ब्रज की गोबर-सांझी को बचाना केवल लोककला को नहीं, एक पूरी सांस्कृतिक स्मृति को बचाना है
मथुरा। ब्रज की सांझी का नाम आते ही आज अधिकांश लोगों के सामने वृंदावन के मंदिरों में रंगीन चूर्ण और बारीक कागजी स्टेंसिल से बनाई जाने वाली आकर्षक आकृतियां सामने आती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यही पूरी सांझी है? शायद नहीं।
ब्रज के गांवों और घरों में पितृपक्ष के दिनों में कुंवारी कन्याओं द्वारा गोबर, फूल और पत्तियों से दीवार पर सांझी बनाने की जो परंपरा रही है, वह सांझी का कहीं अधिक पुराना लोक रूप है। शाम होते ही बालिकाएं एकत्र होती थीं, सांझी बनाती थीं, उसे फूल-पत्तियों से सजाती थीं और सांझी के गीत गाती थीं।
आज यही परंपरा धीरे-धीरे गांवों से गायब होती जा रही है।
विडंबना यह है कि मंदिरों की सांझी को कला के रूप में पहचान और संरक्षण मिल रहा है, लेकिन जिस ग्रामीण लोक-स्मृति से उसका संबंध माना जाता है, वही लोक-सांझी अपने मूल परिवेश में कमजोर होती जा रही है।
सांझी केवल रंगों की आकृति नहीं
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के प्रलेखन में सांझी की लोक-परंपरा का उल्लेख मिलता है, जिसमें पितृपक्ष के दौरान अविवाहित बालिकाएं गोबर और फूलों से सांझी बनाती थीं और संध्या के समय में उससे जुड़े अनुष्ठान तथा गीत गाया करती थीं।
(आईजीएनसीए) के अध्ययन में सांझी की विकास-यात्रा को लोक, काव्य और मंदिर-इन व्यापक चरणों से जोड़कर देखा गया है। अध्ययन में घर की दीवारों से फर्श और फिर घर से मंदिर तक सांझी के पहुंचने की प्रक्रिया का भी उल्लेख मिलता है।
अर्थात लोक-सांझी और मंदिर-सांझी को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग करना भी सही नहीं है और दोनों को बिल्कुल एक जैसा मान लेना भी सही नही है।
मंदिर की हर रंगोली सांझी नहीं
ब्रज के मंदिरों की सांझी ने समय के साथ अपनी विशिष्ट कलात्मक पहचान बनाई। कागज के अत्यंत बारीक स्टेंसिल, सूखे रंग, फूल, रंगीन पत्थर, शीशे और धातु-पन्नी आदि से राधा-कृष्ण की लीलाओं और ब्रज के प्राकृतिक परिवेश को चित्रित किया गया।
भारत सरकार के हस्तशिल्प पोर्टल पर मथुरा की सांझी को विशिष्ट पेपर-स्टेंसिल कला के रूप में दर्ज किया गया है।
इसलिए मंदिर के फर्श पर बनाई गई प्रत्येक रंगोली को सांझी कहना ऐतिहासिक और कलात्मक दोनों दृष्टियों से उचित नहीं है। रंगोली एक व्यापक भारतीय लोक परंपरा है, सांझी उसका पर्याय नहीं।
फिर गांव की सांझी कहां गई? यही सबसे बड़ा प्रश्न है।
बदलता ग्रामीण जीवन, संयुक्त परिवारों का टूटना, पारंपरिक लोकगीतों का कम होना और नई पीढ़ी का लोक अनुष्ठानों से दूर होना। इन सबके बीच सांझी बनाने वाली बालिकाओं की वह सामूहिक परंपरा भी कमजोर हुई है।
जिस सांझी को कभी दादी-नानी अपनी पोतियों और नातिनों को सिखाती थीं, आज कई जगह उसका ज्ञान ही अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंच पा रहा। एक बार लोक-स्मृति टूट गई तो केवल डिजाइन की पुस्तक बनाकर उस परंपरा को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है।
गोबर की सांझी को फिर से दीवार पर लौटाना होगा
ब्रज की सांझी के संरक्षण की शुरुआत किसी बड़े मंच से नहीं, बल्कि गांव के घर और आंगन से होनी चाहिए। पितृपक्ष में स्थानीय संस्थाएं गांवों की कन्याओं के साथ बैठक करें। उन्हें सांझी बनाने की पुरानी विधि बताई जाए। बुजुर्ग महिलाओं को बुलाकर पुराने सांझी गीत सिखाए जाएं।
और सबसे महत्वपूर्ण-
गोबर, फूल और पत्तियों से बनने वाली पारंपरिक सांझी को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाए। क्योंकि यदि सांझी केवल आधुनिक रंगों, कागज और प्रतियोगिता तक सीमित रह गई तो हम उसके बाहरी रूप को तो बचा लेंगे, लेकिन उसकी लोक आत्मा खो देंगे।
सांझी में छिपा है लोक-ज्ञान
सांझी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी। बालिकाएं इसमें फूल-पत्तियों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और स्थानीय प्रकृति से जुड़े रूपों को पहचानती थीं। साथ ही उन्हें लोकगीत, सामाजिक संबंधों और सामूहिक जीवन की परंपराओं का ज्ञान भी मिलता था।
इस दृष्टि से सांझी अनौपचारिक लोक-शिक्षा का भी माध्यम थी।
एक बालिका अपनी मां या दादी से सांझी बनाना सीखती थी और उसके साथ एक पूरा लोक-संसार अगली पीढ़ी तक पहुंचता था।
क्या सांझी सिन्धु सभ्यता से आई?
सांझी की प्राचीनता को लेकर अनेक मत और परिकल्पनाएं सामने आती रही हैं। इसे सूर्य-उपासना, संध्या-पूजा, प्राचीन वैदिक परंपराओं, सिन्धु सभ्यता अथवा इंडो-ग्रीक संस्कृति से जोड़ने के प्रयास भी किए जाते हैं।
लेकिन यहां इतिहास की एक सामान्य सावधानी जरूरी है।
किसी परंपरा की प्राचीनता और उसके निश्चित उद्गम-दो अलग बातें हैं। सिन्धु सभ्यता या इंडो-ग्रीक परंपरा से सांझी की सीधी ऐतिहासिक कड़ी स्थापित करने के लिए ठोस पुरातात्विक और अभिलेखीय प्रमाण आवश्यक हैं। जब तक ऐसे प्रमाण उपलब्ध न हों, इन विचारों को शोध-परिकल्पना के रूप में ही देखा जाना चाहिए। फिलहाल उपलब्ध दस्तावेजी सामग्री से इतना अवश्य कहा जा सकता है कि सांझी के विविध लोक रूप उत्तर और मध्य भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित रहे हैं और ब्रज में इसका विशिष्ट मंदिर रूप विकसित हुआ।
सांझी के संरक्षण का नया अभियान क्यों नहीं?
ब्रज में यदि मंदिर-सांझी के प्रदर्शन और संरक्षण के लिए संस्थाएं काम कर सकती हैं तो लोक-सांझी के पुनर्जीवन के लिए भी एक संगठित अभियान चलाया जा सकता है।
नाम हो सकता है-
“लोक पर्व-सांझी सोली”
पितृपक्ष के दौरान ब्रज के गांवों में-
एक गांव, एक सांझी।
एक आंगन, एक सांझी।
एक बेटी, एक परंपरा।
जैसी पहल की जा सकती है।
गांव की बुजुर्ग महिलाओं को ’लोक-सांझी गुरु’ के रूप में जोड़ा जाए। बालिकाएं उनसे सांझी के पुराने रूप और गीत सीखें। प्रत्येक गांव की सांझी की फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग हो। पुराने गीत लिखे और रिकॉर्ड किए जाएं। इससे सांझी केवल उत्सव नहीं रहेगी, बल्कि ब्रज की लोक-संस्कृति का जीवित दस्तावेज बन सकती है।
आज हमें यह तय करना होगा कि हम सांझी को केवल मंदिरों की सुंदर कला के रूप में बचाना चाहते हैं या उस लोक-स्मृति को भी बचाना चाहते हैं जिसने उसे पीढ़ियों तक जीवित रखा।
मंदिरों की सांझी को बचाना जरूरी है।
लेकिन उसके साथ-साथ गांव की वह दीवार भी बचनी चाहिए, जिस पर पितृपक्ष की शाम एक ब्रज की बेटी अपने हाथों से गोबर की सांझी बनाती है।
वहां कोई बड़ा कलाकार नहीं होता।
कोई महंगा रंग नहीं होता।
कोई स्टूडियो नहीं होता।
होती है तो बस-एक दीवार, थोड़ा गोबर, कुछ फूल-पत्तियां, सांझ का समय, लोकगीत और परंपरा को आगे ले जाती हुई ब्रज की बेटियां। और शायद यही सांझी का सबसे बड़ा सौंदर्य है। सांझी को संग्रहालय में रखने से पहले उसे गांव की दीवार पर वापस लाना होगा।
-प्रस्तुति : सुनील शर्मा























