रविवार, 1 सितंबर 2019

कंजूसी या जीवन की सादगी

    आज की भागदौड भरी जिन्दगी में किसी के पास किसी के लिए समय ही नहीं है, अगर है भी तो ज्यादातर समय मौबाइल ने ले लिया है। घर परिवार में, बस में, ट्रेन में, मेट्रो में, सड़क पर किसी को किसी की तरफ देखने का भी समय ही नहीं है। मौबाइल की चैटिंग और जरूरी कामों को निपटाने की आपा धापी में लोग अपने पास टू ब्हीलर और फोर ब्हीलर तक रखने से बच रहे हैं। ड्राइब करने का झंझट, पार्किंग की समस्या, जाम की समस्या। केब बुक किया और अपने काम तक जाना या आफिस तक जाना फिर बापस घर तक आना यही तो जिन्दगी का हिस्सा बन चुका है। लोगों के घरों में महंगी डाइनिंग टेबिल तो है मगर साथ-साथ खाना खाने की की फुर्सत किसी के पास नहीं है। जब पापा आते हैं तो बच्चे सौ जाते हैं, जब बच्चे स्कूल जाते हैं तब तक पापा सोये हुए होते हैं। ऐसी जिन्दगी में समय किसी के पास नहीं है अगर है भी तो मौबाइल ही सारा समय ले रहा है।


एक समय था जब मेरे एक परम प्रिय मित्र के घर मैं अक्सर जाया करता था। हम दोनों कॉमर्स के स्टुडेन्ट थे। इस लिए प्रायः उनके घर जाना होता था। अक्सर देखा कि पिता जी माता जी जमीन पर बैठ कर खाना खाते है। उनके सामने एक थाली, एक लोटा, एक चम्मच, एक कटौरी होती थी। यह परिवार कोई गरीब नहीं था मगर उन्होंने इसे अपनी जिन्दगी एक हिस्सा बना लिया था। और एक नियम भी जिसमें बड़े से छोटे को खाना खाने के नियम को पालन करना होता था।
दोस्त के पिता प्राईमरी स्कूल में एक अध्यापक थे। मगर थे तो थोडे से कंजूस एक बार मेरा मित्र किसी विषय में फेल हो गया तो उसके पिताजी वोले कि मेरा लाखों का नुकसान कर दिया। मैंने कहा कैसे, तो बोले कि देखो पूरे वर्ष भर दो टाइम खाना खाया, पढाई पर खर्च किताब कापी पर खर्च, कपड़ों पर खर्च, थोड़ा बहुत अन्य खर्चे भी इस हिसाब से लाखों का नुकसान हुआ कि नही।
उनके तीन बेटों में सबसे बड़ा बेटा वो भी एक स्कूल में मास्टर था। बीच वाला बेटा एक सरकारी विभाग में ड्राइवर, सरकारी जीप चलाता था। तीसरे नम्बर का बेटा जो मेरे साथ पढ़ता था। अभी उसने कोई काम शुरू नहीं किया था। पढ़ाई कर रहा था।
सादगी और उनके परिवार के एक साथ खाने के व्यवहार ने मेरे मन में उनको हमेशा स्मरण में रखा है। शायद आज के दौर में यह एक साधारण सी वात हो लेकिन एक मैसेज जरूर है। जब माता पिता खाना खा रहे हों तो परिवार की बड़ी बहु खाना बनाने में व्यस्त रहती थी और उसका हाथ बटाने को बीच वाली बहु भी उसके साथ-साथ काम करती थी। खाने में भी सादगी एक उर्द, चने की दाल फूली-फूली रोटी चुचेमा घी (यानी मानों रोटी घी में डूबी हुई हो) और एक आलू की सूखी सब्जी, न अब वह आटा मिलता है न अब वह आलू रहे, नाही वह घी रहा, न ही उर्द, चने की दाल ही मिलती है।
खेर दोस्त के माता पिता के खाना खाने के दौरान पिता का भोजन जब पूर्ण हो चुका होता था तो उसी थाली में बड़ा बेटा आकर माँ के साथ बैठ जाता था। फिर माँ का खाना समाप्त होने पर बीच वाला बेटा आकर बड़े भाई के साथ बैठ जाता था, बड़े बेटे का खाना जैसे ही समाप्त होता तो छोटा बेटा जो मेरे साथ पढ़ता था वह भोजन करने बैठ जाता था। बीच वाले भाई का खाना तब तक समाप्त होता था, तब जाकर बड़ी बहु अपने देवर यानी मेरे मित्र के साथ उसी खाने की थाली पर बैठ जाती और खाना शुरू करती थी। मेरा मित्र का खाना पूरा हो चुका होता है तो परिवार की वर्तमान छोटी बहु यानी बीच वाले भाई की पत्नी अपनी जिठानी के साथ भोजन पूरा करती थी। बड़ी बहु का काम खाना बनाना और छोटी का काम रसोई की साफ सफाई के वाद वही एक थाली, एक लोटा, एक चम्मच, एक कटोरी की सफाई करके रखती थी, जिससे दूसरे टाइम भी यही क्रम चल सके।
इसमें एक तो ज्यादा बर्तन उपयोग में लाने से बचा जा सकता है जिसमें या तो नौकरानी बर्तन धोने के लिये चाहिए या परिवार की कोई एक बहू सारे बर्तनों को साफ करे, साथही समय की बचत के साथ-साथ भोजन की सादगी से और घर के बने भोजन का आनन्द परिवार के सभी सदस्य बारी-बारी से ले सकेंगे। सभी एक निश्चित समय पर ही भोजन कर सकेंगे। परिवार में एक जुटता बनी रहेगी।

सुनील शर्मा, मथुरा

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