एक नदी जो मरने के कगार पर है, यह यमुना नदी जो कि मथुरा शहर के बीच से होकर बहती यमुना नदी दशा ठीक नहीं है यमुना में गिरने वाले नाले निरन्तर यमुना नदी में जाकर गिर रहे हैं, मसानी नाला निरन्तर यमुना नदी में जाकर गिर रहा है। यमुना नदी अब विलुप्त होने के कगार पर है न कोई जनप्रतिनिधि, न जिलाप्रशासन, न ही स्थानीय नागरिकों का ध्यान इस ओर है, असंख्य लोगों की आस्था आहत हो रही हैं।
बुधवार, 25 अगस्त 2021
रविवार, 22 अगस्त 2021
ऐसे भी विधायक हुए जिन्होंने अपने सिद्धान्तों के चलते मंत्री पद ठुकरा दिया था
ऐसे भी विधायक हुए जिन्होंने अपने सिद्धान्तों के चलते मंत्री पद ठुकरा दिया था
सुनील शर्मावृंदावन (मुथुरा)। सत्यनिष्ठा और गांधीवादी चरित्र के लिए जाने जाने वाले शिक्षक बाल शिक्षक संघ के जनक गुरु कन्हैया लाल गुप्त जिन्होंने अपने सिद्धान्तों से कभी समझोता नहीं किया और शिक्षामंत्री के पद तक को भी ठुकरा दिया था। जिन्होंने वृंदावन की एक छोटी सी गली में रहकर अपने जीवन के आखिरी दिन बड़े ही कष्ट में काटे थे। जिन्होंने मथुरा के लिये आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्द्रागांधी के नसबंदी अभियान के खिलाफ गांधीवादी तरीके से विरोध का रास्ता चुनकर आन्दोलन की शुरूआत की थी और आमजन की आवाज बने थे। उस गांधीवादी नेता को आज राजनीतिज्ञ, समाजसेवियों, शिक्षाविदों ने ही भुला दिया।
आज के समय यह मान लिया जाता है कि राजनैतिक पृष्ठभूमि या राजनैतिक परिवार से आने वाला व्यक्ति ही राजनीति में आ सकता है मगर इस मिथक को कन्हैया लाल जी ने तोड़ा और आम जनता के बीच से उठकर आम जनता की आवाज बने थे। अब कोई भी आम जनता की आवाज बन कर कार्य नहीं करना चाहता है आज सिर्फ बड़ी लम्बी चौड़ी उंची गाडी में बैठ कर सफेद कुर्ता पायजामा पहन कर अपने आपको नेता सिद्ध करने में लगे रहते हैं, जिसका परिणाम है कि राजनीति इतनी दूषित व भृष्ट हो चुकी है।
कन्हैया लाल गुप्त जी एक सच्चे ईमानदार इंसान थे। उन्होंने अपना जीवन दूसरों की भलाई व समाजसेवा करते हुए ही निकाला। वह जीवन के आखिरी पड़ाव तक वृद्धावस्था के चलते वृन्दावन की कुंज गलियों में एक छोटे से मकान में समय गुजारते रहे। किसी भी प्रचार प्रसार व सम्मान से दूर रहने वाले कन्हैयालाल गुप्त आपातकाल के हटते ही जनता पार्टी की टिकट पर जनवरी 1977 में हुए 7 वीं विधानसभा चुनावों में 37813 रिकार्ड मतों से विजयी होकर लखनऊ तक पंहुचे लेकिन श्री गुप्त को लखनऊ की राजनीति कभी रास नहीं आई शिक्षामंत्री बनाये जाने का प्रस्ताव भी उन्होंने उस समय ठुकरा दिया था। जब फरवरी 1980 में विधानसभा पुनः भंग हो गई वह मात्र 969 दिनों तक ही विधानसभा के सदस्य रह सके।
आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्द्रागांधी के नसबंदी अभियान के खिलाफ गांधीवादी तरीके से विरोध का रास्ता चुनकर उन्होंने आन्दोलन की शुरूआत की थी। इमरजेंसी के दौरान ही कन्हैयालाल जी को 25 अगस्त 1976 को चम्पा अग्रवाल इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य कक्ष से ही गिरफ्तार कर लिया गया था।
इसके वाद कॉलेज के लगभग तीन दर्जन से अधिक शिक्षकों और सैकड़ों छात्रों ने उनकी गिरफ्तारी के विरोध में जुलूस निकाला और सड़कों पर उतर आये थे, मथुरा की आम जनता का भी उनके प्रति इतना आदर सम्मान था कि हर कोई उस समय गुप्त जी की गिरफ्तारी का विरोध करने को सड़कों पर आन्दोलन करने को मजबूर हो गया था।
चम्पा अग्रवाल इन्टर कॉलेज में सन् 1967 से लेकर 1977 तक प्रधानाचार्य के पद रहे गुप्त जी की ईमानदारी, निर्भीकता के चर्चे आज तक लोग करते हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में विद्यालय में अनेक आवारा तथा उपद्रवी छात्रों को ठीक रास्ते पर लाने का प्रयास किया यहां तक कि एक छात्र जिसका गन्डागर्दी में काफी नाम था, उसको कॉलेज से बाहर सड़क पर डाल कर पिटाई तक कर दी थी। उनके रहते कॉलेज में छात्रों में काफी भय रहता था। उनके कार्यकाल में विद्यालय का नाम केबल जनपद भर में ही नहीं था बल्कि पूरे प्रदेश में कॉलेज की अपनी एक पहचान थी। 1980 में एक दिन जब कॉलेज में परीक्षाओं का समय था तब उन्हें पता चला कि छात्र अपने साथ नकल करने की सामग्री लेकर आये हैं तब उन्होंने प्रार्थना के समय छात्रों को इतना भावुक होकर कहा कि सभी छात्र जो नकल सामग्री लेकर आये थे, सभी ने नकल सामग्री को प्रार्थना के समय ही कॉलेज के फर्स पर ही छोड़ दिये थे।
कन्हैयालाल गुप्त जी अपनी लोकप्रियता के चलते लगभग 44 संस्थाओं के महत्वपूर्ण पद पर आसीन थे। लेकिन उन्होंने अपने स्वभाव के कारण राजनीति से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति पा ली थी और भगवान श्रीकृष्ण राधा की रास स्थली वृन्दावन को अपने वास करने का हेतु बना लिया था। उन्होंने शरीर त्यागने तक कभी भी वृन्दावन से बाहर नहीं गये। जब तक वह जीवन के आखिरी पड़ाव तक वृद्धावस्था के चलते वृन्दावन की कुंज गलियों में एक छोटे से मकान में समय गुजारते रहे। किसी भी प्रचार प्रसार व सम्मान से दूर रहे और भगवान भजन में ही अपना जीवन व्यतीत किया।
श्री कन्हैया लाल जी मूलतः कस्वा माँट के रहने वाले थे। गुप्त जी शिक्षक होने के नाते दो बार विधान परिषद में एमएलसी भी रह चुके थे। उन्होंने हमेशा शिक्षा में सुधार लाने के लिए प्रयास किये इसके लिए गठित कोठारी आयोग के सदस्य भी रहे। वृंदावन में स्थित टीबी सेनेटोरियम के संस्थापक के रूप में भी उन्हें आज भी जाना जाता है।
कन्हैया लाल जी ने समाज में जो छाप छोडी है उसके कारण ही लोग आज तक मथुरा के गांधी के रूप में उन्हें जानते हैं। मगर कन्हैया लाल जी इस बात से काफी दुखी होते थे कि उनकी तुलना महान देशभक्त व राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से की जाती है। इसके लिए भी उन्होंने हमेशा पूर्व के लेखकों से अपनी वेदना व्यक्त की थी। कन्हैया लाल जी के दो पुत्र हैं जो आज भी बाहर नौकरी करते हैं। उनकी सेवा में बांके बिहारी अग्रवाल ने अन्तिम समय तक उनका साथ दिया। जीवन के अन्तिम समय में कन्हैया लाल जी 90 वर्ष की अवस्था में जब उन्हें चलना फिरना भी मुस्किल हो रहा था और शारीरिक दुर्बलता के चलते अपनी पेंशन की राशि तक बैंक से नहीं निकाल पाते थे क्यों कि चैक पर हस्ताक्षर करते समय उनके हाथ कांपते थे जिससे हस्ताक्षर न मिल पाने के कारण भी बैंक कर्मी उनके चैकों में फर्क बता कर लौटा दिया करते थे। अन्तिम समय में उनका जीवन काफी कष्ट में बीता, आज न किसी शिक्षक संघ को न किसी सामाजिक संस्था को न ही किसी राजनैतिक नेता को उनके द्वारा किये गये कार्यों की याद आती है न ही उन्हें आज के समय में याद किया जाता है।
मंगलवार, 3 अगस्त 2021
एक निराले शिक्षक, सबके प्यारे शिक्षक-निमाई प्रसाद मोइत्रा
एक निराले शिक्षक, सबके प्यारे शिक्षक-निमाई प्रसाद मोइत्रा
मथुरा। वृंदावन के निमाई प्रसाद मोइत्रा जो जनसंघ की स्थापना के दौर से ही इस संस्था के समर्पित व सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में रहे। उनकी यादें आज भी अधिकांश लोगों के जहन में हैं। मगर जिनके कारण कुछ लोग इस संगठन से जुड़े व वर्तमान राजनीति में हैं उन्होंने इस महान विभूति को भुला दिया। निमाई दादा वृन्दावन के लोगों के बड़े चहेते थे, अब वह इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके आदर्श और ईमानदारी के चरचे आज भी लोग करते हैं। लोगों को निमाई प्रसाद मोइत्रा के जीवन को जानना चाहिए कि किस प्रकार के कष्ट के साथ उन्होंने तमाम छात्रों को शिक्षित किया और हजारों छात्रों का जीवन शिक्षा देकर बनाया।
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| निमाई प्रसाद मोइत्रा को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल बी सत्य नारायण रेड्डी व्हील चेयर प्रदान करते हुए। |
निमाई प्रसाद मोइत्रा का जन्म कुलीन बंगाली ब्राहम्ण परिवार में 2 अगस्त 1937 को वर्तमान बांग्लादेश के रंगपुर जिले के कुरीग्राम में हुआ था। उनके पिता डॉ. वी. पी. मोइत्रा पेशे से डाक्टर थे उन्होंने सन् 1942 में वृन्दावन के रामकृष्ण मिशन अस्पताल में नौकरी शुरू की थी। वृन्दावन में ही नहीं उस समय एक मात्र अच्छा और बड़ा अस्पताल होने के कारण उन्हें यहां खूब यश मिला। वह असहाय और गरीब लोगों के मददगार थे, उनकी उदारता और पीड़ित मानवता की सेवा ने लोगों के मन में उनके प्रति अटूट विश्वास पैदा कर दिया। इसका एक उदाहरण यह भी है कि वृन्दावन स्थित रामकृष्ण मिशन अस्पताल ‘‘कारे बाबू अस्पताल’’ के नाम से लोकप्रिय हो गया। कारे बाबू यानी डॉ. मोइत्रा को लोग कारे बाबू के नाम से पुकारते थे। आज भी लोगों की जुबान पर रामकृष्ण मिशन अस्पताल का नाम कारे बाबू अस्पताल ही है। डॉ. मोइत्रा के गुण उनके पुत्र निमाई में भी आए होंगे। निमाई प्रसाद चार भाइयों में सबसे छोटे थे सबसे बड़े भाई कृष्ण दास जिन्होंने वैराग्य धारण किया और वृन्दावन में ही एक आश्रम में रहते हैं। दूसरे नम्बर के भाई रासबिहारी मोइत्रा जो रेलवे में सिग्नल इन्सपेक्टर के पद पर थे। तीसरे नम्बर के भाई बलराम मोइत्रा भी रेलवे में सर्विस करते थे सहायक इन्जीनियर के पद से सेवा निवृत होकर वृन्दावन के ही पैत्रक निवास में आज भी रहते है।
निमाई शुरू से ही पढाई में बहुत अच्छे थे। आगरा के आर.बी. एस. कॉलेज से एम. एस. सी. की डिग्री लेने के बाद निमाई को मथुरा के किशोरी रमण इंटर कॉलेज में अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिल गयी। निमाई प्रसाद मोइत्रा ने अपने जीवन काल में अपने हंसमुख स्वाभाव के कारण ही सभी को अपना बना लिया, जिसके कारण वृन्दावन में अपने मृदु भाषी और मिलनसार होने के चलते निमाई दादा को 1972 में नगर पालिका परिषद का सदस्य चुना गया। निमाई दादा का सामाजिक संपर्क खूब अच्छा था और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सक्रिय सदस्य होने के चलते तथा जनसंघ के शुरूआती दौर में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। सर्व समाज में अच्छी पकड़ होने और हरेक की मदद करने के कारण भी लोग उनसे काफी प्रभावित थे। उस समय पड़ोसी हो या अनजान, रात का वक्त हो या दिन का निमाई दादा जरूरतमंद के संग हर समय जाने के लिए तैयार रहते थे। रामकृष्ण मिशन अस्पताल में किसी को भर्ती कराना हो या उसके लिए अपने घर से खाना पहुंचाना हो निमाई अक्सर अपनी माँ से रोगी के लिए घर से खाना बनवा कर पहुंचाने भी जाते थे।
निमाई प्रसाद मोइत्रा मथुरा के किशोरी रमण इन्टर कॉलेज में केमिस्ट्री के शिक्षक थे। वृंदावन से साइकिल पर चल कर 10 किलोमीटर का रास्ता तय कर वह हर रोज मथुरा आते थे। समय के इतने पाबंद थे कि कभी भी एक मिनट देरी से कॉलेज में दाखिल नहीं हुए होंगे। एक दिन वृन्दावन में मकान की छत पर कुछ कार्य करते समय निमाई दादा उपर से नीचे गिर कर घायल हो गये। किसी तरह जान तो बच गई मगर रीड़ की हड्डी चोट लगने के कारण शरीर के नीचे का आधा हिस्सा हमेशा-हमेशा के लिए बेकार हो गया। 1987 में उन्हें उपचार के लिए दिल्ली ले जाया गया था तमाम चिकित्सकों से उपचार कराया गया मगर निमाई दादा कभी स्वयं उठ कर चल फिर न सके।
कॉलेज के उस समय के अन्य शिक्षकों ने उनकी खूब मदद की लेकिन समस्या थी कि वह कॉलेज कैसे जाएँगे। कॉलेज प्रबन्धन ने भी उनके प्रति काफी सहानुभूति दिखाते हुए एक सुझाव दिया कि हर महीने में एक बार कॉलेज का हस्ताक्षर रजिस्टर चपरासी घर ले कर जाया करेगा ताकि आप रजिस्टर पर हस्ताक्षर कर दें और आपको वेतन मिल सकेगा। बिस्तर पर लेटे निमाई दादा ने इस सुझाव को मानने से इंकार कर दिया और विनती की कि कॉलेज में ही उन्हें एक कमरा दे दिया जाये, ताकि वह वहां अपना निवास बना लेंगे और व्हील चेयर पर बैठ कर कक्षा में चले जाया करेंगे। और क्लास ले लेंगे, इस अनुरोध को कॉलेज के प्रधानाचार्य ने मानकर इसकी व्यवस्था कर दी।
निमाई प्रसाद का आधा शरीर बेकार हो चुका था। इसके बावजूद वह सात वर्षों तक मथुरा किशोरी रमण इण्टर कॉलेज में रसायन शास्त्र पढ़ाते रहे। वह स्कूल के ही कमरा नंबर पाँच में रहते थे और व्हील चेयर पर बैठकर ग्यारहवीं व बारहवीं कक्षा में पढ़ाने जाया करते थे।
असहनीय कष्टों में रहते भी निमाई दादा ने सदैव मुस्कराते हुए गुजारा उनका एक हाथ व्हील चेयर के एक पहिए पर रहता था और दूसरे हाथ में चौक का टुकड़ा लेकर ब्लेक बोर्ड पर लिखते तो दूसरे ही क्षण छात्रों की ओर मुड़ कर समझाते भी थे। कॉलेज का घंटा बजने पर निमाई दादा व्हील चेयर लेकर अपने घर यानी कमरा नंबर पांच की तरफ चले जाते थे।
निमाई दादा के अध्यापकीय जीवन की उनकी जिम्मदारी व ईमानदारी और निष्ठा आज के अध्यापकों में शायद ही मिल पाये। हालांकि उस समय भी तमाम शिक्षक ऐसे थे जो अपनी जिम्मेदारी से शिक्षण कार्य करते हों। तमाम अव्यवस्था में डूबे इस कॉलेज के दिन कभी बदल ही नहीं पाये। उस समय के कई शिक्षक ऐसे थे, जिन्होंने कई सालों तक कोई कक्षा ही नहीं ली और वेतन बरावर लिया करते थे, उस समय भी चर्चा थी कि एक शिक्षक बिना कक्षा में गए वेतन लेते हुए रिटायर हो गए।
निमाई प्रसाद मोइत्रा के परिवार में एक पुत्र, एक पुत्री और पत्नी थे। निमाई दादा का जीवन हमेशा से कष्ट में ही बीता दुःख ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा उनके जीवन में एक बज्राघात और हो गया साधारण से बुखार में उनका 19 वर्षीय बेटा जिसकी असमय मृत्यु हो गई। कॉलेज के कमरा नंबर पांच में उनकी पत्नी उनकी सेवा करती थीं, लेकिन पुत्र की मौत ने पहले से दुःखी पत्नी को और ज्यादा दुःखी कर दिया। निमाई दादा पुरानी सुखद बातों को याद करके भले ही लोगों के बीच अपने दुःख को भुलाने प्रयास करते थे, मगर अपने दुःख को किसी के सामने प्रकट नहीं होने देते थे, इस अपार दुःख ने निमाई दादा को तोड कर रख दिया था। निमाई दादा के सबसे बड़े भाई कृष्णदास मोइत्रा शिक्षा-विभाग में कार्य करते रिटायर हुए थे। वैराग्य धारण कर साधु हो गए, भतीजे की मौत की खबर सुन इलाहाबाद से मथुरा आ गए और अपने छोटे भाई निमाई की पत्नी को वृन्दावन के मकान में समझा-बुझा कर रहने के लिए राजी कर लिया और उन्हें वहां भेज कर स्वयं निमाई के साथ जब तक किशोरी रमण इन्टर कॉलेज में व्हील चेयर पर बैठकर अध्यापन कार्य करते, कृष्णदास मोइत्रा उनके साथ रहे और छोटे भाई की सेवा करते रहे। एक सच्चे साधु की तरह से उन्होंने अपने भाई की सेवा की आज भी वह वृन्दावन में एक आश्रम में रह कर भजन करते हैं।
मुझे भी निमाई दादा से मिलने का कई वार मौका मिला था मैं कई वार उनसे मिलने किशोरी रमण इन्टर कॉलेज के कमरा न. 5 में गया था। उनसे बातों-बातों में जब पूछा कि आप अपने जीवन की ऐसी घटना बतायें जो आपको याद हो इसके उत्तर में निमाई दादा व्हील चेयर पर बैठे अपने बेजान पैरों को देखते हैं और फिर बोलने लगते कि- एक समय था जब, मैं आगरा राजामंडी स्टेशन पर खड़ा था। मथुरा आने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहा था। मालूम हुआ कि ट्रेन चार घंटे लेट है। सोचा पटरी-पटरी चलूंगा तो पहुँच जाऊँगा। काफी देर इंतजार करने के वाद रेल की पटरी पर चल दिया। रेल की पटरी के दोनों ओर के दृश्यों को देखता-देखता चला आया पता ही नहीं चला कि कब मथुरा आ गया।’’ यह कहकर निमाई दादा जोर से हंस पड़े।
बातचीत करते निमाई दादा अक्सर अपने अतीत में खो जाते थे और सोचने लगते थे कि एक जमाना वह था जब 50 कि0 मी0 की दूरी मैंने इन्हीं मजबूत पैरों से चलकर नाप दी थी और अब वक्त यह आया है कि मैं व्हील चेयर पर उम्र भर बैठे रहने को मजबूर हो गया हूँ। निमाई दादा बोले-‘‘जीवन में वह सब घटता है जिसकी हम कल्पना नहीं करते।“ 50 कि0 मी0 तक पैदल चलने वाले निमाई दादा ने कभी सोचा नहीं था कि उनके पैर इस प्रकार बेजान हो जाऐंगे और उन्हें दूसरों के सहारे जीना पडे़गा।
लगातार बिस्तर पर लेटे-लेटे निमाई दादा के शरीर में घाव हो गए थे। खून और मवाद निकलता रहता था। ऐसी हालत में भी निमाई दादा क्लास में पढ़ाने जरूर जाते थे। निमाई मोइत्रा को कभी किसी से कोई शिकायत नहीं थी। जिन लोगों से जुड़े रहे थे उन्होंने भी मुँह मोड़ लिया था कभी किसी ने कोई सुध नहीं ली आज निमाई दादा भलेही न हों लेकिन आज भी उनके चाहने वाले उनके पढ़ाये शिष्य तो जरूर हैं जिन्हें आज भी उनकी यादें आती हैं। मगर साथ चलने वाले तथा भारतीय जनसंघ तथा आर एस एस तक में साथ रहने वाले लोगों ने उन्हें भुला दिया तथा अब वह कोई उनकी चर्चा भी नहीं करते हैं। मगर निमाई दादा ने कभी किसी की टीका टिप्पणी नहीं की।
उनके बड़े भाई बलराम मोइत्रा ने एक मुलाकात में बताया कि वह अक्सर चर्चा करते थे और कहते थे कि ‘‘शिक्षक चाहे तो आज भी छात्रों को अपना बनाकर समाज की दिशा को बदल सकता है’’। अन्तिम दिनों में वह यह कहा करते कि ‘‘अब मेरे मन में ज्यादा जीने की ललक नहीं है क्योंकि मैं अब दूसरों पर भार बन गया हूँ। लेकिन कभी कभी विचार आता है कि शरीर एक अद्भुत मशीन है। एक दुर्घटना में एक पुर्जा खराब हुआ तो क्या हुआ। मन तो नहीं मरा। आखिरी श्वांस तक छात्रों को पढ़ाता रहूं यही मेरी इच्छा है।’’
गजब की इच्छा-शक्ति लिए निमाई दादा रिटायर होने के बाद वृन्दावन में रहे। उनके भाई का परिवार उनकी सेवा करता रहा। बिस्तर पर जीवन जीने वाले निमाई दादा एकदम निश्छल, मनमोहक मुस्कराहट के साथ वृन्दावन के लोगों के लाड़ले बन गए। उन्होंने 2010 में वृन्दावन में लगने वाले कुम्भ में ले जाने की इच्छा अपने बड़े भाई से की और कुम्भ में बड़े भाई ने स्नान कराया और उसके वाद ही निमाई दादा ने इस संसार से बिदा ले लिया था।
मैं कभी कभी सोचता हूँ कि भगवान क्यों किसी को इतना कष्ट देता है जो लागों की मदद करने को तत्पर रहता हो हजारों छात्रों के जीवन को जिसने बनाया हो उनको एक दिशा प्रदान करने वाले के साथ ऐसा क्यों हुआ कि वह जीवन भर पैरों से लाचार हो गये दूसरों के भरोसे जीने को मजबूर हो गये। धन्य है निमाई दादा! उन्होंने इसके लिए भगवान को कभी जिम्मेदार नहीं ठहराया और न कभी अपने भाग्य को कभी कोसा।
आज दुःख इस बात का है कि मथुरा-वृंदावन में जिस पार्टी व संगठन के लिए जिस व्यक्ति ने जो किया उसे उन्हीं के साथी मित्रों व तथाकथित समाजसेवियों ने उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए भुला दिया।
शनिवार, 24 जुलाई 2021
आधुनिकता की दौड़ में प्राचीन स्मृतियां और पहचान से दूर होती मथुरा
मथुरा। मथुरा-वृन्दावन में कृष्ण काल के कितने ही चिन्ह स्थान और प्राचीन घाट काल के गाल में समा चुके हैं हमने आधुनिकता की दौड़ में अपनी प्राचीन स्मृतियों और पहचान को नष्ट कर दिया है। बहुत से ऐसे स्थान हैं जिनका अब केवल नाम ही बचा है निशानियां भी नष्ट हो चुकी हैं शायद ही लोग अब बता पायें कि प्राचीन घाट और एतिहासिक स्थान यहां कभी थे।
मथुरा में कुछ सुप्रसिद्ध और प्राचीन घाट आज भी मौजूद हैं बारह घाट दक्षिण कोटि के और बारह घाट उत्तर कोटि के हैं। मथुरा की परिक्रमा हर एकादशी और अक्षयनवमी को सामुहिक रूप से दी जाती है। देवशयनी और देवोत्थापनी एकादशी को मथुरा-वृंदावन की परिक्रमा एक साथ भी दी जाती है, कोई-कोई तो गरुडगोंविन्द जी को भी शामिल कर लेते हैं। वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को भी रात्रि में परिक्रमा दी जाती है। इसको वन-बिहार की परिक्रमा कहते हैं। परिक्रमा के मार्ग पर गाना-बजाना भी होता था, कहीं-कहीं नाटक या नौटंकी जैसे अभिनय भी किये जाते थे। ऐसी मान्यता है कि दाऊजी ने द्वारका से आकर वसन्त ऋतु के दो मास ब्रज में रहकर जो अपने भक्तजनों को सुख दिया था और वन-बिहार किया था एवं यमुना का पूजन किया था, यह उसी लीला की स्मृति है। परिक्रमा में जो स्थान आते हैं उसमें यहां के चौबीस घाट भी आ जाते हैं।
विश्राम घाट, गतश्रमनारायण मन्दिर, कंसखार, सतीका बुर्ज, चर्चिकादेवी, योगघाट, पिप्पलेश्वर महादेव, योगमार्गवटुक, प्रयागघाट, वेणीमाधव का मंदिर, श्यामाघाट, श्यामजी का मंदिर, दाऊजी, मदनमोहनजी, गोकुलनाथ जी का मंदिर, कनखल तीर्थ, तिन्दुक तीर्थ (यह आजकल नष्ट हो चुके हैं इनका नामोनिशान मौजूद नहीं है)। सूर्यघाट, धु्रवक्षेत्र, ध्रुवघाट यहां पर तीर्थश्राद्ध हुआ करते थे। ध्रुवटीला, सप्तऋर्षि टीला (इसके भीतर से यज्ञ भस्म निकलती है- यहां सप्तर्षियों के दर्शन हैं), कोटितीर्थ, कंस की नगरी में रावणटीला के नाम से भी स्थान था जो आज नष्ट हो चुका है, बुद्धतीर्थ, बलिटीला, यहां भी यज्ञ भस्म निकलने की वात आज भी लोग बताते हैं। यहीं पर बलिराजा और वामन जी के दर्शन मिलते थे। रंगभूमि (कुबलयापीड स्थान, धनुष भङ्ग स्थान आज कहीं खो गये हैं, चाणूरमुष्टिक वध स्थान का भी आज कहीं पता ही नहीं है, जिसे लोग आज भी कंस टीला के नाम से जानते हैं-यह प्राचीन प्रतीत नहीं होता है।
प्राचीन रंगेश्वर महादेव आज भी लोगों के मन में बसते हैं साबन के सोमवार को यहां बड़ी भींड़ उमडती है। सप्तसमुद्रकूप, शिवताल यह राजा पटनीमल का बनवाया हुआ है पहले यह एक साधारण कुण्ड हुआ करता था आज बहुत ही सुन्दर तथा पत्थरों का बना विशाल कुण्ड मौजूद है।, बलभद्र कुण्ड, भूतेश्वर महादेव भी अभी तक पूजे जाते हैं, बड़े ही चमत्कारी महादेव हैं, यहीं पर योगमाया का मंदिर भी मौजूद है यह पाताल देवी के नाम से प्रसिद्ध है। पोतरा कुण्ड जो विशाल कुण्ड के रूप में आज भी मथुरा के प्राचीन इतिहास का साक्षी बना हुआ है इस कुण्ड़ को वर्षों वाद सजाया संवारा गया है आज इस कुण्ड को एल ई डी लाइट की सजावट से सजाया गया है रात्रि में यह तीर्थ यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है।, इसी के निकट ज्ञानवापी भी है विशाल जल श्रोत का एक कुंआ मौजूद है विवाद के चलते इस पर मुसलमानों ने कब्जा किया हुआ है। श्रीकृष्ण जन्मस्थान विशाल प्रांगण में अवस्थित है जहां लाखों तीर्थ यात्री भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए आते हैं, इसके निकट ही प्राचीन केशवदेव का मंदिर भी है जिसमें आकर्षक चर्तुभुज प्रतिमा काले पत्थर की स्थापित है, कृष्णकूप, कुब्जा कूप, इनका नाम ही शेष रह गया है आसपास विशाल कॉलोनियों के निर्माण ने इस ऐतिहासिक धरोहरों को या तो नष्ट कर दिया है या यह अपनी पहचान आज के आधुनिक युग के विकास में कहीं खो चुके हैं। महाविद्या का प्राचीन मंदिर आज भी बड़ी उचाई पर स्थित है जिसके नाम से ही महाविद्या कॉलोनी का विकास हुआ है। इन प्राचीन धरोहरों को नष्ट करने में मथुरा वृन्दावन विकास प्राधीकरण का हाथ भी कुछ कम नहीं है। विकास के नाम पर अति प्राचीन व एतिहासिक धरोहरों को नष्ट भष्ट किया जा चुका है कुछ का तो नामो निशान ही आज मिट गया है। सरस्वती नाला, सरस्वती कुण्ड, सरस्वती देवी का प्राचीन मंदिर पर भी आज व्यक्तिगत लोगों का कब्जा हो चुका है। चामुण्डा देवी का प्राचीन मंदिर भी मौजूद है यहां वर्ष भर देवी भक्तों का तांता लगा रहता है। इसके आसपास की जमीनों पर कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं। उत्तरकोटि के तीर्थों में गणेश टीला आज भी मौजूद है, मनमोहक गणेश जी की प्रतिमा है। गणेशजी के नाम से गणेश टीला के नीचे की जमीनों पर कब्जा होता चला गया यमुना के खादरों और डूब क्षेत्र को भूमाफियाओं ने बेच कर अवैध कॉलोनियों का निमार्ण कर दिया, जहां बहुत बड़ी आवादी के बस जाने के कारण प्रतिवर्ष यमुना जल स्तर के बढ जाने की स्थिति में जिला प्रशासन को इन्हें हटाने में बड़ी मेहनत करनी पडती है।, गोकर्णेश्वर महादेव भी अतिप्राचीन महादेव में से एक हैं यहां आदमकद भोलेनाथ की प्रतिमा के दर्शन होते हैं शायद ही भोलेनाथ का यह स्वरूप अन्यत्र कहीं मिले, मगर इस मंदिर के साथ लगी सारी सम्पत्ति भी बेची जा चुकी है सिर्फ मंदिर का भाग ही बचा है बाकी आसपास की भूमि पर कॉलोनियां, मकान आदि का निमार्ण हो चुका है। गौतम ऋर्षि की समाधि का आज नामो निशान मिट चुका है कहां पर स्थित है, कहा नहीं जा सकता है। इसी प्रकार से सेनापति का घाट लुप्त हो चुका है। सरस्वती संगम और दशाश्वमेध घाट, अम्बरीष टीला जाने कहां गुम हो गये आज लोगों के स्मृति पटल से यह स्थान गायब हो चुके हैं।
चक्रतीर्थ घाट जो प्राचीन घाटों में गिना जाता है। यमुना सौंदर्यीकरण और यमुना शुद्धिकरण के नाम पर यमुना के प्राचीन घाटों को किस प्रकार से नदी की धारा से दूर किया जा रहा है यह जिला प्रशासन से लेकर मथुरा वृन्दावन विकास प्राधीकरण व सिचाई विभाग और मथुरा वृन्दावन नगर निगम सहित पर्यटन विभाग ने भी आँखें मूंद ली हैं। यमुना किनारे के कुछ घाट आज सिर्फ नाम के लिए जिन्दा हैं, उनका अस्तित्व ही समाप्त कर दिया गया है।
मथुरा-वृन्दावन मार्ग पर पड़ने वाला चक्रतीर्थ घाट यमुना सौंदर्यीकरण और शुद्धिकरण की भैंट चढ़ चुका है। कभी इस घाट का बहुत महत्व हुआ करता था यहां शहर से आने वाले शवों को विश्राम कराया जाता था तथा यहां पिण्ड दान की क्रिया सम्पन्न करा कर यमुना के किनारे शवों का दाहसंस्कार किया जाता था। यहां वर्षों पुरानी परम्परा मसानी मोक्षधाम के बनने के वाद समाप्त हो गयी। यहां आज भी वह पत्थर मौजूद है जिसमें शवों को विश्राम हेतु रखा जाता था। इतना प्रचीन घाट अपने अतीत की कहानियां स्वयं वयां कर रहा है। नक्काशी दार पत्थरों पर कारीगरी आज भी घाट पर मौजूद है।
इस घाट के ठीक सामने से यमुना की तरफ एक षडयन्त्र के तहत पक्की सड़क को बनाया गया है कभी इस घाट तक यमुना नदी का जल रहा करता था। घाट के वांये और दायी तरफ यमुना के किनारे अवैध निर्माण कर लिये गये हैं डोरी, निवाड के कारखानों की दीवारे यमुना की तरफ बढ़ाई जा चुकी हैं दायी तरफ के मार्ग भी अतिक्रमण की भैंट चढ़ चुके है। इस ओर नगर निगम का ध्यान भी नहीं है तथा विकास प्राधीकरण भी इस दिशा में अपनी आंखें मूंदे बैठा है।
कृष्ण गंगा घाट बहुत ही आकर्षक घाट है यहां की तीन छतरियां पत्थरों की बनी हैं। यहीं पर महर्षि वेदव्यास जी का स्थान भी है बताया जाता है कि इसी स्थान पर वेदव्यास ने 18 पुराणों की रचना की थी। यह स्थान भी यमुना को घाटों से अलग किये जाने के कारण आज उपेक्षित हो गये हैं। कालिंजर महादेव प्राचीन महादेवों में से एक हैं इस मंदिर के बाहर आकर्षक पत्थरों को काट कर बना नक्काशीदार दरवाजा देखने लायक है। सोमतीर्थ भी अब लुप्त हो चुकी है गौघाट आज अतिक्रमण और यमुना नदी के घाटों से चले जाने के कारण सिसकियां ले रहा है।, कंसटीला का जार्णोद्धार किये जाने के कारण अभी बचा हुआ है।, घण्टाकर्ण, मुक्ति तीर्थ, ब्रह्म घाट, वैकुण्ठ घाट, धारा पतन, इनका कोई पता ही नहीं है कि यह कहां हैं, वसुदेव घाट जो आज स्वामी घाट के नाम से जाना जाता है। असिकुण्डा घाट, वाराह क्षेत्र के वाद सड़क के दायीं ओर द्वारकाधीश का विशाल मंदिर मथुरा के हृदय स्थल में स्थित है यह राजाधिराज द्वारकाधीश पुष्टिमार्गीय बल्लभकुल सम्प्रदाय का प्राचीन मंदिर है यहां प्रतिवर्ष लाखों तीर्थयात्री दर्शन करने आते हैं। मणिकर्णका घाट, महाप्रभुजी की बैठक, विश्राम घाट तीर्थ स्थल है यहां पर यमुना जी में स्नान करने का विशेष महत्व माना जाता है। यह सभी घाट मथुरा की परिक्रमा के स्थान हैं। इनमें से अधिकांश स्थान उत्तर और दक्षिण के परिक्रमा के मार्ग से छूट जाते हैं।
आज अधिकांश पौराणिक घाट व ऐतिहासिक स्थान ऐसे हैं जो समय के साथ-साथ अपना नाम और निशान को खो चुके हैं। मंदिरों की तमाम जमीनें बेची जा चुकी हैं। साथही यमुना के घाटों के किनारे से यमुना को एक षडयंत्र के तहत हटाया जा रहा है। लगातार हम अपने प्राचीन इतिहास को नष्ट भष्ट कर रहे हैं। वर्षों पुरानी सभ्यता तथा उसके चिन्हों को समाप्त करके हम अपनी पहचान भी खो रहे हैं। जिला प्रशासन सहित मथुरा वृन्दावन विकास प्राधीकरण, मथुरा-वृन्दावन नगर निगम तथा पर्यटन विभाग को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
मंगलवार, 6 जुलाई 2021
लम्बे इन्तजार के वाद मथुरा-गोवर्धन मार्ग का निर्माण कार्य शुरू
लम्बे इन्तजार के वाद मथुरा-गोवर्धन मार्ग का निर्माण कार्य शुरू
मथुरा। चार साल के लम्बे इन्तजार के वाद अब वह समय आ ही गया जब मथुरा भूतेश्वर से लेकर गोवर्धन ड़ीग तक सड़क का निर्माण कार्य होने जा रहा है। लोकनिर्माण विभाग को वन विभाग ने मथुरा-गोवर्धन मार्ग के निर्माण कार्य की सशर्त मंजूरी दे दी है। वन विभाग से हरी झंडी मिलने के बाद गोवर्धन मार्ग का निर्माण कार्य शुरु हो गया है। वहीं लोक निर्माण विभाग के सामने अब तक सड़क निर्माण में 2940 पेड़ अवरोध बने हुए थे जिसे वन विभाग की अनुमति के वाद ऐसे 1800 पेड़ों को चिह्नित किया गया है जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही निर्माण में इनके अवरोध को दूर किया जा सकेगा।
इसके लिए विभाग को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार है। वर्ष 2017 से गोवर्धन के ड़ीग बॉर्डर से लेकर-मथुरा भूतेश्वर मार्ग के निर्माण के लिए प्रयास में चार साल लग गये। लोकनिर्माण विभाग को वन विभाग ने सशर्त रोड निर्माण को मंजूरी दे दी गई है। वन विभाग द्वारा दी गई मंजूरी में स्पष्ट किया गया है कि पेड़ों के काटे बगैर सड़क का निर्माण किया जाए। इस मंजूरी के साथ ही लोकनिर्माण विभाग ने गोवर्धन मार्ग का निर्माण कार्य शुरु कर दिया है। बताते चलें कि ड़ीग गोवर्धन मार्ग से मथुरा तक के निर्माण में 2940 पेड़ अवरोधक बने हुए थे। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद विभाग ने 1800 ऐसे पेड़ों को चिह्नित किया है जो अब अवरोधक बनेंगे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही मार्ग निर्माण में आ रहे अवरोध को दूर किया जा सकेगा। लोकनिर्माण विभाग के एक्सईएन सनसवीर सिंह ने बताया कि गोवर्धन मार्ग का निर्माण कार्य वन विभाग की मंजूरी के बाद शुरु हो गया है। वन विभाग ने पेड़ न काटने की शर्त पर मार्ग के निर्माण को मंजूरी दी है। इससे 70 प्रतिशत कार्य हो जाएगा। तीस प्रतिशत कार्य के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार है।
इस सड़क के निर्माण को लेकर चार वर्ष पूर्व टेंडर किया गया था। आगरा की आर. पी. इंफ्रास्ट्रक्चर को इसके निर्माण का कार्य करने का टेंडर मिला था। सड़क का निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही सड़क 2940 पड़ों के विवाद में फंस गई और 25,473 किलोमीटर सड़क का निर्माण कार्य अटक गया। मथुरा गोवर्धन मार्ग को चार लेन का बनाया जाना प्रस्तावित है। जिसमें ड़ीग बार्डर तक अड़ीग बाईपास होकर 25,743 किलोमीटर लम्बाई की सड़क का अनुमानित लागत 138 करोड़ में बन कर तैयार होना था। जिसमें 17.5 मीटर चार लेन 2.5 मीटर चोड़ा डिबाइडर कुल मिलाकर 20 मीटर चोड़ी सड़क का निर्माण 1.5 मीटर दोनों तरफ कच्ची पटरी के साथ निर्माण किया जाना प्रस्तावित था। इस सड़क में 3.5 किलोमीटर गोवर्धन से सतोहा तक तथा 1.5 किलोमीटर गोवर्धन कस्बा तक आवादी का क्षेत्र भी पड़ता है। साथ ही गोवर्धन चौराहा से भूतेश्वर तिराहे तक भी आवादी का क्षे़त्र होने के कारण भी तमाम अवरोध हैं जिन्हें भी पूरा किया जाना है।
इस सड़क के निर्माण की मंजूरी चार वर्ष पूर्व मिली थी मगर इस सड़क के दोनों तरफ 2940 पेड़ अवरोध बन गये। एनजीटी ने इसके निर्माण पर रोक लगा दी थी नियम के अनुसार कुल पेड़ों का दस गुना यानी करीब 30 हजार पेड़ कहीं अन्य जगह में लगाने का आदेश के वाद ही किसी भी पेड़ को काटा जा सकता था। जिसकी एबज में 30 हजार पेड़ लगाये जाने का आदेश मिला वो भी किसी गैर वन विभाग की जमीन में लगाने होंगे। इसके वाद तत्कालीन जिलाधिकारी सर्वज्ञ राम मिश्र द्वारा 30 हजार पेड़ लगाने के लिए महावन तहसील के (मादोर) में 30 हेक्टेयर भूमि का चयन करके देने का प्रस्ताव भी पास हो चुका था। मगर मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया जहां कोर्ट ने पूछा कि जो पेड़ सड़क के किनारे खडे़ हैं वह कितनी ऑक्सीजन देते हैं तथा अब तक कितनी ऑक्सीजन दे चुके होंगे तथा कितनी ऑक्सीजन आगे देंगे। क्या अन्य जगह पेड़ लगाये जाने पर यहां की ऑक्सीजन की पूर्ती हो पायेगी। इसकी जांच का जिम्मा भी वन विभाग को सौंपा गया। वन विभाग ने इसकी जांच किये जाने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी। जब इस कार्य के लिए देहरादून स्थित एक फर्म से विभाग ने सम्पर्क किया तो फर्म ने 18 माह का समय मांगा था। इस कार्य में 40 लाख 10 हजार का खर्चा भी आ रहा था। इस सड़क के निर्माण में 20 से अधिक प्रजातियों के पेड़ अवरोध बने हुए है जिनमें अमरूद, ऑवला, अमलताश, अरिस्ट्रीनियां, अर्जुन, अशोक, बबूल, बकाईन, बर्गद, बैन्जामिन, वैरी, छौकर, डूंगर पीलू, ईमली, गुलमोहर, गूलर, जंगल जलेबी, जामुन, जुलीफोरा, कद्दम, करौंदा, कन्जी, कैशिया, लिसौड़ा, नीम, पाकड, पापड़ी, पसन्दू, पीलू, पीपल, रेमजा, सहजन, सहतूत, सिरस, सुवाफूल, शीशम, सिहोरा, यूकल्पटस, आरू, तमाल आदि पेड़ बताये जाते हैं।
इस सड़क के निर्माण की आवश्यकता गोवर्धन में लगने वाले मुड़िया पूर्णिमा मेले को देख कर निर्णय लिया गया। मुड़िया पूर्णिमा मेले में लाखों परिक्रमार्थी मथुरा से गोवर्धन जाते हैं। अच्छी चौड़ी सड़क के निर्माण से क्षेत्र का विकास भी होगा और आर्थिक दृष्टि से भी लाभ की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
शुक्रवार, 25 जून 2021
तराश मंदिर जहां विराजते हैं जमाई ठाकुर जी
-सुनील शर्मा मथुरा।
मथुरा। वृन्दावन रोड पर वृन्दावन में रामकृष्ण मिशन अस्पताल से पहले दांई ओर एक सडक जाती है यह मंदिर वहां पर स्थित है। इसे तराश वाला मंदिर कहा जाता है, बाहर से देखने पर यह मंदिर कोई धर्मशाला जैसी लगती है अंदर जाने पर बाय हाथ में एक अति सुन्दर मंदिर स्थित है। इस मंदिर की स्थापना राजर्षि श्री वनमाली रायबहादुर ने कराया था।
इस मंदिर में बहुत ही सुन्दर रंगीले बोलते जागृत श्री विग्रह हैं जो हुक्का पीते है ऐसे ठाकुर जी के मिजाज भी बड़े रंगीले हैं।
इन्हें जमाई ठाकुर क्यों कहा जाता है
पश्चिम बंगाल के जिला वर्धमान के नवग्राम में स्थित तरास स्टेट के एक अधिकारी जो परम भक्त श्री वान्छाराम जी नियम से निकट में ही एक नदी में नित्य स्नान करते थे, एक दिन स्नान करते समय उन्हें एक मधुर आवाज सुनाई पड़ी-“मुझे जल से निकालकर अपने घर ले चलो’’। वान्छाराम जी ने चकित होकर चारों ओर देखा कि इतने में कोई वस्तु जल में उनके पॉंव से टकराई हाथ डालकर जब देखा तो अद्भुत श्रीविग्रह को देखकर हृदय से लगाया और अपने घर ले आये, अच्छी से अच्छी व्यवस्या कर दी और उनकी सेवा करने लगे, परन्तु वो तो विनोद जी जो ठहरे नित्य-नये विनोदी, रोज स्वप्न में आदेश देकर कभी नयी पोशाक, तो कभी नए आभूषण, इत्र-फुलेल, रोज-रोज नए मिष्ठान, पकवान, आदि मांगने लगे। वान्छाराम जी इनकी इन्छाओ को जितनी अपनी श्रद्धानुसार पूर्ण करते और दूसरे लोगों से मांग कर भी ठाकुर जी की सेवा पूजा करते थे और उन्हें मनाने का प्रयास करते थे।
जब एक दिन ठाकुर जी ने हुक्के मांग कर दी
एक बार ब्रज में किसी वृद्ध व्यक्ति को श्री ठाकुर जी ने हुक्का पीते देखा सो उनको भी शौक हुआ और उसको पूरा करने के लिए एक धनी आदमी को स्वप्न दिया तो वह व्यक्ति चाँदी से मढ़ा निगारदार सुंदर फारसी हुक्का चिलम और कुछ सुगन्धित तम्बाकू लेकर भक्त वान्छाराम जी के पास आया, यह देख कर वान्छाराम जी चौक गये और उससे कहा कि यह क्या है ? मंदिर और ठाकुर सेवा में हुक्के का क्या काम ? अजब आदमी को तुम ? तब उस व्यक्ति ने अपने स्वप्न को वान्छाराम जी को बताया कि मुझे स्वप्न में यह आदेश हुआ है तो, मैं यह सब ले आया हूँ, उपस्थित सभीजनों ने कहा कि अजीव लीला है श्रीविनोद जी की, राजभोग के समय चिलम भरकर हुक्का, जब सामने रख दिया गया, और पर्दा लगा दिया गया, फिर सभी दूर बैठ गये, सभी को हुक्के के गुडगुडाने की आवाज सुनाई देने लगी तो सभी ने कहा कि अजीव लीला है श्रीविनोद ठाकुर जी की।
जब रंगीले ठाकुर को ठकुरानी की याद आने लगी
कुछ समय के बाद रसिक चूड़ामणि को अपना अकेलापन या जीवन साथी का अभाव खलने लगा जीवन साथी भी उनके ध्यान में ही था एक दिन एक व्यक्ति को उस क्षेत्र के प्रसिद्ध रायबहादुर श्रीवनमाली जी के पास भेजा गया, उसने राय साहब से नवग्राम कि सारी घटना बताई तथा कहा कि आपके नवग्राम में एक भक्त के यहां जाग्रत प्रभावी लीलाधारी श्रीठाकुर जी पधारे हैं। जब राय बहादुर ने यह सब सुना तो उनसे रहा नहीं गया और वह अपनी पत्नी और बेटी राजकुमारी राधा जो कि मात्र 10 वर्ष की थी को साथ लेकर नवग्राम में ठाकुरजी के दर्शन करने के लिए पहुंचे। जब सभी दर्शन कर रहे थे, उस समय राजकुमारी से ठकुरजी के नैन मिले तो राजकुमारी राधा अपनी माँ से बोली कि माँ ठाकुरजी मुझे देखकर हंस रहे हैं।
राधा की माँ भला ठाकुरजी की इस लीला को कैसे समझ पाती तो उसने अपनी बैटी से कहा कि तू तो पगली है। ऐसा भी कभी होता है क्या ? यह सभी वापस अपने घर आ गये परन्तु राजकुमारी राधा को बार-बार ठाकुरजी का हंसना और उसकी तरफ यों टकटकी लगा कर देखना भूल नहीं पा रही थी। वह फिर बार-बार ठाकुरजी के दर्शन करने के लिए जाने लगी और उसने अपने पिता से कहा कि बाबा हम इन्हें अपने साथ अपने घर ले चलें। राय बहादुर ने भक्तराज वान्छाराम से कहा। उसी रात भगवान ने स्वप्न में वान्छाराम से कहा कि अब हम राय साहब के घर जाना चाहते हैं, हम आपकी सेवा से अति प्रसन्न हैं और जल्द ही तुम मेरे पास आ जाओगे।
इसके वाद गाजे बाजे के साथ राधा के घर के लिए श्रीविनोद ठाकुर जी को ले जाया गया। राजकुमारी तो राजकुमारी थी उसे ठाकुरजी कैसा पौशाक पहनेंगे, कैसा उनका श्रंगार होगा, क्या भोग लगाया जायेगा सब व्यवस्था वह स्वंय ही करती थी। मगर यह रसिक ठाकुर थे छेड़छाड करने पर उतर आये, एक दिन उसका आँचल पकड़ कर बोले राधा तुम मेरे साथ विवाह कर लो। राजकुमारी इस बात पर सकुचा गई और यह बात अपनी माता से कहा किन्तु माँ को राधा की वात पर विश्वास ही नहीं हुआ।
इसके बाद ही राजकुमारी को तेज ज्वर आया हालत बिगड़ती चली गई, रानी को स्वप्न में श्रीविनोद ठाकुर ने कहा कि देख तेरी राधा अब नहीं बचेगी मैंने उसे अंगीकार कर लिया है अपने बगीचे में जो नीम का पेड़ सूख गया है उसकी एक कन्या की प्रतिमा बनवाकर उसके साथ मेरा विवाह करा दो। तब दोनों रायबहादुर और उनकी पत्नी को विश्वास हुआ कि श्रीविनोद ठाकुर साक्षात् ही हैं और उनकी बेटी राधा प्रतिमा रूप में घर जमाई श्रीविनोद व राधा हमेशा ही हमारे घर पर ही रहेंगे।
जब ठाकुरजी बन गये जमाई ठाकुर
रायबहादुर ने ऐसा ही किया जैसे ही प्रतिमा बनकर तैयार हुई और राधा अपने प्राकृत देह को त्याग कर चली गयी और दाह संस्कार करने के बाद शुभ मुहुर्त देखकर समारोह पूर्वक ठाकुरजी का विवाह सम्पन्न हुआ। तभी से श्री विनोद जी अकेले न कहलाकर श्री राधा विनोद जी हो गये और राय बहादुर जी के जमाई ठाकुर जी के रूप में पुकारे जाने लगे। अब तो राय बहादुर की जो मूर्ति के प्रति उपेक्षा बुद्धि तो वह नष्ट हो गई और स्वयं सेवा पूजा करने में लग गये, परन्तु भोजन के बाद हुक्के की तलब लगती थी और रायबहादुर के यहां हुक्के की सेवा होती नहीं थी।
राय बहादुर जी के घर सिद्ध महात्मा श्री कृष्ण सुन्दर रहा करते थे वे हुक्का पीया करते थे, किन्तु पीने से पहले वह नित्यप्रति श्री राधा विनोद जी का ध्यान अवश्य किया करते थे और ध्यान करते हुए ही उन्हें भी अर्पण करते थे, ठाकुर जी उससे ही अपनी तलब मिटा लिया करते थे, परन्तु जब कृष्ण सुन्दर जी का नित्य लीला में प्रवेश हो गया, उसके बाद हुक्के पिए जब चार दिन हो गये।
वृन्दावन में मंदिर बनाकर ठाकुर श्रीराधा विनोद जमाई ठाकुर की स्थापना
ठाकुर जी का एक-एक दिन भारी पडने लगा दिन मुश्किल से कटने लगा। मंदिर के पुजारी जब गहरी निंद्रा में थे तब ठाकुरजी ने पुजारी से हुक्का माँगा, पुजारी जी ने राय बहादुर जी से कहा कि फिर हुक्के की सेवा शुरू कर दी गई है। एक दिन जब राय साहब जी पुजारी के साथ बैठे हुए थे उसी समय पुजारी जी ने हुक्का ठाकुर जी को अर्पण किया प्रभु कृपा से हुक्के की गड़गड़ा हट रायबहादुर को सुनाई देने लगी और हुक्के से सुगन्धित दिव्य धुंए का भी आभास होने लगा। उस दिन के बाद से राय बहादुर जी का मन गृहस्थ में नहीं लगा और वह ठाकुर के साथ वृन्दावन आ गए और यहां मंदिर बनाकर ठाकुर श्रीराधा विनोद जमाई ठाकुर की स्थापना कर दी।
आज भी उक्त मंदिर में श्री विनोद ठाकुर के साथ राधा भी विराजमान हैं तथा उनके सामने वही पुराने हुक्के आज भी रखे हुए हैं तथा भोग प्रसाद लगाने के वाद उन्हें हुक्के में सुगन्धित तम्बाकू और दिव्य वस्तुओं के साथ हुक्के को अर्पण किया जाता है।
बुधवार, 16 जून 2021
पुत्री-जमाई की लम्बी आयु की कामना का पर्व जमाई षष्ठी
जमाई षष्ठी का पर्व कल था यानी 16 जून 2021 को यह ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को यह बंगाल का एक परम्परागत हर घर में मनाया जाने वाला बड़ा ही आत्मिक पर्व है, यह पुत्री जमाई की लम्बी उम्र की कामना के लिए होता है, घर की पुत्री की शादी हो चुकी हो, उसके पति को आज के दिन बुला कर अच्छे अच्छे पकवान बना कर जमाई और बेटी को आसन देकर पहले पूजा की जाती है फिर भोजन कराया जाता है यह कार्य सिर्फ बेटी की माँ यानी जमाई की सास ही करती है बड़े भी आर्शीवाद देते हैं वह वाद में करते हैं। इस प्रकार से बंगाल में यह एक दिन जमाई की अच्छे से खातिर दारी का दिन होता है, उसका मान सम्मान करने का दिन होता है, जमाई भी अपनी सामर्थ्य अनुसार मिठाई फल इत्यादी लेकर ससुराल जाते हैं, वहां हर घर में इस दिन जमाई आते हैं खूब आनन्द करते है हंसी मजाक के साथ पूरा दिन ससुराल में गुजारते हैं। यह शायद सामाजिक समरसता को बढाने का एक पारम्परिक पारिवारिक उत्सव के रूप मे मनाया जाता है।
भारत की संस्कृति में और भारत के हर समाज में ही जमाई को ज़्यादा महत्व दिया जाता है, बंगाल इसी को दर्शाता है। जिसमें बंगाल में इस पर्व को बड़े ही हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पर्व पर यहां के जनमानस का आचरण बंगाल की संस्कृति का अविभाजित अंग है।
कहते हैं की एक बार एक लालची बूढी औरत थी। वह हमेशा सारा खाना खा जाती थी और दोष बिल्ली पर डाल देती थी। बिल्ली माँ षष्ठी का वाहन है और उसने जाकर माँ षष्ठी से बूढी औरत की शिकायत की। माँ षष्ठी ने उस औरत को सबक सिखाने के लिये उसकी बेटी और दामाद को ले जाति है। तभी अपनी गलती मानते हुए बूढी औरत माँ की पूजा अर्चना करती है और माँ उसे उसकी बेटी और दामाद को लौटा देती है। इसी से प्रेरणा ले कर आज तक हजारों माँ और सासु माँ इस त्योहार को निरन्तर मनाती चली आ रहे हैं।
जामाई षष्ठी बंगाल का पारिवारिक पर्व है जो अपने जमाई के लिये मनाया जाता है। यह पर्व गर्मी के मौसम में ही आता है (बंगाल मे जैष्ट मास में पडता है)। बंगाल की उपजाऊ धरती पर इस महिने में आम, लीची, कृष्ण बदररी, पके कटहैल आदि फल होते है। इस शुभ दिन के अवसर पर बंगाल के परिवारों मे जमाई के लिये जशन का माहौल होता है पूरा परिवार ही इस दिन जश्न मनाता है।
बंगाल में इस पर्व को बडे ही अनोखे तरीके से मनाया जाता है। सास अपने जमाई और बेटी को घर पर बुलाती है और सास इस समय अनेक रसम रिवाज को पूरा करती है। सुबह जल्दी स्नान आदि करके, व्रत रखते हुए एक कूलो (सूप) में धान, दुर्बा (घास) दही, मिठाई के साथ पांच तरह के फल को कूलो (सूप) में सजा कर एक हाथ का पंखा भी रख कर चन्दन आदि के साथ और षष्ठी देवी की पूजा करती हैं। षष्ठी पूजा के बाद पवित्र जल को बेटी दामाद पर धीरे धीरे छिडका जाता है और सास अपने बेटी और जमाई की लम्बी आयु की कामना षष्ठी देवी से करती है। पूजा के बाद सास जमाई को खूब सारे उपहार देती है और उनके सिर पर हाथ रख कर उनकी लम्बी आयु की कामना करती है। इस दिन जमाई भीं अपने ससुराल जाते समय खूब मिठाई, फल इत्यादि लेकर जाते हैं और अपनी अपनी सासु माँ के लिए भी उपहार लेकर जाते हैं।
ऐसा कहा जाता है कि आदमी के दिल तक का रास्ता उसके पेट से हो कर गुजरता है। भारत में भोजन से बढ़ कर कुछ नहीं है, भोजन इस पर्व का एक महत्वपूर्ण भाग है। लूची (पूडी) और आलू की तरकारी, मोयदा (मैदा) की लूची या दाल पूड़ी कचौड़ी और हींग दही आलू की तरकारी आदि सुबह का नाश्ता दोपहर में चावल, बैंगुन भाजा, मूँग दाल, प्याज के पकोडे, मच्छली करी, या अन्ड़ा करी या मटन चिकिन, पापड़, खट्टे आम की चटनी आदि दोपहर का भोजन। इसके वाद मिठाई में रसगुल्ला, गुलाबजामुन, पांतुआ, आम दोइ, मिष्टि दोई, आदि बनता है। जमाई लोग खूब मजे से खाते पीते हैं मौज मस्ती करते हैं खूब हंसी मजाक हाय हल्ला करते हैं यह एक दिन सुसराल में जमाई की जमकर खातिरदारी होती है।





















