मंगलवार, 12 मई 2020

अजीब संयोग है इस वार महालया और दुर्गा पूजा का महालया के 35 दिन के वाद दुर्गा पूजा होगी

अजीब संयोग है इस वार महालया और दुर्गा पूजा का
महालया के 35 दिन के वाद दुर्गा पूजा होगी
यह पहली बार है कि, मां दुर्गा की पूजा महालया के 35 दिन के बाद की जाएगी, जो इस साल देवी-पक्ष की शुरुआत और पितृ-पक्ष की समाप्ति का प्रतीक है। आम तौर पर, दुर्गा पूजा से सात दिन पहले महालया को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन देवी का आगमन होता है। इस साल 2020 में महालया 17 सितंबर 2020 को निर्धारित किया गया है, जिस दिन हर साल बिस्वकर्मा पूजा मनाई जाती है उस दिन 22 अक्टूबर को षष्ठी है। दुर्गा पूजा उत्सव के पहले दिन महालया और महाषष्ठी के बीच सामान्य अंतर छह दिनों का होता है। मगर यह अन्तर इस वार 35 दिनों का होगा। 21 अक्टूबर 2020 (बुधवार) पंचमी, 22 अक्टूबर 2020 (गुरूवार) को षष्ठी, 23 अक्टूबर 2020 (शुक्रवार) को सप्तमी, 24 अक्टूबर 2020 (शनिवार) को अष्टमी, 25 अक्टूबर 2020 (रविवार) को नवमी और 26 अक्टूबर 2020 (सोमवार) को विजया दशमी होगी।
यह असामान्य पूजा तिथि पहले भी सुनी गई है। 2001 में, महालया के 30 दिन के बाद दुर्गा पूजा मनाई गई थी। उस समय भी 17 सितम्बर को महालया को देवी आगमन हुआ था और 22 अक्टूबर को षष्ठी के साथ देवी पूजा प्रारम्भ हुई थी तथा विजया दशमी भी 26 अक्टूबर 2001 को थी। पंचांग सिद्धान्त और सूर्यसिद्धान्त, दोनों पंचांगों के विद्वान असामान्य अनुसूची पर सहमत हैं। दोनों ही सिद्धानत को मानने वाले विद्वानों के अनुसार, एक दुर्लभ घटना कुछ वर्षों के उपरान्त घटती है, जिसे मल मास कहा जाता है, एक चंद्र महीना जिसमें दो नए चंद्रमा (अमावस्या) होते हैं। कोई भी शुभ संस्कार और अनुष्ठान मल मास में नहीं किया जा सकता है। अगले साल, बंगाली महीना अश्विन 1427 एक मल मास है और इस कारण से दुर्गा पूजा को अमावस्या (चंद्र माह) तक समाप्त कर दिया जाएगा। और पंचांगों के अनुसार, पूजा अगले महीने यानी कार्तिक को होगी। साधारण तय यह दुर्गा पूजा आश्विन माह में होती है मगर 2001 के वाद 2020 में यह पूजा कार्तिक माह में पूर्ण होगी।

पितृपक्ष (पूर्वजों को अर्पण) और महालया के लिए अन्य संस्कार 17 सितंबर की सुबह, अश्विन के पहले दिन, जो कि अमावस्या को पड़ते हैं, हमेशा की तरह होगा। अश्विन का दूसरा नया चंद्रमा उस महीने के 29 वें दिन होगा जो 16 अक्टूबर को है। यह दूसरी बार है कि यह असामान्य कार्यक्रम 21 वीं सदी में हो रहा है, आखिरी घटना 2001 में हुई थी। जब तारीखें अगले वर्ष-17 सितंबर को महालया और 22 अक्टूबर को महाषष्ठी के साथ घटित हुई थीं। इससे पहले, घटना 1982 में भी हुई थी।
भाद्रपद के महीने में सर्वपितृ अमावस्या (अमावस्या) को महालया मनाया जाता है।
महालया की परंपराएं
महालया दुर्गा पूजा उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन देवी दुर्गा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ माना जाता है।
महालया को दुर्गा की बड़ी, विस्तृत रूप से तैयार की गई मूर्तियों को  पंडालों में सजाई व स्थापित की जाती हैं।
महालया 16 दिन की अवधि में पितृ पक्ष की समाप्ति का प्रतीक है, जब हिंदू अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं।
दुर्गा पूजा
दुर्गा पूजा दस भुजाओं वाली माँ देवी की पूजा है और उनकी लड़ाई बुराई यानी भैंस वाले दानव महिषासुर पर जीत का जश्न मनाती है।
यह आयोजन पूरे भारत में मनाया जाता है, पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में, यह साल का सबसे बड़ा त्योहार है और बंगाली समाज में सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम है।
दुर्गा पूजा के अनुष्ठान की शुरुआत दस दिनों तक होती है और पिछले पांच दिनों में विशेष त्यौहार के रूप में होते हैं। जो भारत के कुछ राज्यों में सार्वजनिक छुट्टियों में लोग उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं।

सोमवार, 11 मई 2020

बुढ़िया का गधा कैसे बना इंसान।

एक बार एक बूढ़ी महिला गांव के एक पाठशाला के पीछे अपने गधे को चरा रही थी। गधा हरी हरी घास खा रहा था। बुढ़िया ने गधे को चराते-चराते पाठशाला में पढ़ा रहे मास्टर जी की आबाज सुनाई दी। मास्टर जी अपने बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते कह रहे थे कि ‘‘मैंने अब तक तुम जैसे कई गधों को इंसान बनाया है समझे’’ यह बात बूढ़ी महिला के कानों में पड़ी और वह स्कूल की छुटटी होने का इन्तजार करने लगी, कुछ समय वाद जब स्कूल की छुटटी हो गयी तो वह बडे़ संकोच के साथ मास्टर जी के पास गयी, और बोली कि मास्टर जी मास्टर जी आप अभी बच्चों को बता रहे थे कि आपने बडे़-बडे़ गधों को इन्सान बनाया है, क्या यह सच है, चालाक मास्टर ने तुरन्त जबाव दिया, कि हाँ मैंने कितने ही गधों को इंसान बनाया है। तब उस बूढी महिला ने अपने गधे की तरफ इशारा करते हुए कहा कि क्या यह मेरा गधा भी कभी इंसान बन सकेगा ?



मास्टर ने तुरन्त उत्तर दिया कि क्यों नही यह भी जल्द इंसान बन जायेगा। बुढ़िया ने कहा कि इसके लिए मुझे क्या करना होगा ? मास्टर ने उत्तर दिया चिन्ता की कोई बात नहीं है, केवल गधे को मेरे पास छोड़ना पडे़गा। बुढ़िया बड़ी आशा और भरोसे के साथ गधे को मास्टर के पास छोड़ कर चली गयी। जाते समय फिर बुढ़िया ने पूछा कि मैं अपने इस इंसान बने गधे को कब लेने आंऊ ? मास्टर ने तुरन्त कहा कि कुछ समय लगेगा। बुढ़िया गधे को मास्टर के पास छोड़ कर वहां से चली गयी।
कुछ समय के वाद बुढ़िया फिर मास्टर के पास आयी और पूछने लगी कि क्या मेरा गधा इंसान बन गया है ? चालाक मास्टर ने तो उस गधे को बेच कर पैसे बना लिये थे। सो उसने बुढ़िया से कहा कि अभी और समय लगेगा। तुम चिन्ता न करो एक न एक दिन तुम्हारा गधा इंसान अवश्य बन जायेगा। बुढ़िया चली गयी। मास्टर इस प्रकार कई वार उस बुढ़िया को कोई न कोई नया बहाना बना कर वहां से चलता कर देता था। एक दिन थक हार कर बुढ़िया ने जब मास्टर को भला-बुरा कहा और अपना गधा बापस करने को कहा तो मास्टर ने क्या करे ना करे की स्थिति में आकर बुढ़िया को जबाव दिया कि तेरा गधा तो बहुत बड़ा इंसान बन गया है वह तो अब मेरी बात भी नहीं सुनता है, मैंने कई वार तुम्हारे बारे में उसे बताया है वह कुछ सुनता ही नहीं है। बुढ़िया ने मास्टर से कहा कि तुम मुझे उसके पास ले चलो शायद मुझे देख कर उसे मेरी याद आ जाये और वह मेरे साथ चलने को तैयार हो जाये।
मास्टर बड़ी विकट समस्या में पड़ गया कुछ न सूझा तो मास्टर ने उस बुढ़िया से कहा कि देखो मैं तुम्हें वहां ले तो जाऊंगा मगर, मैं उसके सामने नही जाऊंगा। बुढ़िया राजी हो गयी मास्टर उसे सीधे कचहरी में ले गया और एक कमरे में एक उंचे स्थान पर बैठे व्यक्ति की तरफ इशारा कर, कि वह देख तेरा गधा वहां कितने उंचे पर बैठा है। वह इंसान ही नही वह बहुत ही बुद्धिमान है सबको न्याय देता है। अब वह तेरी बात नही सुनेगा। तू यहां से चल, मगर बुढ़िया अपने गधे से बिना मिले जाना नही चाहती थी। उसने वहां दरवाजे के अन्दर जाकर जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया कि क्यों रे गधे, क्यों रे गधे मैंने तुझे इंसान बनवाया, आज तू ही मुझे भी नहीं पहचानता है। इस पर कुर्सी पर बैठे इंसान को बहुत बुरा लगा और वह उस महिला के पास आया और अपनी इज्जत बचाने को बुढ़िया के पैर छुए और उसका आर्शीवाद लिया। बुढ़िया को अनजाने में ही सही कि मैरा अपना गधा आज इंसान बन गया है और लोगों की मदद करता है, लोगों को न्याय देता है। बुढ़िया इसी संतोष के साथ वहां से चली जाती है। 

कोरोना वायरस के कारण आम जन जीवन के पटरी से उतरने के बीच स्वामी विवेकानन्द

आज 200 साल वाद की इस महामारी के समय में याद आये स्वामी विवेकानन्द।
कलकत्ता नगर में महामारी (प्लैग) का प्रकोप 1898 में हुआ था। प्रतिदिन सैंकड़ों लोगों पर उसका आक्रमण होता था। हालात बिगड़ती देखकर सरकार ने स्थिति का नियंत्रण करने के लिए कड़े नियम बनाए। पर जब नगर निवासी अनुशासन की कमी से उनका पालन करने में ढीलढाल करने लगे तो शहर के भीतर और चारों तरफ फौज तैनात कर दी गई। इससे नगरवासियों में बड़ा आतंक फैल गया और उपद्रव हो जाने की आशंका होने लगी।
कलकत्ता में 200 साल पहले का स्वामी विवेकानंद का प्लेग पर घोषणा पत्र बुलेटिन के माध्यम से प्रकाशित किया गया है। बुलेटिन ने 1898 में स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखा गया प्लेग घोषणा पत्र पुनः प्रकाशित किया है। इसमें कहा गया है, “हमें खुशी होती है जब आप खुश होते हैं और जब आपको दर्द होता है तो हमें तकलीफ होती है। इसलिए, अत्यधिक विपत्ति के इन दिनों में, हम आपके कल्याण के लिए प्रयास कर रहे हैं और लगातार प्रार्थना कर रहे हैं और आपको बीमारी और महामारी के भय से बचाने का एक आसान तरीका है।
उस समय “स्वामीजी ने एक अन्य घोषणा पत्र में कहा, “ अफवाहों पर ध्यान नहीं दें। ब्रिटिश सरकार किसी को भी जबर्दस्ती टीका नहीं लगाएंगी। जो चाहेंगे सिर्फ उन्हें टीका लगाया जाएगा। “उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी प्रभावित व्यक्ती की मदद करने वाला कोई नहीं है तो उसे बेलुर मठ के श्री भगवान रामकृष्ण के सेवकों को तुरंत सूचना भेजनी चाहिए। शारीरिक रूप से संभव मदद में कोई कमी नहीं होगी।
महामारी (प्लैग) के समय स्वामी विवेकानन्द विदेशों में हिन्दू धर्म की ध्वजा फहराकर और भारतवर्ष का दौरा करके कलकत्ता आए थे। वे अपने देशी-विदेशी सहकारियों के साथ बेलूड़ में रामकृष्ण परमहंस मठ की स्थापना की योजना में संलग्न थे। लोगों पर इस घोर विपत्ति को आया देखकर वे सब काम छोडकर कर्मक्षेत्र में कूद पड़े और बीमारों की चिकित्सा तथा साफ सफाई को एक बड़ी योजना बना डाली।
गुरू-भाई ने पूछा-स्वामी जी ? इतनी बड़ी योजना के लिए ‘‘फंड’’ कहाँ से आयेगा ?
स्वामीजी ने तुरन्त उत्तर दिया- आवश्यकता पड़ेगी तो इस मठ के लिए जो जमीन खरीदी है उसे बेच डालेंगे। सच्चा मठ तो सेवा कार्य ही है। हमें सदैव संन्यासियों के नियमानुसार भिक्षा मांगकर खाने तथा पेड़ के नीचे निवास करने को तैयार रहना चाहिए। सेवा व्रत को इतना उच्च स्थान देने वाले स्वामी विवेकानन्द 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के एक मध्यम श्रेणी के बंगाली परिवार में उत्पन्न हुए थे। उस समय भारत में तीव्र वेग से अंग्रेजी राज्य और ईसाई संस्कृति का प्रसार हो रहा था। इसके परिणामस्वरूप देश में उच्चवर्ग का विश्वास अपने धर्म और सभ्यता पर से हिल गया था और ऐसा प्रतीत होने लगा था कि कुछ ही समय में इस देश में ईसाइयत की पताका उड़ने लगेगी। पर उसी समय देश में ऐसे कितने ही महामानवों का आर्विभाव हुआ जिन्होंने इस प्रबल धारा को अपने प्रभावों से दूसरी तरफ मोड़ दिया। उन्होंने हिन्दू-धर्म के सच्चे स्वरूप को संसार के सामने रखा और लोगों को विश्वास दिला दिया कि आत्मोन्नति और कल्याण की दृष्टि से हिन्दू-धर्म से बढ़कर धार्मिक सिद्धान्त संसार में और कहीं नहीं है। इन महामानवों में स्वामी विवेकानन्द का स्थान बहुत उँचा है।