सोमवार, 10 मई 2021

भाव से पूजा और भाव से ही गोपाल के साक्षात दर्शन

    एक ब्राहम्ण था जो भगवान को भोग लगाये बिना खुद कभी भी भोजन नहीं करता था। हर दिन पहले गोपाल जी के लिए खुद प्रसाद बनाता था और भोग लगा कर फिर स्वयं व उसकी पत्नी व एक छोटा बेटा था यह तीनों ही गोपाल जी का प्रसाद पाते थे। बेटा पिताजी को हर रोज ठाकुर जी की सेवा और उनको भोग आदि लगाने की पूरी क्रिया को बड़े ही मनोयोग से देखता था। और पिता जी को यह भी देखता था कि वह किस प्रकार से गोपाल जी को निवेदन करते हैं कि लाला प्रसाद पाओ और पर्दा लगा कर बाहर आ जाते हैं।


एक दिन ब्राहम्ण को किसी काम से शहर की तरफ पत्नी के साथ जाना था सो उसने अपने बेटे से कहा कि आज तुम ठाकुर जी का ख्याल रखना और जैसे भी हो ठाकुर जी को कुछ बना कर खिला देना। बेटा बोला कि ठीक है पिता जी मैं जैसा आप कह रहे हैं वेसा ही करूंगा। माता पिता शहर की तरफ चले गये। बेटे ने कभी कुछ न बनाया न उसे कुछ बनाना आता है। उसने जल्दी-जल्दी से स्नान आदि करके दाल और चाबल मिला कर कुछ कच्ची सब्जी उसमें डाल कर अंगीठी पर बिठा दिया और ठाकुर जी को स्नान करा कर पौशाक आदि बदल कर आरती करके फिर बर्तन से गरम-गरम खिचडी निकाली और ठाकुर जी के सामने एक थाली में सजा कर परोस दी और पर्दा लगा दिया। 

अब वह कुछ देर वाद-वाद जाकर पर्दा हटा कर देखता कि गोपाल जी खा रहे हैं या नहीं मगर वह देखता है कि गोपाल जी ने तो उसकी बनाई हुई खीचड़ी को छुआ तक नहीं, प्रसाद को काफी देर देखने के वाद छोटे से बच्चे को बहुत गुस्सा आया और वह गोपाल जी से वोला कि पिताजी खिलाते हैं सो खा लेते हो क्यों कि वह स्वादिष्ट व्यंजन जो बनाते हैं। आज मैंने बनाया है मुझे खाना बनाना आता नहीं है और मैंने बेकार सा भोजन बनाया है इस लिये नहीं खा रहे हो, बालक ने गोपाल जी से काफी बिनती की कि आज जैसा भी बना है खा लो मुझे भी भूख लगी है तुम खा लो तो मैं भी प्रसाद पांऊगा। मगर गोपाल जी तो उसकी सुन ही नहीं रहे थे। जब उस बच्चे का धैर्य जबाव दे गया और उससे रहा नहीं गया तो वह बाहर से एक बड़ा सा सोटा लेकर आ गया और जोर-जोर से चिल्लाने लगा कि खाते हो या अभी इस सोटे से लगा दूं दो चार। 

यह कह कर वह फिर पर्दा लगा कर बाहर जाकर बैठ जाता है कि शायद इस वार गोपाल जी खा लेंगे, अबकी वार वह फिर झांक कर देखता है कि उसके द्वारा परोसी गई सारी खीचड़ी तो गोपाल जी खा गये है। मगर अब एक समस्या यह हो गयी कि अब सारी खीचड़ी तो गोपाल जी खा गये अब वह क्या खायेगा व माता पिता को क्या खाने को देगा ऐसा मन में विचार लिए वह थाली में जो थोडी बहुत खीचडी लगी थी। उसी को किसी तरह से चाट कर खा गया और फिर वहीं पर सो गया। जब शाम को माता पिता हारे थके घर बापस आये तो उन्होंने बच्चे को उठाया कि बेटा आज क्या बनाया था गोपाल जी के लिए। बेटा बोला पिता जी मैंने वैसे ही किया जैसे आप हर रोज पूजा सेवा करते हैं मगर आज गोपाल ने मेरी बनाई सारी की सारी खिचड़ी खा ली मैं भी भूखा रह गया। 

पिता को अपने बेटे की बात पर विश्वास नहीं हुआ। फिर पिता ने बेटे से कहा कि हमें बड़ी जोर से भूख लगी है गोपाल जी का भोग प्रसाद हमें भी तो दो हम भी कुछ खा लें सुबह से कुछ खाया भी नहीं है। ऐसा सुन कर बच्चा रोने लगा कि पिता जी आज गोपाल ने मेरे लिए भी कुछ नहीं छोड़ा, मैं भी भूखा रह गया कुछ भी नहीं खा पाया जो थाली में लगा रह गया था वही खाया और मुझे नींद आ गयी और मैं सो गया। ब्राहम्ण ने और उनकी पत्नी ने पहले तो सोचा कि शायद यह कुछ बना ही नहीं पाया होगा फिर जब उन्होंने थाली की तरफ देखा तो लगा कि कुछ बनाया तो है मगर शायद खुद ही खा कर सो गया होगा और हमसे झूठ वोल रहा है।

जब वार-वार ब्राहम्ण ने पूछा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं इतने वर्षों से रोजाना ना ना प्रकार के व्यंजन बना कर गोपाल जी के सामने रखता हूँ गोपाल जी ने कभी भी मेरी थाली से एक तिनका भी नहीं खाया आज पुत्र के हाथ से गोपाल ने खा लिया। ब्राहम्ण को विश्वास नहीं हुआ ब्राहम्ण ने देखने के लिए पर्दा हटाया तो देखा कि गोपाल के मुख में वह खिचड़ी लगी हुई है तब जब पुत्र से पूरी घटना सुनी तो ब्राहम्ण खुशी से पागल हो गया कि मैं न सही मैरे पुत्र ने तो साक्षात गोपाल को पा लिया है।

आशय यह है कि हमारी जो पूजा सेवा है भोग राग है यह सब भाव की है मन में जो भाव रखता है उसे भगवान निश्चय ही किसी न किसी रूप में मिल ही जाते हैं। 

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।


शनिवार, 1 मई 2021

चमत्कारी सन्त पागल बाबा

 मथुरा। (सुनील शर्मा ) वृन्दावन में तमाम सन्त है जिनके चमत्कार के किस्से हमेशा चर्चा में रहते हैं एक से एक चमत्कारी सन्त ब्रज में हुए हैं जिन्होंने समय-समय पर ब्रजवासियों को अपना चमत्कार दिखाया है। आज भी अनेक सन्त हैं जिनके आश्चर्यजनक चमत्कार को यहां आने वाले श्रद्धालु भक्त अक्सर देखते रहते हैं। जैसा कि भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि लीला भूमि अपने आपमें एक चमत्कार से कम नहीं है हर जगह आपको कुछ न कुछ आश्चर्य से भरा हुआ दिखाई देगा। कहा जाता है यहाँ कण-कण में भगवान श्रीकृष्ण का वास है और यह लीला भूमि हर पल आनन्दित करती रहती है, यहां हजारों मंदिर स्थापित हैं फिर भी यहां प्रतिवर्ष कोई न कोई नया मंदिर बन कर तैयार हो ही जाता है। जिसमें वृन्दावन में स्थित एक मंदिर हर तरह से चमत्कारी मंदिर है। जो पागल बाबा के मंदिर के नाम से ख्याति प्राप्त है।


हर एक मंदिर कृष्ण कन्हैया और राधारानी से जुड़ी यादों से बना है जिसमें उनकी लीलाओं का वर्णन अलग-अलग रूपों में देखने को मिलता है।  यहां के प्रत्येक मंदिर में पूरे साल भक्तों का तांता लगा रहता है। लोग यहाँ भगवान की लीला भूमि को करीब से देखने उसके आश्चर्य को स्पर्श करने और स्वयं उस चमत्कार का अहसास करने के लिए यहां आते रहते हैं।

आज भी सभी लोग मानते हैं कि जब-जब धरती पर पाप बड़ा है, तब-तब भगवान ने विश्व के कल्याण के लिए अवतार लिए हैं और जब भी भक्तों ने अपने अन्तर मन से भगवान को पुकारा है तो वे स्वयं उसकी मदद करने के लिए आ ही जाते हैं। लेकिन शायद ही आपने कभी सुना होगा कि स्वयं  भगवान अपने किसी भक्त के लिए कोर्ट में भी पेश हुए हों। इस वात में सचाई है कि वृन्दावन में एक ऐसा भी मंदिर है जहां की एक कहानी आपको आश्चर्य चकित कर सकती है। इस मंदिर के निमार्ता और उनकी कहानी दोनों ही बेहद दिलचस्प है। 


तो इस दिलचस्प मंदिर के विषय में जानते हैं कि इस भव्य मंदिर के बारे में जो श्रीपागल बाबाजी महाराज से जुड़ा चम्तकारी मंदिर पागल बाबा के नाम से प्रसिद्ध है, जो उनके एक भक्त को समर्पित है। आपको बता दें कि पागल बाबा मंदिर मथुरा वृन्दावन मार्ग पर स्थित है। इसके बारे में एक कथा जनमानस में आज भी प्रचलित है, जिसके अनुसार एक गरीब ब्राह्मण जो कि श्रीकृष्ण का बहुत बड़ा भक्त था। वह पूरा दिन ठाकुर जी का नाम जपता रहता था। उसके पास जो कुछ भी था या यूं कहें कि जितना भी रूखा-सूखा उसे मांग कर खाने को मिलता है वे उसे भगवान की मर्जी समझकर भगवान को अर्पित करके स्वयं खुशी-खुशी ग्रहण करते हुए अपना जीवन व्यतीत कर रहा था।  


एक समय उसे कुछ पैसों की जरूरत पड़ी तो वो किसी साहुकार से पैसे लेने के लिए गया। साहुकार ने उसे पैसे देते हुए कहा कि उसे जल्द ही पैसे लौटाने होंगे। उसकी बात मानकर वे पैसे लेकर घर आ गए। वह ब्राह्मण हर महीने नियम से किश्त का हिसाब करके साहुकार के पैसे लौटाने जाते थे। आखिरी किश्त के थोड़े दिन पहले ही साहुकार ने पैसे न लौटाने का एक पत्र उसके घर भिजवा दिया। यह देखकर ब्राह्मण बहुत परेशान हुआ और साहुकार से विनती करने लगा लेकिन साहुकार नहीं माना। मामला बड़ते बड़ते कोर्ट में पहुंच गया। एक दिन ब्राह्मण ने जज से अनुरोध करते हुए कहा कि एक किश्त के अलावा मैंने साहुकार का सारा कर्जा अदा कर दिया है। यह साहुकार झुठ बोल रहा है, इतना सुनकर साहुकर क्रोधित होकर जज साहब के सामने ही ब्राह्मण से कहने लगा कि कोई गलत व्यवहार नहीं किया है जिसके सामने आपने मुझे धन लौटा हो उसको सामने लाओ। इतना सुनकर ब्राह्मण सोच में डूब गया और सोचने लगा कि यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं कि मैंने साहुकार को जब जब धन लौटाए उसके और मेरे अलावा तो किसी ने मुझे पैसे देते हुए देखा ही नहीं।

इस बारे में बहुत सोचते हुए ब्राह्मण को अंत में अपने भगवान को याद करते हुए उसने कृष्ण कन्हैया का नाम लिया। यह सुनकर पहले तो जज साहब कुछ हैरान हुए लेकिन बाद में ब्राह्मण से उनका पता मांगा। ब्राह्मण के कहने पर एक नोटिस बांके बिहारी के मंदिर में भेजा गया। पेशी की अगली तारीख पर एक बूढ़ा आदमी कोर्ट में पेश हुआ और ब्राह्मण की तरफ से गबाही देते हुए बोला कि जब ब्राह्मण साहुकार के पैसे लौटाता था तब मैं उसके साथ ही होता था। बूढ़े आदमी ने रकम वापिस करने की हर तारीख को कोर्ट में मुंह जबानी बताया जैसे उसे सब कुछ एक एक तारीख के हिसाब से याद हो और साहुकार के खाते में भी बूढ़े आदमी द्वारा बताई गई रकम की तारीख भी सही लिखी निकली। साहुकार ने राशि तो दर्ज की थी लेकिन नाम फर्जी लिखे थे। जज साहब ने ब्राह्मण को निर्दोष करार दे दिया।


लेकिन जज साहब अब तक हैरान थे कि इतना बूढ़ा आदमी इतनी तारीख कैसे याद रख सकता है। जज साहब ने उसके बारे में उस ब्राह्मण से पूछा कि यह बूढ़ा आदमी कौन है, ब्राह्मण ने उत्तर दिया कि वह सब जगह रहता है लोग उन्हें श्याम, कान्हा, कृष्ण आदि नामों से जानते हैं। इसके बाद जज साहब ने फिर से उसको पूछा कि वह बूढ़ा आदमी कौन था फिर ब्राह्मण ने कहा सच में उन्हें पता नहीं था कि वह कौन थे।


जज साहब को इस बात से बड़ी हैरानी हुई, उसके मन में सवाल पर सवाल आ रहे थे कि आखिर वह आदमी कौन था, इसी पहेली को सुलझाने को जज साहब स्वयं अगले दिन बांके बिहारी के मंदिर में पहुंच गये। वह जानना चाहते थे कि आखिर कल जो कोर्ट में आदमी आया था, वह कौन था। मंदिर के पुजारी से जब जज साहब ने पूछा और सारे घटना क्रम की जानकारी करते हुए बात की तो पुजारी ने उन्हें बताया कि जो भी चिट्ठी-पत्री यहां आती है उसे भगवान के चरणों रख दिया जाता है। जज साहब ने उस बूढ़े आदमी के बारे में भी पूछा लेकिन पूजारी ने कहा ऐसा कोई भी आदमी यहां नहीं रहता है। यह सब बातें सुनने के बाद जज साहब समझ गए कि वह साक्षात श्रीकृष्ण ही मेरी कोर्ट में पेश हुए थे।  इस घटना के बाद जज साहब इतना हक्का-बक्का रह गये और अपने आपको धन्य मानते हुए अपने पद से ही इस्तीफा दे दिया और यहां तक कि उन्होंने अपना घर परिवार भी छोड़ दिया और एक फकीर बन गये।  लोगों की मान्यता के अनुसार बहुत सालों बाद वह जज साहब पागल बाबा के नाम से वृन्दावन में वापिस आ गये और उन्होंने पागल बाबा के मंदिर का निर्माण करवाया तब से ये मंदिर पागल बाबा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ है। 


इस मंदिर के निमार्ण के वारे में एक और मान्यता यह भी है कि जब जज साहब को पता लगा कि उनके सामने साक्षात श्रीकृष्ण ही कोर्ट में पेश हुए थे। तब से वह कृष्ण कन्हैया को ढूंढने के लिए इतने अधीर हो गये कि अपनी सुध बुध खो बैठे थे इस घटना ने उन्हें पागल सा कर दिया था। इसके बाद वह जिस किसी भंडारे में जाते थे वहां से पत्तलों की जूठन उठाते थे और उसमें से आधा जूठन ठाकुर जी को अर्पित करते थे और आधा खुद खाते थे उन्हें ऐसा करते देख लोग उनके खिलाफ हो गए और लोगों ने उन्हें मारना पीटना भी शुरू कर दिया लेकिन वो अपना सुध बुध खो बैठे थे और प्रत्येक दिन भण्डारों का जूठन खुद खाते और भगवान को भी खिलाते रहते थे हार कर लोगों ने उन्हें एक पागल के रूप में मान लिया था धीरे धीरे उनका नाम ही पागल बाबा पड़ गया। 


उनसे परेशान होकर लोगों ने एक बार उनके खिलाफ एक योजना बनाई।  जिसके अनुसार लोगों ने भण्डारे में अपनी पत्तलों में कुछ न छोड़ा ताकि ये पागल ठाकुर जी को जूठन न खिला सके। उन्होंने फिर भी सभी पालों को पांछ कर एक निवाला इकट्ठा कर ही लिया और अपने मुंह में डाल लिया, पर आज वो ठाकुरजी को खिलाना तो भूल ही गये। लेकिन जैसे ही उसे इस बात का आभास हुआ कि आज बिना ठाकुरजी को भोग लगाए ही वह निवाला मुंह में रख गये है, तब उन्होंने अपना निवाला मुंह के अंदर न किया कि अगर पहले मैं पहले खा लूंगा तो ठाकुरजी का अपमान हो जाएगा और अगर थूका तो अन्न का अपमान हो जायेगा। अब वो निवाला मुंह में लेकर ठाकुर जी के चरणों का ध्यान करने लगे। तभी अचानक से बाल-गोपाल एक सुंदर से लड़के के रूप में पागल बाबा जज साहब के पास आया और बोला क्यों आज मेरो भोजन खाय गये। ये सुनकर जज साहब की आंखें आसुओं से भर आई और वो मन ही मन बोल रही थी कि ठाकुरजी बड़ी भूल हो गयी है, मुझे माफ कर दो। ठाकुरजी ने भी मुस्कराते हुए बोले आज तक तेनें मुझे लोगों का जूठा खिलाया है किंतु आज अपना ही जूठा खिला दे। जज साहब की आँखों से अश्रु रूकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसके बाद ही बाबा ने प्रण किया और विशाल मंदिर का निमार्ण कराया फिर विशाल भण्डारा भी किया जिसमें मथुरा जनपद के सभी लोगों को आमंत्रित किया गया था। अपार जन समूह उमड़ा था उस समय बाबा का भण्डार खाली होने का नाम ही नहीं ले रहा था बाबा ने मंदिर में विशाल रसोई का निमार्ण कराया था तथा मंदिर के नीचे विशाल भण्डार घर का निमार्ण भी कराया था। उसी समय इन्कम टेक्स डिपार्टमेन्ट ने बाबा के यहां छापा मार दिया कि इतना अनाज और भण्डारे का सामान कहां से आ रहा है, बाबा का चमत्कार तब भी हुआ था पूरी टीम जब भण्डार घर में घुसी तो उसे वहां कुछ भी नजर नहीं आया वह आश्चर्य चकित हो गये कि जब यहां कोई सामान है ही नहीं तो इतना विशाल भण्डारा कैसे चल रहा है। हैरान परेशान आयकर के अधिकारी वहां से चले गये।


बाबा के देश भर में भक्त विशेष कर आसाम बंगाल व औडीशा के औद्योगिक घरानों व मारवाड़ी परिवारों से आते हैं क्यों कि बाबा मूलरूप से सापटग्राम असम से हैं वहां भी बाबा का विशाल मंदिर है।

पागल बाबा अपने पास एक लाल रंग का बड़ा सा रूमाल रखते थे और हर किसी के सिर पर उसे रखकर आर्शीवाद देते थे। साथही व्यापारियों को समय समय पर समाज में जरूरत की बस्तुओं के विषय में तेजी मंदी के विषय में भी बताते थे, जिससे व्यापारियों को बड़ा लाभ होता था। बड़ी संख्या में मारवाड़ी और देश के बड़े बड़े औद्योगिक घरानों के लोग बाबा के अनन्य शिष्य थे और आज तक उनके परिवार भी बाबा के भक्त हैं और बाबा की शक्तियों को आज भी महसूस करते हैं। बाबा की आकर्षक छवि लिये श्याम वर्ण के बाबा में हर किसी को अपनी ओर संमोहित करने की शक्ति थी चमत्कारी बाबा को आज भी लोग भूल नहीं पाये हैं।

बाबा के असंख्य धनाण्डय परिवार भक्त के रूप में आज भी बाबा की सेवा पूजा व बाबा महाराज के बताये गये मार्ग पर चल कर पीडित मानवता की सेवा करें तो वह परिवार आज भी तीसरी पीढ़ी के वाद भी इस पुनीत कार्य में लगी हुई है।


बाबा देवी पूजक भी थे इसी बाबा ने मंदिर में घुसते ही दांये हाथ पर भगवती दुर्गा का विशाल मंदिर बनवाया था। नो मंजिला मंदिर में हर देवी देवता का मंदिर बनवाया गया।

   आज भी उस पागल बाबा को समर्पित विशाल मंदिर वृन्दावन में स्थित है। कहा जाता है कि यहां से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं जाता है। यहां भक्तों की हर मनोकामना बाबा और उनके कान्हा जरूर सुनते हैं।  पागल बाबा का ये आश्रम बहुत ही धार्मिकता लिए हुए है यहाँ आने वाले भक्तों को सकारात्मकता का अनुभव होता है। बाबा का यह मंदिर अपने आपमें भी किसी चमत्कार से कम नहीं है मंदिर को किसी भी सड़क से देखा जाये तो यह मंदिर बहुत ही करीब दिखाई देता है मगर ज्यों ज्यों मंदिर की ओर जाते हैं मंदिर गायब हो जाता है। मथुरा वृन्दावन मार्ग के दोनों ओर से तथा सौ सैय्या अस्पताल ऐक्सप्रेस वे की तरफ से आने वाले मार्ग देखने पर यह बहुत करीब दिखाई देता है व कुछ समय वाद यह गायब भी हो जाता है।


हॉस्पिटल की परिकल्पना 70 के दशक में की जब किसी ने सोचा नहीं था कि हॉस्पिटल की इतनी जरूरत होगी, बाबा ने 1977 में एक धमार्थ ट्रस्ट की स्थापना की थी, बाबा के आदेश पर बने अस्पताल में बिना सरकारी मदद के जनरल ओपीडी, आंखो का अस्पताल, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, विभाग पागल बाबा महाराज के भक्त परिवारों के सहयोग से चल रहे हैं। हाल में कोरोना जैसी महामारी से परेशान लोगों के लिए ऑक्सीजन प्लांट लगाने व ऑक्सीजन सिलेंडर की निर्भरता खत्म करने कार्य किये जा रहे हैं। पागल बाबा का लक्ष्य था कि पीडित मानवता की सेवा की जाये। आज भी सबसे ऊंचा मंदिर पागल बाबा द्वारा स्थापित किया गया है जो कि ३० वर्ष पूर्व बनाया गया था।


पागल बाबा मंदिरः इस मंदिर का निर्माण स्वर्गीय पागल बाबा के अनुयायियों ने कराया। बाबा को मानने वालों का कहना है कि उन्हें पूरे मंदिर में सकारात्मकता की अनुभूति होती है जो इसके संस्थापक की याद दिलाती है। यह दस मंजिली इमारत का अपने आपमें एक अनूठा मंदिर है और वृंदावन की एक सशक्त पहचान भी है। यह मंदिर सबसे निचली मंजिल पर लगने वाली कठपुतलियों की प्रदर्शनी के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां कठपुतली के खेल के जरिये महाभारत और रामायण रूपी दो महाकाव्यों को दर्शकों के सामने लाने का प्रयास करता है।


मंदिर के बाहर फूल, अगरबत्तियों और भगवान की पोशाकों को बेचने वालों की दुकानें हैं। होली और जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर को भक्तों द्वारा भव्यता के साथ सजाया जाता है। सन् 1969 में बाबा श्री को एसी प्रेरणा हुई की आगरा का ताजमहल देखने के लिए देश विदेश से लाखों करोड़ों पर्यटक आगरा आता हैं, मगर श्रीकृष्ण की प्रेममयी लीलास्थली होने के उपरांत भी तथा आगरा के निकट होते हुए भी वृंदावन आने की प्रेरणा लोगों को नहीं हो पाती है। देश विदेश के पर्यटकों का ध्यान वृंदावन की ओर आकर्षित करने के लिए एक भव्य मंदिर बनाने की परियोजना बनाई गई। वृंदावन मथुरा मार्ग पर एक विशाल भू-खंड लेकर अल्पावधि में ही, जहाँ केवल सूखा खेत था, वहाँ एक विशाल संगमरमर के नौ मंज़िला मंदिर लीलाधाम की स्थापना की गई।


चारों तरफ शस्य श्यामला हरित भूमिपर श्वेत प्रस्तर जडित अतुलनीय मंदिर भारतवर्ष में अपने ढंग का प्रथम मंदिर है। इसकी चौड़ाई करीब 150 फीट (क्षेत्रफल 1800 वर्गफुट) तथा उँचाई 221 फीट है। इसके हर मंज़िल पर विभिन्न देव मंदिर है। इस आश्रम का नाम लीलाधाम रखा गया। यह अनूठा मंदिर भारतवासियों को तो आकर्षित करता ही है, विदेशी पर्यटकों को भी मंत्रमुग्ध करता है और भक्ति प्रधान देश की महत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिद्ध भी करता है। मंदिर में सुबह आठ से रात आठ बजे तक इलेक्ट्रॉनिक पद्धति से कृष्णलीला, रामलीला और पागल बाबा लीला व अखण्ड भजन कीर्तन अनवरत चलता रहता है। (सुनील शर्मा )


शनिवार, 10 अप्रैल 2021

सोशल मीडिया के कारण वृन्दावन कुम्भ घर घर तक पहुंच पाया

  कुम्भ की सदियों से चली आ रही आस्था, भक्ति, श्रद्धा का केन्द्र वृन्दावन कुम्भ भी समय के हिसाब से आधुनिक संसाधनों का उपयोग कर देश ही नही विदेशों तक में कुम्भ पूर्व वैष्णव बैठक को लोगों तक पहुंचाया गया। लोगों ने घर बैठे ही देखा कुम्भ, हर वर्ग ने इसे देखा व समझा भी, सोशल मीडिया के कारण कुम्भ में सभी सांस्कृतिक कार्यक्रम, साधु सन्तों व कथा वाचकों से कथा भागवत को लोग घर पर ही देख व सुन सके। इस व्यवस्था को मथुरा की प्रसिद्ध वीडियो एडिटिंग संस्थान पी. के. स्टुडियो के माध्यम से जाना व समझा जा सका।

सोशल मीडिया के प्लेटफार्म यूट्यूब व फेसबुक और अन्य प्रचार माध्यमों के जरिये लोगों तक वृन्दावन कुम्भ की हर गतिबिधियों को पहुंचाने का प्रयास किया। जिसको वरिष्ठ पत्रकार सुनील शर्मा के कुशल नेतृत्व में 14 लोगों की टीम ने कार्य को बखूवी निभाया। सुबह से ही कुम्भ मेला क्षेत्र में पहुंच कर पल-पल की जानकारी जुटा कर रात्रि में मथुरा पहुंचना फिर अगले दिन सुबह से लेकर रात्रि तक निरन्तर चालीस दिनों तक इस कुम्भ की यादों को समेटना फिर पूरे दिन होने बाली हर गतिबिधि पर नजर रखना और रात्रि में सांस्कृतिक पंडाल में होने बाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों को यूट्यूब व फेसबुक पर लाइब के माध्यम से प्रसारण कराना रहा।  


पी. के. स्टुडियो की टीम में पी. के. गुप्ता ने स्टुडियो के साथ-साथ कुम्भ मेला क्षेत्र में सभी प्रशासनिक अधिकारियों व मेला अधिकारियों के साथ समय-समय पर समन्वय स्थापित कर किस प्रकार से इस विशाल आयोजन को यादगार बनाया जाये इसका प्रयास किया। 


टीम लीडर के रूप में कार्य कर रहे सुनील शर्मा ने बताया कि सुबह 7 बजे तक कुम्भ मेला क्षेत्र में आना और रात्रि 11-12 बजे तक मथुरा बापिस लौटना। चालीस दिनों तक निरन्तर यह क्रम चला। हमारा लक्ष्य था कि हम कुम्भ की हर छोटी बड़ी गतिबिधि को संरक्षित कर सकें। इस कार्य में हमारे सहयोगी रहे मनीष शर्मा, लवकुश सागर, प्रदीप पुजारी, रूपेन्द्र यादव लालजी, संदीप कुलश्रेष्ठ, योगेश कुमार, अरविन्द अन्नू, कृष्णमुरारी पंडित।

तीन शाही स्नान के दिनों में अपार जनसमूह के बीच साधु सन्यासियों, चार सम्प्रदाय, चतु. सम्प्रदाय, वैष्णव गौडिय सम्प्रदाय तमाम अखाड़ों के साधु सन्त अपने अपने निशान व छत्र के साथ बैण्ड बाजों के साथ निकले पहले वृन्दावन की परिक्रमा की फिर कुम्भ मेला स्थल पहुंच कर यमुना में डुबकी लगाई। साथही बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भी पवित्र दिन पवित्र स्नान किया। सुरक्षा के पुख्ता इन्तजाम किये गये थे। उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद मथुरा के उपाध्यक्ष शेल्जाकान्त मिश्र भी कुम्भ मेला क्षेत्र में उपस्थित रहे। मेला क्षेत्र में जिलाधिकारी नवनीत चहल वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गोरव ग्रौवर व कुम्भ मेलाधिकारी नगेन्द्र प्रताप सिंह व उपमेलाधिकारी पंकज वर्मा एसडीएम दीक्षा जेन के अलावा तमाम अधिकारी मौजूद थे। सम्पूर्ण मेला क्षेत्र में कई पुलिस चौकियों का निमार्ण किया गया था भारी संख्या में जनपद व गैर जनपदों से पुलिस फोर्स की सुरक्षा के मद्दे नजर तैनाती की गयी थी।


मेला क्षेत्र के बीचों बीच संस्कृति ग्राम का पंड़ाल भी बनाया गया था जिसमें समूचे ब्रज क्षेत्र की फोटो गेलेरी के अलावा सांझी कला तथा अन्य कलात्मक धार्मिक मंदिरों तीज त्यौहारों मेलों को दशा कर साथही विगत चार वर्षों में ब्रज क्षेत्र में उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के द्वारा कराये गये विकास कार्यों की समीक्षा को दर्शाया गया था। इस पंडाल में प्रो पूअर संस्था द्वारा ब्रज क्षेत्र में गरीब व असहाय लोगों के द्वारा तैयार किये गये माला पौशाक व मुकुट श्रंगार के सामान की प्रर्दशनी भी लगाई गई थी।

संस्कृति ग्राम पंडाल के साथ ही सांकृतिक पंड़ाल भी बनाया गया था जिसमें दोपहर में स्कूली बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये, रात्रि में संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश व पयर्टन विभाग उत्तर प्रदेश के संयुक्त तत्वाधान में प्रदेश के लोकगीत, नृत्य, भजन गायन, विरहा गीत, भोजपुरी लोकगायन, अवधी लोक गायन, राई लोकनृत्य, चरकुला नृत्य,ब्रज के लोकगीत व नृत्य, मयूर नृत्य, फूलों की होली, कृष्ण भजन, जिकड़ी भजन, आल्हा गायन, रसिया गायन, ख्याल व नौटंकी व प्रत्येक दिन रामलीला व रासलीला का मंचन किया गया, दर्शक विशाल पंड़ाल में बैठ कर रंगारंग कार्यक्रमों का आनन्द लेते थे।  


मेला क्षेत्र में हमें तरह-तरह के साधु सन्तों का सानिध्य प्राप्त हुआ उनसे वार्ता करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। तन्त्र साधकों, अघोरियों, औघड़ों तथा हठ योगियों से लेकर विशाल जटाधारी साधु सन्यासियों के विचार जानने का अवसर मिला। वृन्दावन कुम्भ में पधारे श्रीमहन्तों, महामण्डलेश्वरों व प्रख्यात कथा वाचकों के श्रीमुख से उनकी वाणी को रिकार्ड करने का अवसर प्राप्त हुआ। 

वृन्दावन कुम्भ में पहली वार पधारीं पशुपतिनाथ नेपाल से किन्नर अखाड़ा की महामण्डलेश्वर हिमांगी सखी मुख्य आकर्षण का केन्द्र थीं, कुम्भ में आने वाले हरेक श्रद्धालु व दर्शनार्थी ने उनसे आर्शीवाद प्राप्त किया और प्रसाद स्वरूप उन्होंने भी हरेक को कुछ न कुछ दिया।


कुम्भ क्षेत्र में हजारों की संख्या में पंडाल लगाये गये थे मगर सबसे अधिक लोगों की भींड दो पंड़ालों में रही, एक था ढ़ाई लाख रूद्राक्ष से बना शिव लिंग और दूसरा पंडाल जिसमें वृन्दावन कुम्भ के इतिहास को दर्शाता हुआ गरूण जी अमृत कलश के साथ विराजमान थे इन दोनों ही पंडालों में युवाओं, महिलाओं, पुरूषों व बच्चों ने खूब सेल्फी लेकर अपने आपको यादगार बनाया। 

चाट, पकोड़ी, से लेकर तरह-तरह की खाने पीने की चीजों से लेकर खेल खिलौनों ने तथा तरह-तरह के झूलों ने जहां कुम्भ क्षेत्र में लोगों को आने को मजबूर ही नहीं किया आनन्दित भी किया। देर रात्रि तक लोग कुम्भ क्षेत्र में अपना मनोरंजन करते देखे गये।

कुम्भ क्षेत्र में हर धार्मिक पंड़ाल में भण्डारे का आयोजन किया गया था जिसमें श्रद्धालुओं ने खूब खीर पूड़ी, गड्ड की सब्जी, दाल चाबल, व्रत के दिन फलाहार का आनन्द लिया, कहीं-कहीं तो चाऊमीन, पुआ पकौड़ी, चाय कॉफी, फल प्रसाद वितरित किया गया। चारों तरफ आनन्द ही आनन्द था। 


जगह-जगह बड़ी-बड़ी एलसीडी पर चार वर्षों में उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद मथुरा द्वारा कराये गये विकास कार्यों तथा मथुरा वृन्दावन की प्रसिद्ध सांसद हेमा मालिनी को ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाये जाने के उनके द्वारा ब्रज क्षेत्र को दिये गये उदबोधन के साथ-साथ हर दिन के कार्यक्रमों को तथा ब्रज के सबसे प्रसिद्ध ब्रज वन्दना को अधिकाधिक वार देख कर लोग आनन्दित होते देखे गये।

प्रशासनिक अधिकारियों की धार्मिक आस्था के चलते इस वर्ष के कुम्भ की व्यापक व्यवस्थाओं से साधु सन्तों श्रीमहन्तों और कथावाचकों से लेकर आम श्रद्धालु भी अत्यधिक प्रसन्न थे। चौड़ी-चौड़ी सड़कों के साथ-साथ साफ सफाई की व्यापक व्यवस्था के साथ लाइट की व्यवस्था भीं दुरूस्त थी, रात्रि में चारों ओर का नजारा देखने लायक होता था जिधर तक नजर जाये रंगीन रोशनी में नहाये कुम्भ क्षेत्र को देख कर आज की युवा पीढ़ी सेल्फी लेने व अपने-अपने फोटो खीचने से रोक नहीं पाती थी। जिसमें श्याम सुन्दर मंदिर द्वारा सप्तदेवालयों के विशाल पंड़ाल की स्वचालित रंगीन रोशनी सबको भा गयी हर कोई इन लाइटों का दीवाना हो गया और घन्टों तक खड़े होकर लोग इन लाइटों को निहारते देखे गये।


सोशल मीडिया पर देश विदेश में बैठे ब्रज व मथुरा वृन्दावन को जानने व चाहने वालों में भी खासा उत्साह देखने को मिला। हर दिन होने वाले कार्यक्रमों को फेसबुक व यूट्युब पर लाइब देख रहे लोगों के बीच वृन्दावन कुम्भ ने खूब सुर्खियां बटोरीं हजारों दर्शकों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजी हैं। 

यूट््यूब पर हमारे दर्शक देवेश यादव ने हमें अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि ‘‘वृन्दावन कुम्भ में ब्रज तीर्थ विकास परिषद व संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा की की गई व्यवस्था बहुत सराहनीय हैं ब्रज की समृद्ध व अतुलनीय संस्कृति को इसके माध्यम से जानने व देखने का सुनहरा अवसर सभी को प्राप्त हो रहा है’’। इसी प्रकार ज्योति ज्योति जी ने लिखा है कि ‘‘बहुत बढिया प्रस्तुति वृन्दावन घाम की लग रहा है कि हम लोग साक्षात श्रीकृष्ण जी के दर्शन कर रहे हों’’।

फेसबुक मित्र मुनेश गोतम ने ब्रज वन्दना को देख कर लिखा है कि ‘‘ब्रज चौरासी कोस के प्रथम पड़ाव स्थल ध्रुव तपोस्थली मधुवन, महौली, कृष्ण कुण्ड, महाप्रभु जी की बैठक को भी शामिल किया जाये तथा वहां का विकास भी कराया जाये’’। राजवीर सिंह चौहान लिखते हैं कि ‘‘ अभिनन्दनीय, वन्दनीय, प्रशंसनीय है’’। हेमेन्द्र गर्ग ने लिखा है कि ‘‘ आपके द्वारा वृन्दावन कुम्भ मेले की तैयारियों से लेकर समापन तक की कबरेज की गई वह काबिले तारीफ है, वहीं प्रशासन द्वारा की गयी सुन्दर व्यवस्था से आम लोगों को काई परेशानी न हो इसका विशेष ख्याल रखा गया मैं मेले में तैयारियों से लेकर अन्त तक जुड़े रहे सभी लोगों को बहुत-बहंत धन्यवाद देता हूँ।


आर पी गुप्ता गहोई जी लिखते हैं कि ‘‘इनमें से बहुत से स्थानों की यात्रा जानकारी के अभाव में श्रद्धालु नहीं कर पाते हैं। सभी प्रमुख स्थानों की यात्रा जानकारी हेतु प्रशिक्षित गाइड की उपलब्धता सुनिश्चित कराने हेतु प्रयास करें। जिससे श्रद्धालुओं को ब्रज क्षेत्र की पूरी यात्रा का आनंद मिल सके’’। 

वृन्दावन कुम्भ की शुरूआत से अब तक मात्र साठ दिनों के भीतर फेसबुक उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद, मथुरा के पेज पर 38808 लोग पहंचे, 20100 लोगों ने हमारे फेसबुक पेज को देखा तथा 151 लोगों ने पेज को क्लिक किया। वहीं उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद, मथुरा के यूट्यूब चैनल को दो माह के भीतर 18392 लोगों ने देखा। जिसमें सबसे ज्यादा ब्रज वन्दना को 12747 बार देखा गया।


मंगलवार, 12 जनवरी 2021

भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का नाम ही कुम्भ है।

    हजारों वर्षों की परम्पराओं के निर्वाहन का केन्द्र है कुम्भ। कुम्भ शब्द आते ही हमारे मन में एक कलश की कल्पना भर उभर कर आती है, बास्तव में कुम्भ एक व्यापक शब्द है। कुम्भ में जनमानस से धर्म आध्यत्म को जोड़ने और कथा, भागवत, भजन, कीर्तन, हवन, यज्ञ, साधु संतों, महात्माओं से जोडे़ रखने का नाम ही एक कुम्भ है। कुंभ मेले का आयोजन प्राचीन काल से होता आ रहा है। हिंदू धर्म में कुंभ मेले और कुंभ स्नान को बेहद महत्व भी दिया जाता है। प्रत्येक बारह वर्षों के बाद लोग दूर-दूर से कुंभ मेले में स्नान करने पहुंचते हैं। ज्यादातर लोगों को यही पता होगा कि, कुंभ मेले का आयोजन 4 जगहों पर होता है हरिद्वार, प्रयाग, नासिक, और उज्जैन। हालाँकि आपको शायद यह जानकर आर्श्चय भी हागो की कुंभ मेला श्रीधाम वृंदावन में भी आयोजित होता है। इसे ‘मिनी कुंभ’ के नाम से भी जाना जाता हैं। 


इस वर्ष श्रीधाम वृंदावन में कुंभ 16 फरवरी 2021 बसंत पंचमी माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी से शुरू होने जा रहा है। यह आयोजन 25 मार्च 2021 आमलकी एकादशी तक चलेगा। वृंदावन में होने वाले कुंभ पर्व को कुंभ या वैष्णव कुम्भ के नाम से जाना जाता है। जहां संत समाज व साधु समाज इसे तकरीबन 5000 साल पुराना मानते हैं।

    श्रीवृन्दावन धाम अमृत कलश के स्पर्श के कारण कुम्भ स्थल बना ऐसा कहना उचित नहीं है। श्रीवृन्दावन धाम तो श्रीकृष्ण से अभिन्न यानि नित्य अमृतमय श्रीप्रभु ने ही रस-कुम्भ रूप, वृन्दावन को सम्पूर्ण आनन्द से मथ करके ही प्रकट किया है। श्रीवृन्दावन कुम्भ भागवत सम्मत एक महान भागवत पर्व है। भारतवर्ष के जिन चार स्थानों पर कुम्भ के आयोजन होते हैं वहां तो मात्र अमृत कलश से कुछ बूँदें ही छलकी थीं। किन्तु ब्रज वृन्दावन में सुधा-धारा सर्वत्र प्रवाहमान रहती है। यहाँ अमृतधारा है वेणु वादन की, श्री राधारानी के नूपुरों के धुनों की, श्रीकृष्ण की लीलाओं की, कथाओं की, यहां का जल अमृत है और श्रीराधा रानी व श्रीकृष्ण रसामृत मूर्ति हैं। इस प्रकार यहां तो प्रेमामृत की धारा अनवरत वहती ही रहती है। यहां की प्रेम रस की एक भी छींट जहां पड़ जाती है वहीं प्रेम का उद्गार हो जाता है।


          ‘‘छलकत छींट जहां पड़ी तहां प्रेम उद्ंगार’’

    निकुंज वृन्दावन में तो नित्य महाकुम्भ पर्व बना रहता है। इस लिये वृन्दावन के कुम्भ का विशेष महात्म्य है। वास्तव में कुम्भ पर्व स्नान-दान धर्म में आस्था का पर्व है। इस अवसर पर स्नान का विशेष महत्व होता है।

‘‘सहस्र कार्तिके स्नानं माघे स्नान शतानि च।

वैशाखे नर्मदा कोटिं कुम्भ स्नानेन तत्फलम्।।

‘‘अश्वमेध सहस्त्राणि वाजपेय शतानि च।

लक्षप्रद्क्षिणा भूमेः कुम्भ स्नानेन तत्फलम्’’।।

    अतः वृन्दावन में कुम्भ-पर्व के अवसर पर विभिन्न मठ, मन्दिर, अखाडे़ तथा सभी सम्प्रदाय के प्रतिनिधिगण महामिलन स्थल श्रीयमुना तीर पर एकत्रित होकर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। देश-विदेश से लाखों की संख्या में भक्तजन कुम्भ स्नान के पुण्य फल की प्राप्ति हेतु आते हैं। अनेक भक्तजन कल्पवास भी करते हैं तथा दान, पुण्य, कर अपने जीवन को धन्य मानते हैं। वास्तव में कुम्भ स्नान दान धर्म का महापर्व है जो हमें सांसारिक बन्धन से मुक्ति दिला कर सद्गति प्रदान करता है। कुम्भ स्थल पर पवित्र हवन, यज्ञ, धर्म ग्रन्थों का पाठ, कथा, भागवत, अनुष्ठान, मंत्रोच्चारण से भक्तों में एक अभिनव धार्मिक एवं आध्यात्मिक सनातन धर्म हिन्दू जन मानस को जागृति उत्पन्न करने का व हिन्दू धर्मावलम्बियों को एक स्थान पर एकत्र करने का साधन मात्र है तथा अनेकता में एकता के प्रत्यक्ष दर्शन का उपयुक्त स्थान होता है।

‘‘धन्यो वृन्दावने कुम्भो, धन्यं वृन्दावनं महत्।

धन्याः कुम्भपरा जीवा, धन्य श्रीकृष्ण कीर्तनम्’’।।



श्रीवृन्दावन कुम्भ का रहस्य 

विश्व का सबसे बड़ा मेला या समागम होता है कुम्भ। यह प्रति बारह वर्ष के बाद आता है। इस वर्ष 16 फरवरी से 25 मार्च तक यह कुम्भ पर्व हरिद्वार में होने वाले कुम्भ से एक माह पूर्व में श्रीधाम वृन्दावन में आयोजित होगा। श्रीधाम वृन्दावन में कदम्ब वृक्ष पर अमृत कलश रख कर गरुड़ ने विश्राम किया था। जहां भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि, लीला भूमि हो वहां अमृत बिन्दु की आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि अमृतबिन्दु गिराने वाले का मुख्य स्रोत तो यहीं पर है। यहां तो अमृत कुंड है। कुम्भ एक ऐसे सन्त-समागम का नाम है, जहाँ विभिन्न सम्प्रदाय, मत-मतान्तर के सामान्य तथा विशेष सन्त एकत्र होते हैं। कथा-सत्संग का प्रसाद, भजन कीर्तन आदि का जन साधारण में धर्म-भक्ति, ज्ञान, सदाचार आदि का प्रचार प्रसार होता है। कुम्भ का कारण अमृत बिंदु और अमृत बिन्दु का कारण समुद्र-मंथन, समुद्र मंथन का कारण देव व देवासुरों के बीच छीना झपटी के मध्य श्रीविष्णु या स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जो उस समय मोहिनी रूप में प्रकट हुए थे और इस अमृत का वितरण कर रहे थे।

ऐसे श्रीकृष्ण का नित्य धाम श्रीवृन्दावन जहाँ श्रीकृष्ण जन्मे, खेले, लीलाएँ की और ब्रज में, विशेष तो श्रीराधा-श्याम कुण्ड में सभी तीर्थों को बुलाया और यहाँ स्थित रहने का आदेश दिया। ऐसे श्रीवृन्दावन धाम की महिमा और स्वयं भगवान् के लीला धाम को प्रणाम करने के पश्चात ही उनके भक्ति धर्म को प्रचार करने के लिए सन्त कुम्भ-स्थल आते हैं।


लेकिन यह रहस्य की बात है, यह साधना का उच्चतम उच्च स्तर है। यह भक्ति की पराकाष्ठा का धाम है-जहाँ जन साधारण की तो बात ही क्या सामान्य भक्त का भी प्रवेश नहीं है। अतः यहाँ कुछ विशिष्ट होता है और यहाँ कुछ विशिष्ट भक्त-सन्त ही आते हैं और अपने प्रिय को रिझाकर कुम्भ में जाते हैं। इसलिए यहां के कुम्भ का आकर कुछ कम होता है। यहाँ गुणवत्ता होती है यहाँ मात्रा कम अवश्य होती है। किन्तु यहां के कुम्भ का महत्व कम नहीं आंका जा सकता है। अपितु यह नियम ही है कि श्रेष्ठता का आकार सदैव कम ही होता है। पूर्व में श्रीवृन्दावन कुम्भ चार सम्प्रदाय तक ही सीमित होना बताया जाता है। मगर आज ऐसी बात नहीं है। आज प्रत्येक मठ, मंदिर, महन्त कोई भी यहां तक कि व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भी स्थान आवन्टित किये जाते हैं। 

वृन्दावन कुम्भ विषय में ठीक यही बात लागू होती है जो कभी सप्तदेवालयों के बीच में सीमित रही है श्री गोविन्द देव, श्री गोपीनाथ, श्री मदन मोहन, श्री राधारमण, श्री श्यामसुन्दर, श्री राधादामोदर श्री गोकुलानंद। इन सप्त देवलियों में श्रृंगारवट का कहीं नाम नहीं है। जबकि इस स्थान को संकर्षण के अवतार श्रीनित्यानन्द प्रभु का स्थान होने से श्रेष्ठ कहा गया है। एक समय था जब श्रृंगारवट को सप्तदेवालयों की गुरूगद्दी मानकर विशेष महत्व दिया जाता था। उस समय में जब किसी भी धार्मिक आयोजन में यदि श्रृंगारयट के एक सामान्य से भी गोस्वामी स्वरूप उपस्थित रहते थे तो उस सभा की अध्यक्षता (योग्यता न होने पर भी) वही किया करते थे। समय के प्रभाव से यह सब समाप्त हो गया।

ठीक उसी प्रकार जब कुम्भ का नाम आता है तो चार स्थानों में श्रीवृन्दावन धाम का नाम नहीं आने का कारण श्रीवृन्दावन की श्रेष्ठता ही इसका मुख्य कारण है। भला ऐसा दिव्य धाम, जहाँ स्वयं भगवान् ब्रजनन्दन श्रीकृष्ण का प्राकट्य स्थान हो, जहाँ भगवान की लीलाएँ हुई हां उस धाम को हरिद्वार, उज्जैन, नासिक, प्रयाग के समकक्ष कैसे रखा जा सकता है। इन चारों स्थानों का किसी भी रूप में स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं से सीधा संपर्क नहीं है। इस लिये इन चारों स्थानों पर कुम्भ के प्रारंभ होने से पूर्व सन्तजन एकत्र होकर प्रभु के लीलाधाम को प्रणाम कर अपने-अपने गन्तव्य स्थानों की ओर बढते हैं। 


कुम्भ की स्थापना कैसे हुई

कुम्भ पर्व का सीधा सम्बन्ध-अमृत कलश से है। इसकी परम्परा बहुत प्राचीन है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें वैदिकरण की झांकी भी मिलती है। अजर-अमर होने के लिए ’अमृत’ प्राप्ति हेतु देव और दानवों के मिले जुले प्रयत्न से समुद्र का मंथन किया गया था। फलस्वरूप क्षीर सागर से विष, वरुणी आदि तेरह रत्नों की प्राप्ति के बाद श्री धन्वन्तरि अमृत से भरे हुए कुम्भ को लेकर प्रकट हुए। इसी कुम्भ को प्राप्त करने के लिए देव और दानवों में छीना-झपटी होने लगी। देवताओं के इशारे पर इन्द्र पुत्र जयंत उस कलश को लेकर भागे। दैत्य गुरु शुक्राचार्य के आदेश पर उस कुम्भ को छीनने के लिए दैत्य जयंत के पीछे-पीछे भागे। यह देखकर अमृत कलश की रक्षा के लिए देवगण भी भाग पड़े। चन्द्रमा ने उस कलश को छलकने लुढ़कने से बचाया, सूर्य ने टूटने से तथा गुरु बृहस्पति ने कुम्भ को असुरों के हाथ में जाने से बचाया। 

ये भागा-भागी बारह दिन (मनुष्य के बारह बरस) तक होती रही। इस बीच जयंत ने अमृत कलश को बारह स्थानों पर रखा जिसमें आठ स्थान स्वर्ग में और चार भारतवर्ष में हैं। जिन स्थानों पर अमृत कलश रखा गया उन स्थानों पर अमृत कलश से कुछ अमृत बिंदु छलक गये थे। 

माना जाता है कि चन्द्र, सूर्य और गुरु बृहस्पति ने अमृत कुम्भ की रक्षा की थी अतः कुम्भ का आयोजन बृहस्पति, सूर्य व चन्द्र के ज्योतिषीय (ग्रह राशि) योग के अनुसार होता है अर्थात जिस समय गुरू, चन्द्र व सूर्य एक विशिष्ट राशि पर अवस्थित होते हैं तभी कुम्भ से अमृत छलकने वाले चार स्थानों (हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक व उज्जैन) में कुम्भ पर्व का आयोजन प्रति बारह वर्ष बाद होता है।


श्रीधाम वृन्दावन में भी अमृत कलश स्थापना के बहुत से संदर्भ प्राप्त होते हैं। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में कालियादमन लीला में इसका प्रमाण मिलता है। महाभारत में भी गरुड़ द्वारा अमृत कलश यहाँ लाने की कथा का वर्णन है। अतः वृन्दावन का कुम्भ पर्व पुराण द्वारा प्रतिष्ठित है। यहाँ भी प्रति बारहवें वर्ष में कुम्भ पर्व का आयोजन होता है। यों कहा जाय तो गलत नहीं होगा कि चारों कुम्भों से पूर्व श्रीधाम वृन्दावन में कुम्भ होता है जिसमें सन्त यहां आकर भगवान श्रीकृष्ण की जन्म स्थली को नमन करके यहां से ही हरिद्वार कुम्भ को प्रस्थान करते हैं।


यह कुम्भ हरिद्वार में होने वाले कुम्भ से एक माह पहले माघ शुक्ल बसन्त पंचमी से फाल्गुन शुक्ल एकादशी तक होता है। समुद्र मंथन के बाद कश्यप पत्नि सर्पों की माँ कद्रु एवं गरुड़ की माँ विनिता ने शर्त लगाई कि सूर्य के रथ के घोड़े की पूछ काली है या सफेद ?  कद्रु ने कहा काली है और विनिता ने कहा सफेद, शर्त के अनुसार जो भी हारेगी वो दूसरे की दासी बनकर सेवा करेगी। कद्रु ने छल किया, उसने अपने सर्प पुत्र को घोड़े की पूंछ से लिपट जाने को कहा, ऐसा ही हुआ। विनिता शर्त हार गई और कद्रु की दासी बनना पड़ा। विनिता के पुत्र गरुड़ को भी दास का कार्य करना पड़ा। उन्होंने एक दिन कद्रु से दासता से मुक्ति का उपाय पूछा। कद्रु ने कहा कि अगर तुम स्वर्ग से अमृत लाकर हमें दोगे तो हम तुम्हें दासता से मुक्त कर देंगे। गरुड़ अमृत लेने स्वर्ग चले गये। इन्द्र ने उनका प्रतिरोध किया किन्तु गरुड़ ने देवसेना को परास्त कर दिया और कलश को लेकर लौटने समय श्रीविष्णु ने उनको बिना अमृत पिये ही अजर-अमर होने का तथा अपने वाहन बनने का वरदान दे दिया।  

    पराजित इन्द्र ने गरुड़ से माफी मांगी और उनसे मित्रता करनी चाही, गरूड़ ने उन्हें बताया कि वे अमृत पिलाकर सर्पों को अमर नहीं बनाना चाहते हैं, वह तो केवल अपनी माँ को दासता से मुक्ति दिलाना चाहते हैं। इसलिए जब मैं अमृत कलश को वहाँ रखूँ, आप छिपकर उसे उठाकर ले जाना। इस प्रकार मेरे माँ की मुक्ति भी हो जायेगी और आपकी कार्य सिद्धी भी होगी। गरुड़ ने अमृत कलश को सर्पों को सौपते हुए उसे कुश पर रख दिया। अमृत पान करने से पहले स्नान करने के लिए सर्प जैसे ही दूर गये इन्द्र ने अमृत कलश पुनः हरण कर लिया। कुश को चाटने के कारण सर्पों की जिह्वा दो जिह्वा में बंट गई।


    इस वर्ष यमुनातट पर आयोजित कुंभमेला श्रीधाम वृन्दावन में अति उच्य स्तर पर मनाया जायेगा। व्यवस्थाएँ भी पहले वर्षों की अपेक्षा सामान्य से अधिक अच्छी हो रही हैं। आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा को लेकर पुलिस महकमे ने तैयारियां शुरू कर दी है। पुलिस महानिरीक्षक ए. सतीश गणेश ने स्थलीय निरीक्षण कर अधीनस्थों को आवश्यक दिशा निर्देश दिये। 16 फरवरी से 28 मार्च तक धार्मिक नगरी के यमुनातट पर कुंभमेला बैठक का आयोजन किया गया। जिसमें देशभर से हजारों सन्तों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुँचने का अनुमान लगाया जा रहा है जिसके मद्देनजर प्रशासनिक तैयारियां जोरों पर है। सन्तसमाज व श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये पुलिस महकमे में भी व्यवस्थाओं का खाका तैयार किया जा रहा है। कागजी तौर पर मंथन के बाद अब तैयारियों को जमीनी स्तर पर उतारने की कवायद शुरू हो गयी है। पुलिस महानिरीक्षक ए. सतीश गणेश ने प्रस्तावित मेला स्थल पहुंच कर जायजा लिया। मेला स्थल के प्रवेश स्थान से लेकर कुंभ बैठक में होने वाले शाही स्नान के पॉइंट्स पर अधीनस्थों से चर्चा की। खासतौर पर ट्रैफिक व्यवस्था व शोभायात्रा के बिन्दुओं पर विस्तृत जानकारी मांगी। मेलास्थल पर दमकल गाड़ियों, स्टीमर, घुड़सवार सुरक्षाकर्मियों के अलावा अस्थाई सुरक्षा चौकी को लेकर भी बिंदुवार जानकारी ली गयी। श्री गणेश ने बताया कि प्रदेश सरकार बेहतर सुरक्षा, सुगमता व स्वच्छता को दृष्टिगत रखते हुए योजनाओं को तैयार कर रही है। ताकि कुम्भ के भव्य आयोजन को सफलता पूर्वक संपन्न कराया जा सके। उनके अनुसार आगन्तुक सन्तो व श्रद्धालुओं की सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नही किया जायेगा। हर बारीकी पर प्रशासन की गहरी नजर है। अभी तक कागजी तैयारियां की गई है। उनमें जरूरी संशोधन कर जल्द ही जमीनी स्तर पर अंतिम रूप दिया जायेगा।


शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

महाभारत काल में यमुना नदी गोर्वधन में बहती थी। यमुना नदी ने समय के साथ साथ अपना स्थान भी बदला।

मथुरा। महाभारत काल में यमुना नदी गोर्वधन में बहती थी। यमुना नदी ने समय के साथ साथ अपना स्थान भी बदला आज जहां से यमुना का प्रवाह है, वहा वह सदा से प्रवाहित नहीं होती रही है। पौराणिक अनुश्रुतियों और ऐतिहासिक उल्लेखों से ज्ञात होता है, कि यमुना नदी ने समय के साथ साथ अपना स्थान भी बदला है। जबकि यमुना पिछले हजारों वर्षो से हमारे जीवन की धारा के रूप में विधमान है, तथापि इसका प्रवाह समय समय पर परिवर्तित होता रहा है। महाभारत काल से वर्तमान तक यमुना की बदलती धारा के विषय में ज्ञात होता है कि यमुना कभी नन्दगांव, बरसाना गोर्वधन के निकट से होकर बहती थी। यमुना ने अपने दीर्घ  जीवन काल में इसने कितने स्थान वदले है, उनमें से बहुत कम की ही जानकारी हो सकी है। मगर एक प्राचीन महाभारत काल के एक मानचित्र के अनुसार यह अवश्य ज्ञात होता है कि यमुना की धारा गोर्वधन के निकट से बहती थी।

प्राचीन काल में यमुना मधुबन के समीप से बहती थी, जहां उसके तट पर शत्रुध्न जी ने सर्वप्रथम मथुरा नगरी की स्थापना की थी वाल्मीकि रामायण और विष्णु पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि कृष्ण काल में यमुना का प्रवाह कटरा केशव देव के निकट था । सत्रहवीं शताबदी में भारत आने वाले यूरोपीय विद्वान टेवर्नियर ने कटरा के समीप की भूमि को देख कर यह अनुमानित किया था कि वहां किसी समय यमुना की धारा थी। 

इस संदर्भ में मथुरा के तत्कालीन जिला कलेक्टर मथुरा के अजायब घर के संस्थापक ग्राउज का मत है कि ऐतिहासिक काल में कटरा के समीप यमुना के प्रवाहित होने की संभावना कम है, किन्तु अत्यन्त प्राचीन काल में वहाँ यमुना का प्रवाह अवश्य था। इस बात से यह सिद्ध होता है कि कृष्ण काल में यमुना का प्रवाह कटरा केशव देव के समीप ही था।

कनिधंम का अनुमान है, यूनानी लेखकों के समय में यमुना नदी की एक मुख्य धारा या उसकी एक बड़ी शाखा कटरा केशव देव की पूर्वी दीवाल के नीचे से बहती होगी। जब मथुरा में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार हो गया और यहाँ यमुना के दोंनों ओर अनेक संधाराम बनाये गये, तव यमुना की मुख्य धारा कटरा से हटकर प्रायः उसी स्थान पर बहती होगी, जहाँ वह अब है, किन्तु उसकी कोई शाखा अथवा सहायक नही कटरा के निकट भी विधमान रही होगी।

ऐसा अनुमान है, यमुना की वह शाखा बौद्ध काल के बहुत बाद तक संभवतः सोलहवीं शताब्दी तक केशव देव मन्दिर के नीचे बहती रही थी। पहिले दो वरसाती नदियाँ ‘‘सरस्वती’’ और ‘‘कृष्ण गंगा’’ मथुरा के पश्चिमी भाग में प्रवाहित होकर यमुना में गिरती थीं, जिनकी स्मृति में यमुना के सरस्वती संगम और कृष्ण गंगा नामक धाट आज भी इतिहास के गबाह वने हुए हैं। संभव है यमुना की उन सहायक नादियों में से ही कोई कटरा केशव देव के पास से होकर बहती रही हो।

प्राचीन ग्रन्थों से ज्ञात होता है, प्राचीन वृन्दावन में यमुना गोवर्धन के निकट प्रवाहित होती थी। जबकि वर्तमान में वह गोवर्धन से लगभग कई मील दूर हो गई है। गोवर्धन के निकटवर्ती दो छोटे ग्राम ‘‘जमुनावती’’ और पारसौली है। वहाँ किसी काल में यमुना के प्रवाहित होने के उल्लेख मिलते हैं।

बल्लभ कुल सम्प्रदाय के वार्ता साहित्य से ज्ञात होता है कि सारस्वत कल्प में यमुना नदी जमुनावती ग्राम के समीप बहती थी। उस काल में यमुना नदी की दो धाराऐं थी, एक धारा नंदगाँव, वरसाना, संकेत के निकट वहती हुई गोबर्धन में जमुनावती पर आती थी और दूसरी धारा चीर घाट से होती हुई गोकुल की ओर चली जाती थी। आगे दोनों धाराएँ एक होकर वर्तमान आगरा की ओर बढ़ जाती थी।

परासौली में यमुना नदी की धारा प्रवाहित होने का प्रमाण स. १७१७ तक मिलता है। यद्यपि इस पर विश्वास करना कठिन है। श्री गंगाप्रसाद कमठान ने ब्रजभाषा के एक मुसलमान भक्तकवि कारबेग उपमान कारे का वृतांत प्रकाशित किया है। काबेग के कथनानुसार जमुना के तटवर्ती पारसौली गाँव का निवासी था और उसने अपनी रचना सं १७१७ में श्रजित है

 वरिष्ठ  पत्रकार, सुनील शर्मा, मथुरा 

 

बुधवार, 12 अगस्त 2020

श्रद्धालुओं के विना मनी जन्माष्टमी, परम्परागत तरीके से हुए आयोजन

मथुरा। (सुनील शर्मा) गीता के नायक, लीला पुरूषोत्तम, योगीराज श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्णा अष्टमी को हुआ था। देश के प्रायः सभी प्रान्तों में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व असीम श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। जन्माष्टमी का यह पर्व देश विदेश में बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। किन्तु इस वर्ष जन्माष्टमी के सभी आयोजन मंदिरों में तो परम्परागत तरीके से होंगे किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित किया गया है जिसके चलते इस वर्ष बाहर से आने वाले श्रद्धालु मथुरा जनपद में प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं श्रद्धालु इस वर्ष भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अपने-अपने घर पर रह कर ही मनायेंगे।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर ब्रज के कण-कण में अपूर्व हर्षोल्लास छा जाता है। आज भी घर आगंन को गोवर से लीपा जाता है चौक पूरे जाते हैं द्वार पर बंदरवार बांधी जाती है, मंगल सूचक थापे लगाये जाते हैं और फूलों से पालने को सजाकर ब्रजकी बालाएं गाती हैं।

‘‘डोरी फूलन को पालनों, आजु नन्द लाला भए’’।

ब्रज के घर-घर में भगवान को नये वस्त्र पहना कर उनका श्रंगार करके झांकियां सजाई जाती है। महिलाएं अपने यहां रखे सालिगराम की वटिया को एक खीरे में रख कर डोरे से बांध कर श्री कृष्ण के जन्म समय मध्य रात्रि को 12 बजे उसे खीरे में से निकाल कर पंचामृत स्नान कराती हैं। इस प्रकार से भगवान श्री कृष्ण का प्रतीक रूप में जन्म की भावनाएं संजोई जाती हैं। स्त्री पुरूष बच्चे भी श्री कृष्ण के जन्म के दर्शन के उपरान्त ही अपना व्रत खोलते हैं।

मथुरा स्थित प्राचीन मंदिर भगवान केशवदेव और नगर के मध्य विराजमान ठाकुर द्वारकानाथ द्वारकाधीश मंदिर में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। इस अवसर पर अपार जनसमूह उमड़ पड़ता है।

ब्रज के प्रत्येक घर आंगन में शंख घन्टा घड़ियाल की ध्वनि ऐसे गंज उठती है मानों वहां किसी बालक का जन्म हुआ हो इस प्रकार ब्रज के हर घर-घर में कृष्ण जन्म लेते हैं लोग आपस में बधाईयां देते हैं भक्ति भावनाओं में विभोर होकर ब्रजवासी नांचने गाने लगते हैं ‘‘नन्द के आनन्द भए जय कन्हैया लाल की’’ गाते हुए हर तरफ टौलियां नजर आने लगती है।

भगवान श्री कृष्ण का जन्म अर्धरात्रि के समय कंस के कारागार में होने के वाद उनके पिता वसुदेव जी कंस के भय से बालक को रात्रि में ही यमुना नदी को पार कर नन्द बाबा के यहां गोकुल छोड़ आये थे। इसी लिए कृष्ण जन्म के दूसरे दिन गोकुल में नन्दोत्सव मनाया जाता है। भाद्र पद नवमी के दिन समस्त ब्रजमंड़ल में नन्दोत्सव की धूम रहती है। यह उत्सव दधिकांदों के रूप मनाया जाता है दधिकांदो का अर्थ है दही की कीच। हल्दी मिश्रत दही फेंकने की परम्परा आज भी निभाई जाती है। मंदिर के पुजारी नन्दबाबा और जशोदा के वेष में भगवान कृष्ण के पालने को झुलाते हैं। मिठाई, फल व मेवा मिश्री लुटायी जाती है। श्रद्धालु इस प्रसाद को पाकर अपने आपको धन्य मानते हैं। 

श्रीरंगजी मंदिर

श्री वृंदावन का यह भव्य विशाल मंदिर के सामने वाली मुख्य सड़क पर बना हुआ है। दक्षिण भारतीय शैली का अद्भुत मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण सेठ श्री राधाकृष्ण, उनके बड़े भाई सेठ लक्ष्मीचंद तथा छोटे भाई सेठ गोविंद दास जी ने कराया। श्रीरामानुज सम्प्रदाय का अति विशाल मंदिर स्थापत्थ कला की दृष्टि से भारत में एक अलग स्थान रखता है। यह मंदिर आकार में बहुत बड़े भूभाग को संजोये हुए है। इसमें पांच परिक्रमाएं हैं। जो ऊँचे-ऊँचे पत्थरों के परकोटों से विभक्त है। भीतरी परिक्रमा में श्री हनुमान जी, श्री गोपाल जी, श्रीनृसिंह जी के श्री विग्रह हैं। यहां एक पुष्करणी भी है जहां वर्ष में एक बार भाद्र पद मास में गजग्राह लीला का प्रदर्शन होता है। चौथे व प्रधानद्वार बैकुण्ठद्वार और नैवेद्य द्वार से तीन विशाल द्वार बने हुए है। इसी में 60 फुट ऊँचा स्वर्णमय विशाल गरूड़ स्तम्भ (सोने का खम्भा जिसे सोने के खम्भे का मंदिर भी कहा जाता है।) चैत्र मास में विशाल रथ यात्रा भी निकाली जाती है।

वृंदावन के इस उत्तर भारत के विशाल श्री रंगनाथ मंदिर में ब्रज नायक भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के दूसरे दिन नन्दोत्सव की धूम रहती है। नन्दोत्सव के दौरान सुप्रसिद्ध लठ्ठे के मेले का आयोजन किया जाता है। धर्मनगरी वृंदावन में श्री कृष्ण जन्माष्टमी जगह-जगह मनाई जाती है किन्तु उत्तर भारत के सबसे विशाल मंदिर में नन्दोत्सव की निराली छटा देखने को मिलती है। दक्षिण भारतीय शैली के प्रसिद्ध श्री रंगनाथ मंदिर में नन्दोत्सव के दिन श्रद्धालु लठ्ठे के मेले की एक झलक पाने को टकटकी लगाकर खड़े होकर देखते रहते हैं। जब भगवान रंगनाथ रथ पर विराजमान होकर मंदिर के पश्चिमी द्वार पर आते हैं तो लठ्ठे पर चढ़ने वाले पहलवान भगवान रंगनाथ को दण्डवत कर विजयश्री का आर्शीवाद लेकर लठ्ठे पर चढ़ना प्रारम्भ करते हैं। 35 फुट ऊंचे लठ्ठे पर जब पहलवान चढ़ना शुरू करते हैं उसी समय मचान के ऊपर से कई मन तेल और पानी की धार अन्य ग्वाल-वालों द्वारा लठ्ठे के सहारे गिराई जाती है। जिससे पहलवान फिसलकर नीचे जमीन पर आ गिरते हैं। जिसे देखकर श्रद्धालुओं में रोमांच की अनुभूति होती है। पुनः भगवान का आर्शीवाद लेकर ग्वाल-वाल पहलवान एक दूसरे को सहारा देकर लठ्ठे पर चढ़ने का प्रयास करते है। तो तेज पानी की धार और तेल की धार के बीच पूरे जतन के साथ ऊपर की ओर चढ़ने लगते हैं। कई घंटे की मशक्कत के बाद आखिर ग्वाल-वालों को भगवान के आर्शीवाद से लठ्ठे पर चढ़कर जीत हासिल करने का मौका मिलता है। इस रोमांचक मेले को देखकर देश-विदेश के श्रद्धालु अभिभूत हो जाते हैं। ग्वाल-वाल खम्भे पर चढ़कर नारियल, लोटा, अमरूद, केला, फल मेवा व पैसे लूटने लगते हैं। मगर इस वर्ष कोरोना संकट के चलते जिला प्रशासन ने इस प्रकार के आयोजनों की अनुमति नहीं दी है।

इसी प्रकार वृंदावन में ही क्या जगह-जगह भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर नन्दोत्सव मनाया जाता है। ब्रहमकुण्ड स्थित हनुमान गढ़ी में नन्दोत्सव के दौरान मटकी फोड़ लीला का आयोजन किया जाता है। 15 फुट ऊंची मटकी को ग्वाल-वाल पिरामिड बनाकर मशक्कत के साथ मटकी को फोड़ते हैं। एवं दधिकांधा उत्सव का आयोजन भी होता रहा है। इस वर्ष यह लीला भी मंदिर व स्थानीय युवाओं द्वारा ही परम्परा का निर्वहन किया जायेगा।


श्रीधाम वृंदावन आने का सौभाग्य प्राप्त होने पर भी यदि वृंदावन में बाँकेबिहारी के दर्शन न किये जाये तो तीर्थ करना अधूरा ही रह जाता है। 

बाँकेबिहारी के मंदिर का निर्माण लगभग संवत् 1921 में हुआ इस मंदिर का निर्माण स्वामी हरिदास जी के वंशजों के सामुहिक प्रयासों से हुआ। आरंभ में किसी धनी मानी व्यक्ति का धन इस मंदिर में नहीं लगाया गया। 

श्रीस्वामी हरिदास जी बाल्यकाल से ही संसार से विरक्त थे। वह एक मात्र श्यामाश्याम का ही गुणगान किया करते थे। यमुना के निकट निर्जन स्थान पर युगल छवि में ध्यान मग्न रहा करते थे। उन्होंने 25 वर्षों की अवस्था में विरक्तवेश ले लिया था।

आप ने जहां जिस स्थान पर निधिवन में युगल छवि का ध्यान किया था। वहीं पर श्रीविग्रह भूमि से बाहर निकाले जाने का स्वप्नादेशानुसार श्रीस्वामी जी की आज्ञा पाकर श्री विठल विपुल आदि शिष्यों ने बाँके बिहारी को भूमि से प्राप्त किया था। आज बाँके बिहारी अपनी रूप माधुरी से विश्व के तमाम लोगों को रिझाते हैं। यहां वर्ष में एक ही दिन हरियाली तीज को ठाकुर स्वर्ण हिंडोले में विराजते हैं जिसके दर्शनों को लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। चैत्र मास की एकादशी से श्रावण मास की हरियाली अमावस्या तक प्रतिदिन ठाकुर जी का फूल बंगला सजाया जाता है। 

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन बाँके बिहारी के मंदिर में कोई विशेष आयोजन तो नहीं होते है लेकिन यहां जन्माष्टमी का अभिषेक रात्री 2ः30 के करीब होता है। प्रातः 5 बजे से मंगला आरती के दर्शन होते हैं। यहां की एक विशेषता और है कि बाँके बिहारी जी की निकुंज सेवा होने के कारण आरती में कोई शंख घण्टा घड़ियाल नहीं बजते शान्तभाव में आरती होती है।


गोविन्द देव जी का मंदिर

श्रीगोविंद देव जी का मंदिर वृंदावन में प्रसिद्ध व प्राचीन मंदिर है। उत्तर भारतीय स्थापत्य शैली का लाल पत्थर का बना प्राचीनतम मंदिर है वर्तमान स्वरूप में जो मंदिर दिखाई देता है यह भवन औरंगजेब के अत्याचारों एवं क्रूरता का साक्षी है। इसके ऊपर के हिस्से को तोड़ दिया गया था। आकाशचुम्बी इस मंदिर का निर्माण गौड़ीय गोस्वामी श्री रूप सनातन गोस्वामी के शिष्य जयपुर नरेश श्री मानसिंह ने सवंत् 1647 में कराया था। आताताइयों के आक्रमण करने से पूर्व ही राजा मानसिंह के जयपुर स्थित महल में यहां के श्री विग्रह को स्थानांतरित कर दिया गया था। आज भी जयपुर में गोविंददेव जी राजा के महल में विराजमान है तत्पश्चात संवत 1877 में पुनः बंगाल के भक्त श्री नंदकुमार वसु ने श्री गोविंददेव के नये मंदिर का निर्माण कराया यहां श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन विधिविधान से पूजा अर्चना अभिषेक का कार्यक्रम होता है। 

श्रीकृष्ण बलराम मंदिर (इस्कॉन मंदिर)

इसका निर्माण श्री एसी भक्तिवेदान्त स्वामी द्वारा स्थापित श्रीकृष्ण भावनात्मक संघ के तत्वावधान में सन् 1975 में हुआ था। प्रभुपाद के अनेक विदेशी कृष्ण भक्तों की देख-रेख में सेवा पूजा आदि समस्त व्यवस्थाएं सम्पन्न होती हैं यह मन्दिर अंग्रेज मन्दिर के नाम से भी प्रसिद्ध है। तीन सुंदर कक्षों में बायी ओर निताई गौरांग महाप्रभु मध्य में श्रीकृष्ण बलराम के अति मनोहारी छवि विराजमान है तो दायीं ओर श्रीराधाश्यामसुंदर युगल किशोर सुशोभित हैं। सभी श्री विग्रह अद्भुद वस्त्र आभूषण पुष्प मालाओं तथा मणिमय अलंकारों से श्रृंगारित होकर दर्शकों के मन को आकर्षित करते है। यहांँ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन भजन कीर्तन तथा प्रसाद वितरण होता है। रात्रि में अभिषेक का कार्यक्रम होता है, लाखों तीर्थ यात्री मंदिर में आते हैं।


मथुरा में द्वारकाधीश मन्दिर

मथुरा में असकुण्डा बाजार में स्थित यह मन्दिर सांस्कृतिक वैभवकला और सौंदर्य के लिये अनुपम है। इस मन्दिर का निर्माण सन् 1814-15 में ग्वालियर राज्य के कोषाध्यक्ष सेठ गोकुल दास पारीख ने कराया था। इनकी मृत्यु के उपरांत इनकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी सेठ लक्ष्मीचंद ने मंदिर के निर्माण को पूर्ण कराया था। 1930 में इस मंदिर की सेवा पूजा पुष्टिमार्गीय वैष्णव आचार्य गोस्वामी गिरधर लाल जी कांकरौली को भेंट स्वरूप दे दिया था। यहाँ सेवा पूजा अर्चना पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय के अनुसार ही होती है। श्रावण मास में प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु यहां सोने व चाँदी से निर्मित हिंडोले को देखने आते है। यहां जन्माष्टमी के दिन 108 सालिगराम का पंचामृत अभिषेक होता है तथा यहां अष्टभुजा द्वारकानाथ के श्रीविग्रह का भी पंचामृत अभिषेक किया जाता है। 


श्रीकृष्ण जन्मस्थान

यह मथुरा का एक मात्र पवित्र धार्मिक स्थल है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म इसी स्थान पर स्थित कंस के कारागार में हुआ था। वर्तमान समय में इस स्थान पर भव्य मंदिर स्थापित है जिसे देखने वर्ष भर लाखों तीर्थ यात्री श्रद्धालु पर्यटक आते हैं।

देश-विदेश से लाखों यात्री प्रतिवर्ष तो आते ही है लेकिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन यहां जन्माष्टमी पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यहाँ के विशाल मंच पर रासलीला नाटक, कथा प्रवचन आदि उत्सव नित्य प्रति होते रहते हैं।

जन्माष्टमी के दिन रात्रि के 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय श्रीविग्रह का पंचामृत अभिषेक होता है। इसके बाद श्रद्धालु नाचते, गाते, कीर्तन करते हुए भाव विभोर हो जाते हैं। 

इस मंदिर का निर्माण महामना पं. मदन मोहन मालवीय जी की सद्प्रेरणा से जुगल किशोर विड़ला व जय दयाल डालमियो ने कराया था विशाल भागवत भवन का निर्माण भी उन्हीं के द्वारा कराया गया था।


केशवदेव में जन्माष्टमी एक दिन पूर्व मनाई गई

मथुरा में ही श्रीकृष्णजन्म स्थान के निकट ही प्राचीन केशवदेव मंदिर में एक दिन पूर्व मनाई जसती है जन्माष्टमी यहां पंचामृत अभिषेक के पश्चात आकर्षक झांकियों में सजी कृष्ण की चर्तुभुज प्रतिमा के हजारों की संख्या में दर्शनार्थी मध्य रात्री तक भगवान केशव देव के अभिषेक के दर्शन करते हैं। यहां भजन, कीर्तन, नाच गाने के बीच हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में जन्माष्टमी मनाई जाती है। जन्म के दर्शन से पूर्व भजन-कीर्तन चलते रहे। महिला-पुरुष नाचते-गाते रहे। पुराने केशवदेव की प्रतिमा को जगमोहन से बाहर लाया जाता है। रात्रि में ठीक 12 बजे गोस्वामियों द्वारा अभिषेक सम्पन्न कराया जाता है। जिसमें दही, मधु, शक्कर, दूध, यमुना जल से अभिषेक कराने के बाद भव्य दर्शन होते हैं। दर्शन के लिए मंदिर के पट खुलते ही सभी दर्शनार्थी दोनों हाथ उठाकर जय कन्हैया लाल की, कह उठते हैं। शंख, घंटा, घड़ियाल बज उठते हैं, चारों ओर रोशनी मंदिर में विद्युत सजावट से जगमगाता है। 

श्रीकृष्णा जन्माष्टमी पर समूचा ब्रज जय कन्हैया लाल की के उद्घोषों से गूंज उठता है

चौतरफा जहां भण्डारों की धूम होती थी वहीं आज न श्रद्धाल हैं न अबकी वार भण्डारे लगाये गये कोराना संक्रमण के चलते जिला प्रशासन की परमीशन न मिलने के कारण कहीं भी कोई भण्डारा नहीं लगाया गया।

बाहर से श्रद्धालु न आसके तो क्या श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर सुबह से ही लोग बंदरवार, फूलमाला, केला के पत्ते आदि सामान खरीदते नजर आये। श्रद्धालुओं के अभाव में मंदिर भी सूने पड़े थे, श्रीकृष्ण जन्मस्थान और द्वारकाधीश मंदिर के रास्ते पर अन्य वर्षों की भांति इस वर्ष सूनी गलियां सूने बाजार नजर आये।

हर वर्ष जहां जिलाप्रशासन नगर के चारों तरफ के रास्तों को सुरक्षा के लिहाज से वाहनों को बेरीकेटिंग करके बंद करा दिया करता था। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को मीलों पैदल चलकर मंदिरों तक पहुंचना पड़ता था। जगह-जगह भण्डारा पूड़ी, हलवा, खीचड़ी तथा व्रत का प्रसाद वितरण किया जाता था। वहीं इस वार जिलाप्रशासन को बाहर से आने वालों पर नजर रखनी पड़ी और कोई नगर में प्रवेश न करे इसकी व्यवस्था करने व्यस्त रहा।

कोरोना महामारी के चलते चाहें श्रद्धालु न आ पा रहे हों मगर श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर मनोहारी विद्युत लाइटों से सजावट की गई। नगर में हर चौराहे को प्रदेश सरकार के निर्देश पर सजाया गया। मंदिरों में भी बिद्युत सजावट के साथ जन्माष्टमी की धूम दिखाई दे रही थी। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व को लेकर आज समूचे बृजमण्डल में आपार श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना हुआ है। शहर के बाजार और घर-घर पर लगे वंदनवार और सजाबट देखते ही बनती है। समूचे बृज में कान्हा के जन्मोत्सव की धूम मची हुई है। मंदिर द्वारिकाधीश, श्रीकृष्णजन्मस्थान को जाने वाले सभी मार्ग सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ बाजार से खरीददारी करती देखी गई। सुदूर प्रांतों से कान्हा के जन्मोत्सव में शामिल होने आने वाले भक्तों के स्वागत सत्कार में बृजवासियों आशा पर पानी फिर गया इस वार स्थानीय लोगों को यह मौंका नहीं मिल सका। मुख्य बाजारों में स्थान-स्थान पर पूड़ी सब्जी और व्रत से जुड़े आहार के वितरण में समाजसेवी और व्यवसायिक संस्थान अग्रणी भूमिका निभाते थे मगर इस वर्ष उन्हें यह अवसर नहीं मिल सका।

मथुरा के स्कूलों में भी मनाई जाती है जन्माष्टमी

मथुरा के स्कूलों में भी जन्माष्टमी मनाई जाती है, छोटे-छोटे बच्चों को श्रीकृष्ण के आकर्षक रूप में सजाया जाता है। इस वर्ष स्कूल कॉलेजों के न खुल पाने के कारण छोटे-छोटे बच्चों को भी मायूस होना पड़ा। यहां स्कूल कॉलेजों में भी बाल-कलाकार सामूहिक रूप से जगह-जगह श्रीकृष्ण जन्म की कथाओं का वर्णन व मंचन भी करते हैं जगह-जगह लोग नाचते गाते देखे जाते थे। विभिन्न रासलीलाओं के माध्यम से श्रीकृष्ण की लीलाओं को रास के माध्यम से लोगों का मनोरंजन किया जाता रहा है, इस वर्ष महामारी के चलते श्रद्धालु और तीर्थयात्रियों के अभाव में ऐसे आयोजन भी नहीं हो सके। 

मथुरा से सुनील शर्मा


मंगलवार, 4 अगस्त 2020

नहीं मेरी ऐसी कोई भावना नहीं है कि मोदी जी मुझको बुलायें या मैं उनको सलाम ठोकूं

मथुरा, वृन्दावन। (सुनील शर्मा) किसी भी आन्दोलन में चाहें वो आजादी के पहले का आन्दोलन ही क्यों न हो एक गरम दल और दूसरा नरम दल के सहारे ही सफल हो पाया है। नरम दल अपना वर्चश्व किसी न किसी रूप में कायम करने में सफल हो ही जाता है मगर गरम दल के नैतृत्व को या उसके योगदान को कोई जगह कभी मिल ही नहीं पाती है, ऐसा ही कुछ श्रीरामजन्म भूमि आन्दोलन में हुआ एक दल जो किसी भी तरह से विवादित ढांचे को वहां से हटा कर मंदिर का निर्माण किया जाना सम्भव मानता था वहीं एक खेमा इसे भी हमेशा जन मानस में बनाये रखने के लिए ढांचे के बगल में मंदिर निर्माण का सपना देख रहा था। मगर यह किसी योजना की तरह ही हो पाया और विवादित ढांचे को ढहाने के काम में हजारों कारसेवकों ने यह काम किया था। मगर वृन्दावन के सुरेश बघेल ने सबसे पहले ढांचे को हटाने के लिए प्रयास किया था। मगर वह इसमें सफल नहीं हो सका। और 28 डायनामाइट की छड़ों के साथ अयोध्या के विवादित ढांचे में पकडे़ भी गया। 
राम मंदिर आंदोलन में शामिल कई लोगों को पद मिले, प्रतिष्ठा मिली और उन्होंने सत्ता का सुख भोगा, लेकिन इसके सच्चे हीरो सुरेश बघेल आज भी एक ठेकेदार के नीचे निजी कंपनी में 6000 रुपये महीने में सीवेज पम्प ऑपरेटर का काम करके मुफलिसी का जीवन जीने को मजबूर हैं। 30 साल पहले 1990 में राम मंदिर आंदोलन में शामिल होकर बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को गिराने की पहली और मजबूत कोशिश करने वाले वृंदावन के हिंदूवादी नेता सुरेश बघेल का नाम शायद ही आज किसी को याद हो। राम मंदिर आंदोलन के ये वही हीरो हैं जिन्होंने आंदोलन की चोट अपने माथे पर ली। इतना ही नहीं उस चोट का दर्द भी पिछले 30 साल से कोर्ट-कचहरी, गिरफ्तारियां, जेल, धमकियां, मुफलिसी और परिवार से दूरी के साथ झेला है। सुरेश बघेल ने अपनी आप बीती बताते हुए बड़ी बेवाकी से प्रश्नों के उत्तर दिये।

सुरेश चन्द बघेल आप डायनामाइट की छड़ों के साथ अयोध्या में गिरफ्तार हुए थे। आप 28 छड़ों के साथ आपको गिरफ्तार किया गया था। इसमें कोई सच्चाई है ?
हाँ सच्चाई तो है ही गिरफ्तार तो मैं हुआ ही था और सजा भी काटी है मेंने करीव चार वार में पांच साल की सजा और पांच हजार रुपया जुर्माना भी हुआ था। 18 साल मुकदमा चला है मुझ पर, एक ही मुकदमें में चार वार जेल गया हूँ मुकदमा अभी हाईकोर्ट में चल रहा है, अपील पर हूँ।
क्या आप पर एनएसए भी लगी थी?
एनएसए लगी थी एनएसए जब समाप्त हुई तो टाड़ा लगा दी गई।
आपने कहां तक पढ़ाई की है?
मैं 10 वीं फेल हूँ।
आपके परिवार में कौन कौन हैं ?
परिवार पहले तो बड़ा था माता पिता सब थे। मेरे परिवार में एक लड़की तथा दो लड़के हैं 
आपके माता-पिता या पत्नी ने कभी रोका नहीं आपको?
पिता ने कुछ नहीं बोला और 2000 में गुजर गए। मां जरूर कहती थी कि तू झोपड़ी को भी बिकवाएगा, माँ भी अब नहीं है। लेकिन मेरी पत्नी ने मुझे कभी नहीं रोका। ये जरूर बोलती थी अब बहुत हो गई सेवा, अब तो घर-परिवार देख लो। अब कभी-कभी मेरी बेटी साथ रहने आ जाती है तो खुशी मिलती है।

आपके बच्चे क्या पढ़ रहे हैं ? 
लड़के अभी छोटे हैं 2008 में सजा हुई थी उस समय लड़की हुई थी, एक लड़का 2010 में तथा दूसरा लड़का 2011 में हुआ था।
इस दौरान आपने बड़ा कष्ट झेला परिवार ने भी बहुत कष्ट झेला होगा?
कष्ट तो है ही मैंने तो जो झेला वह है ही मगर परिवार ने भी कम कष्ट नहीं झेला है। मैंने मजदूरी की है।
आप जब जेल में तब परिवार का काम काज कैसे चलता था?
परिवार ने भी मजदूरी की किसी तरह से गुजर बसर किया था, कभी खेत पर काम किया कभी बेलदारी करके बच्चों को पाला पोशा है। मेने रिक्शा भी चलाया मजदूरी भी की है साधु सेवा भी की है गौशालाओं में काम किया है।
जिस दिन अयोध्या में यह काण्ड हुआ वह क्या था इस विषय में कुछ बतायें आपको कुछ याद है ?
मुझे बिलकुल याद है फिल्म की तरह पूरी घटना मेरे सामने है। 1990 में विवादित परिसर में अपने चार पांच साथियों के साथ गया था।
उस समय हम शिव सेना के कार्यकर्ता थे, शिव सेना का कोई दायित्व है या पद कोई उस समय था आपके पास ?
मैं शिव सेना के कई पदों पर रह चुका हूँ। विशेष कर मैं शिव सेना के साथ जेल से छूटने के वाद ही पूरी तरह से जुड़ पाया था।
क्या किसी ने आपको कहा था कहां से प्रेरणा मिली कि ऐसा कुछ आप करो ?
उस समय मेरे मन में एक प्रश्न था कि राम पर धर्म पर। वृनदावन में रहते हैं आस्था के साथ जीते हैं हमारे अन्दर भी राम के प्रति व ईश्वर के प्रति आस्था है। उस समय राम जन्मभूमि आन्दोलन चल रहा था।
हमारा एक मित्र मुसलमान था, एक जुलुस निकल रहा था। उस जुलुस में नारा लगाया जा रहा था देश धर्म का नाता है गऊ हमारी माता है। उसने टिप्पणी की थी कि गऊ यदि माता है तो वेल या सांड़ तुम्हारा कौन लगता है। हमने कहा कि वह हमारा बाप है, अब मशीनी युग आ गया है जब खेती बाड़ी से लेकर आवागमन में इन्हीं का उपयोग होता था यह अब काम में नहीं आते हैं, अनाज से लेकर सारी भूमिका यह बाप ही पूरी करता था बाप है पालनहार है जिम्मेदारी उसी की होती है।
आपको ऐसा क्यों लगा कि आप अयोध्या जाऊ बाबरी मस्जिद में जाऊ और यह आपके मन में कैसे आया ?
वह वावरी मस्जिद ही नहीं थी वह महाजिद है पागल लोगों की महाजिद है मस्जिद तो वह थी ही नहीं कैसे उसे मस्जिद वोल सकते हैं, आप अयोध्या को खुर्द मक्का कैसे बता सकते हो।
आपके मन में कैसे आया कि आप वृन्दावन से इतनी दूर जायें और वहां घुसे, यह विचार मन में कैसे आया ?
यह सब उस समय स्थितियाँ और परिस्थियाँ जो उस समय वन रही थीं।
क्या आप अपने साथ कुछ ले गये थे ?
मैं अपने साथ कुछ नहीं ले गया था, मैंने तो प्रभु से प्रार्थना की थी कि प्रभु मुझे शक्ति प्रदान करना।
आपके पास वह जो छड़े मिली थीं वह आपके पास कैसे मिली थीं कहां से आयीं थीं ?
वह निश्चित ही मुझसे पहले वहां पहुंची थीं मैं तो कुछ लेकर गया ही नहीं था वह छडे़ं तो मुझसे पहले से ही वहां मौजूद थीं।
आपने इतना बड़ा काम किया आपको इसका कोई लाभ मिला ?
हानि, लाभ, यश, अपयश, जीवन, मरण यह सब उपर वाले के हाथ में है।
शिव सेना ने भाजपा ने आपको माना हो कुछ समझा हो ?
शिव सेना का उत्तर प्रदेश में कोई बर्चश्व कभी वन ही नहीं पाया है। महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी के साथ शिव सेना रही है शिव सेना से महाराष्ट्र में तो समझोता किया था, सरकार भी बनाई थी, मगर उत्तर प्रदेश में तो कभी कोई समझोता किया ही नहीं गया था। राजनैतिक लाभ राममंदिर आन्दोलन से लोगों ने लिया ही है। राजनैतिक लाभ के लिए ही इस आन्दोलन को उठाया था।
आपके मन में कभी विचार नहीं आया कि मुझे भी इसका श्रेय मिलना चाहिए कि मैंने कुछ किया है ?
अगर मैंने कुछ किया है तो लोग समझेंगे विचार करेंगे। मेरा मानना है कि मैं इस देश, इस हिन्दू धर्म के लिए परिवार के लिए क्या कर सकता हूँ। यही मन में विचार शुरू से था।
अब 5 अगस्त को जब राममंदिर के लिए शिला पूजन व भूमिपूजन शिलान्यास होगा देश के प्रधानमंत्री वहां पहुंचेंगे वह शिलान्यास करेंगे, आपके मन में नहीं होता कि मुझे भी वहां होना चाहिए ?
अगर मैं सोच लूँ कि मुझे प्रधानमंत्री के सानिध्य में वहां होना चाहिए तो मैं इस वात को फील करू कि मुझे वहां होना चाहिए या नहीं होना चाहिए। जहां तक शिलान्यास का प्रश्न है तो जब 1992 में प्रतीकात्मक कारसेवा का आयोजन उस समय कल्याण सिंह सरकार के समय आव्हान किया गया था, विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा रामजन्म भूमि न्यास द्वारा तो उस समय यह योजना बनी थी कि सरयू से बालू और जल लायेंगे और शिलाओं के साथ शिलान्यास स्थल पर ले जाकर डालेंगे। एक वार और शिलादान का आयोजन किया गया था, बाबा रामचन्द्र परमहंस जी द्वारा 1986 में एक गड्डा खुदा था जहां कीर्तन चलता था। तो अब कौन सा शिलान्यास है। अयोध्या में मैं भी बहुत रहा हूँ एक-एक आयोजन का हिस्सा रहा हूँ।
आप इतने समय तक जेल में रहे आपने संघर्ष किया जेल गये। जेल में रहने के वाद आने पर किसी संत या किसी महन्त, धर्माचार्य ने आपको पूछा या आपका हाल चाल जाना या आपको आर्शीवाद दिया था ?
धर्माचार्यों में वामदेव जी महाराज जी के पास में पकड़े जाने से पहले भी और वाद में भी जाता रहता था क्यों कि मैं भी उसी अखण्डानन्द महाराज के आश्रम में ही रहता था वहीं काम करता था, वहीं वामदेव जी भी रहा करते थे। सानिध्य तो इन सभी संत महात्माओं का था ही आर्शीवाद भी था। उधर बाबा रामचन्द्र परमहंस भी थे मैं दिगम्बर अखाडे़ में भी आता जाता था। अब वह बाबा भी नहीं रहे और यह बाबा भी नहीं हैं तो मेरा आना जाना भी नहीं होता है। 
अब आपको कितनी खुशी है राममंदिर निमार्ण का प्रथम चरण तो कोर्ट ने पूरा कर दिया, दूसरा चरण प्रधानमंत्री करने जा रहे हैं तो आपके मन में कितनी खुशी है ?
मेरे मन में खुशी है कि भारतीय जनता पार्टी आरएसएस या अन्य संगठन उन्होंने मामले को उठाया कि ‘‘रामलला हम आयेगें मंदिर वहीं बनायेंगे’’। तब मैं भी इसी नारे को सुन कर वहां गया था और मैंने देखा कि वहां पर एक ढांचा खड़ा है मैंने सोचा कि इसके रहते तो यहां मंदिर का निमार्ण सम्भव ही नहीं है। यह तो इनकी एक दुकान है, जैसे कृष्ण जन्मभूमि में मस्जिद के बरावर से मंदिर का निमार्ण हो गया, इन्होंने यही सोचा था कि यह विवादित ढांचा यो ही खड़ा रहेगा और पास में मंदिर का निमार्ण हो जायेगा। मगर यहां भव्य मंदिर निमार्ण के लिए ढांचे को हटाया जाना बहुत जरूरी था। इसी लिए मेरा यह प्रयास पहला प्रयास था। प्रथम चरण में उस ढांचे को वहां से हटाना था, यही मेरा सपना था। 
मगर आप तो उसमें सफल नहीं हो सके ?
मेरा प्रयास रहा मैं उसमें सफल नहीं हो सका, मगर मेरे सपने को 1992 में पूरा कर दिया गया। अब मंदिर की बात है ठाकुर जी की पूजा सेवा तो वहां बराबर होती रही है, अब उस स्थान को भव्यता देने की वात है तो वह अब देश के प्रधानमंत्री के हाथों शिलान्यास हो रहा है।
आपके मन में सन्तोष तो है कि एक भव्य राममंदिर का शिलान्यास होने जा रहा है ?
मुझे सन्तोष ही नहीं बेहद खुशी है कि वहां विशाल और भव्य मंदिर वन रहा है, खुशी की वात है।
आपके मन में कभी यह विचार आता है कि मोदी जी आपको बुलायें, मोदी जी के पास जाने की आपकी कोई इच्छा है ?
नहीं मेरी ऐसी कोई भावना नहीं है कि मोदी जी मुझको बुलायें या मैं उनको सलाम ठोकूं या मैं उनको लम्बा दण्डवत प्रणाम करूं, ऐसी मेरी कोई भावना नहीं है।
वर्तमान प्रदेश व केन्द्र में भाजपा सरकार है हिन्दुत्व की सरकार है उसमे आपको क्या लगता है कि उनसे कोई अपेक्षा है ?
मुझे कोई अपेक्षा नहीं है। मैं इनको सबसे गडबड़ सरकार मानता हूँ भगवान सब जगह हैं वृन्दावन में भी भगवान हैं और अयोध्या में भी भगवान हैं जो महत्व रामचन्द्र जी का है, वहीं महत्व कृष्ण का भी है।
वृन्दावन में मंदिर तोडे जा रहे हैं उसकी एफआईआर मेंने की उसकी शिकायत मेंने की उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई वृन्दावन के अत्यन्त प्राचीन 300 साल पुराना मंदिर तोड़ दिया गया। मेंने एक विवादित ढांचा तोड़ने का प्रयास किया मेरे को पांच साल की सजा, पांच हजार का जुर्माना, 18 साल मुकदमा, टाड़ा, रासुका जैसे मुकदमें मेरे उपर कार्यवाही हुई। अभी वृन्दावन में मंदिर गिराया गया उलटा मेरे उपर ही कार्यवाही हुई कि मेंने आवाज क्यों उठाई, शान्ति व्यवस्था भंग करने के आरोप में मुझे पावंद किया गया है। मैं इस सरकार से और क्या उम्मीद कर सकता हूँ। यह हिन्दूवादी सरकार खुद को मानती रहे मगर मैं इसे हिन्दूवादी सरकार नहीं मानता कभी नहीं मानता हूँ।
आपने जो किया, जो आप अयोध्या में करके आये थे, आप पकड़े गये थे गम्भीर आरोप आप पर लगे थे। उसका आपके मन में कोई अफसोस है ?
अफसोस का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता है अफसोस उसका होता है जो कोई गलती हो जाती है। 
आप इसे क्या मानते हैं ?
मैं तो इसे सही मान रहा हूँ तब भी मंदिर मानता था, आज भी मंदिर मानता हूँ और कल भी मंदिर ही मानुंगा। मानता रहा हूँ, मानता रहूंगा।
भव्य मंदिर बन जाने पर आपको खुशी होगी ?
मुझे निश्चित ही खुशी होगी। 

मथुरा से सुनील शर्मा