मंगलवार, 26 दिसंबर 2023

विदेशों में ब्रजभाषा को गायन से पहचान दिलाने वाली माधुरी शर्मा

लोक गायन के माध्यम से देश विदेश में प्रस्तुति देने वाली सुप्रसिद्ध ब्रज लोक गायक कलाकार माधुरी शर्मा से एक मुलाकात विदेषों में भी ब्रजभाषा के अपने कार्यक्रम प्रस्तुत कर अन्तर्राष्ट्रीय पहचान पा चुकी लोक कलाकार माधुरी शर्मा से एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि मेरी शुरूआत तो आकाशवाणी मथुरा के मंच से हुई है। आकाशवाणी मंच मर्यादा और गरिमामयी औैर बहुत ही शालीन मंच है और सबसे बड़ी बात यह है कि वहाँ बिल्कुल देशी चीज़ें मिलेंगी। वहां पर कोई मिलावट नहीं है। यानी जो भी लोक गीत गाए जायें, जो भाषा बोली जाये, वो है ब्रजभाषा, हमारे ब्रज के लोगों के लिए, हमने वहाँ आकाशवाणी मंच से देश के कोने-कोने में कोई जगह ऐसी नहीं छोड़ी जहाँ पर ब्रजभाषा को नहीं पहुँचाया हो, विदेशों में भी ब्रजभाषा में ही गाया। लोग कहते थे कि इस भाषा को कौन समझेगा। मैं ऐसी-ऐसी जगह गयी हूँ जहां इस भाषा को लोगों ने पहली बार सुना था। मैं आकाषवाणी की एक कलाकार हूँ ठाकुरजी की कृपा से आकाशवाणी का सबसे बड़ा ग्रेड मुझे मिला है टॉप ग्रेड जो कि पूरे उत्तर प्रदेश में, मैं एक अकेली कलाकार हूँ। टॉप प्लस ग्रेड जो की एक लोक कलाकार के लिए एक सपना जैसा होता है। वो कभी पूरा नहीं हो होता है और यदि पूरा हो जाए तो समझो कि ठाकुरजी की बड़ी कृपा हो गयी है। शास्त्रीय और सुगम संगीत में तो यह मिल जाता है लेकिन लोकगायन के लिए मिलना एक असंभव सी बात है, क्योंकि लोककला को लोग शौकिया तरीके से ज्यादा गाते हैं। संगीत को सीख कर बहुत कम ही लोग गाते हैं। जो संगीत को सीख कर गाते हैं वह बहुत ऊपर तक जाते हैं।
उन्होंने बताया कि मैंने तो शास्त्रीय संगीत को सीखा है। विषारद किया है एम ए किया है। हमारे घर में हमारे बड़े भाईसाहब डॉ0 सत्यभान शर्मा जो कि हबेली संगीत के जाने माने गायक कलाकार हैं, वह आगरा में दयालबाग यूनिवर्सिटी में डीन के पद पर रह चूके हैं। माधुरी शर्मा ने बताया कि मुझे शिमला में बुलाया गया था। शिमला आकाशवाणी की ओर से कुल्लू फेस्टिवल, दशहरा फेस्टिवल में तो वहाँ के एक सज्जन बोले, मैडम आप कहा से आईं हैं मेने कहा मथुरा से आयी हूँ, उन्होंने पहली बार मथुरा का नाम सुना था, मैंने जब कहा कि मैं तो उनकी मथुरा से आई हूँ, सुन कर उनके चेहरे का भाव ही बदल गया और कहने लगे अरे मैडम आपको कौन सुनेगा? मैंने कहा कि भैया यह तो समय ही बताएगा। वहाँ पर 20 और 30 के ग्रुप में लोग गाने आते हैं, वहां मैं एक अकेली कलाकार वहां कोई अकेले गाने के लिए नहीं आता हैं, उस समय मैं लहंगा नहीं पहनती थी। जब शुरूआत में 1986 की बात रही होगी, मैं चौड़े बॉर्डर की साड़ी पहन के गाने जाती थी। उस समय मेरे लोकगीत इतनी तनमयता से वहां के लोगों ने सुना। वहाँ के डाइरेक्टर कार्यक्रम के बाद तुरंत उठ के आए और हमारा सम्मान किया यह यादगार और स्मरणीय पल था, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने कहा कि आपने तो रिकॉर्ड तोड़ दिया। यहाँ यह दशहरा फेस्टिवल है, कुल्लू में इतनी बड़े मंच पर बड़े-बड़े ग्रुप आते हैं। यहाँ अकेला आदमी तो कोई आया ही नहीं और अगर आया भी तो यहां टमाटर फेंके जाते हैं और यहां से भगा देते हैं। आपको इतने प्रेम से लोगों ने सुना, मैंने कहा कि यह तो हमारे ठाकुरजी की हमारे उपर बड़ी कृपा है। मैं ब्रजभाषा में गाऊ ब्रजभाषा में बोलूं और तब भी सबकी समझ में आवे है।
आपके विदेशों के अपने अनुभव बताइए कैसा रहा? विदेशों का अनुभव भी बड़ा अच्छा अनुभव है। वहाँ पहले तो हम गए 1991 में, मैं अगर यह कहूं तो कोई गलत बात नहीं होगी कि मैं ब्रज की पहली लोक कलाकार हूँ, जिसने विदेश की धरती पर जाकर के अपना लोक गायन प्रस्तुत किया हो। वहाँ के लोगों ने कैसी प्रतिक्रिया दी? वहाँ के लोगों की प्रतिक्रिया से पहले मैं बता दूं कि हमने ना तो अपनी वेशभूषा छोड़ी, मंच के अलावा भी हमने हर जगह पर साड़ी ही पहनी ये नहीं है कि हम और कोई ड्रेस में वहां घूमे हों। पूरे एशिया, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप का वर्ड सॉन्ग फेस्टिवल था जो कि मलेशिया में हुआ था हमने वहां पर अपनी प्रस्तुति दी, मलेशिया में। सही बात कहूं कि वहाँ हमें एक बात सुनाई पड़ी क्योंकि यह आयोजन मलेशिया के कोलालम्पुर राजधानी में वर्ड सॉन्ग फेस्टिवल में हुआ था जिसमें हमने भाग लिया था भारत की ओर से आकाशवाणी महानिदेशालय ने हमको भेजा था? क्योंकि जब हम ए ग्रेड हुए थे। तो तुरंत ही हमको ये बाहर का कार्यक्रम मिला। जब हम वहाँ पहुंचे तो सब ने हमको देखा सबने तो ये कहा की भाई एक कलाकार हैं, जिनसे बिना पूछे ही हम कह सकते हैं यह भारत की आर्टिस्ट हैं क्योंकि उनका बोलना, चालना, खाना-पीना और गाना और पहनना औढ़ना, सब कुछ भारतीय है, इनसे पूछने की जरूरत ही नहीं है। वो कहां की कलाकार हैं तो यह हमारे लिए बड़े गौरव की बात रही। जो हमारे लिए यह बात वहां कही गयी थी।
हम जब वहाँ से लौट आये तो हमारे बच्चों ने हमसे कहा कि ‘‘अरे मम्मी आप तो जैसी गयीं थीं, वैसी आ गयीं’’। तो मैंने कहा तो क्या करती, ‘‘अरे नहीं, बाल वॉल कटवा के आतीं कछु न कुछ बदल के आतीं’’ तो हमने उनसे क्या कहा ‘‘हम तो अपनों रंग चढ़ाए के आये हैं, काई को रंग हम पे न चढ़ सके, हम पे किसी का रंग क्यों न चढ़ सकता क्यों कि हम तो श्याम सुन्दर के रंग में रंगे भये हैं। हम तो उन पे रंग चढाये वे गए और चढ़ाएं के आये गये, उनको रंग हम पे नाय चढ़ सके। हम ब्रज में रहे हैं जहाँ हमारे कृष्ण कन्हैया रहे हैं और कन्हैया को रंग श्याम वर्ण है, श्याम को मतलब है कारो। तो भैया सुनील जी जे बताओ या रंग पे कछु रंग चढ़ सके का, चढ़ाओगे तो का बा पे कोई रंग चढ़ जावेगो का?

मंगलवार, 12 सितंबर 2023

निर्मला सुन्दरी से श्री श्रीमाँ आनन्दमयी

ब्रज में न जाने कितने ही लोग प्रतिदिन ब्रज और वृन्दावन में दर्शन करने आते कुछ तो यहीं बसने की आश लिए यहां आते हैं। भौतिक सुख सुविधाओं को त्याग कर कितने ही लोग यहां रह कर साधना में रत रहते हैं, असंख्य सन्तों ने इस दिव्य भूमि को अपनी साधना स्थली बना लिया और यहां पर रह कर आश्रम, मठ, मंदिरों का निमार्ण कर लोक कल्याण का काम किया है। इनमें एक नाम आनन्दमयी माँ का भी है जिन्होंने वृन्दावन में विशाल मंदिर का निमार्ण कराया और असंख्य लोगों को धार्मिक आस्था और भक्ति के मार्ग से जोड़ने का कार्य किया। आनन्दमयी माँ का जन्म 30 अप्रैल सन् 1886 ई. वृहस्पतिवार के दिन रात्रि 3 बजे त्रिपुरा जिलान्तर्गत अभिवाजित बंगाल प्रान्त के ’सेउड़ा’ नामक ग्राम में हुआ था। पिता श्री विपिनबिहारी भट्टाचार्य“ तथा माँ का नाम “मोक्षदा सुन्दरी“ था। पूर्व जन्म की इन्हें स्मृति बनी रही। बचपन में माँ को खिला पिला देने पर भी वह हमेशा आकाश की ओर ही निहारती रहती थीं बाल्यावस्था में स्वाभाविक उदासीन स्वरूप देख लोग इन्हें ’ढेला’ या ’विदिशा’ भी कहने लगे थे। जिसका मतलब आजल या पागल कहते थे। इन्हें अपने देह की कोई सुधबुध नहीं रहती थी।
माँ ने बचपन में इनका नाम निर्मला सुन्दरी रखा था। आनन्दमयी माँ नाम तो बाद में ढाका के प्रसिद्ध ज्योतिष चन्द्र राय के साथ एक बार ’सिद्धेश्वरी ससान’ में जाने पर वहाँ के सन्यासी स्वामी मौनानन्द महाराज ने रखा था। शैशवकाल में अपने पितामह की सान्निध्य में गाँव की एक पाठशाला में अल्प शिक्षा ग्रहण की थी क्योंकि उस समय शिक्षा, देशकाल की सीमा तक ही सीमित थी। फिर भी तीव्र प्रतिभा एवं विलक्षण स्मरण शक्ति की धनी होने के चलते आप शिक्षा के प्रति अब जैसी इतनी जागरूकता न थी। उस समय की प्रथानुसार 13 वर्ष की आयु में सन् 1909 में ढाका विक्रमपुर आटपाड़ा गाँव के ’रमणी मोहन चक्रवर्ती’ के साथ आपका विवाह हो गया था। इनकी लघु वैवाहिक जीवन यात्रा में भी अन्तर्मुखी साधना प्रवाहित रही। माँ के कारण ही पतिदेव ’रमणीमोहन’ का नाम ’भोलानाथ’ के नाम से विख्यात हुए। विवाह के कुछ समय बाद ही पतिदेव की पुलिस नौकरी की छूट गई। परिस्थितिवश ऐसे में 4 वर्ष तक जेठ के साथ साधन निरत रहते हुए रहना पड़ा। भोजन बनाते ही कभी समाधी लग जाती। ऐसी दशा देखकर आपसे जेठ बड़े प्रसन्न थे। चूल्हे पर चढ़ा सब कुछ जल जाता तो जेठानी प्रायः नाराज रहती थीं। पर कुछ बस न चलता। कुछ वर्षो बाद पतिदेव की नौकरी नवाब की रियासत अष्टग्राम में पुनः सर्वे विभाग में लग गई। तब वहाँ जयशंकर सेन के बाड़े में आकर आप रहने लगीं थीं। सेन की पत्नी का आपके प्रति इतनी श्रद्धा थी कि आपका नाम खुशी की माँ कह कर पुकारती थीं। आप भागवत आदि सुनते-सुनते भावावेश में आ जाती थी। इसी बीच 18 वर्ष की आयु में कई बार नौकरी से स्थानान्तरण भी हुआ। आपके अन्दर तीव्र प्रकट ज्योति होते देखकर कितने ही तान्त्रिकों एवं ओझाओं को आपके पतिदेव ने दिखाया किन्तु सभी नतमस्तक होकर वापस चले जाते थे। तब कहीं पतिदेव को भी ज्ञान हुआ कि यह पूर्व अर्जित भावदशा ईश्वरीय प्रदत्त महत स्थिती है। सन् 1922 ई. श्रावण झूलन पूर्णिमा को स्वतः दीक्षा सम्पन्न हुई। एवं योगिक, तांत्रिक क्रियाओं के साथ संस्कार आदिक मंत्र जप करना चलता रहा। आपने कोई सम्प्रदाय नहीं चलाया। हिन्दू सभी देवी देवताओं में आस्था और उनका समान करती थी। इसी बीच सन् 1924 ई. में पुनः नौकरी छूट गई। अबकी बार नवाब के द्वारा ढाका मैनेजरी मिली। आप यहाँ शाहबाग में अपने देवर ’माखन’ एवं भतीजे ’आशु’ के साथ रहती थीं। यहीं पर आपकी अनन्य उपासिका गुरूप्रिया दीदी से भी प्रथम भेंट हुई। आगे चलकर माँ के चरणों में आजीवन बनी रहीं। इनके द्वारा मूलतः बंगाल में छपी ’श्री श्री माँ आनन्दमयी’ नामक संस्मरणात्मक रचनाएँ सन् 1964 ई. तक की अनुभूतियाँ 20 खण्डों में छपी है। इन रचनाओं की हिन्दी एवं अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हो चुका है। माँ की बाहरी यात्रा सन् 1927 ई. से हरिद्वार तीर्थो के कुम्भ मेले से प्रारम्भ हुई। लौटते समय मथुरा वृन्दावन आई। फिर तो काशी आदि विभिन्न तीर्थों की यात्राएँ होती रहीं। बंगीय परिवेश के कारण आप शक्ति की विशेष उपासिका थीं। किंतु साथ में गौड़ीय सम्प्रदाय चैतन्य महाप्रभु के प्रति निष्ठा थी। माँ के सम्पर्क में आने में आगे चलकर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, आचार्य जे. पी. कृपलानी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, पं. गोविन्दबल्लभ पंत, युगल किशोर विड़ला, यमुनालाल बजाज, श्रीमती अपर्णा रे, श्रीमती कमला नेहरू, श्री दिलीप कुमार राय, श्री महादेव देसाई, श्रीगोपाल स्वरूप पाठक, श्रीमती सुचेता कृपलानी, जवाहरलाल नेहरू एवं श्रीमती इन्द्रा गाँधी आदि थे। वृन्दावन धाम आश्रम में एक बार मैंने भी साक्षात् दर्शन किये थे। उस समय उनका स्वास्थ्य खराब चल रहा था मैंने दर्शन किये और फिर 27 अगस्त सन् 1982 ई. 96 वर्ष की आयु में माँ ने देहरादून स्थित अपने किशनपुरा आश्रम में इस धाम को छोड़ कर हमेशा के लिए सभी को छोड़ कर चलीं गयीं। चमत्कार की वात तो यह थी कि इतनी वृद्धावस्था होने पर भी आपके एक भी बाल सफेद नहीं बल्कि स्याह काले ही बने रहे। आपके आश्रम वृन्दावन में छलिया राधाकृष्ण की सेवा पूजा होती है
मन्दिर का निर्माण सन् 1950 ई. के लगभग सुश्री माँ आनन्दमयी जी के द्वारा किया गया। मंदिर में ठाकुर छलिया राधाकृष्ण विराजते हैं। बगल में गौर निताई भी है। मंदिर एक विशालकाय अहाते के में बना हुआ है। ठाकुर के छलिया नाम पड़ने का कारण बड़ा विचित्र है एकबार ग्वालियर के महाराज जियाजी राव सिंधिया ने अपने लिए अष्टधातु निर्मित एक भव्य मूर्ति बनवायी। स्थापना उत्सव में माँ को भी बुलवाया किन्तु उत्सव के पहले ही अचानक महाराज परलोकवासी हो गये। घटना से पत्नी जियाजी राव सिंधिया बड़ी मर्माहत हो गयीं। माँ के समझाने बुझाने पर अचानक यह आया कि छलिया यह वृन्दावन धाम में ही वसना चाहते है। माँ से वार्तालाप हुयी। माँ ने स्वीकार कर लिया। और वृन्दावन स्थित रामकृष्ण मिशन हास्पीटल के सामने आनन्दमयी माँ का आश्रम है। जहां राधारानी विग्रह, छलिया ठाकुर के साथ गौर निताई विग्रह भी स्थापित किये गए। तभी से ठाकुर का नाम छलिया पड़ गया। एकबार काशी पक्के मोहल्ले में कोई बंगीय भक्त जमींदार का गोपाल मंदिर था। गरीबी के कारण आने वाला खर्च बन्द हो गया। भक्तराज तीन बार गोपालजी को गंगाजी में पधराने का प्रयास किया। दो बार व्यवधान पड़ने से गोपाल रुक गये। तीसरी बार ठाकुर ने स्वप्न दिया मुझे आनन्दमयी माँ को भेंट कर दो। माँ के आश्रम का पता लगाते हुए भक्त पहुँच गया। और घटना सुनाते हुए माँ को भेंट कर दिया। माँ ने वहीं काशीपुरी में गंगा के तट पर आनन्द ज्योति नामक मंदिर का निर्माण कराकर वहीं लड्डू गोपाल का विग्रह विराजित कर दिया। माँ के जीवन की ऐसी ही अनेक घटनाऐं है। राधाकृष्ण एवं गौर निताई विग्रह पूना आश्रम, उत्तरकाशी एवं देहरादून आदि सभी आश्रमों में विराजमान है। दीपावली कृष्णाष्टमी, एवं राधाष्टमी पर्व पर वृन्दावन में धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है।

रविवार, 10 सितंबर 2023

मथुरा वृन्दावन रेल लाइन का परिवर्तन समस्या या समाधान

मथुरा और वृन्दावन के बीच चलने वाली रेलवे की नयी व्यवस्था के वारे में कुछ वात कर लें। जानकारी के अनुसार इस रेलवे लाइन का निर्माण वृन्दावन स्थित राधा माधव जयपुर मंदिर के निर्माण के लिए उस समय पत्थरों की ढुलाई के लिए किया गया था। करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले मथुरा-वृंदावन के बीच यह मीटर गेज रेल लाइन डाली गयी थी, कुछ सालों के वाद यह इतिहास में यादगार बन कर रह गई। जयपुर घराने के राजा सवाई माधव सिंह (द्वितीय) द्वारा वृंदावन में जयपुर मंदिर (राधा माधव) का निर्माण कराया गया था। इसके लिए 1905 से 1908 के बीच जयपुर और धौलपुर से लाल पत्थरों की ढुलाई के लिए राजा सवाई माधव सिंह द्वारा तत्कालीन ब्रिटिश शासकों से विशेष अनुमति लेकर यह मीटर गेज लाइन बिछाई गई थी। मंदिर परिसर में ही अस्थायी रूप से स्टेशन भी बनाया गया था। राधा माधव मंदिर के निर्माण में रेल से पत्थरों की ढुलाई के कारण मंदिर का निर्माण 23 मई 1917 में पूरा हुआ और इस अवसर पर ठाकुरजी का पाटोत्सव मनाया गया। इस मंदिर के निर्माण में 40 वर्ष का समय लगा था।
इस रेल लाइन को अब डेढ़ सौ वर्ष के वाद गेज परिवर्तन करने का काम उत्तर मध्य रेलवे ने शुरू किया। यह रेलवे लाइन मथुरा वृंदावन के बीच 12 किलोमीटर के मीटर गेज रेल ट्रैक के रूप में थी, जिस पर कभी वृन्दावन से बैशाली एक्सप्रेस नोर्थ बंगाल के न्यू जलपाईगुड़ी स्टेषन तक सवारी गाड़ी के रूप में अप एण्ड डाउन किया करती थी तथा मालगाड़ी भी वृन्दावन के कुछ व्यापारियों के लिए नोर्थ बंगाल से कुछ माल लेकर आती व जाती थी। दिलचस्प बात यह है कि वृन्दावन में नगरवासी कुंज, छोटे पागल बाबा मंदिर में दुर्गा पूजा के लिए गौर कृष्ण दास उर्फ सुरेस्वरानन्द जी ने सन् 1963 में प्रथम बार एक दुर्गा की प्रतिमा को जलपाईगुड़ी से बनवा कर यहां पूजा के लिए मंगाई थी। मंदिर के सेवायत नवद्वीप दास ने बताया कि मूर्ति प्रतिवर्ष वृन्दावन इसी ट्रेन के लगेज में लाई जाती रही, सन् 2000 के बाद मूर्ति अब यहां नहीं आती है, क्यों कि अब सवारी गाड़ी व माल गाड़ी का चलन इस रूट पर बन्द कर दिया गया। इसके कुछ समय के बाद इस रेल रूट पर बैटरी से चलने वाली दो डिब्बों की रेल बस को शुरू किया गया जिसे तत्कालीन रेलमंत्री रामविलास पासवान ने शुरू किया था। कुछ समय तक ठीक से चलने के बाद आयदिन इसमें खराबी आने लगी। कभी इसे चालू किया जाता फिर खराब होने पर बन्द कर दिया जाता था। रेल बस दिन में केवल तीन चक्कर लगाती थी, तथा इसमें एक समय में 72 से अधिक यात्रियों को नहीं ले जाया जा सकता था। इसलिए दोनों शहरों के बीच पूरे यातायात का भार मथुरा-वृंदावन मार्ग पर पड़ने लगा। इस स्थिति को देखते हुए यातायात को आसान बनाने की दृष्टि से एक अन्य विकल्प को विकसित करना अत्यावश्यक हो गया। अब मथुरा-वृंदावन रेल लाइन को डबल रोड के रूप में बदला जाएगा, साथ ही एलिवेटेड को ट्विन मेट्रो ट्रैक के रूप में विकसित किये जाने की योजना है। मथुरा-वृंदावन मेट्रो जो भाजपा सांसद (मथुरा) हेमा मालिनी का लंबे समय से सपना रहा है, जल्द ही यह वास्तविकता बदलने जा रही है। इसके लिए रेल मंत्रालय और संबंधित अधिकारियों ने कम उपयोग में आ रही मथुरा-वृंदावन रेल लाइन को डबल रोड में बदलने और एलिवेटेड पाथवे को मेट्रो ट्रैक के रूप में विकसित करने के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।
श्रीमती हेमा मालिनी और ब्रज तीर्थ विकास परिषद् के उपाध्यक्ष शैलजा कांत मिश्रा ने रेल मंत्री श्री पीयूष गोयल को मथुरा वृन्दावन में अनियंत्रित यातायात के समाधान के रूप में मेट्रो चलाने का प्रस्ताव दिया था, जो मथुरा और वृंदावन के बीच यात्रा को असुविधाजनक और कम समय लेने वाला बनाना है। यूपी के तत्कालीन ऊर्जा मंत्री वर्तमान विधायक श्री श्रीकांत शर्मा ने उनसे ‘ब्रज हेरिटेज मेट्रो ट्रेन कॉरिडोर’ पर भी चर्चा की थी। मंत्रालय से मंजूरी अनिवार्य थी क्योंकि संपत्ति रेलवे की है। रेल भूमि विकास प्राधिकरण (दिल्ली) के अधिकारी अंजनी कुमार और आगरा के डीआरएम ने स्थिति और परियोजना के दायरे का अध्ययन करने के लिए जिला प्रशासन के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक की जिसमें यह निर्णय लिया गया कि रेल लाइन को डबल रोड में बदल दिया जाएगा, साथ ही एलिवेटेड का उपयोग मेट्रो के लिए किया जाएगा। मेट्रो के दो ट्रैक मथुरा और वृन्दावन के बीच आने-जाने से सहायता मिलेगी। मथुरा के लोगों के लिए मेट्रो की सवारी अपने आप में एक आकर्षण के रूप में देखा जा रहा है जो यात्रियों को मथुरा-वृंदावन के प्रतिष्ठित मंदिरों जैसे श्री कृष्ण जन्मस्थान, बिड़ला मंदिर और पागल बाबा मंदिर को उपर से देखने का अवसर प्रदान करेगा। इसके अलावा, मेट्रो लाइन के दोनों ओर जहां स्टेशनों की योजना है, वहां शॉपिंग मॉल और पार्किंग सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी। मथुरा वृंदावन के बीच रेल ट्रैक 12 किमी. का है मथुरा वृंदावन के बीच करीब 12 किलोमीटर का रेल ट्रैक है। इस मीटर गेज को परिवर्तित करने के लिए रेलवे ने प्रोजेक्ट तैयार कर काम भी शुरू कर दिया था। रेलवे द्वारा तैयार प्रोजेक्ट के अनुसार इस ट्रैक के ब्रॉड गेज में कन्वर्ट करने के दौरान 2 आरओबी, 17 आरयूबी के अलावा 23 छोटे ब्रिज भी बनाए जाने की योजना थी। इस ट्रैक पर 6.6 किलोमीटर का एलिवेटेड इंबैंकमेंट ट्रैक रहेगा इसके अलावा 4.5 किलोमीटर लेबल ट्रैक बनाया जायेगा यानी जमीन के लेबल पर बनाया जाता फिलहाल इसका काम बन्द करा दिया गया है। 2 स्टेशनों के साथ 4 हॉल्ट स्टेशन भी बनाए जाने थे मथुरा वृंदावन के बीच गेज ट्रैक परिवर्तन के बाद इस रूट पर 4 हॉल्ट स्टेशन के साथ 2 रेलवे स्टेशन बनाए जाने की योजना थी। मथुरा जंक्शन से शुरू होने वाले इस रेल ट्रैक पर पहला हॉल्ट स्टेशन शिव ताल पर होता। इसके बाद श्री कृष्ण जन्मस्थान और फिर मसानी पर क्रॉसिंग रेलवे स्टेशन बनाया जाना था। यहां से आगे चामुंडा देवी मंदिर के पास और चैतन्य बिहार वृन्दावन में हॉल्ट स्टेशन बनना था। अंत में वृंदावन स्टेशन टर्मिनल विकसित करने की योजना थी। गेज ट्रैक परिवर्तन का काम जनवरी 2023 सें शुरू हो चुका था गेज कन्वर्ट करने का काम 14 जनवरी 2023 से शुरू किया गया था। 10 चरण में शुरू होने वाले इस गेज परिवर्तन का काम 14 जनवरी 2025 को काम पूरा किया जाना था। इसके लिए अर्थ वर्क और ब्लैंकेटिंग का काम शुरू किया गया। यह काम 15 जुलाई 2024 तक पूरा होना था। तथा मार्च 2023 से सितम्बर 2024 तक पुल बनाने का काम भी पूरा करना था। स्टेशन की इमारत और प्लेटफार्म बनाने का काम भी इसी दौरान पूरा किया जाना था। ट्रैक लिंक करने का काम फरवरी 2024 से नवम्बर 2024 तक किया जाना था। इस ट्रैक पर विद्युतीकरण भी किया जाना था। यह काम अप्रैल 2023 से शुरू होकर दिसंबर 2024 तक पूरा करना था। इस दौरान सिगनल और टेलीग्राफ सिस्टम पर भी काम किया जाना था। इसके बाद टेस्टिंग, ट्रायल आदि का काम जनवरी 2025 तक पूरा कर लिये जाने की योजना थी, यानी 2 साल के भीतर गेज परिवर्तन कर रेलवे इस ट्रैक को पूरी तरह से चालू कर देता। श्रद्धालुओं को मिलती सुबिधाएं स्थानीय व्यापारियों को होता फायदा गेज परिवर्तन होने के बाद मथुरा वृंदावन आने वाले श्रद्धालुओं को बड़ी राहत मिलती। अभी श्रद्धालु मथुरा जंक्शन स्टेशन पर उतरते हैं और उसके बाद वह विभिन्न माध्यम से वृंदावन तक आते हैं। वृंदावन स्टेशन से लंबी दूरी की ट्रेन शुरू होने से न केवल श्रद्धालुओं को राहत मिलती बल्कि स्थानीय लोगों और स्थानीय व्यापारियों को भी पुनः सहूलियत मिल सकती थी। मथुरा वृंदावन में करोड़ों श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन करने आते हैं। इस ट्रैक के परिवर्तन के बाद श्रद्धालुओं को जहां राहत मिलने की सम्भावना थी वहीं शहर में लगने वाले जाम की समस्या से भी निजात मिल सकती थी। रेलवे वंदे भारत की तरह की ट्रेन चलाने की योजना बना रहा था रेलवे मथुरा वृंदावन के बीच कम कोच की वंदे भारत जैसी ट्रेन चलाने की योजना बना रहा था। इसके साथ ही वृंदावन स्टेशन से लंबी दूरी की भी कुछ ट्रेन चला कर श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों को भी सुबिधा मिल सकती थी। हालांकि मथुरा वृंदावन के बीच चलने वाली ट्रेन के नाम और इसकी टाइमिंग क्या होती इस पर अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया। मथुरा वृन्दावन के मध्य गेज परिवर्तन कर रेलवे ट्रैक को पूरी तरह से चालू करने में 402 करोड़ 88 लाख के इस गति शक्ति प्रोजेक्ट पर उत्तर मध्य रेलवे ने काम करना शुरू कर दिया था कुछ लोगों को यह विकास कार्य रास नहीं आया और विरोध के चलते फिलहाल इस योजना को ब्रेक लग गया है।
रेलवे को पूरे ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा क्षेत्र को रेल ट्रेक से जोड़ना चाहिए रेलवे को ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा में पड़ने वाले पडाव स्थलों को जोड़कर तीन फेज में मेट्रो की तर्ज पर पिलर्स डाल कर यहां भी मेट्रो चलाने की योजना बनानी चाहिए। प्रथम फेज में मथुरा से वृन्दावन तक मेट्रो ट्रेक डालने पर विचार किया जाना चाहिए। दूसरे चरण में वृन्दावन से राधाकुण्ड़ बरसाना होते हुए गोवर्धन से मथुरा तक मेट्रो ट्रेक डालना चाहिए, तीसरे चरण में मथुरा से गोकुल महावन बलदेव होकर वृन्दावन तक का मेट्रो ट्रेक विकसित किया जाना चाहिए। जिससे रेलवे को अत्यधिक आय का अवसर मिलेगा, क्यों कि मथुरा वृन्दावन में प्रतिवर्ष करोड़ों श्रद्धालु यहां आते हैं तथा ब्रज के सभी प्राचीन धार्मिक व आस्था के केन्द्रों में जहां-जहां श्रीकृष्ण राधारानी की लीला स्थलियों का दर्षन करते हैं। इस योजना से रेलवे को भारी लाभ का अनुमान लगाया जा सकता है तथा मथुरा वृन्दावन तथा ब्रजचौरासी कोस परिक्रमा का विकास भी सम्भव है जिससे रोजगार की अपार सम्भावनाओं की आषा की जा सकती है।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

सनातन, वैष्णव धर्म को विश्व के कौने-कौने में पहुंचाने का श्रेय श्रील ए. सी. भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी को जाता है।

सनातन धर्म और वैष्णव धर्म के प्रचार प्रसार को विश्व के कौने-कौने में पहुंचाने का श्रेय एक मात्र श्रील ए. सी. भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी को जाता है। आज 01 सितम्बर 1896 ई0 प्रतिपदा के दिन आपका जन्म पश्चिम बंगाल प्रान्त के “कलकत्ता“ शहर में हुआ था। आपने 81 वर्ष आयु तक सन् 1977 ई. को मिती मार्गशीर्ष कृष्णा चतुर्दशी को वृन्दावन में रमणरेती की रज प्राप्ति की। आपके गुरू श्रील विमलानन्द (भक्ति सिद्धान्त सरस्वती) ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में दीक्षा दी थी। तत्पश्चात् 11 वर्ष अखण्ड गौड़ीय ग्रन्थों को पढ़ने के बाद ही दीक्षा ले ली थी। आपका पहले का नाम ’अभय चरन डे’ था। श्री गुरु महाराज ने आपका नाम अभय का ’ए’ तथा ’चरन’ का सी., अँग्रेजी के पहले अक्षर को मिलाकर अपनी तरफ से सन्यास का नाम ’भक्ति वेदान्त’ को जोड़कर “ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी“ बना दिया। श्रील से तात्पर्य जो धन धान्य लक्ष्मी से परिपूर्ण हो। तात्पर्य-श्रीः लास्यति इति श्रीलः।
संगम-प्रयागराज तीर्थ में दीक्षा लेते ही धर्म प्रचार कार्य में जुट गए। गुरु जी ने वैदिक ज्ञान के प्रचार हेतु अंग्रेजी भाषा में करने को कहा क्योंकि अंग्रेजी भाषा में आप कुशल दक्षता प्राप्त थे। अतः गौड़ीय मठों को सहयोग देते हुए सन् 1933 ई. में गीता पर एक टीका लिखी। कितने वर्षों तक आप भारत में ही धर्म प्रचार करते रहे। सन् 1944 ई. में आपने बिना किसी के सहयोग लिए अंग्रेजी में एक ’पाक्षिक पत्रिका’ निकाली जो कभी भी बन्द न होकर बल्कि अब तक तीस भाषाओं में छप रही है। सन् 1959 ई. में आपने ‘वानप्रस्थ’ सन्यास लेकर कितने ही वर्षों तक वृन्दावन ’राधादामोदर’ मन्दिर में रहकर यहां से धर्मग्रन्थों का अनुवाद किया, विषेष कर श्रीमद्भगवत गीता का अनुवाद अंग्रेजी में करके विष्व में जन-जन तक पहुंचाने का पुनीत कार्य किया। सन् 1965 ई. में श्री गुरुदेव द्वारा चलाया हुआ धर्मानुष्ठान अभियान पूरा करने के लिए सितम्बर मास में ‘‘संयुक्तराज्य अमेरिका’ गए। वहाँ पहुँचकर प्रथम् “न्यूयार्क“ नगर से अपना अभियान प्रारम्भ किया। फिर सन् 1966 ई. में ‘‘आंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ“ की स्थापना की। आपके प्रचार, प्रसार, विस्तार विषय में जितना कुछ कहा जाय वह कम है। जीवन का एक-एक दिन अमूल्य घटनाओं से भरा पड़ा है।
आपने अपनी वृद्धावस्था की भी परवाह न करते हुए ग्यारह वर्षों के अन्तराल में विश्व के छहों महाद्वीपों की चौदह बार परिक्रमा की। आप की उर्वरा शक्ति सम्पन्न लेखनी अविरत चलती ही रहती थी। सौ से अधिक ग्रन्थों को पच्चास भाषाओं में छापकर करोड़ से अधिक संख्या में वितरित किया। एक बार “हरे कृष्ण“ आन्दोलन के उपर शुरूआती समय में ’रूस जैसे कम्युनिज्म देश में प्रतिबंध लगा दिया गया था। फिर भी न मानने से ’हरेकृष्ण’ भक्तों को पागलों के साथ जेल में ठूंस दिया गया। जेल में भी जमकर कीर्तन होता रहा। नाम के प्रताप से कितने ही पागल तो ठीक भी हो गए। ऐसा चमत्कार देखकर वहाँ की सरकार को हार मान कर ढाई वर्षों बाद इन्हें छोड़ना पड़ा था। रूसी भाषा में लाखों गीता भागवत छपवा कर वितरित की गई, जो परम्परा अभी भी चली आ रही है। परिणामतः कितने ही रूसी भक्त वर्तमान में पश्चिम बंगाल के मायापुर एवं मथुरा के वृन्दावन धाम की यात्रा पर निरन्तर आते हैं।
गुरू षिष्य परम्परा का निर्वहन करते हुए प्रभु प्रेरित दैवी शक्ति सम्पन्न गुरु, कृपा से धराधाम पर गौड़ीयमठ के माध्यम से प्रचारकों के रूप में आए। केवल विदेशों में “अन्तर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ“ प्रचार केन्द्रों की संख्या आज लगभग 200 से अधिक मंदिरों के साथ शाखाएं हो गई हैं। जहाँ मन्दिरों में ’राधाकृष्ण’ चैतन्य-नित्यानन्द श्रीविग्रह के साथ विशुद्ध वैष्णव पद्धति से सेवा पूजा होती है। भक्त सदाचार का समुचित पालन करते हैं। श्री गौराङ्ग, नित्यानन्द, राधाकृष्ण नाम संकीर्तन के माध्यम से मात्र 11 वर्षों में भारतीय धर्म संस्कृति का प्रचार प्रसार विश्व क्षितिज पर जिस प्रकार उनकी कृपा से छा गया है इस प्रकार की सफलता विश्व के इतिहास में एक मात्र बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार काल में सम्राट ’अशोक’ ही एक बार कर पाया था । ’हरे कृष्ण’ आन्दोलन सफलता पूर्वक समस्त विश्व में छा गया है। नास्तिकों के हृदय रूपी मरुभूमि में भी आस्तिकता की निष्ठा जाग गई है। यह पूरा श्रेय श्रील ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी को ही जाता है जिन्होंने सनातन धर्म वैष्णव धर्म का प्रचार प्रसार पूरे विष्व में किया है। श्रीचैतन्य देव ने जो एक बार कहा था उन्हीं के शब्दों में “पृथ्वी पर्यन्त यत आछे देश ग्राम, सर्वत्र प्रचार होइवेक मोर नाम“।। (चै० चरि० 2/4/26)

सोमवार, 28 अगस्त 2023

लंकाधिपति रावण शिवजी का परम भक्त था।

लंकाधिपति रावण शिवजी का परम भक्त था। रावण की शिवभक्ति के किस्से हम सुनते ही रहते हैं, उसकी शिवभक्ति के अनेक रोचक किस्से प्रचिलित हैं। इसी कथानक को प्रमाणित करती राजकीय संग्रहालय, मथुरा की मूर्ति रावणानुग्रह
कहा जाता है कि एक बार रावण जब अपने पुष्पक विमान से यात्रा कर रहा था तो रास्ते में एक वन क्षेत्र से गुजर रहा था। उस क्षेत्र के पहाड़ पर शिवजी ध्यानमग्न बैठे हुए थे। शिव के गण नंदी ने रावण को रोकते हुए कहा कि इधर से गुजरना सभी के लिए निषिद्ध कर दिया गया है, क्योंकि भगवान तप में मग्न हैं। रावण को यह सुनकर क्रोध उत्पन्न हो गया। उसने अपना विमान नीचे उतारकर नंदी और वहां उपस्थित गणों का अपमान किया और फिर जिस पर्वत पर शिव जी विराजमान थे, उसे उठाने लगा, यह देख शिव जी ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को दबा दिया जिस कारण रावण का हाथ उस पर्वत के नीचे दब गया। जिसके कारण रावण को असहनीय कष्ट होने लगा जिससे वह रोने लगा और शिव से प्रार्थना करने लगा कि मुझे इस कष्ट से मुक्त कर दें। इस घटना के बाद रावण शिव का परम भक्त बन गया। यह भी कहा जाता है कि एक बार नारदजी के उकसावे पर रावण अपने प्रभु महादेव को कैलाश पर्वत सहित उठाकर लंका में लाने की सोचने लगा। वह अपने विमान से कैलाश पर्वत गया और वहां जाकर वह पर्वत को उठाने लगा। पर्वत हिलने लगा तो माता पार्वती ने पूछा कि यह पर्वत क्यों हिल रहा है प्रभु। तब शिवजी ने कहा कि मेरा भक्त रावण मुझे पर्वत सहित लंका ले जाना चाहता है। तब भगवान शंकर ने अपना भार बड़ा करके अपने अंगूठे से तनिक-सा दबाया तो कैलाश पर्वत फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया। इससे रावण का हाथ दब गया और वह क्षमा मांगते हुए कहने लगा- ’शंकर शंकर’- अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया। यह क्षमा याचना और स्तुति ही कालांतर में ’शिव तांडव स्तोत्र’ की रचना हुई। इसी घटना को दर्षाती एक दुर्लभ मूर्ति राजकीय संग्रहालय मथुरा की वीथिका में पर्दषित है। यह प्राप्त मूर्ति से इस कथानक का पता चलता है कि यह मूर्ति मध्यकाल की मूर्ति है। जिसे रावणानुग्रह - के रूप में प्रर्दषित किया गया है। Ravana Lifting Uma Maheshvara With Kailash Mound gupta Period यह मूर्ति गुप्तकाल की है और यह मूर्ति (34.2577) में रावण द्वारा कैलाष पर्वत उठाने का प्रयास किया जा रहा है, जिस पर पार्वती और शिव एक साथ बैठे हुए हैं, उस प्रसंग को यहां दर्शाया गया है। कहानी के अनुसार जब रावण कैलाष से गुजर रहा था, तो उनके रथ को शिव के एक सेवक नंदिकेश्वर ने रोका था। पूछताछ करने पर रावण को बताया गया कि यह क्षेत्र निषिद्ध है, क्योंकि शिव और पार्वती एकांतवास में थे। लंकाधिपति को क्रोध आ गया। क्रोधित राक्षस राजा ने उस पर्वत को उठाना शुरू कर दिया। डावांडोल होते कैलाष पर्वत के कारण शिव का ध्यान भंग हुआ और कैलाष पर अशांति का कारण जानकर शिव ने पर्वत को अपने पैर से दबा दिया। उसका भार रावण को असहनीय हो गया और शक्तिशाली राक्षस रोने लगा। उसके रोने के कारण उसे रावण कहा जाने लगा। कई बार प्रार्थनाओं के बाद जब शिव प्रसन्न हुए तो रावण को भारी बोझ से राहत मिली। वर्तमान मूर्तिकला में रावण की शक्ति को उसके मजबूत शरीर, भारी भरकम सिर और भयानक रूप के माध्यम से दिखाया गया है। साथ ही उभरे हुए चेहरे से उनकी चिंता साफ झलक रही है। पार्वती अपने पति से लिपटी हुई हैं जो ऊर्ध्वलिंग रूप (अंग सीधा) में दिखाई दे रहा हैं और अपने दाहिने पैर से रावण को दबा भी रखा हैं।

बुधवार, 23 अगस्त 2023

दीघ्र जीवन की कहानियाँ

रामकृष्ण देव की तीन ही फोटो पूरे विश्व में सबसे ज्यादा देखने को मिलती हैं, किन्तु उनकी और भी पाँच-पाँच फोटो हैं, यह किसी को नहीं पता था। इन पाँचो फोटो के विषय में हम आगे चल कर चर्चा करेंगे। हम पहले-पहले तीन फोटो के विषय में जानते हैं, दीघ्र जीवन की कहानियाँ में प्रथम फोटो केशव चन्द्र सेन के निवास कमल कुटी पर उस समय ली गयी थी, जब रामकृष्ण देव ध्यान मुद्रा में थे तथा पीछे से उन्हें पकड़े हुए हैं उनके भांजे विनय मुखोपाध्याय, उनकी दूसरी तस्वीर खींची गयी थी श्रीराधा बाजार के एक स्टुडियों में यह फोटो रामकृष्ण देव एक स्टेन्ड के सहारे हाथ रख कर खडे हैं, मगर तीसरी तस्वीर जो पूरे विश्व में विख्यात हैं इस तस्वीर को खीचा गया था दक्षिणेष्वर मंदिर के राधा कान्त, मंदिर के प्रांगण में, उस समय बंगाल के एक नामी फोटोग्राफर अविनाश चन्द्र दा ने यह फोटो खींची थी, परन्तु इस फोटो को खीचते समय बड़ी मुसीबत खड़ी हो गयी। रामकृष्ण देव के फोटो खींचने की व्यवस्था भवनाथ नामक एक प्रिय भक्त ने की थी, रामकृष्ण देव किसी भी तरह से अपना प्रचार प्रसार नहीं चाहते थे, फोटो खींचने के लिए तो वह किसी भी तरह से राजी नहीं होते थे।
जब उन्होंने फोटोग्राफर को देखा तो वह वहाँ से सीधे चल दिये राधा कान्त मंदिर की ओर, और उनके पीछे-पीछे भवनाथ व वह फोटोग्राफर उस समय यह लुका छुपी के मध्य हाजिर हो जाते हैं नरेन्द्र नाथ तब उन्होंने तस्वीर खीचने की सभी व्यवस्था खुद करने की जिम्मेदारी ले ली। नरेन्द्र नाथ जी ने जिम्मेदारी तो ले ली मगर यह व्यवस्था होगी कैसे यह सभी सोच रहे थे कि रामकृष्ण देव तो केमरा देखकर ही विगड जा रहे थे। तब एक युक्ती लगाई गई नरेन्द्र नाथ उनके साथ कुछ बातचीत में व्यस्त हो गये, बातचीत का विषय था ईश्वर व भगवत कथा, भगवत चर्चा शुरू होते ही रामकृष्ण देव समाधिस्थ हो गये, इसी समय का अवसर भांपकर फोटोग्राफर को इशारा किया गया नरेन्द्र नाथ जी की तरफ से, फिर एक समस्या उत्पन्न हो गयी कि समाधिस्थ अवस्था में रामकृष्ण देव का शरीर एक तरफ झुक गया था। इस प्रकार की तस्वीर खींचना ठीक नहीं होगा जानकर अविनाश बाबू ने रामकृष्ण देव के शरीर को पकड़ कर थोड़ा सा सीधा करने की कोशिश की जब उनके मुह को पकड़ कर थोड़ा सीधा करने का प्रयास अविनाश बाबू करने लगे तो उन्हें रामकृष्ण देव का शरीर इतना हलका महसूस हुआ जैसे मानों किसी पतले कागज की भाँति हां, अविनाश बाबू घबरा गये नरेन्द्र देव भी इस दृश्य को देख कर उस तरफ दौड लिये फोटोग्राफर को निर्देश दिया कि रामकृष्ण देव जैसे हैं वैसे ही फोटो खींच लें, फिर किसी ने मारे डर के उनके शरीर को हाथ भी नहीं लगाया, दूर से ही तस्वीर खीच कर फोटोग्राफर हट गये। रामकृष्ण परमहंस को जरा सा भी आभास नहीं हो पाया, कुछ दिनों के बाद उन तस्वीरों के प्रिन्ट निकलवा कर लाये गये उन फोटोग्राफ को देखकर रामकृष्ण देव खूब आनन्दित हुए बाद में अपने इसी फोटोग्राफ को स्वयं रामकृष्ण देव फूल चढ़ा कर पूजा भी करने लगे थे, इनको देखकर उन्हें आनन्द जरूर हुआ मगर बाद के फोटो देखकर उन्हें अच्छा नही लगा। 1883 से लेकर 1886 साल के बीच रामकृष्णदेव के और पाँच फोटो लिये गये थे वह उन्हें जरा भी पसन्द नहीं आये जो तस्वीर उन्हें पसन्द नही आयी वो तस्वीर किसी भी तरह से प्रचार का हिस्सा न बनें, यह बात गिरीश चन्द्र बोस की समझ में आ गयी और उन्होंने उन पाँचों तस्वीरों के नैगेटिव्स को लेकर टुकडे-टुकड़े करके गंगा में वहा दिये, फिर उन तस्वीरों का तो कोई अस्तित्व ही नहीं बचा था। घटना केवल यहीं तक नहीं थी रामकृष्ण देव के प्रचलित तस्वीर में जो उनकी बैठी हुई तस्वीर है उसका नैगेटिव्स भी धीरे-धीरे समय के साथ खराब हो गया था, उसे कैसे भी ठीक नहीं किया जा सकता था। ऐसी स्थिति में उस नैगेटिव्स को रामकृष्ण मिशन के स्वामी चेतना नन्द जी के हाथ में ब्रज किशोर सिन्हा ने वह नैगेटिव्स सौंप दिया, समय था 1982 के साल का उस समय वह विक्टोरिया मैमोरियल के क्यूरेटर थे उस नैगेटिव्स को लेकर वह जोन हेन्स के पास पहुंचे यह वह व्यक्ति थे जिन्होंने 65 वर्षों तक आर्ट और डिजायन पर कार्य किया था। वह एक नामी गिरामी आर्टिस्ट थे। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि राम कृष्ण देव का नैगेटिव्स उनके हाथ में आयेगा। उन्होंने कड़ी मेहनत से इस नेगेटिव्स पर कार्य किया। जोन हेन्स भारतीय दर्शन के गहराई से अनुरागी थे, वह हिन्दू सनातन धर्म के प्रति आस्था रखते थे। रामकृष्ण देव का औरीजनल नैगेटिव्स जो उनके पास उनके हाथ में आएगा यह उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था, यह नैगेटिव्स हाथ में आने के बाद पूरे दो वर्षों की कड़ी मेहनत से जोन हेन्स ने एकाग्रता के साथ कड़े परिश्रम से उस नैगेटिव्स से समस्त काले दाग, डॉट्स एवं उसमें अन्यान्य कमियों को उन्होंने दूर किया, जबकि 100 वर्ष पुराने मूल नैगेटिव्स के उपर उन्होंने कोई भी परिवर्तन नहीं किया उसके बाद उसी नैगेटिव्स से फिर रामकृष्ण परमहंस जी के फोटो की कॉपी तैयार होने लगी। आज समूचे विश्व में यदि रामकृष्ण देव जी की तस्वीर देखने को मिल रही है इसके पीछे यही जोन हेन्स हैं जिनकी बजह से तैयार किये गये नैगेटिव्स से यह सम्भव हो सका। बंगाल के अविनाष चन्द्र दा के नैगेटिव्स से तमाम देशों में घूम-घूम कर फिर भारत देश में आकर प्रतिष्ठित हुए रामकृष्ण परमहंस देव। उन्होंने और उनकी इस तस्वीर ने मिलकर एक आर्ष्चयजनक सफर तय किया, जिससे सारा विश्व रामकृष्ण देव को जान सका।

गुरुवार, 27 जुलाई 2023

अतीत की कहानियां कहती संग्रहालय की शिव मूर्तियां

2 हजार वर्ष पूर्व में होती थी पंच मुखी शिव लिंग की पूजा

        श्रावण मास में महादेव के पांच मुख की पूजा का बड़ा महत्व माना गया है। अनेक विद्वानों के अनुसार सृष्टि, स्थिति, लय, अनुग्रह एवं निग्रह- इन 5 कार्यों की निर्मात्री 5 शक्तियों के संकेत शिव के 5 मुख से मिलते हैं। पूर्व मुख सृष्टि, दक्षिण मुख स्थिति, पश्चिम मुख प्रलय, उत्तर मुख अनुग्रह (कृपा) एवं ऊर्ध्व मुख निग्रह (ज्ञान) का सूचक माना जाता है। किन्तु अब मथुरा में कहीं भी पंच मुखी शिव लिंग की पूजा नहीं होती है, जनपद में कहीं भी पाँच मुखी शिव लिंग नहीं हैं। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व में मथुरा जनपद में पंच मुखी शिव की पूजा के प्रमाण राजकीय संग्रहालय, मथुरा में मिलते हैं। मथुरा संग्रहालय में एक मुखी शिव लिंग, दो मुखी शिव लिंग, चार मुखी शिव लिंग तथा पाँच मुखी शिव लिंग की मूर्तियाँ यहां पर दर्शनीय हैं।


किस प्रकार भगवान शंकर के हुए पांच मुख

        भगवान शंकर के पांच मुखों में ऊर्ध्व मुख ईशान दुग्ध जैसे रंग का, पूर्व मुख तत्पुरुष पीत वर्ण का, दक्षिण मुख अघोर नील वर्ण का, पश्चिम मुख सद्योजात श्वेत वर्ण का और उत्तर मुख वामदेव कृष्ण वर्ण का है। भगवान शिव के पांच मुख चारों दिशाओं में और पांचवा मध्य में उपर की ओर है। भगवान शिव के पश्चिम दिशा का मुख सद्योजात बालक के समान स्वच्छ, शुद्ध व निर्विकार है। उत्तर दिशा का मुख वामदेव अर्थात् विकारों का नाश करने वाला है। दक्षिण मुख अघोर अर्थात निन्दित कर्म करने वाला है। निन्दित कर्म करने वाला भी शिव की कृपा से ही निन्दित कर्म को शुद्ध बना लेता है। शिव के पूर्व मुख का नाम तत्पुरुष अर्थात अपनी आत्मा में स्थित रहने वाला है। वहीं ऊर्ध्व मुख का नाम ईशान अर्थात जगत का स्वामी का प्रतीक है।




शिवपुराण में भगवान शिव शंकर कहते हैं

        सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह- ये मेरे पांच कृत्य (कार्य) मेरे पांचों मुखों द्वारा धारित हैं। कथा अनुसार एक बार भगवान विष्णु ने अत्यन्त मनोहर किशोर रूप धारण किया। उस मनोहर रूप को देखने के लिए चतुर्भुज ब्रह्मा, बहुमुख वाले शेष, सहस्त्राक्ष मुख धारण कर इन्द्र आदि देवता आए। सभी ने भगवान के इस रूप का आनंद लिया तो भगवान शिव सोचने लगे कि यदि मेरे भी अनेक मुख होते तो मैं भी अनेक नेत्रों से भगवान के इस किशोर रूप का सबसे अधिक दर्शन करता। कैलाशपति के मन में इस इच्छा के उत्पन्न होते ही वे पंचमुख के हो गए। भगवान शिव के पांच मुख-सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान हुए और प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र बन गए। तभी से वे ‘पंचानन’ या ‘पंचवक्त्र’ कहलाने लगे। भगवान शिव के इन पंचमुख के अवतार की कथा पढ़ने और सुनने का बड़ा माहात्म्य है। यह प्रसंग मनुष्य के अंदर शिव-भक्ति जाग्रत करने के साथ उसकी समस्त मनोकामनाओं को पूरा कर परम गति को देने वाला है।


शिव शंकर की व्यापकता

        हमारे देश के विभिन्न प्रांतों में अनेक देवताओं का पूजन होता रहा है और होता है, किंतु शिव की व्यापकता ऐसी है कि वह हर जगह पूजे जाते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथ, जो हर जिज्ञासा को शांत करने में समर्थ हैं, जो श्रुति स्मृति के दैदीप्यमान स्तंभ हैं, ऐसे वेदों के वाग्मय में जगह-जगह शिव को ईश्वर या रुद्र के नाम से संबोधित कर उनकी व्यापकता को दर्शाया गया है।

        यजुर्वेद के एकादश अध्याय के 54वें मंत्र में कहा गया है कि रुद्रदेव ने भूलोक का सृजन किया और उसको महान तेजस्विता से युक्त सूर्यदेव ने प्रकाशित किया। उन रुद्रदेव की प्रचंड ज्योति ही अन्य देवों के अस्तित्व की परिचायक है। शिव ही सर्वप्रथम देव हैं, जिन्होंने पृथ्वी की संरचना की तथा अन्य सभी देवों को अपने तेज से तेजस्वी बनाया। 

        शिव को पंचमुखी, दशभुजा युक्त माना गया है। पांच तत्वों का निर्माण भगवान सदाशिव से ही हुआ है। इन्हीं पांच तत्वों से संपूर्ण चराचर जगत का निर्माण हुआ है। तभी तो देवराज पुष्पदंत महिम्न में कहते हैं - हे सदाशिव! आपकी शक्ति से ही इस संपूर्ण संसार का चर-अचर निर्माण हुआ है।


शिव का वर्णन शब्दों से नहीं किया जा सकता

        इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवान शिव उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के दृष्टा हैं। निर्माण, रक्षण एवं संहरण कार्यों का कर्ता होने के कारण उन्हें ही ब्रम्हा, विष्णु एवं रुद्र कहा गया है। शिव के विषय में उनका वर्णन शब्दों से नहीं किया जा सकता है। शिव की महिमा वाणी का विषय नहीं है। मन का विषय भी नहीं है। वे तो सारे ब्रह्मांड में तद्रूप होकर विद्यमान होने से सदैव श्वास-प्रश्वास में अनुभूत होते रहते हैं। इसी कारण ईश्वर के स्वरूप को अनुभव एवं आनंद की संज्ञा भी दी गई है।

भगवान शिव को लिंग रूप में क्यों पूजा जाता है

        इसकी वजह बेहद दिलचस्प है जबकि शिव शंभु आदि और अंत के देवता है और इनका न कोई स्वरूप है और न ही आकार वे निराकार हैं। आदि और अंत न होने से लिंग को शिव का निराकार रूप माना जाता है, केवल शिव ही निराकार लिंग के रूप में पूजे जाते हैं। लिंग रूप में समस्त ब्रह्मांड का पूजन हो जाता है। 

        पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन के समय सभी देवता अमृत के आकांक्षी थे लेकिन भगवान शिव के हिस्से में भयंकर हलाहल विष आया। उन्होंने बड़ी सहजता से सारे संसार को समाप्त करने में सक्षम उस विष को अपने कण्ठ में धारण किया तथा ‘नीलकण्ठ’ कहलाए। समुद्र मंथन के समय निकला विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ़ गया। उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई, जो आज तक चली आ रही है।


        शिव, हिंदू मतानुसार त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के रूप में एक महत्वपूर्ण देवता हैं, जिन्हें कई रूपों में दर्शाया गया है। वह एकमात्र देवता हैं जिनकी प्रतीकात्मक पूजा उन्होंने मानवरूपी रूप के साथ-साथ जारी रखी। इस उप-प्रकट रूप को लिंग (फालस) के माध्यम से दिखाया गया है। कभी-कभी लिंग पहलू को उनके मानव रूप के साथ भी जोड़ा जाता है।

मथुरा संग्रहालय में दर्षनीय शिव प्रतिमाएं

        मथुरा संग्रहालय में रखी शिव प्रतिमाओं के पास जाने से ज्ञात होता है कि यहां संरक्षित मूर्तियां गुप्त काल से भी पहले की हैं जिससे यह ज्ञात होता है कि यहां शिव लिंग की पूजा की जाती रही है। राजकीय संग्रहालय, मथुरा की मूर्तिकला के संग्रह में एक मुखी, दोमुखी, चार मुखी एवं पांच मुखी शिवलिंग की मूर्तियां प्रदर्शन के लिए रखी गयी हैं, जिनमें (11-15.462), जो जटायुक्त बैर, माथे पर तीसरा नैत्र और मानव खोपड़ी की एक माला (मुंड माला जोर अक्षमाला, रुद्राक्ष की माला) इनमें से एक के चेहरे पर कुछ उल्लेखनीय विशेषताएं भी देखने को मिलती हैं।


        एक अन्य मूर्ति (29.1931) में वर्गाकार आधार और शीर्ष पर एक स्वतंत्र अष्टकोणीय स्तंभ पर एक बड़ा त्रिशूल (शिव का हथियार जिसे त्रिशूल के रूप में जाना जाता है और तीसरी आंख (त्रिनेत्र) के साथ एक विशाल आकृति) और दाहिने हाथ में एक शाफ्ट पकड़े हुए है। उसका निचला हिस्सा नग्न दिखता है और हो सकता है यह लकुलिश पंथ का प्रतिनिधित्व करता हो, जिसकी एक समय में मथुरा में मजबूत पकड़ थी। शिलालेख में दर्ज है कि कुछ उदिताचार्य ने गुप्त काल (380) के सम्बत् 61 वें वर्ष में दो शिवलिंग (उपमितेश्वर और कपिलेश्वर) स्थापित किए थे। यह जान कर आर्श्चय और दिलचस्प लगता है कि यह स्तंभ उसी स्थान से जहां आज भी प्रसिद्ध शिव मंदिर रंगेश्वर है इस मंदिर के पास से ही इसे प्राप्त किया गया था। 


        एक अन्य शिवलिंग (15.516) जिसमें चार मानव आकृति के साथ अलग-अलग दिशाओं में उभरे हुए हैं। पांचवें सिर के निशानों से ऐसा प्रतीत होता है कि पंचमूर्ति में शिव के पंचानन पहलू का प्रतिनिधित्व करने वाला पंच मुखी (पांच मुखी) शिव लिंग है। इन सिरों को क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं की ओर मुख करके तत्पुरुष, अघोरा, वामदेव और सद्योजात कहा जाता है। ऊपरी चेहरा जो ऊपर की ओर दिखता है उसे ईशान के नाम से जाना जाता है। इस मूर्ति को देखकर लगता है कि आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व में पांच मुखी शिव की पूजा मथुरा जनपद में की जाती थी। जिसमें मोतियों की माला के चारों ओर बंधे मोटे उभरे हुए बैंड के आधार पर यह मूर्ति प्रारंभिक गुप्त काल की प्रतीत होती है। इस मूर्ति को संग्रहालय में स्थित सप्त समुद्री कूप से बरामद किया गया था।


        एक अन्य मूर्ति (30.2084) में शिव नंदी (बैल) और उनकी पत्नी पार्वती अपने वाहन सिंह के साथ खड़े हैं। दोनों तरफ उकेरी गई मूर्ति में शिव को उलझे हुए बालों (जटा), तीसरी आंख (त्रिनेत्र) और लिंग के साथ सीधी स्थिति में दिखाया गया है। वह बाघ की खाल (व्याघ्रजिना या व्याघ्रांबर) पहने हैं, जैसा कि दोनों के सिरों पर अंकित आभा मण्डल जैसे उकेरे गये संकेत से मिलता है। शिव और पार्वती वाली इस मूर्ति को आमतौर पर उमामहेश्वर के नाम से जाना जाता है। उमा संभवतः अपने बाएं हाथ में एक लिली का फूल लिए हुए हैं। शिव के एक मुखी लिंग पहलू को शिव के सिर के रूप में भी दर्शाया गया है।

शिव एवं पार्वती के अर्धनारीश्वर स्वरूप के दर्शन 

        गुप्त काल के पांच सिरों वाले शिव को दर्शाया गया है, जिनमें अलग-अलग हेयर स्टाइल दिखाई गई हैं। यह प्रतिमा (13.362) गुप्त काल की कलाकृति उच्च कारीगरी को प्रदर्शित करती है। जिसमें पुरुष और महिला के दो अलग-अलग पहलुओं को दिखाया गया हैं। एक तरफ दाहिनी ओर ऊंचे उलझे हुए बाल के साथ दिखाई देता है, जबकि बाईं ओर सुंदर हेयर स्टाइल और ऊर्ध्वाधर मोती की माला के साथ एक बड़े गोल आकार के कान के कुंडल से सुशोभित है। इस मूर्ति में मर्दाना और स्त्रियोचित विशेषताओं को अलग-अलग दर्शाया गया है। शिव की भौंहें ऊपर की ओर खिंची हुई हैं जबकि महिला के भाग को नाजुक ढंग से संभाला गया है। एक कुशल कलाकार ही यह उत्तम संश्लेषण कर सकता था।


        एक अन्य प्रदर्शित मूर्ति (15.772) में एक असाधारण सुंदर अर्धनारीश्वर की है जो शिव के ईश्वर पहलू को दर्शाती है, जो शिव और पार्वती का एक मिश्रित रूप है जो पुरुष और महिला की ऊर्जा के संलयन का संकेत देता है। ऊँचे उलझे बालों (जटाजूट) के साथ दाहिना भाग शिव का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि शेष आधा हिस्सा आकर्षक रूप से कंघी किए हुए बालों और फूलों से सजे बालों, बड़े और भारी कान की बाली के साथ, पार्वती का है। माथे पर एक ऊर्ध्वाधर तीसरी आंख है और गले में एकावली (मोती का हार) पहने हुए है। सुंदर होंठ, आधी बंद आंखें और सूक्ष्म लालित्य ने समग्र विशेषताओं के कारण आकर्षण को और बढ़ा दिया है।


        पुराणों में शिव और पार्वती के विलय की कहानी अलग-अलग तरह से वर्णित की गई है। कालिका पुराण के अनुसार एक बार पार्वती ने शिव की छाती पर अपना प्रतिबिंब देखा जो एक चमकती हुई आकृति के रूप में था। उन्हें कोई अन्य स्त्री समझकर ईर्ष्या होने लगी और उन्होंने शिव से उसे एक क्षण भी अपने से अलग न करने का अनुरोध किया। शिव ने पार्वती का यह अनुरोध स्वीकार कर लिया और उन्होंने अपने और पार्वती के शरीर को एक में मिला दिया। आध्यात्मिक रूप से अर्ध न अर स्वरे रूप प्रकृति और पुरुष के अनलोन का सुझाव देता है। पुरुष और महिला पंथ का संयोजन उदारवाद को आगे बढ़ाने वाले दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है।

प्रस्तुति - सुनील शर्मा 9319225654