साथ समागम किया इसके पष्चात श्रृंग का जन्म हुआ और इस वेदिका स्तम्भ के उपरी भाग में बोधिसत्व के मुकुट का पूजन शीर्षभाग में दर्षाया गया है, इसके नीचे एक मुनि अपने आश्रम में एक हिरनी को चारा खिला रहे हैं, इसके नीचे तीसरे भाग में हिरनी से ऋषि पुत्र का जन्म अंकित है और सबसे नीचे ऋषि कुमार के जन्मोत्सव पर मिठाई वितरण का दृष्य अंकित है। आहत हुए विभाण्डक मुनि ने आश्रम में किसी भी नारी का प्रवेश वर्जित कर दिया था। वे पूरे मनोयोग से बालक का पालन पोषण कर रहे थे। बालक अपने पिता के अलावा अन्य किसी को जानता तक नहीं था। नारी जाति को उसने न कभी देखा न उसके विषय में उसे कोई ज्ञान था यह आश्रम मनोरमा जिसे सरस्वती भी कहा जाता था, के तट पर स्थित था और अंग देश से भी लगा हुआ था। देवताओं के छल से आहत महर्षि विभाण्डक तप और क्रोध करने लगे थे। उस आश्रम में कोई तामसी वृत्ति नहीं पायी जाती थी। महर्षि विभाण्डक तथा नव ज्वजल्यमान (चमकता हुआ) बालक श्रृंग के साथ ही आश्रम में रहते थे।
कहा जाता है कि उन दिनों आश्रम के निकट ही अंग देष में भयंकर सूखा पड़ा था। अंग के राजा रोमपाद (चित्ररथ) ने अपने मंत्रियों व पुरोहितों से मंत्रणा की, सभी ने श्रृंग ऋषि को राज्य में बुलाने का सुझाव दिया। क्यों कि श्रृंग ऋषि अपने पिता विभाण्डक से भी अधिक तेजवान एवं प्रतिभावान बन गये थे। उसकी ख्याति दिग-दिगन्तर तक फैल गई थी। राज दरवारियों ने अंगराज को सलाह दी कि किसी तरह से यदि महर्षि श्रृंग को अंग देश में लाया जाये तो राज्य से अकाल और सूखा समाप्त हो जायेगा। मगर पिता के रहते पुत्र को आश्रम से बाहर लाना असम्भव था। इसके लिये अंग राज ने योजना बनाई जब एक बार महर्षि विभाण्डक आश्रम से कहीं बाहर गये हुए थे, अवसर की प्रतीक्षा में अंगराज ने श्रृंग ऋषि को रिझाने के लिए देवदासियों तथा सुन्दिरियों को वहां भेज दिया। उनके लिए गुप्त रूप से आश्रम के पास एक शिविर भी लगवा दिया गया। त्वरित गति से उस आश्रम में सुन्दरियों ने तरह-तरह के हाव-भाव से श्रृंग ऋषि को रिझाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया। ऋषि कुमार को तरह-तरह के व्यंजन तथा पकवान उपलब्ध कराये गये। श्रृंग ने कभी भी कोई स्त्री को देखा तक नहीं था इन सुन्दरियों को अपने पास पाकर वह उनके मोहपाष के जाल में फंसने लगा। महर्षि विभाण्डक के आने के पहले ही वह सुन्दरियां वहां से पलायन कर जाती थीं। ऋषि कुमार श्रृंग अब चंचल मन वाले हो गये थे। पिता के कहीं वाहर जाते ही वह छिप-छिप कर उन सुन्दिरियों के शिविर में स्वयं ही पहुच जाते थे। सुन्दरियां योजना के अनुसार श्रृंग को अपने साथ अंग देश ले जाने मे सफल हुईं।
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जहां ऋषि कुमार के विषय में कहा गया हैं कि उन्होंने किसी भी स्त्री कभी देखा नहीं था। तो संग्रहालय के एक अन्य वेदिका स्तम्भ में दृश्य दर्षाया गया है कि कुछ स्त्रियां नाव से गन्तव्य तक पहुंच रही हैं। दूसरे दृश्य में मुनि विभांडक की अनुपस्थिति में गाना वजाना हो रहा है तथा ऋषि कुमार को लुभाने का प्रयत्न किया जा रहा है इसके और अन्त में श्रृंग ऋषि प्रेमपाश में बंधे हुए दिखाये गये हैं। वीथिका में ही सामने के स्तम्भ में एक अन्य मूर्ति में ऋषि कुमार को स्त्री संसर्ग के पश्चात उद्विग्न (खिन्नता के भाव) में स्थित दिखाया गया है। ...................................................................................................................................... 
अंग देष में ऋषि कुमार का बड़े ही हर्ष औेर उल्लास के साथ स्वागत किया गया। श्रृंग ऋषि के पहुचते ही अंग देश में वर्षा होने लगी। देषवासी सभी लोग अति आनन्दित हुए। उघर अपने आश्रम में पुत्र श्रृंग को ना पाकर महर्षि विभाण्डक को क्रोध और आश्चर्य हुआ। उन्होने अपने योग बल से सब जानकारी प्राप्त कर ली और अपने पुत्र को वापस लाने तथा अंग देश के राजा को दण्ड देने के लिए महर्षि विभाण्डक अपने आश्रम से अंग देश के लिए निकल पड़े।
अंगदेश के राजा रोमपाद तथा राजा दशरथ दोनों मित्र थे। महर्षि विभाण्डक के शाप से बचने के लिए रोमपाद ने राजा दशरथ की कन्या शान्ता को अपनी पोश्या पुत्री का दर्जा प्रदान करते हुए जल्दी से श्रृंग ऋषि से उसकी शादी करा दी। महर्षि विभाण्डक को देखकर एक योजना के तहत अंगदेश के वासियों ने जोर-जोर से शोर मचाना शुरू दिया कि ‘’इस देश का राजा महर्षि श्रृंग हैं।’’ अपने पुत्र को पुत्रवधू के साथ देख कर महर्षि विभाण्डक का क्रोध दूर हो गया और उन्होंने अपना विचार बदलते हुए बर वधू के साथ राजा रोमपाद को भी आशीर्वाद दिया और अपने पुत्र व पुत्रवधू को साथ लेकर महर्षि विभाण्डक अपने आश्रम लौट आये और शान्ति पूर्वक रहने लगे। उधर अयोध्या के राजा दशरथ के कोई सन्तान नहीं हो रही थी। उन्होने अपनी चिन्ता महर्षि वशिष्ठ को बताई। महर्षि वशिष्ठ ने श्रृंग ऋषि के द्वारा अश्वमेध तथा पुत्रेष्ठीकामना यज्ञ करवाने का सुझाव दिया। तब राजा दशरथ नंगे पैर श्रृंग ऋषि के आश्रम में गये थे। तरह-तरह से उन्होंने महर्षि श्रृंग ऋषि की बन्दना की। ऋषि को उन पर तरस आ गया। महर्षि वशिष्ठ की सलाह को मानते हुए वह यज्ञ की पुरोहिताई करने को तैयार हो गये। उन्होने एक यज्ञ कुण्ड का निर्माण कराया। इस स्थान को मखौड़ा कहा जाता है। रूद्रायामक अयोध्याकाण्ड 28 में मख स्थान की महिमा को इस प्रकार कहा गया है- 
कुटिला संगमाद्देवि ईशान्ये क्षेत्रमुत्तमम्। 
मखःस्थानं महत्पूर्णा यम पुण्यामनोरमा।। 
स्कन्द पुराण के मनोरमा महात्य में मखक्षेत्र को इस प्रकार महिमा मण्डित किया गया है- 
मखःस्थलमितिख्यातं तीर्थाणामुत्तमोत्तमम्। 
हरिष्चन्ग्रादयो यत्र यज्ञै विविध दक्षिणे।। 

महाभारत के बनपर्व में इस आश्रम को चम्पा नदी के किनारे बताया है। उत्तर प्रदेश के पूवोत्तर क्षेत्र के पर्यटन विभाग की बेवसाइट पर इस आश्रम को फ़ैजाबाद जिले में होना बताया गया है। परन्तु अयोध्या से इस स्थान की निकटता तथा परम्परागत रूप से 84 कोस की परिक्रमा मार्ग में सम्मलित होने के कारण इसकी सत्यता प्रमाणित होती है। ऋषि श्रृंग के यज्ञ के परिणाम स्वरूप राजा दशरथ को राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न नामक चार सन्तानें हुई थी। जिस स्थान पर उन्होंने यह यज्ञ करवाये थे वहां आज भी एक प्राचीन मंदिर बना हुआ है। यहां श्रृंग ऋषि व माता शान्ता का मंदिर बना हुआ है। यहां इनकी समाधियां भी बनी हुई हैं। यह स्थान अयोध्या से पूरब में स्थित है। आषाढ़ माह के अन्तिम मंगलवार को बुढ़वा मंगल का मेला लगता है। माताजी को पूड़ी व हलवा का भोग लगाया जाता है। इसी दिन त्रेतायुग में यज्ञ का समापन हुआ था। यहां पर शान्ता माता ने 45 दिनों तक अराधना की थी। यज्ञ के बाद ऋषि श्रृंग अपनी पत्नी शान्ता को अपने साथ लिवा ले जाना चाहते थे किन्तु वह वहां से नहीं गई और वर्तमान मंदिर में पिण्डी बनकर समां गयीं। पुरातत्वविदों के सर्वेक्षणों में इस स्थान के ऊपरी सतह पर लाल मृदभाण्डों, (मिट्टी के वर्तनों) भवन की संरचना के अवशेष तथा ईंटों के टुकड़े प्राप्त हुए हैं। 

प्रस्तुति- सुनील शर्मा (पत्रकार) मथुरा

बुधवार, 12 अप्रैल 2023

पौराणिक महत्व का प्रतीक सप्त समुद्री कूप आज उपेक्षित

धार्मिक परम्पराओं को निभाने के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों की जलापूर्ति करता कूप आज सूख गया है 

मथुरा। (सुनील शर्मा) सनातन धर्म का पालन करने बाले सभी अपने यहां किसी भी मांगलिक कार्य में सभी देवताओं का आवाहान करते हैं इसके लिए देवताओं को आमंत्रण करने के उपरान्त उनकी प्राण प्रतिष्ठा का विशेष महत्व माना जाता है। जब भी कोई शुभ कार्य किया जाता है, जैसे गृह प्रवेश, बच्चे का नामकरण, विवाह संस्कार मांगलिक कार्य आदि में सभी देवताओं को आमंत्रित कर उनकी प्राण प्रतिष्ठा पुराहितों के द्वारा कराई जाती है। जब देवता के आगमन और उनकी प्राण प्रतिष्ठा किसी न किसी मनोरथ की पूर्ति के लिए की जाती है जिससे भगवान हम पर प्रसन्न हों और हमारा मनोरथ पूर्ण हो, जिसके लिए हवन-यज्ञ भी किये जाने का विधान है। आज के दौर में लोग मनोरथ तो करते हैं पर उसमें धार्मिक प्रक्रियाओं का पालन पूरी तरह नहीं करते हैं जिसके कारण मनोरथ के श्रेष्ठ फल की प्राप्ति नहीं हो पाती है। प्राण प्रतिष्ठा के लिए सप्त समुद्रों के जल, सप्त नदियों का जल, सप्त तीर्थों की मिट्टी आदि की आवश्यकता पड़ती है। जो कि न उपलब्ध हो पाने की स्थिति में किये गये मनोरथ का पूर्ण होना भी संभव नहीं होता है। ब्रजवासियों के मनोरथ की पूर्ति हेतु समुद्रदेव ने भी वनखंडी क्षेत्र में एक कुएं में यह शक्ति प्रदान कर दी थी। ऐसा एक सप्त समुद्र कूप (कुआं) वनखंडी क्षेत्र स्थित डैम्पीयर नगर में पड़ने वाले राजकीय संग्रहालय स्थित है। यहां लोग कभी अपने-अपने धार्मिक परम्पराओं को निभाने थे, अब राजकीय संग्रहालय ने सुरक्षा की दृष्टि से इसे ढ़कवा दिया हैं।
यह एक सदियों से चली आ रही परंपरा का एक हिस्सा हैं, आज के आधुनिक युग में मनुष्य इन सभी प्राचीन परम्पराओं से दूर होता चला जा रहा है और हर कार्य शीघ्रता में और कम समय में होने लगे हैं। इन प्राचीन परम्पराओं के प्रति आस्था भी घटती चली गयी और लोग इन स्थानों को भी भूलते चले गये नतीजा यह कि प्राचीन धरोहर भी हमसे दूर हो गये या हमें मालुम ही नहीं कि कहां क्या छुपा हुआ है धीरे-धीरे एतिहासिकता भी कोसों दूर होती चली जायेगी। आज घर, मंदिर, आश्रम सहित अन्य प्रतिष्ठानों पर देवताओं को बैठा तो दिया जाता है पूजा भी की जाती है मगर इन देवताओं की प्राण प्रतिष्ठा के लिए अनुष्ठान में कई तरह की सामग्रियों का उपयोग नहीं हो पाता है और हर कार्य शोर्टकट से किया जाता है। इन आयोजनों में सात समुद्र, सात नदियां, सात मेवा, सात फल, सात पेड़ों के पत्ते, सात कुओं का पानी आदि की आवष्यकता के अनुसार व्यवस्था होती है। ऋषियों मुनियों ने लोगों के सात समुद्र के जल को न ला पाने की दुविधा को दूर करते हुए भारतवर्ष के सात स्थानों पर ऐसे कुपों की स्थापना की जिनके जल का स्त्रोत समुद्रों के जल से मिला हो और इनका जल कभी सूखे नहीं, गर्ग संहिता, पदम पुराण, वराहपुराण आदि में इस तरह के कूपों का उल्लेख मिलता है, उन्हीं में से एक कूप मथुरा के क्षेत्र में होना माना गया है, कई ग्रंथों में इसे मथुरा के वनखंडी क्षेत्र में होना बताया जाता है। यह वही क्षेत्र है जहां आज राजकीय संग्रहालय बना हुआ है। ब्रज मंडल में यही एकमात्र ऐसा स्त्रोत है जो समुद्रों से जुड़ा है, इसका पानी पहले बहुत ही अच्छा था तथा आसपास के पूरे क्षेत्र की जलापूर्ति इससे होती थी आज इसका स्त्रोत सूख गया है तथा इसके सूख जाने के कारण यह बन्द पड़ा है और सुरक्षा की दृष्टि से इसे पाट दिया गया है।
सप्तसमुद्र कूप अन्य जगह पर भी हैं पौराणिक महत्व के प्रतीक सप्त समुद्रीय कूप भारत में ही मौजूद हैं। इनमें काषी, प्रयाग, पाटलीपुत्र में ऐसे सप्त समुद्री कूप हैं, जिनके स्त्रोत कभी सूखते नहीं। इनका स्त्रोत समुद्र तल के साथ मिला हुआ माना जाता है। इस कूप से भगवान की मूर्तियां भी मिलीं सन् 1930 में जब कर्जन आर्कोलॉजिकल म्युजियम जो वाद में राजकीय संग्रहालय मथुरा का निर्माण हुआ तो परिसर में मौजूद इस सप्त समुद्रिक कूप की साफ सफाई कराई गई थी। कूप में से भगवान विष्णु, शिव आदि की मूर्तियां निकलीं थीं। इस आधार पर भी ये कूप पुरातत्व महत्व माना जाता है। आज से करीब 30 साल पहले ये कूप सूख गया तो इसकी सफाई नहीं कराई गई। बाद में इसको पाट दिया गया। 20 वर्ष पहले टोरंटो के एक प्रोफेसर भी इस कूप पर रिसर्च करने आए थे। उन्होंने अन्य सप्तसमुद्रीय कूप का अवलोकन किया था। वीथिका सहायक हरि बाबू ने बताया कि यह कूप सप्तसमुद्रीय कूपों में एक माना जाता है। पहले इसका स्त्रोत बहुत गहरा था। संग्रहालय प्रशासन ने बताया कि कूप को सुरक्षा की दृष्टि से बंद करा दिया गया था। लगभग 2000 वर्ष पुराना है यह कूप राजकीय संग्रहालय, मथुरा स्थित यह कूप गुप्तकाल का है और लगभग 2000 वर्ष पुराना यह कूप यहाँ के स्थानीय लोगों के सामाजिक धार्मिक आस्था का केन्द्र था और सभी के लिए यह बहुत पूजनीय था। माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों के परिवार में नव विवाहित दम्पत्ति को इस कूप की पूजा करने के लिए यहां लाते थे। शादी होने पर बहू को यहीं पूजन के लिए लाते थे। पुराने लोग तो आज भी कुआं पूजन के लिए आते हैं। सन् 1917 ई. के लगभग मथुरा में उत्तर प्रदेश की पहली आधुनिक कॉलोनी डैम्पियर पार्क के नाम से बनी जिसका गेट आज भी अपनी प्राचीनता को वयां कर रहा है जिसके दोनों ओर एक शिलालेख आज भी मौजूद है जिसमें एक तरफ उर्दू और एक तरफ अंग्रेजी में इस ग्रेट के निर्माण का प्रमाण मिलता है। 1930 ई. में कर्जन आर्कोलॉजिकल म्युजियम का निमार्ण शुरू हुआ जिसके परिसर में यह मथुरा का ऐतिहासिक सप्त समुद्री कूप आज भी मौजूद है। इस कूप से मथुरा कला की कई महत्वपूर्ण एवं दुर्लभ मुर्तियां बरामद हुई हैं, जो आज राजकीय संग्रहालय, मथुरा में संरक्षित व सुरक्षित हैं। परन्तु आज यह सप्त समुद्री कूप सूख चुका है और आम जनमानस के जहन से भी विस्मृत हो चुका है। संग्रहालय प्रशासन ने इसे सुरक्षा की दृष्टि से इसका पटाव कराकर ढ़क कर बन्द करा दिया है।
चतुर्वेदी समाज के लोगों की राय गोपाल चतुर्वेदी ने बताया कि धार्मिक कार्यों में सात समुद्र, सात नदियां, सात घुड़साल की मिट्टी आदि का विशेष महत्व है। देव स्थान, प्राण प्रतिष्ठा, विग्रह स्थापित, हवन, यज्ञ आदि में इस कूप से पानी लिया जाता था। संग्रहालय स्थित इस कुएं का चतुर्वेदी समाज में विशेष महत्व है। जब भी कोई बेटी शादी के बाद पहली बार मायके आती थी तो भाई के साथ यहां पूजन करने यहां आती थी। 
प्रस्तुति- सुनील शर्मा, मथुरा

शनिवार, 17 दिसंबर 2022

वीरेन्द्र सक्सेना भारतीय थिएटर, फिल्म और टेलीविजन के एक जानेमाने अभिनेता हैं।

वीरेन्द्र सक्सेना भारतीय थिएटर, फिल्म और टेलीविजन के एक जानेमाने अभिनेता हैं। वो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के पूर्व छात्र भी हैं। सक्सेना को उनके चरित्र अभिनय और अद्वितीय आवाज के लिए जाना जाता है। मथुरा में जन्मे, पले, पढ़े यहीं पर बचपन बीता मथुरा की मिट्टी से बेहद लगाव रखने वाले वीरेन्द्र सक्सेना ने अपने कुशल अभिनय से मथुरा का नाम रौशन किया। कल का दिन मेरे लिए बड़ा ही खास था, आजकल मेरा नियमित जंकषन रोड़ पर स्थित पी. के. स्टुडियो में जाना होता है, मुझे मालुम हुआ कि आज वीरू दादा यानी (वीरेन्द्र सक्सेना) स्टुडियो आने वाले हैं, मैं भी जल्दी से स्टुडियो पहुंच गया। दादा से मुलाकात हुई एक गम्भीर स्वभाव, अत्यन्त सरल व्यक्तित्व के धनी तथा अपनी अद्वितीय आवाज के लिए मषहूर, मुम्बईया फिल्मों में अपना लोहा मनवाने वाले वीरेन्द्र सक्सेना ने एक से एक धांसू फिल्में सिनेमा प्रमियों को दीं हैं।
आज वीरेन्द्र दादा किसी परिचय के मौहताज नहीं हैं हालांकि वीरेन्द्र जी आज मुम्बई की व्यस्त और चकाचौध भरी जिन्दगी का एक हिस्सा हैं मगर उनका मथुरा यानी उनके जन्मस्थान को वह कभी भुला नहीं पाये जब भी कभी मथुरा आते हैं उसी सादगी से लोगों से मिलते हैं, प्यार से वाते करते हैं, हर कौई काहिल हो ही जाता है। आज भी वह मथुरा के हालचाल जानने की इच्छा रखते हैं। मथुरा की तरक्की, मथुरा का विकास तथा यहां के सफल होते लोगों के विषय में जानने रूचि उनमें देखने को मिली। वीरेन्द्र जी से वातें हो रही थी कि उन्होंने कुछ नामचीन लोगों के बारे में पूछ लिया साथ ही मथुरा घाटी बहालराय से लेकर चौक बाजार और ब्रजवासी मिठाई वाला से लेकर लाल दरवाजा सब कुछ उन्हें याद है और हर गली और मौहल्ले के नामों को आजतक वह भूल नहीं सके। सब कुछ याद है तथा मथुरा से उनकी खटटी मीठी यादें जुड़ी हुई हैं।
वीरेन्द्र सक्सेना (वीरू दादा) भारतीय थिएटर, फिल्म और टेलीविजन के अभिनेता हैं। वो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के पूर्व छात्र भी हैं। सक्सेना को उनके चरित्र अभिनय और अद्वितीय आवाज के लिए जाना जाता है। उन्होंने ८० से अधिक भारतीय फ़िल्मों में, कुछ होलिवुड फ़िल्मों जैसे रैनबॉ, कॉटन मेरी, इन कस्टडी आदि तथा विभिन्न टेलीविजन धारावाहिकों में भी अभिनय किया है। सक्सेना का जन्म मथुरा के घाटी बहालराय में हुआ। उन्होंने टेलीविजन तारिका समता से विवाह किया और अब दोनों मुम्बई में रहते हैं। आपने उलझन, मेस्सी साहिब, खामोश, तामस, आशिकी, नरसिम्हा, दिल है कि मानता नहीं, विष्णु-देवा, धारावी, अंगार, सूरज का सातवां घोडा, कभी हाँ कभी ना, आइना, तेजस्विनी, तर्पण, इन कस्टडी, नाराज़, इंग्लिश, अगस्त, राम, टुन्नू की टीना, ज़िद्दी, परदेसी बाबू, हीरालाल पन्नालाल, अर्जुन पंडित, स्प्लिट वाइड ओपन, शूल, कॉटन मैरी, बिच्छू, अक्स, माया, काबू, घाव, साथिया, एक हिंदुस्तानी, जाल : दी ट्रैप, रघु रोमियो, समय, धुप, फंटूश, रुद्राक्ष, किस्मत, बर्दाश्त, वैनिटी फेयर, भोला इन बॉलीवुड, वादा, वाइट रेनबो, बनटी और बबली, सरकार, एक चालीस की लास्ट लोकल, राम गोपाल वर्मा की आग, ए वेडनेसडे, यह मेरा इंडिया, थे स्टोनमैन मर्डर्स, हाउसफुल 2, भेजा फ्राई 2, दी मैकेनिक, अत पता, लपटता, बबल गम, शागिर्द, तेरा क्या होगा, जॉनी रोड, मूवी देख भाई देख, संकट सिटी, एक से बुरे दो, चल चला चल से सलाम इंडिया कृष्णा करामाती कोट जिगरिया, डत जो बी, कार्वाल्हो जैसी फिल्मों अद्वितीय अभिनय किया है।
उन्होंने उस मिथक को भी तोड़ा जब फिल्मी दुनिया में यह समझा जाता था कि अति सुन्दर और बहुत अच्छा दीखने वाला व्यक्ति ही फिल्मों में जा सकता है और काम कर सकता है अगर आपके अन्दर प्रतिभा हो तो आप रंग रूप से नहीं अपने काम से लोगों के बीच अपनी पहचान बना सकते हैं, वीरेन्द्र सक्सेना एक मिशाल हैं।