शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

विभाण्डक ऋषि कुमार श्रृंग ऋषि राम की बड़ी बहन शान्ता के पति थे

अतीत की कहानियाँ कहती संग्रहालय की मूर्तियां 
विभाण्डक ऋषि कुमार श्रृंग ऋषि राम की बड़ी बहन शान्ता के पति थे 

राजकीय संग्रहालय, मथुरा की प्रत्येक मूर्तियां अपनी अतीत की कहानियाँ कहती हैं और उसमें छिपे इतिहास को खोजने और उसे समझने का अवसर भी देती हैं। एक दिन वीथिकाओं का अवलोकन करते-करते अचानक एक मूर्ति पर नजर गयी, यह मूर्ति चार हिस्सों में एक वेदिका स्तम्भ के रूप में बनी हुई है। जिसमें चार चित्र उपर से नीचे तक दिखाये गये हैं उपर के प्रथम भाग में बोधिसत्व के मुकट का पूजा करते हुए दिखाया गया है जब कि बीच के एक हिस्से में एक साधु एक हिरनी को कुछ चारा खिला व पानी किसी पात्र से पिला रहा है, इसके ठीक नीचे के हिस्से में साधु गर्भवती हिरनी के प्रसव के समय उसके बच्चे को अपने दोनों हाथ में लिये हुए दिखाया गया है, इसी वेदिका स्तम्भ के नीचे अन्तिम हिस्से में साधु एक टोकरी से लड्डु बांटता हुआ दिख रहा है। यह मूर्ति गोविन्द नगर, मथुरा क्षेत्र से प्राप्त हुई थी यह मूर्ति प्रथम शती ई. की है लगभग 2100-2200 वर्ष की वेदिका स्तम्भ के रूप में मिली जिसके विवरण को पढ़कर ज्ञात हुआ कि यह श्रृंग ऋषि के जन्म का वर्णन करती है। आपने श्रृंग ऋषि का नाम अवष्य ही सुना होगा। श्रृंग ऋषि विभाण्डक मुनि के पुत्र थे विभाण्डक मुनि के विषय में महाभारत में बड़े विस्तार व रोचकता के साथ लिखा गया है। श्रृंग ऋषि विभाण्डक मुनि के पुत्र थे और मस्तक पर सींग होने के कारण इनका नाम श्रृंग पड़ गया।
कहा जाता है उन दिनों देवता व अप्सरायें पृथ्वी लोक में आते-जाते रहते थे। बस्ती मण्डल में हिमालय क्षेत्र का जंगल दूर-दूर तक फैला हुआ था। जहां ऋषियों व मुनियों के आश्रम हुआ करते थे। आबादी बहुत ही कम थी। आश्रमों के आस-पास सभी हिंसक पशु-पक्षी हिंसक वृत्ति और वैर-भाव भूलकर एक साथ रहते थे। परम पिता ब्रहमा के मानस पुत्र महर्षि कश्यप के पुत्र महर्षि विभाण्डक उच्च कोटि के सिद्ध सन्त थे। पूरे आर्यावर्त में उनको बड़े श्रद्धा व सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उनके तप से देवतागण भी भयभीत हो गये थे। इन्द्र को अपना सिंहासन डगमगाता हुआ दिखाई देने लगा था। महर्षि विभाण्डक की तपस्या भंग करने के लिए देवताओं ने अपनी प्रिय अप्सरा उर्वशी को महर्षि के आश्रम में भेजा, उर्वषी के प्रेमपाश में पड़कर महर्षि का तप खंडित हुआ और दोनों के संयोग से बालक श्रृंगी का जन्म हुआ। पुराणों में श्रृंग ऋषि को इन दोनों का संतान कहा गया है। चूकि बालक के मस्तक पर एक सींग था अतः उनका नाम श्रृंग या श्रृंगी कहा गया। बालक को जन्म देने के बाद उर्वशी का काम पूरा हो गया और वह स्वर्गलोक वापस लौट गई। इस धोखे से विभाण्डक इतने आहत हुए कि उन्हें नारी जाति से ही घृणा हो गई। वे क्रोधित रहने लगे तथा लोग उनके शाप से बहुत डरने लगे थे। उन्होंने अपने पुत्र को मां, बाप तथा गुरू तीनों का प्यार दिया और उसे तीनों की कमी कभी नहीं होने दी। एक अन्य जनश्रुति कथा के अनुसार एक बार महर्षि विभाण्डक इन्द्र की सबसे प्रिय अप्सरा उर्वशी को देखते ही उस पर मोहित हो गये तथा नदी में स्नान करते समय उनका वीर्यपात हुआ। एक शापित देवकन्या मृगी के रूप में वहां विचरण कर रही थी। उसने जल के साथ वीर्य को ग्रहण कर लिया। जिससे एक बालक का जन्म हुआ उसके सिर पर सींग उगे हुए थे। उस विचित्र बालक को जन्म देकर वह मृगी शापमुक्त होकर स्वर्ग लोक को चली गई। किन्तु यहां राजकीय संग्रहालय, मथुरा में स्थित वेदिका स्तम्भ जिसका पंजीयन संख्या 76.40 का जिक्र करना ही पड़ेगा क्यों कि करीव 2200 वर्ष पूर्व यानी कि प्रथम शती ई. पूर्व की इस वेदिका स्तम्भ का मथुरा नगर के बीचों बीच गोविन्द नगर क्षेत्र से प्राप्ति और उसमें अंकित मूर्ति के चित्र इस इतिहास को सच साबित करती हुई दिख रही है, संग्रहालय में संरक्षित मूर्ति के विवरण के अनुसार विभाण्डक मुनि के आश्रम में एक हिरणी रहती थी मुनि को उससे प्रेम हो गया तत्पष्चात मुनि ने इस हिरणी के साथ समागम किया इसके पष्चात श्रृंग का जन्म हुआ और इस वेदिका स्तम्भ के उपरी भाग में बोधिसत्व के मुकुट का पूजन शीर्षभाग में दर्षाया गया है, इसके नीचे एक मुनि अपने आश्रम में एक हिरनी को चारा खिला रहे हैं, इसके नीचे तीसरे भाग में हिरनी से ऋषि पुत्र का जन्म अंकित है और सबसे नीचे ऋषि कुमार के जन्मोत्सव पर मिठाई वितरण का दृष्य अंकित है। आहत हुए विभाण्डक मुनि ने आश्रम में किसी भी नारी का प्रवेश वर्जित कर दिया था। वे पूरे मनोयोग से बालक का पालन पोषण कर रहे थे। बालक अपने पिता के अलावा अन्य किसी को जानता तक नहीं था। नारी जाति को उसने न कभी देखा न उसके विषय में उसे कोई ज्ञान था यह आश्रम मनोरमा जिसे सरस्वती भी कहा जाता था, के तट पर स्थित था और अंग देश से भी लगा हुआ था। देवताओं के छल से आहत महर्षि विभाण्डक तप और क्रोध करने लगे थे। उस आश्रम में कोई तामसी वृत्ति नहीं पायी जाती थी। महर्षि विभाण्डक तथा नव ज्वजल्यमान (चमकता हुआ) बालक श्रृंग के साथ ही आश्रम में रहते थे।
कहा जाता है कि उन दिनों आश्रम के निकट ही अंग देष में भयंकर सूखा पड़ा था। अंग के राजा रोमपाद (चित्ररथ) ने अपने मंत्रियों व पुरोहितों से मंत्रणा की, सभी ने श्रृंग ऋषि को राज्य में बुलाने का सुझाव दिया। क्यों कि श्रृंग ऋषि अपने पिता विभाण्डक से भी अधिक तेजवान एवं प्रतिभावान बन गये थे। उसकी ख्याति दिग-दिगन्तर तक फैल गई थी। राज दरवारियों ने अंगराज को सलाह दी कि किसी तरह से यदि महर्षि श्रृंग को अंग देश में लाया जाये तो राज्य से अकाल और सूखा समाप्त हो जायेगा। मगर पिता के रहते पुत्र को आश्रम से बाहर लाना असम्भव था। इसके लिये अंग राज ने योजना बनाई जब एक बार महर्षि विभाण्डक आश्रम से कहीं बाहर गये हुए थे, अवसर की प्रतीक्षा में अंगराज ने श्रृंग ऋषि को रिझाने के लिए देवदासियों तथा सुन्दिरियों को वहां भेज दिया। उनके लिए गुप्त रूप से आश्रम के पास एक शिविर भी लगवा दिया गया। त्वरित गति से उस आश्रम में सुन्दरियों ने तरह-तरह के हाव-भाव से श्रृंग ऋषि को रिझाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया। ऋषि कुमार को तरह-तरह के व्यंजन तथा पकवान उपलब्ध कराये गये। श्रृंग ने कभी भी कोई स्त्री को देखा तक नहीं था इन सुन्दरियों को अपने पास पाकर वह उनके मोहपाष के जाल में फंसने लगा। महर्षि विभाण्डक के आने के पहले ही वह सुन्दरियां वहां से पलायन कर जाती थीं। ऋषि कुमार श्रृंग अब चंचल मन वाले हो गये थे। पिता के कहीं वाहर जाते ही वह छिप-छिप कर उन सुन्दिरियों के शिविर में स्वयं ही पहुच जाते थे। सुन्दरियां योजना के अनुसार श्रृंग को अपने साथ अंग देश ले जाने मे सफल हुईं।
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जहां ऋषि कुमार के विषय में कहा गया हैं कि उन्होंने किसी भी स्त्री कभी देखा नहीं था। तो संग्रहालय के एक अन्य वेदिका स्तम्भ में दृश्य दर्षाया गया है कि कुछ स्त्रियां नाव से गन्तव्य तक पहुंच रही हैं। दूसरे दृश्य में मुनि विभांडक की अनुपस्थिति में गाना वजाना हो रहा है तथा ऋषि कुमार को लुभाने का प्रयत्न किया जा रहा है इसके और अन्त में श्रृंग ऋषि प्रेमपाश में बंधे हुए दिखाये गये हैं। वीथिका में ही सामने के स्तम्भ में एक अन्य मूर्ति में ऋषि कुमार को स्त्री संसर्ग के पश्चात उद्विग्न (खिन्नता के भाव) में स्थित दिखाया गया है। ...................................................................................................................................... 
अंग देष में ऋषि कुमार का बड़े ही हर्ष औेर उल्लास के साथ स्वागत किया गया। श्रृंग ऋषि के पहुचते ही अंग देश में वर्षा होने लगी। देषवासी सभी लोग अति आनन्दित हुए। उघर अपने आश्रम में पुत्र श्रृंग को ना पाकर महर्षि विभाण्डक को क्रोध और आश्चर्य हुआ। उन्होने अपने योग बल से सब जानकारी प्राप्त कर ली और अपने पुत्र को वापस लाने तथा अंग देश के राजा को दण्ड देने के लिए महर्षि विभाण्डक अपने आश्रम से अंग देश के लिए निकल पड़े।
अंगदेश के राजा रोमपाद तथा राजा दशरथ दोनों मित्र थे। महर्षि विभाण्डक के शाप से बचने के लिए रोमपाद ने राजा दशरथ की कन्या शान्ता को अपनी पोश्या पुत्री का दर्जा प्रदान करते हुए जल्दी से श्रृंग ऋषि से उसकी शादी करा दी। महर्षि विभाण्डक को देखकर एक योजना के तहत अंगदेश के वासियों ने जोर-जोर से शोर मचाना शुरू दिया कि ‘’इस देश का राजा महर्षि श्रृंग हैं।’’ अपने पुत्र को पुत्रवधू के साथ देख कर महर्षि विभाण्डक का क्रोध दूर हो गया और उन्होंने अपना विचार बदलते हुए बर वधू के साथ राजा रोमपाद को भी आशीर्वाद दिया और अपने पुत्र व पुत्रवधू को साथ लेकर महर्षि विभाण्डक अपने आश्रम लौट आये और शान्ति पूर्वक रहने लगे। उधर अयोध्या के राजा दशरथ के कोई सन्तान नहीं हो रही थी। उन्होने अपनी चिन्ता महर्षि वशिष्ठ को बताई। महर्षि वशिष्ठ ने श्रृंग ऋषि के द्वारा अश्वमेध तथा पुत्रेष्ठीकामना यज्ञ करवाने का सुझाव दिया। तब राजा दशरथ नंगे पैर श्रृंग ऋषि के आश्रम में गये थे। तरह-तरह से उन्होंने महर्षि श्रृंग ऋषि की बन्दना की। ऋषि को उन पर तरस आ गया। महर्षि वशिष्ठ की सलाह को मानते हुए वह यज्ञ की पुरोहिताई करने को तैयार हो गये। उन्होने एक यज्ञ कुण्ड का निर्माण कराया। इस स्थान को मखौड़ा कहा जाता है। रूद्रायामक अयोध्याकाण्ड 28 में मख स्थान की महिमा को इस प्रकार कहा गया है- 
कुटिला संगमाद्देवि ईशान्ये क्षेत्रमुत्तमम्। 
मखःस्थानं महत्पूर्णा यम पुण्यामनोरमा।। 
स्कन्द पुराण के मनोरमा महात्य में मखक्षेत्र को इस प्रकार महिमा मण्डित किया गया है- 
मखःस्थलमितिख्यातं तीर्थाणामुत्तमोत्तमम्। 
हरिष्चन्ग्रादयो यत्र यज्ञै विविध दक्षिणे।। 

महाभारत के बनपर्व में इस आश्रम को चम्पा नदी के किनारे बताया है। उत्तर प्रदेश के पूवोत्तर क्षेत्र के पर्यटन विभाग की बेवसाइट पर इस आश्रम को फ़ैजाबाद जिले में होना बताया गया है। परन्तु अयोध्या से इस स्थान की निकटता तथा परम्परागत रूप से 84 कोस की परिक्रमा मार्ग में सम्मलित होने के कारण इसकी सत्यता प्रमाणित होती है। ऋषि श्रृंग के यज्ञ के परिणाम स्वरूप राजा दशरथ को राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न नामक चार सन्तानें हुई थी। जिस स्थान पर उन्होंने यह यज्ञ करवाये थे वहां आज भी एक प्राचीन मंदिर बना हुआ है। यहां श्रृंग ऋषि व माता शान्ता का मंदिर बना हुआ है। यहां इनकी समाधियां भी बनी हुई हैं। यह स्थान अयोध्या से पूरब में स्थित है। आषाढ़ माह के अन्तिम मंगलवार को बुढ़वा मंगल का मेला लगता है। माताजी को पूड़ी व हलवा का भोग लगाया जाता है। इसी दिन त्रेतायुग में यज्ञ का समापन हुआ था। यहां पर शान्ता माता ने 45 दिनों तक अराधना की थी। यज्ञ के बाद ऋषि श्रृंग अपनी पत्नी शान्ता को अपने साथ लिवा ले जाना चाहते थे किन्तु वह वहां से नहीं गई और वर्तमान मंदिर में पिण्डी बनकर समां गयीं। पुरातत्वविदों के सर्वेक्षणों में इस स्थान के ऊपरी सतह पर लाल मृदभाण्डों, (मिट्टी के वर्तनों) भवन की संरचना के अवशेष तथा ईंटों के टुकड़े प्राप्त हुए हैं। 

प्रस्तुति- सुनील शर्मा (पत्रकार) मथुरा

बुधवार, 12 अप्रैल 2023

पौराणिक महत्व का प्रतीक सप्त समुद्री कूप आज उपेक्षित

धार्मिक परम्पराओं को निभाने के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों की जलापूर्ति करता कूप आज सूख गया है 

मथुरा। (सुनील शर्मा) सनातन धर्म का पालन करने बाले सभी अपने यहां किसी भी मांगलिक कार्य में सभी देवताओं का आवाहान करते हैं इसके लिए देवताओं को आमंत्रण करने के उपरान्त उनकी प्राण प्रतिष्ठा का विशेष महत्व माना जाता है। जब भी कोई शुभ कार्य किया जाता है, जैसे गृह प्रवेश, बच्चे का नामकरण, विवाह संस्कार मांगलिक कार्य आदि में सभी देवताओं को आमंत्रित कर उनकी प्राण प्रतिष्ठा पुराहितों के द्वारा कराई जाती है। जब देवता के आगमन और उनकी प्राण प्रतिष्ठा किसी न किसी मनोरथ की पूर्ति के लिए की जाती है जिससे भगवान हम पर प्रसन्न हों और हमारा मनोरथ पूर्ण हो, जिसके लिए हवन-यज्ञ भी किये जाने का विधान है। आज के दौर में लोग मनोरथ तो करते हैं पर उसमें धार्मिक प्रक्रियाओं का पालन पूरी तरह नहीं करते हैं जिसके कारण मनोरथ के श्रेष्ठ फल की प्राप्ति नहीं हो पाती है। प्राण प्रतिष्ठा के लिए सप्त समुद्रों के जल, सप्त नदियों का जल, सप्त तीर्थों की मिट्टी आदि की आवश्यकता पड़ती है। जो कि न उपलब्ध हो पाने की स्थिति में किये गये मनोरथ का पूर्ण होना भी संभव नहीं होता है। ब्रजवासियों के मनोरथ की पूर्ति हेतु समुद्रदेव ने भी वनखंडी क्षेत्र में एक कुएं में यह शक्ति प्रदान कर दी थी। ऐसा एक सप्त समुद्र कूप (कुआं) वनखंडी क्षेत्र स्थित डैम्पीयर नगर में पड़ने वाले राजकीय संग्रहालय स्थित है। यहां लोग कभी अपने-अपने धार्मिक परम्पराओं को निभाने थे, अब राजकीय संग्रहालय ने सुरक्षा की दृष्टि से इसे ढ़कवा दिया हैं।
यह एक सदियों से चली आ रही परंपरा का एक हिस्सा हैं, आज के आधुनिक युग में मनुष्य इन सभी प्राचीन परम्पराओं से दूर होता चला जा रहा है और हर कार्य शीघ्रता में और कम समय में होने लगे हैं। इन प्राचीन परम्पराओं के प्रति आस्था भी घटती चली गयी और लोग इन स्थानों को भी भूलते चले गये नतीजा यह कि प्राचीन धरोहर भी हमसे दूर हो गये या हमें मालुम ही नहीं कि कहां क्या छुपा हुआ है धीरे-धीरे एतिहासिकता भी कोसों दूर होती चली जायेगी। आज घर, मंदिर, आश्रम सहित अन्य प्रतिष्ठानों पर देवताओं को बैठा तो दिया जाता है पूजा भी की जाती है मगर इन देवताओं की प्राण प्रतिष्ठा के लिए अनुष्ठान में कई तरह की सामग्रियों का उपयोग नहीं हो पाता है और हर कार्य शोर्टकट से किया जाता है। इन आयोजनों में सात समुद्र, सात नदियां, सात मेवा, सात फल, सात पेड़ों के पत्ते, सात कुओं का पानी आदि की आवष्यकता के अनुसार व्यवस्था होती है। ऋषियों मुनियों ने लोगों के सात समुद्र के जल को न ला पाने की दुविधा को दूर करते हुए भारतवर्ष के सात स्थानों पर ऐसे कुपों की स्थापना की जिनके जल का स्त्रोत समुद्रों के जल से मिला हो और इनका जल कभी सूखे नहीं, गर्ग संहिता, पदम पुराण, वराहपुराण आदि में इस तरह के कूपों का उल्लेख मिलता है, उन्हीं में से एक कूप मथुरा के क्षेत्र में होना माना गया है, कई ग्रंथों में इसे मथुरा के वनखंडी क्षेत्र में होना बताया जाता है। यह वही क्षेत्र है जहां आज राजकीय संग्रहालय बना हुआ है। ब्रज मंडल में यही एकमात्र ऐसा स्त्रोत है जो समुद्रों से जुड़ा है, इसका पानी पहले बहुत ही अच्छा था तथा आसपास के पूरे क्षेत्र की जलापूर्ति इससे होती थी आज इसका स्त्रोत सूख गया है तथा इसके सूख जाने के कारण यह बन्द पड़ा है और सुरक्षा की दृष्टि से इसे पाट दिया गया है।
सप्तसमुद्र कूप अन्य जगह पर भी हैं पौराणिक महत्व के प्रतीक सप्त समुद्रीय कूप भारत में ही मौजूद हैं। इनमें काषी, प्रयाग, पाटलीपुत्र में ऐसे सप्त समुद्री कूप हैं, जिनके स्त्रोत कभी सूखते नहीं। इनका स्त्रोत समुद्र तल के साथ मिला हुआ माना जाता है। इस कूप से भगवान की मूर्तियां भी मिलीं सन् 1930 में जब कर्जन आर्कोलॉजिकल म्युजियम जो वाद में राजकीय संग्रहालय मथुरा का निर्माण हुआ तो परिसर में मौजूद इस सप्त समुद्रिक कूप की साफ सफाई कराई गई थी। कूप में से भगवान विष्णु, शिव आदि की मूर्तियां निकलीं थीं। इस आधार पर भी ये कूप पुरातत्व महत्व माना जाता है। आज से करीब 30 साल पहले ये कूप सूख गया तो इसकी सफाई नहीं कराई गई। बाद में इसको पाट दिया गया। 20 वर्ष पहले टोरंटो के एक प्रोफेसर भी इस कूप पर रिसर्च करने आए थे। उन्होंने अन्य सप्तसमुद्रीय कूप का अवलोकन किया था। वीथिका सहायक हरि बाबू ने बताया कि यह कूप सप्तसमुद्रीय कूपों में एक माना जाता है। पहले इसका स्त्रोत बहुत गहरा था। संग्रहालय प्रशासन ने बताया कि कूप को सुरक्षा की दृष्टि से बंद करा दिया गया था। लगभग 2000 वर्ष पुराना है यह कूप राजकीय संग्रहालय, मथुरा स्थित यह कूप गुप्तकाल का है और लगभग 2000 वर्ष पुराना यह कूप यहाँ के स्थानीय लोगों के सामाजिक धार्मिक आस्था का केन्द्र था और सभी के लिए यह बहुत पूजनीय था। माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों के परिवार में नव विवाहित दम्पत्ति को इस कूप की पूजा करने के लिए यहां लाते थे। शादी होने पर बहू को यहीं पूजन के लिए लाते थे। पुराने लोग तो आज भी कुआं पूजन के लिए आते हैं। सन् 1917 ई. के लगभग मथुरा में उत्तर प्रदेश की पहली आधुनिक कॉलोनी डैम्पियर पार्क के नाम से बनी जिसका गेट आज भी अपनी प्राचीनता को वयां कर रहा है जिसके दोनों ओर एक शिलालेख आज भी मौजूद है जिसमें एक तरफ उर्दू और एक तरफ अंग्रेजी में इस ग्रेट के निर्माण का प्रमाण मिलता है। 1930 ई. में कर्जन आर्कोलॉजिकल म्युजियम का निमार्ण शुरू हुआ जिसके परिसर में यह मथुरा का ऐतिहासिक सप्त समुद्री कूप आज भी मौजूद है। इस कूप से मथुरा कला की कई महत्वपूर्ण एवं दुर्लभ मुर्तियां बरामद हुई हैं, जो आज राजकीय संग्रहालय, मथुरा में संरक्षित व सुरक्षित हैं। परन्तु आज यह सप्त समुद्री कूप सूख चुका है और आम जनमानस के जहन से भी विस्मृत हो चुका है। संग्रहालय प्रशासन ने इसे सुरक्षा की दृष्टि से इसका पटाव कराकर ढ़क कर बन्द करा दिया है।
चतुर्वेदी समाज के लोगों की राय गोपाल चतुर्वेदी ने बताया कि धार्मिक कार्यों में सात समुद्र, सात नदियां, सात घुड़साल की मिट्टी आदि का विशेष महत्व है। देव स्थान, प्राण प्रतिष्ठा, विग्रह स्थापित, हवन, यज्ञ आदि में इस कूप से पानी लिया जाता था। संग्रहालय स्थित इस कुएं का चतुर्वेदी समाज में विशेष महत्व है। जब भी कोई बेटी शादी के बाद पहली बार मायके आती थी तो भाई के साथ यहां पूजन करने यहां आती थी। 
प्रस्तुति- सुनील शर्मा, मथुरा

शनिवार, 17 दिसंबर 2022

वीरेन्द्र सक्सेना भारतीय थिएटर, फिल्म और टेलीविजन के एक जानेमाने अभिनेता हैं।

वीरेन्द्र सक्सेना भारतीय थिएटर, फिल्म और टेलीविजन के एक जानेमाने अभिनेता हैं। वो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के पूर्व छात्र भी हैं। सक्सेना को उनके चरित्र अभिनय और अद्वितीय आवाज के लिए जाना जाता है। मथुरा में जन्मे, पले, पढ़े यहीं पर बचपन बीता मथुरा की मिट्टी से बेहद लगाव रखने वाले वीरेन्द्र सक्सेना ने अपने कुशल अभिनय से मथुरा का नाम रौशन किया। कल का दिन मेरे लिए बड़ा ही खास था, आजकल मेरा नियमित जंकषन रोड़ पर स्थित पी. के. स्टुडियो में जाना होता है, मुझे मालुम हुआ कि आज वीरू दादा यानी (वीरेन्द्र सक्सेना) स्टुडियो आने वाले हैं, मैं भी जल्दी से स्टुडियो पहुंच गया। दादा से मुलाकात हुई एक गम्भीर स्वभाव, अत्यन्त सरल व्यक्तित्व के धनी तथा अपनी अद्वितीय आवाज के लिए मषहूर, मुम्बईया फिल्मों में अपना लोहा मनवाने वाले वीरेन्द्र सक्सेना ने एक से एक धांसू फिल्में सिनेमा प्रमियों को दीं हैं।
आज वीरेन्द्र दादा किसी परिचय के मौहताज नहीं हैं हालांकि वीरेन्द्र जी आज मुम्बई की व्यस्त और चकाचौध भरी जिन्दगी का एक हिस्सा हैं मगर उनका मथुरा यानी उनके जन्मस्थान को वह कभी भुला नहीं पाये जब भी कभी मथुरा आते हैं उसी सादगी से लोगों से मिलते हैं, प्यार से वाते करते हैं, हर कौई काहिल हो ही जाता है। आज भी वह मथुरा के हालचाल जानने की इच्छा रखते हैं। मथुरा की तरक्की, मथुरा का विकास तथा यहां के सफल होते लोगों के विषय में जानने रूचि उनमें देखने को मिली। वीरेन्द्र जी से वातें हो रही थी कि उन्होंने कुछ नामचीन लोगों के बारे में पूछ लिया साथ ही मथुरा घाटी बहालराय से लेकर चौक बाजार और ब्रजवासी मिठाई वाला से लेकर लाल दरवाजा सब कुछ उन्हें याद है और हर गली और मौहल्ले के नामों को आजतक वह भूल नहीं सके। सब कुछ याद है तथा मथुरा से उनकी खटटी मीठी यादें जुड़ी हुई हैं।
वीरेन्द्र सक्सेना (वीरू दादा) भारतीय थिएटर, फिल्म और टेलीविजन के अभिनेता हैं। वो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के पूर्व छात्र भी हैं। सक्सेना को उनके चरित्र अभिनय और अद्वितीय आवाज के लिए जाना जाता है। उन्होंने ८० से अधिक भारतीय फ़िल्मों में, कुछ होलिवुड फ़िल्मों जैसे रैनबॉ, कॉटन मेरी, इन कस्टडी आदि तथा विभिन्न टेलीविजन धारावाहिकों में भी अभिनय किया है। सक्सेना का जन्म मथुरा के घाटी बहालराय में हुआ। उन्होंने टेलीविजन तारिका समता से विवाह किया और अब दोनों मुम्बई में रहते हैं। आपने उलझन, मेस्सी साहिब, खामोश, तामस, आशिकी, नरसिम्हा, दिल है कि मानता नहीं, विष्णु-देवा, धारावी, अंगार, सूरज का सातवां घोडा, कभी हाँ कभी ना, आइना, तेजस्विनी, तर्पण, इन कस्टडी, नाराज़, इंग्लिश, अगस्त, राम, टुन्नू की टीना, ज़िद्दी, परदेसी बाबू, हीरालाल पन्नालाल, अर्जुन पंडित, स्प्लिट वाइड ओपन, शूल, कॉटन मैरी, बिच्छू, अक्स, माया, काबू, घाव, साथिया, एक हिंदुस्तानी, जाल : दी ट्रैप, रघु रोमियो, समय, धुप, फंटूश, रुद्राक्ष, किस्मत, बर्दाश्त, वैनिटी फेयर, भोला इन बॉलीवुड, वादा, वाइट रेनबो, बनटी और बबली, सरकार, एक चालीस की लास्ट लोकल, राम गोपाल वर्मा की आग, ए वेडनेसडे, यह मेरा इंडिया, थे स्टोनमैन मर्डर्स, हाउसफुल 2, भेजा फ्राई 2, दी मैकेनिक, अत पता, लपटता, बबल गम, शागिर्द, तेरा क्या होगा, जॉनी रोड, मूवी देख भाई देख, संकट सिटी, एक से बुरे दो, चल चला चल से सलाम इंडिया कृष्णा करामाती कोट जिगरिया, डत जो बी, कार्वाल्हो जैसी फिल्मों अद्वितीय अभिनय किया है।
उन्होंने उस मिथक को भी तोड़ा जब फिल्मी दुनिया में यह समझा जाता था कि अति सुन्दर और बहुत अच्छा दीखने वाला व्यक्ति ही फिल्मों में जा सकता है और काम कर सकता है अगर आपके अन्दर प्रतिभा हो तो आप रंग रूप से नहीं अपने काम से लोगों के बीच अपनी पहचान बना सकते हैं, वीरेन्द्र सक्सेना एक मिशाल हैं।

रविवार, 4 दिसंबर 2022

ब्रजभाषा में चर्चित धारावाहिक ‘‘मिठाई’’ को सोशल मीडिया पर दर्शकों का मिल रहा है दुलार

गृहस्थ वह तपोवन है जहां संयम त्याग और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है। इसी विचार को लेकर जी बांग्ला के लोकप्रिय धारावाहिक ‘‘मिठाई’’ का ही हिन्दी रीमेक तैयार किया गया है। ‘‘मिठाई’’ जी टीवी पर प्रसारित होने वाला बहुचर्चित धारावाहिक है। मुम्बई के ऐबी प्रोडक्शन द्वारा प्रस्तुत किए गये पारीवारिक धारावाहिक के निर्देशक अरविंद बब्बल और व्रज की मिठास भरे संवाद रेखा बब्बल द्वारा लिखे गये हैं। इस घारावाहिक की कहानी मथुरा के एक मिष्ठान व्यवसायी धनाढ्य चौबे परिवार व जतीपुरा गोवर्धन के गुसाई हलवाई के बीच रची गई है। चौबे परिवार और मिठाई परिवार में बहुत ही प्रेम होने के साथ-साथ जब भी किसी परिवार पर कोई संकट आये यह गोपाल जी यानी भगवान को स्मरण किया करते हैं। चौबे परिवार की बड़ी बहू जतीपुरा में आरती के समय जो भजन गाती थी, वही भजन चौबे परिवार के आवास बंशीबट में जतीपुरा की मिठाई गाती है। यह भक्ति रचनाओं को ‘‘मेरे गोपाल’’ को लिखने में रंगकर्मी यतीन्द्र चतुर्वेदी का विषेष सहयोग रहा है। धारावाहिक ‘‘मिठाई’’ में मिठाई की मुख्य भूमिका में मुम्बई की प्रसिद्ध अभिनेत्री देबत्तमा साहा, नायक की मुख्य भूमिका में आशीष भारद्वाज ने अभिनय किया है। वहीं हरीमोहन चौबे जो हरीमोहन स्वीट्स के मालिक हैं उसकी भूमिका ग्वालियर के प्रसिद्ध रंगकर्मी यतीन्द्र चतुर्वेदी ने दर्शकों को अपने अभिनय के जरिए बांधे रखने में सफल रहे हैं। पत्नी की भूमिका में शैली शुक्ला ने अपने अभिनय से लोगों को प्रभावित किया है व इनके बड़े पुत्र गिरीश की भूमिका में सौरभ अग्रवाल ने अभिनय किया है। मिठाई की माँ इंदू की भूमिका में मुम्बई की अमिता चौकसी हैं। वहीं अग्रवाल जी की भूमिका में जीवाजी गंज ग्लालियर के प्रवीन गडकर सुपुत्र वैद्य कृष्णाचार्य गडकर अनुज डॉक्टर गजेन्द्र गडकर सहित सभी कलाकारों के प्रभावषाली अभिनय से धारावाहिक मिठाई को शोसल मीड़िया पर खूब सराहा जा रहा है। धारावाहिक मिठाई के सभी एपिसोड पारिवारिक पृष्ठ भूमि में आपसी मेल मिलाप के साथ रहने का संदेश दर्शकों को दिया गया है। धारावाहिक की कहानी में मिठाई एक प्रतिभाशाली मिठाई निर्माता, अपनी पेशेवर पहचान स्थापित करने की तलाश में है। क्या होता है जब मिठाई की दुनिया सिद्धार्थ से टकराती है, जो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर और पारंपरिक मिठाई बनाने के व्यवसायी का उत्तराधिकारी है। जिसके कारण धारावाहिक को दर्शकों का प्यार और सफलता की राह चढ़ने में बहुत कम समय लगा। अच्छी ब्रजभाषा बोलती हैं मुम्बई की अभिनेत्री अमिता चौकसी । जी़ टीवी 4 अप्रैल 2022 से शुरू हुए धारावाहिक मिठाई में मुख्य पात्र मिठाई की मां इंदु की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री अमिता ने ब्रज भाषा में अभिनय का चुनौती पूर्ण कार्य किया है। अमिता बताती हैं कि जब वे शुरुआत में मथुरा आउटडोर शूट के लिए फरवरी 2022 में सात आठ दिंन के लिए यहां रहीं थीं तो धारावाहिक के निर्माता निर्देशक अरविंद बब्बल ने कहा था कि आपको जतीपुरा की मिठाई गोस्वामी की मां का अभिनय करना हैं और आपको ब्रजभाषा में ही संवाद बोलने होंगे, तब अमिता को यह कार्य चुनौती भरा लगा परन्तु उन्होंने इस चुनौतीपूर्ण कार्य को सहर्ष स्वीकार किया और आंग्ल लिपि में लिखे हिंदी संवादौं का ब्रजभाषा में तर्जुमा कर बोलनां शुरू किया। इस कार्य के लिए मथुरा की मेघना शर्मा ने सहयोग किया था। मुम्बई में ही पली बढ़ी अमिता हिंदी, अंग्रेजी, मराठी व गुजराती धाराप्रवाह बोलती हैं और अब उनका ब्रज भाषा बोलना भी सराहनीय है। हर ब्रजवासी को उनकी प्रशंसा करनी ही चाहिए। कैमरे के सामने अभिनय हो या रंगमंच पर अमिता को इस क्षेत्र का व्यापक अनुभव व महारथ हासिल है। आपने रंगमंच पर अनेक गुजराती नाटकों में बतौर अभिनेत्री कार्य किया है और मिठाई में भी बहुत अच्छा काम किया है, यह पूर्व में भी अनेक लोकप्रिय धारावाहिकों में अभिनय कर चुकी हैं। सरल चित्त, मिलनसार, व हंसमुख और मुम्बईया भाषा में में इन्हें बिंदास ही कहा जाये तो ठीक होगा। अमिता एक बिजनेस मैन परिवार से आती हैं। अभिनय में रुचि होने के कारण बचपन में ही काम करना शुरू कर दिया था। वह बताती हैं कि मैंने एक बाल कलाकार के रूप में काम करना शुरू किया लेकिन शिक्षा मेरी प्राथमिकता थी, इसलिए मैं अपने अभिनय करियर पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकी, लेकिन जुनून के कारण मैंने ‘‘तेरी भी चुप, मेरी भी चुप’’, ‘‘श्रीमान श्रीमति’’ कालिंदी, अपराजिता, नारी तू न हरि जैसे धारावाहिकों में कार्य किया फिर गुजराती थिएटर करना शुरू किया, तभी मुझे ‘‘एक महल हो सपनों’’ में कार्य करने का ऑफर मिला। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, मैंने मुख्य भूमिका के रूप में गुजराती सीरियल करना शुरू किया और फिर मैंने अपना एलएलबी पूरा करने के लिए ब्रेक लिया। पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और धमाकेदार शुरुआत की श्रीमती तेंदुलकर, बलवीर, अग्निफेरा, तुझसे है राब्ता और अब मिठाई। देबत्तमा साहा भी एक चर्चित नाम है देबत्तमा बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं तथा मिठाई सीरीयल में उन्होंने अपनी अभिनय कला के जरिए इस भूमिका को निभाने में सफल रहीं है, देबत्तमा नृत्य गायन और अभिनय से दर्शकों का दिल जीतने में सफल रही हैं, देबत्तमा को अभिनय के क्षेत्र में अपनी अच्छी पहचान बना चुकी हैं। जी टीवी के इस धारावाहिक मिठाई के कुछ ऐसे ही लम्हौं को साकार करते किरदार हरी मोहन चौबे यानि बड़े दादू ग्वालियर के प्रसिद्ध रंगकर्मियों के रूप में जाने जाते हैं। धारावाहिक मिठाई में वरिष्ठ रंगकर्मी, अभिनेता और आकाशवाणी के पूर्व सहायक निदेशक यतींद्र चतुर्वेदी ने प्रमुख भूमिका में अपने अभिनय से सभी दर्शकों का दिल जीत रहे हैं। यतीन्द्र चतुर्वेदी का मथुरा से भी अलग नाता है उनका यहां पैतृक निवास होने के साथ-साथ मथुरा आकाशवाणी में भी आप सहायक केन्द्र निदेशक के पद पर कार्यरत रहे हैं मूलरूप से आप मथुरा के ही हैं, आपके

मंगलवार, 9 अगस्त 2022

मथुरा में जन्माष्टमी अलौकिक आनन्द का पर्व , साक्षात श्रीकृष्ण के अवतरित होने का अहसास कराती जन्माष्टमी

भगवान् श्रीकृष्ण धन्य हैं, उनकी लीलाएँ धन्य हैं और इसी प्रकार वह भूमि भी धन्य है जहाँ वे त्रिभुवनपति मानव रूप में अवतरित हुए और परम पवित्र अनुपम अलौकिक लीलाएँ कीं हैं। जिनकी एक-एक लीला का अनुकरण भी भावुक हृदयों को अलौकिक आनन्द देने वाला है। श्रीकृष्ण को अवतरित हुए आज पाँच हजार एक सो पैंतीस वर्ष हुए। उनके कीर्ति-गान के साथ-साथ उस परम पावन भूखण्ड की भी महिमा का सर्वदा बखान किया जाता है। वहाँ की रज को मस्तक पर धारण करने के लिये अब तक करोड़ों लोग तरसते हैं। बड़े-बड़े लक्ष्मी के लाल अपने समस्त सुख-सौभाग्य को त्याग कर यहाँ आ बसे और ब्रज में माँग-माँगकर उदर-पोषण करने में ही अपने आपको धन्य समझा। यही नहीं, अनेक भक्त-हृदय तो यहाँ के टुकड़ों के लिये तरसा करते हैं, भगवान् से इसके लिये प्रार्थना करते हैं। ऐसा ही एक कवि हृदय ने व्यक्त किया है ऐसो कब करिहो मन मेरो । कर करवा हरवा गुंजनको, कुंजन माँहि बसेरो। व्रजवासिनके टूक जूँठ अरु घर-घर छाछ महेरो।। भूख लगे तब माँगि खाइहौं, गिनौं न साँझ-सबेरो। ऐसी आस ‘व्यास’ की पूजौ मेरे गाँव न खेरो।। इस भूमि में ऐसा कौन-सा आकर्षण है जो अपनी ओर इच्छा के विरुद्ध भी आकर्षित कर लेती है ? भगवान् श्रीकृष्ण ने यहाँ जन्म धारण किया था और नाना प्रकार की अलौकिक लीलाएँ की थीं, इसीलिये भक्त- हृदय इससे इतना प्रेम करते हैं ? अखिल ब्रह्मांड नायक, गीता के नायक, लीला पुरूषोत्तम, योगीराज श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्णा अष्टमी को हुआ था। देश के प्रायः सभी प्रान्तों में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व असीम श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। जन्माष्टमी का यह पर्व देश विदेश में बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। किन्तु पिछले दो वर्ष से जन्माष्टमी के सभी आयोजन मंदिरों में तो परम्परागत तरीके से सम्पन्न हुए कोरोना के चलते किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित किया गया था जिसके चलते इन वर्षों में बाहर से आने वाले श्रद्धालु मथुरा जनपद में प्रवेश नहीं कर पा रहे थें। इस वर्ष श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण का जन्म बड़े ही धूम धाम से मनायेंगे। श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर ब्रज के कण-कण में अपूर्व हर्षाेल्लास छा जाता है। जिसकी तैयारियां अभी से शुरू हो गयी हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु आपने घर आंगन को गोवर से लीप कर घर के द्वार पर बंदरवार बांध कर भव्य सजावट करके, मंगल सूचक थापे लगा कर और फूलों से घर में पालने (झूले) को सजाकर तैयारी करते हैं। इस अवसर पर ब्रज की बालाएं गाती हैं। ‘‘डोरी फूलन को पालनों, आजु नन्द लाला भए’’ ब्रज के घर-घर में भगवान को नये वस्त्र पहना कर उनका श्रंगार करके झांकियां सजाई जाती है। महिलाएं अपने यहां रखे सालिगराम की वटिया को एक खीरे में रख कर डोर से बांध कर श्री कृष्ण के जन्म समय मध्य रात्रि को 12 बजे उसे खीरे में से निकाल कर पंचामृत स्नान कराती हैं। इस प्रकार से भगवान श्री कृष्ण का प्रतीक रूप में जन्म की भावनाएं संजोई जाती हैं। स्त्री पुरूष बच्चे सभी व्रत रखते है और श्री कृष्ण के जन्म के दर्शन के उपरान्त ही अपना व्रत खोलते हैं।
इस अवसर पर अपार जनसमूह उमड़ पड़ता है। ब्रज के प्रत्येक घर आंगन में शंख घन्टा घड़ियाल की ध्वनि ऐसे गंज उठती है मानों वहां किसी बालक का जन्म हुआ हो इस प्रकार ब्रज के हर घर-घर में कृष्ण जन्म लेते हैं लोग आपस में बधाईयां देते हैं भक्ति भावनाओं में विभोर होकर ब्रजवासी नांचने गाने लगते हैं ‘‘नन्द के आनन्द भए जय कन्हैया लाल की’’ गाते हुए हर तरफ टौलियां नजर आने लगती है। मथुरा स्थित प्राचीन केशवदेव मंदिर में एक दिन पूर्व जन्माष्टमी मथुरा स्थित प्राचीन मंदिर भगवान केशवदेव और नगर के मध्य विराजमान ठाकुर द्वारकानाथ द्वारकाधीश मंदिर में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। भगवान श्री कृष्ण का जन्म अर्धरात्रि के समय कंस के कारागार में होने के वाद उनके पिता वसुदेव जी कंस के भय से बालक को रात्रि में ही यमुना नदी को पार कर नन्द बाबा के यहां गोकुल छोड़ आये थे। इसी लिए कृष्ण जन्म के दूसरे दिन गोकुल में नन्दोत्सव मनाया जाता है। भाद्र पद नवमी के दिन समस्त ब्रजमंड़ल में नन्दोत्सव की धूम रहती है। यह उत्सव दधिकांदों के रूप मनाया जाता है दधिकांदो का अर्थ है दही की कीच। हल्दी मिश्रत दही फेंकने की परम्परा आज भी निभाई जाती है। मंदिर के पुजारी नन्दबाबा और जशोदा के वेष में भगवान श्रीकृष्ण के पालने को झुलाते हैं। मिठाई, फल व मेवा मिश्री लुटायी जाती है। श्रद्धालु इस प्रसाद को पाकर अपने आपको धन्य मानते हैं। श्री रंगनाथ मंदिर में जन्माष्मी श्रीरंगजी मंदिर श्री वृंदावन का यह भव्य विशाल मंदिर के सामने वाली मुख्य सड़क पर बना हुआ है। दक्षिण भारतीय शैली का अद्भुत मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण सेठ श्री राधाकृष्ण, उनके बड़े भाई सेठ लक्ष्मीचंद तथा छोटे भाई सेठ गोविंद दास जी ने कराया। श्रीरामानुज सम्प्रदाय का अति विशाल मंदिर स्थापत्थ कला की दृष्टि से भारत में एक अलग स्थान रखता है। यह मंदिर आकार में बहुत बड़े भूभाग को संजोये हुए है। इसमें पांच परिक्रमाएं हैं। जो ऊँचे-ऊँचे पत्थरों के परकोटों से विभक्त है। भीतरी परिक्रमा में श्री हनुमान जी, श्री गोपाल जी, श्रीनृसिंह जी के श्री विग्रह हैं। यहां एक पुष्करणी भी है जहां वर्ष में एक बार भाद्र पद मास में गजग्राह लीला का प्रदर्शन होता है। चौथे व प्रधानद्वार बैकुण्ठद्वार और नैवेद्य द्वार से तीन विशाल द्वार बने हुए है। इसी में 60 फुट ऊँचा स्वर्णमय विशाल गरूड़ स्तम्भ (सोने का खम्भा जिसे सोने के खम्भे का मंदिर भी कहा जाता है।) चौत्र मास में विशाल रथ यात्रा भी निकाली जाती है। वृंदावन के इस उत्तर भारत के विशाल श्री रंगनाथ मंदिर में ब्रज नायक भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के दूसरे दिन नन्दोत्सव की धूम रहती है। नन्दोत्सव के दौरान सुप्रसिद्ध लठ्ठे के मेले का आयोजन किया जाता है। धर्मनगरी वृंदावन में श्री कृष्ण जन्माष्टमी जगह-जगह मनाई जाती है किन्तु उत्तर भारत के सबसे विशाल मंदिर में नन्दोत्सव की निराली छटा देखने को मिलती है। दक्षिण भारतीय शैली के प्रसिद्ध श्री रंगनाथ मंदिर में नन्दोत्सव के दिन श्रद्धालु लठ्ठे के मेले की एक झलक पाने को टकटकी लगाकर खड़े होकर देखते रहते हैं। जब भगवान रंगनाथ रथ पर विराजमान होकर मंदिर के पश्चिमी द्वार पर आते हैं तो लठ्ठे पर चढ़ने वाले पहलवान भगवान रंगनाथ को दण्डवत कर विजयश्री का आर्शीवाद लेकर लठ्ठे पर चढ़ना प्रारम्भ करते हैं। 35 फुट ऊंचे लठ्ठे पर जब पहलवान चढ़ना शुरू करते हैं उसी समय मचान के ऊपर से कई मन तेल और पानी की धार अन्य ग्वाल-वालों द्वारा लठ्ठे के सहारे गिराई जाती है। जिससे पहलवान फिसलकर नीचे जमीन पर आ गिरते हैं। जिसे देखकर श्रद्धालुओं में रोमांच की अनुभूति होती है। पुनः भगवान का आर्शीवाद लेकर ग्वाल-वाल पहलवान एक दूसरे को सहारा देकर लठ्ठे पर चढ़ने का प्रयास करते है। तो तेज पानी की धार और तेल की धार के बीच पूरे जतन के साथ ऊपर की ओर चढ़ने लगते हैं। कई घंटे की मशक्कत के बाद आखिर ग्वाल-वालों को भगवान के आर्शीवाद से लठ्ठे पर चढ़कर जीत हासिल करने का मौका मिलता है। इस रोमांचक मेले को देखकर देश-विदेश के श्रद्धालु अभिभूत हो जाते हैं। ग्वाल-वाल खम्भे पर चढ़कर नारियल, लोटा, अमरूद, केला, फल मेवा व पैसे लूटने लगते हैं। इसी प्रकार से वृंदावन में ही क्या यहां के सभी मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर नन्दोत्सव मनाया जाता है। ब्रहमकुण्ड स्थित हनुमान गढ़ी में नन्दोत्सव के दौरान मटकी फोड़ लीला का आयोजन किया जाता है। 15 फुट ऊंची मटकी को ग्वाल-वाल पिरामिड बनाकर मशक्कत के साथ मटकी को फोड़ते हैं। एवं दधिकांधा उत्सव का आयोजन भी होता रहा है। यह लीला मंदिर के व स्थानीय युवाओं द्वारा इस परम्परा का निर्वहन किया जाता है।
बाँकेबिहारी के मंदिर में जन्माष्मी श्रीधाम वृंदावन आने का सौभाग्य प्राप्त होने पर भी यदि वृंदावन में बाँकेबिहारी के दर्शन न किये जाये तो तीर्थ करना अधूरा ही रह जाता है। बाँकेबिहारी के मंदिर का निर्माण लगभग संवत् 1921 में हुआ इस मंदिर का निर्माण स्वामी हरिदास जी के वंशजों के सामुहिक प्रयासों से हुआ। आरंभ में किसी धनी मानी व्यक्ति का धन इस मंदिर में नहीं लगाया गया। श्रीस्वामी हरिदास जी बाल्यकाल से ही संसार से विरक्त थे। वह एक मात्र श्यामाश्याम का ही गुणगान किया करते थे। यमुना के निकट निर्जन स्थान पर युगल छवि में ध्यान मग्न रहा करते थे। उन्होंने 25 वर्षों की अवस्था में विरक्तवेश ले लिया था। आप ने जहां जिस स्थान ‘‘निधिवन’’ में युगल छवि का ध्यान किया था। वहीं पर श्रीविग्रह भूमि से बाहर निकाले जाने का स्वप्नादेशानुसार श्रीस्वामी जी की आज्ञा पाकर श्री विठल, विपुल आदि शिष्यों ने बाँके बिहारी को भूमि से प्राप्त किया था। आज बाँके बिहारी अपनी रूप माधुरी से विश्व के तमाम लोगों को रिझाते हैं। यहां वर्ष में एक ही दिन हरियाली तीज को ठाकुर स्वर्ण हिंडोले में विराजते हैं जिसके दर्शनों को लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। चौत्र मास की एकादशी से श्रावण मास की हरियाली अमावस्या तक प्रतिदिन ठाकुर जी का फूल बंगला सजाया जाता है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन बाँके बिहारी के मंदिर में कोई विशेष आयोजन तो नहीं होते है लेकिन यहां जन्माष्टमी का अभिषेक रात्री 2ः30 के करीब होता है। प्रातः 5 बजे से मंगला आरती के दर्शन होते हैं। यहां की एक विशेषता और है कि बाँके बिहारी जी की निकुंज सेवा होने के कारण आरती में कोई शंख घण्टा घड़ियाल नहीं बजते शान्त भाव में आरती होती है। गोविन्द देव जी का मंदिर में जन्माष्टमी श्रीगोविंद देव जी का मंदिर वृंदावन में प्रसिद्ध व अतिप्राचीन मंदिर है। उत्तर भारतीय स्थापत्य शैली का लाल पत्थर का बना प्राचीनतम मंदिर है वर्तमान स्वरूप में जो मंदिर दिखाई देता है यह भवन औरंगजेब के अत्याचारों एवं क्रूरता का आज भी साक्षी है। इसके ऊपर के हिस्से को तोड़ दिया गया था। आकाशचुम्बी इस मंदिर का निर्माण गौड़ीय गोस्वामी श्री रूप, सनातन गोस्वामी के शिष्य जयपुर नरेश श्री मानसिंह ने सवंत् 1647 में कराया था। आताताईयों के आक्रमण करने से पूर्व ही राजा मानसिंह के जयपुर स्थित महल में यहां के श्री विग्रह को स्थानांतरित कर दिया गया था। आज भी जयपुर में गोविंददेव जी राजा के महल में विराजमान है तत्पश्चात संवत 1877 में पुनः बंगाल के भक्त श्री नंदकुमार वसु ने श्री गोविंददेव के नये मंदिर का निर्माण कराया यहां श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन विधिविधान से पूजा अर्चना अभिषेक का कार्यक्रम होता है। इस्कॉन मंदिर में जन्माष्टमी श्रीकृष्ण बलराम मंदिर (इस्कॉन मंदिर) इसका निर्माण श्री ए सी भक्तिवेदान्त स्वामी द्वारा स्थापित श्रीकृष्ण भावनात्मक संघ के तत्वावधान में सन् 1975 में हुआ था। प्रभुपाद के अनेक विदेशी कृष्ण भक्तों की देख-रेख में सेवा पूजा आदि समस्त व्यवस्थाएं सम्पन्न होती हैं यह मन्दिर अंग्रेज मन्दिर के नाम से भी प्रसिद्ध है। तीन सुंदर कक्षों में बायी ओर निताई गौरांग महाप्रभु मध्य में श्रीकृष्ण बलराम के अति मनोहारी छवि में विराजमान है तो दायीं ओर श्री राधा श्याम सुंदर युगल किशोर सुशोभित हैं। सभी श्री विग्रह अद्भुद वस्त्र आभूषण पुष्प मालाओं तथा मणिमय अलंकारों से श्रृंगारित होकर दर्शकों के मन को आकर्षित करते है। यहांँ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन भजन कीर्तन तथा प्रसाद वितरण होता है। रात्रि में अभिषेक का कार्यक्रम होता है, लाखों तीर्थ यात्री मंदिर में आते हैं और भजन के साथ-साथ हरी नाम संकीर्तन के साथ उछल-उछल कर नृत्य करते हैं। द्वारकाधीश मन्दिर मथुरा में जन्माष्मी असकुण्डा बाजार में स्थित यह मन्दिर सांस्कृतिक वैभवकला और सौंदर्य के लिये अनुपम है। इस मन्दिर का निर्माण सन् 1814-15 में ग्वालियर राज्य के कोषाध्यक्ष सेठ गोकुल दास पारीख ने कराया था। इनकी मृत्यु के उपरांत इनकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी सेठ लक्ष्मीचंद ने मंदिर के निर्माण को पूर्ण कराया था। 1930 में इस मंदिर की सेवा पूजा पुष्टिमार्गीय वैष्णव आचार्य गोस्वामी गिरधर लाल जी कांकरौली को भेंट स्वरूप दे दिया था। यहाँ सेवा पूजा अर्चना पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय के अनुसार ही होती है। श्रावण मास में प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु यहां सोने व चाँदी से निर्मित हिंडोले को देखने आते है। यहां जन्माष्टमी के दिन 108 सालिगराम का पंचामृत अभिषेक होता है तथा यहां अष्टभुजा द्वारकानाथ के श्रीविग्रह का भी पंचामृत अभिषेक किया जाता है। श्रीकृष्ण जन्मस्थान यह मथुरा का एक मात्र पवित्र धार्मिक स्थल है कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म इसी स्थान पर स्थित कंस के कारागार में हुआ था। वर्तमान समय में इस स्थान पर भव्य मंदिर स्थापित है जिसे देखने वर्ष भर लाखों तीर्थ यात्री श्रद्धालु पर्यटक आते हैं। देश-विदेश से लाखों तीर्थ यात्री प्रतिवर्ष तो आते ही है लेकिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन यहां जन्माष्टमी का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यहाँ के विशाल मंच पर रासलीला नाटक, कथा प्रवचन आदि उत्सव नित्य प्रति होते रहते हैं। जन्माष्टमी 19 अगस्त 2022 के दिन रात्रि के 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय श्रीविग्रह का पंचामृत अभिषेक होता है। इसके बाद श्रद्धालु नाचते, गाते, कीर्तन करते हुए भाव विभोर हो जाते हैं। इस मंदिर का निर्माण महामना पं. मदन मोहन मालवीय जी की सद्प्रेरणा से जुगल किशोर विड़ला व जय दयाल डालमियो ने कराया था विशाल भागवत भवन का निर्माण भी उन्हीं के द्वारा कराया गया था। प्राचीन केशवदेव मंदिर में जन्माष्टमी एक दिन पूर्व मनाई जाती है
मथुरा में ही श्रीकृष्ण जन्मस्थान के निकट ही प्राचीन केशवदेव मंदिर में एक दिन पूर्व मनाई जसती है। जन्माष्टमी के दिन यहां पंचामृत अभिषेक के पश्चात आकर्षक झांकियों में सजी कृष्ण की चर्तुभुज प्रतिमा के हजारों की संख्या में दर्शनार्थी मध्य रात्री तक भगवान केशव देव के अभिषेक के दर्शन करते हैं। यहां भजन, कीर्तन, नाच गाने के बीच हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में जन्माष्टमी मनाई जाती है। जन्म के दर्शन से पूर्व भजन-कीर्तन चलते रहे। महिला-पुरुष नाचते-गाते रहे। पुराने केशवदेव की प्रतिमा को जगमोहन से बाहर लाया जाता है। रात्रि में ठीक 12 बजे गोस्वामियों द्वारा अभिषेक सम्पन्न कराया जाता है। जिसमें दही, मधु, शक्कर, दूध, यमुना जल से अभिषेक कराने के बाद भव्य दर्शन होते हैं। दर्शन के लिए मंदिर के पट खुलते ही सभी दर्शनार्थी दोनों हाथ उठाकर ‘‘जय कन्हैया लाल की’’, कह उठते हैं। शंख, घंटा, घड़ियाल बज उठते हैं, चारों ओर रोशनी और मंदिर में विद्युत सजावट से जगमगा उठता है। श्रीकृष्णा जन्माष्टमी पर समूचा ब्रज जय कन्हैया लाल की के उद्घोषों से गूंज चारों तरफ सुनाई देती है वहीं हर सड़क पर भण्डारों की धूम दिखाई देती है। इस वर्ष कोरोना काल के बाद बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के बड़ी संख्या में आने का अनुमान जिला प्रषासन भी लगा रहा है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर सुबह से ही लोग बंदरवार, फूलमाला, केला के पत्ते आदि सामान खरीदते नजर आते हैं। श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर मनोहारी विद्युत लाइटों से सजावट की जाती है। नगर में हर चौराहे को प्रदेश सरकार के दिषा निर्देश पर सजाया जाता है। मंदिरों में भी बिद्युत सजावट के साथ जन्माष्टमी की धूम अभी से दिखाई दे रही है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व को लेकर आज समूचे बृजमण्डल में आपार श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना हुआ है। शहर के बाजार और घर-घर पर लोगों की तैयारियां व सजाबट देखते ही बनती है। समूचे बृज में कान्हा के जन्मोत्सव की धूम मची हुई है। मंदिर द्वारिकाधीश, श्रीकृष्णजन्मस्थान को जाने वाले सभी मार्ग सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ बाजार से खरीददारी करती देखी जा सकती है। सुदूर प्रांतों से कान्हा के जन्मोत्सव में शामिल होने आने वाले भक्तों के स्वागत सत्कार में बृजवासियों का उत्साह देखते ही बनता है। अभी से मुख्य बाजारों में स्थान-स्थान पर भण्डारों की तैयारी व पूड़ी सब्जी और व्रत से जुड़े आहार के वितरण में समाजसेवी और व्यवसायिक संस्थान अग्रणी भूमिका निभाने के लिए अभी से तैयार हैं। मथुरा के स्कूलों में भी मनाई जाती है जन्माष्टमी मथुरा के स्कूलों में भी जन्माष्टमी मनाई जाती है, छोटे-छोटे बच्चों को श्रीकृष्ण के आकर्षक रूप में सजाया जाता है। स्कूल में भी बाल-कलाकार सामूहिक रूप से जगह-जगह श्रीकृष्ण जन्म की कथाओं का वर्णन व मंचन भी करते हैं जगह-जगह लोग नाचते गाते देखे जाते थे। विभिन्न रासलीलाओं के माध्यम से श्रीकृष्ण की लीलाओं को रास के माध्यम से लोगों का मनोरंजन किया जाता रहा है। जन्माष्टमीः ठाकुर जी की पोषाक मुस्लिम सिलते हैं, बधाई गीत भी मुसलमान गाते हैं मथुरा। कान्हा की पोशाकों को तैयार करने में दिन रात मुस्लिम कारीगर लगे हुए हैं, ये पीढ़ी दर पीढ़ी इनका कारोबार चला आ रहा है, इस तरह मुस्लिम समाज के ये लोग सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश समाज में दे रहे हैं। मथुरा में भगवान श्री कृष्ण के जन्म उत्सव को लेकर सभी तैयारियों में लगे हुए हैं, वहीं प्रशासन भी पूरी तरह भगवान श्रीकृष्ण के जन्म उत्सव को अबकी बार दिव्य और भव्य बनाने के लिए कमर कसे हुए हैं। गोकुल में सुबह जब कान्हा के जन्म की खुशियां मनाई जायेंगी तो बधाई गीत भी मुसलमान गाते हैं और शहनाई भी मुसलमान ही बजाते हैं। मुस्लिम कारीगर भगवान श्रीकृष्ण और राधाजी की सुंदर और आकर्षक पोशाक तैयार करने में लगे हैं। कन्हैया के जन्म उत्सव की तैयारियों में मुस्लिम लोग सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दे रहे हैं। अल्लाह के बंदे श्रद्धा के साथ कृष्ण के जन्मोत्सव के दिन ठाकुरजी के श्रंगार में पहनाई जाने वाली पोशाकों के निर्माण में जुटे हुए हैं। इन पोशाक की भारत के विभिन्न शहरों में ही नहीं विदेशों में भी मांग है। मुस्लिम समाज के यह लोग भगवान श्रीकृष्ण की पोशाक व मुकुट श्रंगार के सामान बनाने का काम अब से नहीं कर रहे। इनके पूर्वज भी इसी तरह भगवान श्रीकृष्ण के आभूषण आदि बनाकर समाज मंे सौहार्द कायम करने का काम कर रहे हैं। मुस्लिम कारीगरों ने बताया कि 40 साल हो गये यह काम करते हुए, विदेशों में भी जाती हैं हमारी बनाई पौषाक, फक्र महसूस करता हूँ, हमारी किस्मत है कि ठाकुर जी ने हमें अपने कपडों को सिलने पर लगा रखा है। यह संदेश पूरा भारत में जाना चाहिए, भाईचारा सीखना है तो हमारे मथुरा वृंदावन के इन कारीगरों से सीखें, जो हमें लडाते हैं वह गलत आदमी है। बांकेबिहारी जी मंदिर भी जाते हैं वृंदावन में, पांच फुट से ज्यादा के ठाकुर जी होंगे तो पौषाक सिलने में पूरा एक महीना लगता है। एक पोषाक में करीब पांच आदमी लगते हैं। हमें अच्छा लगता है, दिल को सुकून मिलता है, ठाकुर जी की पोषाक बनाने में, भारत और भारत के बाहर के मंदिरों में हमारी पोषाक पहनाई जाती है। 100 से अधिक कारखानों में पौषाक तैयार करने के काम होता है मथुरा में पोशाक और मुकुट श्रृंगार का व्यवसाय फैला हुआ है। 100 से अधिक कारखानों में अधिकांश कारीगर मुस्लिम समाज के हैं, जो दिन-रात भगवान श्रीकृष्ण के पोशाक और श्रृंगार का सामान तैयार करने में जुटे हुए हैं, वह इन लोगों की रोजी-रोटी का भी एक साधन है। कान्हा के जन्मोत्सव का इंतजार इन्हें भी बेसब्री से रहता है। विदेशों में भी भारी मांग है इन पौषाकों की जन्माष्टमी से महीनों पहले से ही ये भगवान श्रीकृष्ण की पोशाकों को तैयार करने में लग जाते हैं। भगवान के मुकुट, गले का हार, पायजेब, बगल बंदी, चूड़ियां, कान के कुंडल जैसे आभूषणों को तैयार किया जाता है। तैयार होने के बाद इन्हें विदेशों में भी भेजा जाता है। इन पौषाकों के लिए अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड कनाडा, नेपाल और अफ्रीका से भी ऑर्डर आते हैं। पुराणों के अनुसार, श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं मथुरा के राजा कंस की बहन देवकी की कोख से नंद के लाल का जन्म हुआ था। कान्हा का बचपन गोकुल और वृंदावन में माता यशोदा की देखरेख में बीता। बाद में मामा कंस का उद्धार करने के लिए श्री कृष्ण मथुरा वापस आ गए। मथुरा, गोकुल, वृंदावन और बरसाना में देवकी नंदन की शरारतों, खेल कूद की कई यादें और कहानियां मौजूद हैं। इन जगहों पर कई कृष्ण मंदिर हैं, जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के मथुरा और उसके आसपास के जिलों में वासुदेव के मंदिरों के अलावा भी देश में कई बड़े कृष्ण मंदिर हैं। श्रीकृष्ण द्वारिका के राजा थे, जहां उनका राजमहल हुआ करता था। इसके अलावा उड़ीसा के पुरी में श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ भगवान जगन्नाथ के रूप में विराजमान हैं। इस बार 19 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। इस मौके पर अगर आप भगवान श्रीहरि के मंदिर जाकर उनके दर्शन और पूजा अर्चना करना चाहते हैं तो इस बार कृष्ण जन्माष्टमी पर कान्हा के प्रसिद्ध मंदिरों के करें दर्शन। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाने के लिए सबसे शुभ और महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक माना जाता है। यह हिंदुओं के लिए एक अत्यधिक महत्वपूर्ण त्योहार है क्योंकि भगवान विष्णु ने भगवान श्री कृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया था। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण का जन्म पांच हजार एक सो पैंतीस साल पहले द्वापर युग में मथुरा शहर में मध्यरात्रि में हुआ था। कृष्ण जन्माष्टमी एक लोकप्रिय और बहुप्रतीक्षित त्योहार है और इसे गोकुलाष्टमी, सातम आठम, श्री कृष्णष्टमी, श्रीकृष्ण जयंती और अष्टमी रोहिणी जैसे विविध नामों से पूरे भारत में मनाया जाता है। इस अवसर पर मंदिरों को सजाया जाता है। कीर्तन गाए जाते हैं, घंटियां बजाई जाती हैं, शंख बजाया जाता है और भगवान कृष्ण की स्तुति में संस्कृत के भजन गाए जाते हैं। भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में इस समय विशेष सांस्कृतिक व धार्मिक आयोजन किया जाता है, जिसमें जगह-जगह रासलीला कथा भागवत का आयोजन होता है। पूरे भारत से तीर्थयात्री व श्रद्धालु इस उत्सव समारोहों में शामिल होते हैं। लेकिन कृष्ण जन्माष्टमी अक्सर 2 दिन मनाई जाती है एक दिन स्मार्त द्वारा दूसरा वैष्णवों द्वारा। जन्माष्टमी 2022 तिथि और शुभ मुहूर्त जन्माष्टमी तिथि: 18 अगस्त 2022, गुरुवार अष्टमी तिथि का आरंभ: 18 अगस्त, गुरुवार रात्रि 09: 21 मिनट से अष्टमी तिथि का समाप्त: 19 अगस्त, शुक्रवार रात्रि 10: 59 मिनट तक जन्माष्टमी 2022 विशेष मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त 12ः05 मिनट से 12ः56 मिनट तक इस साल की जन्माष्टमी बेहद खास होने वाली है श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के विशेष कार्याधिकारी विजय बहादुर सिंह ने बताया कि श्री कृष्ण जन्मस्थान पर कृष्ण जन्माष्टमी 19-20 अगस्त की रात्रि में मनाया जाएगा। द्वारिकाधीश मंदिर के मीडिया प्रभारी राकेश तिवारी ने बताया कि मंदिर में कृष्ण जन्माष्टमी पर्व 19 अगस्त को मनाया जाएगा। मंदिर में जन्माष्टमी की तैयारी शुरू हो गई हैं। वहीं बांके बिहारी मंदिर में भी कृष्ण जन्माष्टमी पर्व 19 अगस्त को मनाया जाएगा। बांके बिहारी में जन्माष्टमी पर मंगला आरती 19-20 अगस्त की रात्रि दो बजे होगी। हिन्दू पंचांग के अनुसार इस वर्ष 2 दिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी 18 अगस्त को गृहस्थ जीवन की श्रेणी के लोग जन्माष्टमी पर्व मनाएंगे। अगले दिन यानि 19 अगस्त को साधु-संत इस पर्व को मनाएंगे। इस दिन बहुत शुभ योग का निर्माण हो रहा है जिस वजह इस साल की जन्माष्टमी बेहद खास होने वाली है। पंचांग के अनुसार इस दिन वृद्धि योग का निर्माण हो रहा है। माना जाता है कि इस योग में भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

वृन्दावन और मथुरा के दुर्लभ श्रीषट्भुज महाप्रभु के मंदिर

वृन्दावन (मथुरा)। चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिष्यों को समय-समय अनेक रूपों के दर्शन कराये थे जिसमें से एक षट्भुज अंग दर्शन भी कराये थे। जिसके दर्शन करने से षट् भुजाओं में श्रीकृष्ण, श्रीराम व स्वयं चैतन्य ने अपने आपको प्रस्तुत कर एक ही रूप में तीनों दर्शन करा दिये थे। इस रूप के दर्शन वृन्दावन तथा मथुरा के मंदिरों में होते हैं। वृन्दावन स्थित मंदिर का निमार्ण वि0सं0 1930 एवं षट्भुज महाप्रभु विग्रह की स्थापना वि0 सं0 1932 में श्रीराधारमण मंदिर के गोस्वामी श्री गल्लूजी “गुण मंजरी दास“ ने किया था। तथा मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान के निकट पोतराकुण्ड के समीप गुरूगोविन्द गौडिय मठ में भी इसी रूप के दर्शन होते हैं, जिसमें श्रीगौरांग महाप्रभु के विग्रह छः भुजाधारी महाप्रभु के वृंदावन तथा मथुरा में अति सुंदर दर्शन मंदिर में होते है। वृन्दावन में जहां उक्त मंदिर की स्थापना गोस्वामी गुल्लू जी द्वारा की गई है। वहीं मथुरा में इस रूप के श्रीविग्रह की स्थापना नवद्वीप पश्चिम बंगाल से आये गुरूगोविन्द दास ब्रह्मचारी बाबा महाराज ने की थी। मथुरा में उन्होंने सन् 1960 में ज्ञानवापी पोतरा कुण्ड के निकट जमीन खरीदी और 1998 में इस षट्भुज महाप्रभु जी के श्रीविग्रह की स्थापना की थी। वर्तमान सेवायत श्री कृष्ण प्रसाद दत्तगुप्त ने बताया कि महाराजश्री को स्वप्न में उक्त मूर्ति की स्थापित करने का आदेश हुआ था। जिसके वाद गुरूगोविन्द दास जी ने 1998 में षटभुज महाप्रभु जी के श्रीविग्रह को यहां स्थापित किया था। तभी से निरन्तर यहां सेवापूजा चलती आ रही है।
यह स्थान पुराणों में वर्णित है कि चैतन्य महाप्रभु यहां पधारे थे तथा यहां स्थित ज्ञानवापी में स्नान आदि के उपरान्त केशव देव के दर्शन किये थे। महाभारत काल का वर्णन भी इस स्थान का मिलता है। बताया जाता है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुरी में श्री सार्वभौम भट्टाचार्य और कृष्णानगर आँध्रप्रदेश के गोदावरी तट पर रायरामानन्द को जो षट्भुज रूप के दर्शन कराये थे, वही विग्रह यहां विराजित है। अर्थात् उठी हुई ऊपर की दो भुजाओं में धनुष, बाण, (राम-स्वरूप दो भुजा मध्य भाग में अधर पर मुरली (कृष्ण स्वरूप) तथा दो भुजा में दण्ड और कमण्डलु के साथ प्रकट षट्भुज महाप्रभु श्रीविग्रह में स्थित है।
वृन्दावन के राधारमण मंदिर के गोस्वामी गल्लू जी ’गुण मंजरी दास’ का जन्म वि0 सं0 1884 सम्वत् जेष्ठमास कृष्णपक्ष अष्टमी को वृंदावन में ही हुआ था। आप राधारमण के गोस्वामी दामोदरदास के वंशज श्री रमणदयालु जी के सुपुत्र थे। अधिकतर समय पिता फर्रूखाबाद निवास करते थे। परम विद्वान भागवती पण्डित, उदारमना थे। उन्होंने भागवत से अच्छा चैतन्य मत का प्रचार प्रसार किया आपकी प्रथम् भागवत लखनऊ के शाह बिहारीलाल जी के यहां पर हुई थी। जिससे उन्हें प्रचुर मात्रा में धन चढ़ावे में मिला था, आपने जो कुछ मिला वह ठाकुरजी की सेवा में लगा दिया। वृन्दावन स्थित शाहबिहारी जी का मंदिर जिसे टेड़े खम्बे का मंदिर भी कहा जाता है उसके निमार्णकर्ता कुन्दनलाल जी और फुन्दनलाल जी आपको गुरू मानते थे। काशी, भरतपुर नरेश के यहाँ शाहजहाँपुर आदि अनेकों स्थानों पर रजवाड़ों में आपकी कथाएं होती थीं, यहां गाजे बाजे के साथ भागवत की इनकी सवारी निकलती थी। उस समय आपकी खूब धूंम रही मगर 1937 से आपने हमेशा-हमेशा के लिए वृन्दावन वास कर लिया था और ब्रजभाषा में ही कथा किया करते थे।
एक वार की घटनाक्रम है कि इनका फर्रुखाबाद से पहला विवाह सखीदेवी के साथ हुआ था और कुछ समय के उपरान्त वह इस दुनिया से चली गयीं। उनके जाने के बाद किसी प्रकार से भी आप दूसरे व्याह को राजी नहीं थे। किन्तु पिता जी का अनेक उपाय, आग्रह करते देख ब्रजधाम वृंदावन से ही ब्याह करने को राजी हो गये। अतः जगन्नाथ मिश्र की पुत्री सूर्यदेवी से दूसरा विवाह हुआ। व्याह के समय आपने अपने पिताजी से कहा कि, “जब पाँव में बेड़ियाँ पहनानी हैं तो लोहे की क्यों ? सोने की बेड़ी पहनाओ’’ अर्थात् वृन्दावन में ही ब्याह कराओ। बाहर की कन्या से नही। यहां गोस्वामी जी का वृन्दावन धाम के प्रति निष्ठा का भाव दिखाई देता है। एक बार जब भागवत करके आ रहे थे। डाकुओं ने धन समझकर ग्रन्थ की पूरी-पूरी पेटी ही लूट ली थी। आपके अनेक अनुरोध पर डांकुओं ने सब धन तो ले लिया, किन्तु ग्रन्थ रूपी धन को डांकुओं से वापस लेने में सफल हो गये थे। एक बार जब ललितकिशोरी जी के यहाँ भागवत वाँचते समय गोस्वामी जी ने कथा प्रसंग में बन्दूक छोड़ने का प्रसंग आया। तब आपने कहा कि, “लौह नलिका में श्याम चूर्ण प्रवेश करिकै अग्नि संस्कार कियौ तो भड़ाम शब्द भयो।’’ ऐसा सुनकर सब आश्चर्य चकित हो गए। आपके विषय में अनेक चर्चाएँ आज भी लोगों के मन मस्तिष्क में हैं। वह साहित्यिक व्यक्ति थे। राधारमण जी में अनन्य आस्था थी। हमेशा ही बोलचाल में भी ब्रजभाषा का ही प्रयोग करते थे। आपके हृदय में ऐसा भाव था कि कथा के द्वारा जो धन प्राप्त होता है वह भगवद् सेवा और साधु-वैष्णवों की सेवा में लगना चाहिए। अपने उपयोग में उतना ही लाना चाहिए जितना शरीर धारण करने के लिए आवश्यक हो। शरीर में अधिक लगाने से चित की वृत्ति चंचल हो जाती है। गल्लू जी ने अपने निवास स्थान पर षट्भुज महाप्रभु के मंदिर की स्थापना की। आपके प्रेममयी सेवा को स्वीकार करने के लिए प्राचीन विग्रह के रूप में महाप्रभु जी स्वयं आ गए। गल्लू जी बड़े प्रेम से सेवा करने लगे। आज भी दर्शन होते हैं।
कहा जाता है कि जब गल्लू जी ने वृंदावन से बाहर जाना बंद कर दिया। केवल राधा रमण जी एवं महाप्रभु जी की सेवा में ही लगे रहते थे। महाप्रभु जी ने लगभग 15 वर्ष की सेवा इस शरीर से स्वीकार की। एक दिन श्री राधारमण जी ने अपनी नित्य लीला में बुला लिया। दाह संस्कार के समय शरीर भस्मीभूत तो हो गया लेकिन उनके गले की कंठी (माला) नहीं जली। लोग माला के दाने ग्रहण करने के लिए टूट पड़े। जिस-जिस को माला के दाने प्राप्त हुए वह अपने आपको भाग्यशाली समझने लगा था। गल्लू जी ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे। आज भी विभिन्न उत्सवों मंदिरों में गल्लू जी के पद गाए जाते हैं। आज भी श्रीषट्डभुज महाप्रभु जी का मंदिर राधारमण मंदिर और गोकुलानन्द मंदिर के रास्ते में बांईं ओर पर स्थित है। श्रीविग्रह श्रीषड़भुज महाप्रभु अति प्रचीन विग्रह प्रतिष्ठित मंदिर है। इनकी दो भुजाओं में वंशी है तो दो में धनुष बांण तथा दो में दण्ड और कमण्डलु है, अति दर्शनीय श्रीविग्रह है। कलियुग पावनावतार श्रीकृष्णचैतन्यदेव ने अनेक महान पुरूषों के सामने अपने अनेक अनेक रूप दरसाये हैं। उनमें से षड़भुज रुप का भी प्राकट्य किया है। विशेषतः श्री सार्वभौम भटटाचार्य को श्रीमहाप्रभु ने अपने षड्भुज रुप के दर्शन कराये थे। आत्म-निन्दा करि लैंन प्रभुर शरण। कृपा करिवारे तबे प्रभुर हाल मन।। देखाइलैन आगे तारे चतुर्भुज रूप। पाछेश्याम वंशीमुख स्वकीय स्वरूप।। देखि सार्वभौम पड़े दण्डवत करि। पुन उठि स्तुति करे दुई कर जुड़ि।। श्रीमन्महाप्रभु के श्रीमुख से अभिधेय, सम्बन्ध तथा प्रयोजनादि तत्त्वों की अदभुद व्याख्या सुनकर श्रीसार्वभौम विस्मित हो उठे थे। श्री सार्वभौम के मन में श्री चैतन्य महाप्रभु को लेकर एक धारणा थी कि यह एक युवक सन्यासी है और मैं इसे वेदान्त का अध्ययन कराऊंगा, वह घारणा जाती रही और अपनी निन्दा करते हुए स्वयं ही श्रीमहाप्रभु के चरणों में पड़ गए थे। तब श्रीमहाप्रभु ने कृपा करते हुए उन्हें अपने वास्तव स्वरूप के दर्शन कराये थे। पहले तो शंख चक्रगदा पद्मधारी चतुभुज वह रूप दिखाया जो श्रीवासुदेव के सामने अविर्भूत हुआ था। फिर वंशी बजाते हुए द्विभुज रूप जो ब्रज में लीला परायण था उसके दर्शन कराये। इस प्रकार परब्रहम स्वयं भगवान श्रीब्रजेन्द्रनन्दन रूप में श्रीमहाप्रभु ने श्रीसार्वभौम को अपने स्वरूप का परिचय दिया था। दोनों रूपों को मिलाकर श्रीषड़भुज की भावना की गई है।
इस प्रकार के दर्शन मात्र से मनुष्य का कल्याण हो जाता है जिसमें तीनों रूप एक साथ और षट्भुज महाप्रभु के दर्शन होते हैं। कहीं दो हाथों में ‘‘धनुष बाण’’ (श्रीराम रूप) दो हाथों में ‘‘वंशी बजाते’’ हुए (श्रीकृष्ण) और दो हाथों में ‘‘दंड कमण्डलु’’ (संन्यासी रूप) के चित्र भी देखने को मिलते हैं निधुवन के पास में श्रीगोपाल जी के मंदिर में भी षड़भुज जी के दर्शन हैं। इसी प्रकार से मथुरा में पोतरा कुण्ड के निकट ज्ञानवापी से लगा हुआ गुरू गोविन्द गौडिय मठ में भी षड़भुज महाप्रभु के दर्शन होते हैं यहां का भी एतिहासिक महत्व है। अति प्राचीन ज्ञानवापी है यहां जब ब्रज में चैतन्य महाप्रभु पधारे थे तो उन्होंने यहीं पर प्रथम आकर इसी ज्ञानवापी में स्नान किया फिर केशव देव के दर्शन किये थे। यहां पर भी षड़भुज महाप्रभु के दर्शन मिलते हैं।