रविवार, 5 जुलाई 2020

58 साल पहले मुड़िया पूर्णिमा के दिन रेल हादसा अब एक कहानी बन कर रह गई है।


मथुरा। (सुनील शर्मा) स्वाधीनता के बाद देश में एक ऐसी घटना घटी जिसे आज तक भुलाया नहीं जा सका है, हांलाकि इस घटना के चश्मदीद गवाह अब गिने चुने ही बचे हैं फिर भी अधिकांश लोगों को उनके पूर्वजों व अपनों से, बड़ों से कहानी के रूप में सुनने को मिली घटना आज भी लोगों को सिरहन पैदा कर देती है। इतना बड़ा रेल हादसा वो भी यमुना के बीचों बीच रेलवे के पुल पर घटी थी वह भी मुडिया पूर्णिमा मेला के दिन आज से लगभग 58 साल पहले की घटना सन् 1962 की 17 जुलाई मंगलवार का दिन था और गुरूपूर्णिमा का पर्व था।

मथुरा में यमुना नदी को पार करने के लिए मात्र एक ही साधन था
देश में आवागमन की व्यवस्थाएं भी नहीं थी। मथुरा में यमुना नदी को पार करने के लिए मात्र एक ही साधन था रेलवे का पुल उस पर से पैदल चलने की व्यवस्था थी और ट्रेन का आवागमन भी होता था और सड़क भी थी। रेलवे के पुल के उपर रेलगाड़ी के निकलने भर को जगह थी। रेल के निकलने के समय में सड़क को बंद कर दिया जाता था। रेलगाड़ी के उपर यदि कोई चढ़ जाता तो उसका घायल होना निश्चित ही था।
भींड़ अधिक होने के कारण लोग रेल गाड़ी की छत्तों पर चढ़ कर यात्रा कर रहे थे
17 जुलाई मंगलवार 1962 का दिन मथुरा के इतिहास में और स्वतन्त्र भारत के इतिहास में रेलवे की यह पहली घटना थी। जब मुडिया पूनों यानी मुड़िया पूर्णिमा के दिन परिक्रमार्थी गिर्राज गोवर्धन की परिक्रमा करने को बड़ी संख्या में आते हैं उस दिन भी आये, भींड़ अधिक होने के कारण लोग रेल गाड़ी की छत्तों पर चढ़ कर यात्रा कर रहे थे। उस समय यह रेल मार्ग नोर्दन ईस्टन रेलवे का भाग था और इस मीटर गेज (छोटी लाइन) रेल मार्ग पर नोर्थ बंगाल न्यू जलपाईगुडी, असम तक की यात्राएं इस मार्ग से लोग किया करते थे।
स्थानीय स्तर पर बरेली, इज्जतनगर तक के यात्री भी यातायात किया करते थे। मुड़िया पूर्णिमा मेला में रेल यातायात से पूर्व भी लोग पैदल ही तीर्थयात्रा करने के लिए आते थे रेल मार्ग शुरू होने के वाद से लोग रेल का उपयोग करने लगे। आज यह रेल मार्ग ब्राडगेज (बड़ी लाइन) होने के वाद इसका इलैक्ट्रीफिकेशन भी हो चुका है।
किस प्रकार से हजारों लोग एक साथ काल के गाल में समा गए थे
रेल हादसे को लगभग 58 साल बीत चुके है। उस समय के आज भी मौजूद लोगों की जुबान आज भी यह बताते-बताते लडखड़ा जाती है, मुड़िया पूर्णिमा के दिन 17 जुलाई मंगलवार की सुबह करीब चार बजे का समय था। यमुना नदी पर बने रेल के पुल पर तेजी के साथ एक सवारी गाड़ी गुजरी और देखते ही देखते सैकड़ों लोग जो रेलगाड़ी की छत पर बैठे थे, दुर्घटना का शिकार हो गये, कोई कुछ समझ पाता कि किसी की गर्दन कट गयी, कोई धड़ से अलग हो गया, किसी का हाथ कटा, किसी की टांग कटी चारों ओर चीख पुकार और बदहवास होकर इधर-उधर दौड़ते लोग देखे जा सकते थे। जो लोग दुर्घटना का शिकार हुए और गर्दन कटने के वाद भी कुछ समय के लिए वह नदी और आस पास इधर-उधर चलते देखे गये। ऐसा भयानक हादसा का जिक्र करते हुए सुशील शर्मा जो वर्तमान में लन्दन में निवास करते है उन्होंने बताया कि उस समय उनकी उम्र करीब 12-13 वर्ष की थी। घटना की जानकारी मिलते ही यमुना किनारे जाकर देखा था कि किस प्रकार से हजारों लोग एक साथ काल के गाल में समा गए थे तथा सैकड़ों लोग जीवन भर के लिए अपाहिज हो गए थे।
रेलवे कर्मचारियों ने छतों पर यात्रा करने से मना भी किया था
इस घटना के सम्बन्ध में लम्बे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुडे रहे मोहन स्वरूप भाटिया ने बताया कि गोवर्धन की परिक्रमा करने के लिए हजारों लोग रेलगाड़ी के डिब्बों की छतों पर बैठकर परिक्रमा के लिए आ रहे थे। पिछले स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो रेलवे कर्मचारियों ने छतों पर यात्रा करने से मना भी किया था। लेकिन किसी ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया। हर मुड़िया पूनों पर सभी रेलगाड़ियों की छतों पर बैठकर यात्री गोवर्धन परिक्रमा के लिए आते थे। हमेशा पुल से पहले ड्राइवर गाड़ी रोक देता था तथा यात्री उतर कर गोवर्धन जाने के लिए बस या अन्य साधनों से जाते थे।
ड्राइवर जो एक मुसलमान था, वह काफी गुस्से में रेलगाड़ी को रेलवे पुल से तेजी से ले गया
एक अन्य पत्रकार ब्रजगरिमा के सम्पादक विनोद चूडामणि ने बताया कि मैं उस समय पढ़ाई कर रहा था मगर मुझे इस घटना की यादें आज भी मेरे मन मस्तिष्क में स्टष्ट छवि के साथ है कि यात्रियों के न उतरने से रेलगाड़ी का ड्राइवर जो एक मुसलमान था, वह काफी गुस्से में रेलगाड़ी को रेलवे पुल से तेजी से ले गया और राया स्टेशन पार करते ही उसने रेलगाड़ी की रफ्तार एकदम तेज कर दी तथा बहुत तेज गति से पुल के अंदर गाड़ी को घुसा दी जिससे इतना बड़ा हादसा हुआ था।

गाड़ी के डिब्बों की छतें यहां तक कि खिड़की-दरवाजे खून से लाल हो गये
सुबह के सन्नाटे में इस भयंकर दुर्घटना में चीख पुकार की आवाज दूर दूर तक सुनी गयी चारों ओर हा हाकार मच गया। सैकड़ों लोग इस दुर्घटना का शिकार हुए चारों ओर खून ही खून बिखर गया। पूरी गाड़ी के डिब्बों की छतें यहां तक कि खिड़की-दरवाजे खून से लाल हो गये। जो लोग खिड़की के सहारे बैठे थे या दरवाजे पर खड़े थे वह भी खून से सन गये थे। पुल की सड़क भी खून से लाल हो गई। चारों तरफ शरीरों के चिथड़ौं व खून से सड़क पट गई और यमुना का पानी भी कुछ समय के लिये लाल हो गया। उल्लेखनीय है कि पहले इस पुल पर सड़क भी थी रेल और सड़क एक साथ होने के चलते सड़क के ऊपर बस, कार, ट्रक, तांगा आदि सभी वाहन गुजरते थे। कोई अन्य पुल उस समय यमुना पर नहीं था। रेल के गुजरते बक्त सड़क को बंद कर दिया जाता था।
एक रेल हादसा जो अब एक कहानी बन कर रह गई है।
इस भयानक हादसे के बाद न सिर्फ मथुरा के इस पुल की कैंचियों को हटाया गया, बल्कि पूरे देश में जहां-जहां भी पुलों के उपर कैंचियां थी सभी को हटा दिया गया। इस दुखद घटना की याद करके आज भी 70 या 80 वर्षीय लोग जो यमुना किनारे रहते हैं एक कहानी की तरह से सुनाते हैं।
मथुरा से सुनील शर्मा


पहली बार मुड़िया मेला निरस्त होने के बाद भी गुरू शिष्य परम्परा का निर्वहन किया गया।

(सुनील शर्मा)
मथुरा, गोवर्धन। कोरोना महामारी के चलते आस्था और मान्यताएं पूरी नहीं हो सकती, पूरे ब्रज के करीव-करीव सभी मंदिर कोविड-19 के प्रकोप के चलते बंद हैं। जिसमें कि राजकीय मेला पहली बार निरस्त होने के बाद आज रविवार को पुरानी परंपराओं के तहत दो मुड़िया शोभायात्रा निकाली जायेंगी। शोभायात्रा से पूर्व अनुयायियों ने परंपरा का निर्बहन करते हुए सिर का मुंडन कराया और अपने गुरू के प्रति अपनी आस्था और भक्ति का परिचय दिया।

पहली बार इस लक्खी मेला के निरस्त होने के बाद आश्रमों में रोनक कुछ कम देखने को मिली। श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के मंदिर के सामने पूज्य सनातन गोस्वामी जी की समाधि स्थल पर अधिवास संकीर्तन का शुभारम्भ किया गया। इसी के साथ शोभायात्रा की शुरूआत हो गयी इस अवसर पर महन्त गोपाल दास ने बताया कि आश्रम के साधु-संतों ने झांझ, मंजीरे, हारमोनियम व ढोलक की लय ताल पर अधिवास कीर्तन शुरू किया। रघुनाथ दास गोस्वामी की गद्दी राधाकुंड के महन्त केशव दास महाराज ने बताया हक पूज्य सनातन गोस्वामी के निकुंज लीला में प्रवेश करने के बाद गुरू भक्ति की याद में मुड़िया पर्व को मनाया जाता है। इसमें राधाकुंड-श्यामकुंड से सनातन गोस्वामी के चिन्हों को लेकर साधु-संत इस शोभायात्रा में नाचते कूदते शामिल होते हैं। और मानसी गंगा और गिरि गोवर्धन की परिक्रमा भी करते हैं।

पौराणिक वर्णनों के अनुसार समूचे ब्रजक्षेत्र में दो वस्तुओं का अस्तित्व आज भी विद्यमान है, इनमें से एक है यमुना नदी और दूसरा है गिरिराज गोवर्धन पर्वत। भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का वध करके यमुना को प्रदूषण से मुक्त कराया था। और गिरिराज गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली में छाता की तरह उठाकर इंद्रदेव की अतिवृष्टि से डूबते ब्रजवासियों को बचाया था। भगवान श्रीकृष्ण के समय से आज तक यमुना और गिरिराज पर्वत गोवर्धन करोड़ों भारतीयों की श्रद्धा और आस्था का केंद्र बना हुआ है। संपूर्ण ब्रजभूमि का वैभव यमुना और गोवर्धन पर्वत के कारण ही है। इसी लिये संपूर्ण भारत ही नही पूरे विश्व से आज मथुरा, गोवर्धन, वृन्दावन, बरसाना आदि स्थलों को देखने व भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थली का दर्शन करने प्रतिवर्ष लाखों तीर्थ यात्री यहां आते है। यमुना के जल के आचमन मात्र से मोक्ष प्राप्ति का अटूट विश्वास लोक मानस में है ओर गिरिराज गोवर्धन को साक्षात कृष्ण का ही रूप माना जाता है।

मथुरा से 22 कि.मी. दूर स्थित है प्राचीन तीर्थ स्थल गोवर्धन, गोवर्धन के चारों ओर लगभग 21 किलों मीटर क्षेत्र में गिरिराज गोवर्धन पर्वत श्रृंखला है। इस पर्वत श्रृखंला की तलहटी में बारहों महिने करोड़ों लोगों को परिक्रमा कर गिरिराज गोवर्धन के प्रति अपनी आस्था और भक्ति की अभिव्यक्ति करते देखा जा सकता है। गुरू पूर्णिमा के लोक पर्व मुड़िया पूनौ पर देश के विभिन्न अंचलों से बहुत बड़ी संख्या में यहां भक्त नर-नारी आते हैं। जिनके कारण मुड़िया पूनौ ब्रज का सबसे बड़ा लक्खी मेला माना जाता है।

पहली बार जिला प्रशासन ने लोगों से मथुरा, वृन्दावन व गोवर्धन न आने की अपील करनी पड़ी।

इस वर्ष यह पर्व 5 जुलाई को है मगर इस वर्ष इस मेले को शासन व जिला प्रशासन ने कोविड़ 19 की महामारी के प्रकोप के चलते इस पर रोक लगा दी। जहां प्रति वर्ष प्रशासन इस मेले के लिए मुड़िया पूणिमा मेला में आपका स्वागत है लिखकर स्वागत करता था, वहीं इस बार जिला प्रशासन को जगह-जगह होर्डिंग लगा कर लोगों को गोवर्धन, मथुरा, वृन्दावन न पधारने की गुहार लगानी पड़ रही है।  जिसके कारण लोगों का आना नहीं हो पाया और यह लक्खी मेला इस बार जिला प्रशासन के दिशानिर्देश पर प्रतिबन्धित रहा।

गुरू पूर्णिमा के इस लोक पर्व के रूप में मनाये जाने वाले मेले को मनाये जाने के पीछे भगवान वेदव्यास का जन्म दिवस व चैतन्य महाप्रभु सम्प्रदाय के शिष्य आचार्य सनातन गोस्वामी का आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को निर्वाण और गिरिराज गोवर्धन को साक्षात श्रीकृष्ण का प्रतिरूप माने जाने की अटूट आस्था है। इस आस्था का दर्शन भक्तों द्वारा गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा लगाते समय गाये जाने वाले लोग गीतों से होता है। ऐसे ही एक लोकगीत में गोवर्धन जाने के लिए मन की व्याकुलता गिर्राज जी की परिक्रमा और मानसी गंगा में स्नान की आकांक्षा इस प्रकार व्यक्त करते हैं।
 नांइ माने मेरौं मनुआं मै तो गोवर्धन कूं जाऊ मेरी वीर।
 सात कोस की दे परिक्रम्मा मानसी गंगा नहाऊ मेरी वीर।।

मुड़िया पूनौं के नाम करण के संबंध में कहा जाता है कि चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय के उनके विद्वान शिष्य आचार्य सनातन गोस्वामी से है। जिनका निधन हो जाने पर उनके शिष्यों ने शोक में अपने सिर मुड़वा कर कीर्तन करते हुए मानसी गंगा की परिक्रमा की थी। मुडे हुए सिरों के कारण शिष्य साधुओं को मुड़िया कहा गया और पूनौं (पूर्णिमा) का दिन होने के कारण इस दिन को मुड़िया पूनौं कहा जाने लगा सनातन गोस्वामी और उनके भाई रूप गोस्वामी गौड़ देश प्राचीन बंगाल के शासन हुसैन शाह के दरवार में मंत्री थे। चैतन्य महाप्रभु के भक्ति-सिद्धांतों से प्रभावित होकर वे मंत्री पद छोड़कर वृन्दावन आ गये और यहां उन्होंने चैतन्य महाप्रभु से दीक्षा प्राप्त की और उनके शिष्य हो गये। चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें यह आदेश दिया कि वे कृष्ण के समय के तीर्थ स्थलों की खोज करें और उनके प्राचीन स्वरूप को प्रदान करें साथ ही श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार-प्रसार करें। चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार दोनों भाईयों ने ब्रज के वन-उपवन और कुंज निकुंजों में भ्रमण करके भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थलों की खोज करने लगें। वे घर-घर जाकर रोटी की भिक्षा ग्रहण करते और

‘‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।’’ 

महामंत्र का कीर्तन कर कृष्ण भक्ति का प्रचार प्रसार करने लगे। सनातन गोस्वामी भ्रमण करते हुए जब गोवर्धन आये तो उन्होंने मानसी गंगा के किनारे स्थित चकलेश्वर मंदिर के निकट अपनी कुटिया बना ली और वहीं रहने लगे वह नित्य प्रति गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा करते थे। वह नित्य प्रति मानसी गंगा में ही स्नान करते थे। अत्यंत वृद्ध और अशक्त हो जाने पर भी उन्हांने जब इस नियम को नहीं तोड़ा तो कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें दर्शन देकर गिरिराज पर्वत की एक शिला पर अपने चरण चिन्ह अंकित किए और कहा-बाबा आप इसकी परिक्रमा कर लेंगे तो गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा हो जायेगी।
सनातन गोस्वामी का निधन अब से 466 वर्ष पूर्व संवत् 1611 में आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को हुआ था। उनके निधन पर उनके अनुयायियों ने सिर मुड़वाकर चकलेश्वर मंदिर से शोभायात्रा के रूप में निकाली थी वहीं परम्परा आज भी उनके शिष्यों व अनुयासियों द्वारा प्रत्येक वर्ष निकाली जाती है।

ब्रज क्षेत्र में हर मंदिर और आश्रम में लोग अपने-अपने गुरू की पूजा अर्चना करते हैं 

मुडिया पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है पूरे ब्रज क्षेत्र में हर मंदिर और आश्रम में लोग अपने-अपने गुरू की पूजा अर्चना करते हैं तथा गुरू स्थान की भी पूजा करते है और इस दिन जगह-जगह भंडारे लगे होते हैं जहां श्रृद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं और पूर्ण भक्ति भाव से आस्था के साथ अपने-अपने गुरू से आर्शीवाद ग्रहण करते हैं। कुछ लोग इस दिन को पवित्र मान कर अपने जीवन को सफल व पूर्व जन्म को सुधारने व भगवत प्राप्ति का मार्ग पाने के लिए गुरू बनाते है और उनकी पूजा अर्चना करते हैं तथा गुरू को उपहार स्वरूप फल वस्त्र आदि भेंट करते हैं। गुरू द्वारा बताये मार्ग पर चलते हुए भजन पूजा शुरू करते हैं।
इस वर्ष यह सभी आयोजनों से भक्तों को कोरोना महामारी के चलते विरत रहना पड़ा। जिला प्रशासन की शक्ति भक्तों की भक्ति पर भारी पड़ी।
सुनील शर्मा, मथुरा

मंगलवार, 12 मई 2020

अजीब संयोग है इस वार महालया और दुर्गा पूजा का महालया के 35 दिन के वाद दुर्गा पूजा होगी

अजीब संयोग है इस वार महालया और दुर्गा पूजा का
महालया के 35 दिन के वाद दुर्गा पूजा होगी
यह पहली बार है कि, मां दुर्गा की पूजा महालया के 35 दिन के बाद की जाएगी, जो इस साल देवी-पक्ष की शुरुआत और पितृ-पक्ष की समाप्ति का प्रतीक है। आम तौर पर, दुर्गा पूजा से सात दिन पहले महालया को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन देवी का आगमन होता है। इस साल 2020 में महालया 17 सितंबर 2020 को निर्धारित किया गया है, जिस दिन हर साल बिस्वकर्मा पूजा मनाई जाती है उस दिन 22 अक्टूबर को षष्ठी है। दुर्गा पूजा उत्सव के पहले दिन महालया और महाषष्ठी के बीच सामान्य अंतर छह दिनों का होता है। मगर यह अन्तर इस वार 35 दिनों का होगा। 21 अक्टूबर 2020 (बुधवार) पंचमी, 22 अक्टूबर 2020 (गुरूवार) को षष्ठी, 23 अक्टूबर 2020 (शुक्रवार) को सप्तमी, 24 अक्टूबर 2020 (शनिवार) को अष्टमी, 25 अक्टूबर 2020 (रविवार) को नवमी और 26 अक्टूबर 2020 (सोमवार) को विजया दशमी होगी।
यह असामान्य पूजा तिथि पहले भी सुनी गई है। 2001 में, महालया के 30 दिन के बाद दुर्गा पूजा मनाई गई थी। उस समय भी 17 सितम्बर को महालया को देवी आगमन हुआ था और 22 अक्टूबर को षष्ठी के साथ देवी पूजा प्रारम्भ हुई थी तथा विजया दशमी भी 26 अक्टूबर 2001 को थी। पंचांग सिद्धान्त और सूर्यसिद्धान्त, दोनों पंचांगों के विद्वान असामान्य अनुसूची पर सहमत हैं। दोनों ही सिद्धानत को मानने वाले विद्वानों के अनुसार, एक दुर्लभ घटना कुछ वर्षों के उपरान्त घटती है, जिसे मल मास कहा जाता है, एक चंद्र महीना जिसमें दो नए चंद्रमा (अमावस्या) होते हैं। कोई भी शुभ संस्कार और अनुष्ठान मल मास में नहीं किया जा सकता है। अगले साल, बंगाली महीना अश्विन 1427 एक मल मास है और इस कारण से दुर्गा पूजा को अमावस्या (चंद्र माह) तक समाप्त कर दिया जाएगा। और पंचांगों के अनुसार, पूजा अगले महीने यानी कार्तिक को होगी। साधारण तय यह दुर्गा पूजा आश्विन माह में होती है मगर 2001 के वाद 2020 में यह पूजा कार्तिक माह में पूर्ण होगी।

पितृपक्ष (पूर्वजों को अर्पण) और महालया के लिए अन्य संस्कार 17 सितंबर की सुबह, अश्विन के पहले दिन, जो कि अमावस्या को पड़ते हैं, हमेशा की तरह होगा। अश्विन का दूसरा नया चंद्रमा उस महीने के 29 वें दिन होगा जो 16 अक्टूबर को है। यह दूसरी बार है कि यह असामान्य कार्यक्रम 21 वीं सदी में हो रहा है, आखिरी घटना 2001 में हुई थी। जब तारीखें अगले वर्ष-17 सितंबर को महालया और 22 अक्टूबर को महाषष्ठी के साथ घटित हुई थीं। इससे पहले, घटना 1982 में भी हुई थी।
भाद्रपद के महीने में सर्वपितृ अमावस्या (अमावस्या) को महालया मनाया जाता है।
महालया की परंपराएं
महालया दुर्गा पूजा उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन देवी दुर्गा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ माना जाता है।
महालया को दुर्गा की बड़ी, विस्तृत रूप से तैयार की गई मूर्तियों को  पंडालों में सजाई व स्थापित की जाती हैं।
महालया 16 दिन की अवधि में पितृ पक्ष की समाप्ति का प्रतीक है, जब हिंदू अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं।
दुर्गा पूजा
दुर्गा पूजा दस भुजाओं वाली माँ देवी की पूजा है और उनकी लड़ाई बुराई यानी भैंस वाले दानव महिषासुर पर जीत का जश्न मनाती है।
यह आयोजन पूरे भारत में मनाया जाता है, पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में, यह साल का सबसे बड़ा त्योहार है और बंगाली समाज में सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम है।
दुर्गा पूजा के अनुष्ठान की शुरुआत दस दिनों तक होती है और पिछले पांच दिनों में विशेष त्यौहार के रूप में होते हैं। जो भारत के कुछ राज्यों में सार्वजनिक छुट्टियों में लोग उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं।

सोमवार, 11 मई 2020

बुढ़िया का गधा कैसे बना इंसान।

एक बार एक बूढ़ी महिला गांव के एक पाठशाला के पीछे अपने गधे को चरा रही थी। गधा हरी हरी घास खा रहा था। बुढ़िया ने गधे को चराते-चराते पाठशाला में पढ़ा रहे मास्टर जी की आबाज सुनाई दी। मास्टर जी अपने बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते कह रहे थे कि ‘‘मैंने अब तक तुम जैसे कई गधों को इंसान बनाया है समझे’’ यह बात बूढ़ी महिला के कानों में पड़ी और वह स्कूल की छुटटी होने का इन्तजार करने लगी, कुछ समय वाद जब स्कूल की छुटटी हो गयी तो वह बडे़ संकोच के साथ मास्टर जी के पास गयी, और बोली कि मास्टर जी मास्टर जी आप अभी बच्चों को बता रहे थे कि आपने बडे़-बडे़ गधों को इन्सान बनाया है, क्या यह सच है, चालाक मास्टर ने तुरन्त जबाव दिया, कि हाँ मैंने कितने ही गधों को इंसान बनाया है। तब उस बूढी महिला ने अपने गधे की तरफ इशारा करते हुए कहा कि क्या यह मेरा गधा भी कभी इंसान बन सकेगा ?



मास्टर ने तुरन्त उत्तर दिया कि क्यों नही यह भी जल्द इंसान बन जायेगा। बुढ़िया ने कहा कि इसके लिए मुझे क्या करना होगा ? मास्टर ने उत्तर दिया चिन्ता की कोई बात नहीं है, केवल गधे को मेरे पास छोड़ना पडे़गा। बुढ़िया बड़ी आशा और भरोसे के साथ गधे को मास्टर के पास छोड़ कर चली गयी। जाते समय फिर बुढ़िया ने पूछा कि मैं अपने इस इंसान बने गधे को कब लेने आंऊ ? मास्टर ने तुरन्त कहा कि कुछ समय लगेगा। बुढ़िया गधे को मास्टर के पास छोड़ कर वहां से चली गयी।
कुछ समय के वाद बुढ़िया फिर मास्टर के पास आयी और पूछने लगी कि क्या मेरा गधा इंसान बन गया है ? चालाक मास्टर ने तो उस गधे को बेच कर पैसे बना लिये थे। सो उसने बुढ़िया से कहा कि अभी और समय लगेगा। तुम चिन्ता न करो एक न एक दिन तुम्हारा गधा इंसान अवश्य बन जायेगा। बुढ़िया चली गयी। मास्टर इस प्रकार कई वार उस बुढ़िया को कोई न कोई नया बहाना बना कर वहां से चलता कर देता था। एक दिन थक हार कर बुढ़िया ने जब मास्टर को भला-बुरा कहा और अपना गधा बापस करने को कहा तो मास्टर ने क्या करे ना करे की स्थिति में आकर बुढ़िया को जबाव दिया कि तेरा गधा तो बहुत बड़ा इंसान बन गया है वह तो अब मेरी बात भी नहीं सुनता है, मैंने कई वार तुम्हारे बारे में उसे बताया है वह कुछ सुनता ही नहीं है। बुढ़िया ने मास्टर से कहा कि तुम मुझे उसके पास ले चलो शायद मुझे देख कर उसे मेरी याद आ जाये और वह मेरे साथ चलने को तैयार हो जाये।
मास्टर बड़ी विकट समस्या में पड़ गया कुछ न सूझा तो मास्टर ने उस बुढ़िया से कहा कि देखो मैं तुम्हें वहां ले तो जाऊंगा मगर, मैं उसके सामने नही जाऊंगा। बुढ़िया राजी हो गयी मास्टर उसे सीधे कचहरी में ले गया और एक कमरे में एक उंचे स्थान पर बैठे व्यक्ति की तरफ इशारा कर, कि वह देख तेरा गधा वहां कितने उंचे पर बैठा है। वह इंसान ही नही वह बहुत ही बुद्धिमान है सबको न्याय देता है। अब वह तेरी बात नही सुनेगा। तू यहां से चल, मगर बुढ़िया अपने गधे से बिना मिले जाना नही चाहती थी। उसने वहां दरवाजे के अन्दर जाकर जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया कि क्यों रे गधे, क्यों रे गधे मैंने तुझे इंसान बनवाया, आज तू ही मुझे भी नहीं पहचानता है। इस पर कुर्सी पर बैठे इंसान को बहुत बुरा लगा और वह उस महिला के पास आया और अपनी इज्जत बचाने को बुढ़िया के पैर छुए और उसका आर्शीवाद लिया। बुढ़िया को अनजाने में ही सही कि मैरा अपना गधा आज इंसान बन गया है और लोगों की मदद करता है, लोगों को न्याय देता है। बुढ़िया इसी संतोष के साथ वहां से चली जाती है। 

कोरोना वायरस के कारण आम जन जीवन के पटरी से उतरने के बीच स्वामी विवेकानन्द

आज 200 साल वाद की इस महामारी के समय में याद आये स्वामी विवेकानन्द।
कलकत्ता नगर में महामारी (प्लैग) का प्रकोप 1898 में हुआ था। प्रतिदिन सैंकड़ों लोगों पर उसका आक्रमण होता था। हालात बिगड़ती देखकर सरकार ने स्थिति का नियंत्रण करने के लिए कड़े नियम बनाए। पर जब नगर निवासी अनुशासन की कमी से उनका पालन करने में ढीलढाल करने लगे तो शहर के भीतर और चारों तरफ फौज तैनात कर दी गई। इससे नगरवासियों में बड़ा आतंक फैल गया और उपद्रव हो जाने की आशंका होने लगी।
कलकत्ता में 200 साल पहले का स्वामी विवेकानंद का प्लेग पर घोषणा पत्र बुलेटिन के माध्यम से प्रकाशित किया गया है। बुलेटिन ने 1898 में स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखा गया प्लेग घोषणा पत्र पुनः प्रकाशित किया है। इसमें कहा गया है, “हमें खुशी होती है जब आप खुश होते हैं और जब आपको दर्द होता है तो हमें तकलीफ होती है। इसलिए, अत्यधिक विपत्ति के इन दिनों में, हम आपके कल्याण के लिए प्रयास कर रहे हैं और लगातार प्रार्थना कर रहे हैं और आपको बीमारी और महामारी के भय से बचाने का एक आसान तरीका है।
उस समय “स्वामीजी ने एक अन्य घोषणा पत्र में कहा, “ अफवाहों पर ध्यान नहीं दें। ब्रिटिश सरकार किसी को भी जबर्दस्ती टीका नहीं लगाएंगी। जो चाहेंगे सिर्फ उन्हें टीका लगाया जाएगा। “उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी प्रभावित व्यक्ती की मदद करने वाला कोई नहीं है तो उसे बेलुर मठ के श्री भगवान रामकृष्ण के सेवकों को तुरंत सूचना भेजनी चाहिए। शारीरिक रूप से संभव मदद में कोई कमी नहीं होगी।
महामारी (प्लैग) के समय स्वामी विवेकानन्द विदेशों में हिन्दू धर्म की ध्वजा फहराकर और भारतवर्ष का दौरा करके कलकत्ता आए थे। वे अपने देशी-विदेशी सहकारियों के साथ बेलूड़ में रामकृष्ण परमहंस मठ की स्थापना की योजना में संलग्न थे। लोगों पर इस घोर विपत्ति को आया देखकर वे सब काम छोडकर कर्मक्षेत्र में कूद पड़े और बीमारों की चिकित्सा तथा साफ सफाई को एक बड़ी योजना बना डाली।
गुरू-भाई ने पूछा-स्वामी जी ? इतनी बड़ी योजना के लिए ‘‘फंड’’ कहाँ से आयेगा ?
स्वामीजी ने तुरन्त उत्तर दिया- आवश्यकता पड़ेगी तो इस मठ के लिए जो जमीन खरीदी है उसे बेच डालेंगे। सच्चा मठ तो सेवा कार्य ही है। हमें सदैव संन्यासियों के नियमानुसार भिक्षा मांगकर खाने तथा पेड़ के नीचे निवास करने को तैयार रहना चाहिए। सेवा व्रत को इतना उच्च स्थान देने वाले स्वामी विवेकानन्द 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के एक मध्यम श्रेणी के बंगाली परिवार में उत्पन्न हुए थे। उस समय भारत में तीव्र वेग से अंग्रेजी राज्य और ईसाई संस्कृति का प्रसार हो रहा था। इसके परिणामस्वरूप देश में उच्चवर्ग का विश्वास अपने धर्म और सभ्यता पर से हिल गया था और ऐसा प्रतीत होने लगा था कि कुछ ही समय में इस देश में ईसाइयत की पताका उड़ने लगेगी। पर उसी समय देश में ऐसे कितने ही महामानवों का आर्विभाव हुआ जिन्होंने इस प्रबल धारा को अपने प्रभावों से दूसरी तरफ मोड़ दिया। उन्होंने हिन्दू-धर्म के सच्चे स्वरूप को संसार के सामने रखा और लोगों को विश्वास दिला दिया कि आत्मोन्नति और कल्याण की दृष्टि से हिन्दू-धर्म से बढ़कर धार्मिक सिद्धान्त संसार में और कहीं नहीं है। इन महामानवों में स्वामी विवेकानन्द का स्थान बहुत उँचा है।



बुधवार, 29 अप्रैल 2020

मध्यम वर्ग के विना ही जीवन हो जायेगा व्यर्थ।

अभिशाप से गरीब का जन्म, आर्शीवाद से धनी,
मध्यम वर्ग को सदा रहना ही होगा ऋणी।
अच्छे दिन आयें या आयें र्दुदिन, चित्र एक ही रहेगी हमेशा।
छाती फटे मगर मुंह नही फटे। सम्मान बोध ही रहेगा हमेशा।
गरीब के तो पास खड़ी सरकार हमेशा, वह रहते विन्दास हमेशा।
सरकारी व दाताओं के सहारे कट जायेंगे कई महिना।
उनको मिलते आलू, दाल, चाबल और मिलती गैस।
बाकी जरुरत मिटाने को उनको मिलता है कैश।


वो कर्म विहीन, अर्थ विहीन वो दो हाथ फैला कर ले सकते है दान।
शिक्षा की झौली शून्य उनकी, लगता नही उनको सम्मान।
धनी के पास तो है अगाध अर्थ, खाद्य की न कोई परेशानी।
अभाव की समस्या से रोती मध्यम वर्ग बैचारी।
उनको नही कोई सरकारी दान, न ही मिलता दृव्य कम मूल्य पर।
धनी के मूल्य पर ही खरीदना पड़ता है, जरूरत का सामान भर।
कवि अकेला ही रोता खाली पन्नों के सहारे।
बाकी शिल्पी भी रोते पेट बांधे।
गृह शिक्षक भी हैं वेतन विहीन परेशान नहीं जा पा रहे पढ़ाने।
पत्नी भी देख हो रही परेशान कि कैसे गृहस्थी चलेगी सामने।
शिल्पी के कैनवास पर रंगों का मूल्य भारी।
ईश्वर की छवि पड़ी कोने में, कौन देगा मूल्य इसकी।
मृत्यु के भय से सबने छोड़े, गली और रास्ते,
श्रोता, दर्शक के अभाव में हो गये हैं देवालये।
देव प्रतिमाएं खड़ीं ज्यों कि त्यों, वाट भक्तों की जौहते।
नित्य प्रति मसजिद से होती अजानें, घरों में पढ़ी जाती नमाजें।
शिल्पी के सुर हो गये अन्धे, तवलची घर में समय अकेला काटे।
कैसे सोचे, रहा समय सुरताल के बिना कट जाये।
मन में हो रहा हा हाकार क्या होगा कल।
खत्म हो रहा आटा, दाल कैसे, कटेगा यह साल।
विद्या के धनी जितने भी हों धनी, जव तक न हो अर्थ।
मध्यम वर्ग के विना ही जीवन हो जायेगा व्यर्थ।


सोमवार, 9 मार्च 2020

कहीं उडता रंग गुलाल, तो कहीं चलती लाठियां

मथुरा। आज के आधुनिक परिवेश में भी ब्रज की होली ने अपने वास्तविक स्वरूप को वनाये रखा है। होली माधुर्य का पर्व है प्रेम रस रंग और उमंग का प्रतीक पर्व है। होली का वास्तविक आनन्द केबल ब्रज में ही मिल सकता है। इस आनन्द की अनुभूति के लिये सारे देश के लोग यहां बरवस ही खिचे चले आते है यही नही यहां की होली विदेशी पर्यटकों को भी यहां आने और इस आनन्द में डूब जाने को मजबूर कर देती है। ब्रज में होली पूरे एक महिने से अधिक दिनों तक खूव मस्ती के साथ मनाई जाती है। यहां होली का वास्तविक आनन्द यहां के देवालयों में मिलता है। मंदिरों में होली एक माह पूर्व ही शुरू हो जाती जब कहीं भी होली की चर्चा भी नही होती है। होली की शुरूआत मंदिरों में समाज गायन से होती है बसन्त पंचमी के दिन से मंदिरों में ठाकुर जी को इत्र और रंग लगा कर होली शुरू की जाती है। वृन्दावन में प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर तथा मथुरा में द्वारकाधीश मंदिर में होली की शुरूआत समाजगायन से की जाती है पंडा समाज के लोग बडे़-बडे़ नगाडों और ढोल मंजीरे की धुन पर नाचते गाते है।


हजारों-हजारों वर्षों से ब्रज की धरती पर होली खेली जाती है इतिहास वदल गये, हमारी संस्कृति और परम्पराओं में बदलाव आया आधुनिकता ने हमें चारों ओर से घेर लिया है किन्तु ब्रज के कण कण में आज भी राधा कृष्ण का प्रेम और नटखट कृष्ण कन्हैया की और श्री राधा रानी की प्रेम भरी होली आज भी जनमानस के मनमस्तिक पर अमिट छाप की तरह हमेशा के लिये बनी हुई है। कान्हा की मधुर बासुरी की धुन और राधा रानी के नूपुरों की झनकार और उनके नृत्य आज भी हमें उनके हमारे बीच ही उपस्थिति का अहसास कराते रहते है। जब होली की कहीं भी चर्चा तक नहीं होती उस समय ब्रज में होली शुरू हो जाती है यहां होली का पर्व वंसत पंचमी से शुरू हो जाता है इसी दिन श्यामा श्याम को गुलाल लगा कर श्रंगार करने की परम्परा निभाई जाती है। इस समय जब भक्तों पर गुलाल पड़ता है तो वह इसे भगवान का प्रसाद मानकर अपने आपको धन्य मानते हैं। ब्रज में चारों ओर होली की अनूठी परम्पराओं के दर्शन होते हैं कहीं रगं गुलाल की होली होती है तो कहीं अंगारों की, कहीं फूलों की तो कहीं लाठियों और कोडों की होली होती है।

बरसाने और नन्दगांव में लाठियों की होली
यहां ब्रज की अनूठी होली होती है फाल्गुन शुक्ला नवमी को बरसाना में लठामार होली खेली जाती है कहने को बरसाना छोटा सा गांव है किन्तु श्री राधा रानी जी की बाललीलाओं का स्थान होने के कारण यह देश विदेश में विख्यात है। यहां होली खेलने के लिये कन्हैया के गांव नन्दगांव से हुरिहारे बरसाना आते हैं रंगविरंगी पगड़ी पहने हाथों में ढाल लिये ये सब पीली पोखर में पहुचते हैं। यहां भांग ठन्डाई छान कर सब आपस में हास परिहास करते हुए गीत गाते हुए बरसाने की उंची पहाडियों की तंग गलियों में होते हुये उपर बने हुए मंदिर में पहुंचते हैं। यहां श्रीजी के प्राचीन मंदिर में बरसाना और नन्दगांव के गुसाईयों में हास परिहास के बीच गीत संगीत का कार्यक्रम शुरू होता है। इसमें आपस में गालियों का प्रयोग करते हुए प्रेम और प्रीति के साथ हंसी ठिठोली भी होती है।

गीत संगीत और नृत्य कार्यक्रम के वाद नन्दगांव के हुरिहारे अपने अपने हाथों में ढाल लिये संकरी गली जिसका नाम रंगीली गली के नाम से जाना जाता है वहां एकत्रित हो जाते हैं और यहीं पर होती है विश्व प्रसिद्ध लठामार होली। इन संकरी गलियों में मोटी मोटी लाठियां लिये गोस्वामी परिवार की महिलायें गोपियों के रूप में अपने मुह पर घूंघट काढे़ नन्दगांव से आये हुरिहारों की प्रतीक्षा में होती हैं और जैसे ही वह यहां से गुजरते हैं उछल-उछल कर उन पर लाठियां बरसाती रहती हैं और नन्दगांव के हरिहारे जमीन पर बैठ कर उनकी लाठियों के प्रहार को झेलते रहते हैं। इस अनौखी होली का आनन्द लाखों श्रद्धालु वहां उपस्थित रह कर उठाते हैं। और होली का भरपूर आनन्द उठाते हुए लाडली लाल की जय जयकार करते हैं।

दूसरे दिन इसी तरह का माहौल नन्दगांव में होता है यहां भी नन्दराय जी का उंची पहाडी पर मंदिर है। बरसाने के हुरिहारे यहां आते हैं और नन्दगांव के गुसाईयों के साथ समाज गायन का कार्यक्रम होता है इसके वाद नन्दगांव के एक चौक में सभी एकत्रित होते हैं जिसमें नन्दगांव की हुरिहारिनें बरसाने के हुरिहारों के साथ लठामार होली खेलती हैं।

बरसाने नन्दगांव की होली की शुरूआत के साथही ब्रज मंडल में चारों ओर सतरंगी रूप निखर उठता है और चारों तरफ अलग अलग ढ़ंग से होली खेलने की परम्परा शुरू हो जाती है। नन्दगांव की होली के अगले दिन फाल्गुन शुक्ल एकादशी को रंगभरनी एकादशी पर्व पर मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन आदि के मंदिरों में रंग और गुलाल के ऐसे बादल उड़ते हैं जिससे बच कर किसी का भी निकलना मुश्किल होता है।  मंदिरों में होने वाली सतरंगी होली का आनन्द भक्त और भगवान के बीच में खेला जाने वाला होली का वास्तविक आनन्द की अनुभूति कराता है।
फाल्गुन शुक्ला पर्णिमा को ब्रज में होली पूजन और होलिका दहन का दिन होता है इस दिन तिथि के अनुसार ही महिलायें होलिका का पूजन करती हैं और उसी के तहत ही रात्रि में शहर व गांव के हर गली मौहल्ले में होलिका दहन का कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। इस मौके पर फालैन और जटवारी में गांव के बीचों बीच बडे से मैदान में हिरण्यकश्यप और होलिका के प्रतीक स्वरूप के दर्शन देखने को मिलते हैं जिसमें दोनों गावों में एक एक पन्डा कई दिनों से पूजा अर्चना करके आपने आप का शुद्ध मन से विशाल होली की लपटों से निकलने के लिये तैयार करता है। इस दिन पन्डा विशाल होली की लपटों के बीच से होकर छलांग मार कर बाहर आता है। यह रोमांचकारी दृश्य देश विदेश के लाखों लोगों के बीच सम्पन्न होता है। प्रहलाद के विशाल अग्नि से बाहर आने पर सभी भक्त प्रहलाद की जय जयकार करने लगते हैं।
होलिका दहन के अगले दिन धुलैडी के दिन समूचे ब्रज में सभी नर नारी मदमस्त होकर होली खेलते हैं एक दूसरे को रंग लगाते हैं जगह जगह गीत संगीत का आयोजन किया जाता है लोग ठन्डाई और भांग का सेवन करके माहौल को और उमंग से भर देते हैं नाचते हैं गाते हैं झूमते हैं आपस में रंग लगाते हैं खुशियां मनाते हैं मिठाई खाते हैं और खिलाते हैं और आपस में बधाईयों का आदान प्रदान भी करते हैं गले मिल कर आपसी प्रेम को और प्रगांढ़ करते हैं।
मथुरा में यमुनातट पर विश्राम घाट, स्वामी घाट, बंगाली घाट आदि क्षेत्रों में होली की छटा कुछ अलग ही देखने को मिलती है जगह-जगह घाटों की बुर्जियों में भांग ठन्डाई बड़ी-बड़ी सिलों पर पीसते हैं। इसके शौकीन मथुरा के चतुर्वेदी समाज के लोग बादाम, पिस्ता, काजू, मुनक्का, खरबूजे की मिंगी, सौंफ, कालीमिर्च, गुलकंद आदि को पीस कर एक गोले का रूप दिया जाता है। इसके वाद मनों दूध में इस मिश्रण को मिला कर सभी देवताओं का आवाहन करके फिर वहां उपस्थित लोग प्रसाद के रूप में इसका सेवन करते हैं। भांग की तरंग और ठन्डाई की उमंग के साथ सभी मस्ती में डूब जाते हैं फिर शुरू होती है होली की तान।
होली का त्यौहार बेसे तो पूरे देश में अपने अपने तरीके से मनाया जाता है लेकिन ब्रज की होली जैसा आनन्द और रंगीन मस्ती कहीं नहीं होती है। अब होली का आनन्द पूरे महिने भर गांव गांव में हुरंगों के रूप में देखने को मिलता है।

चैत्र कृष्ण पक्ष की द्वितीया से नवमी तक ब्रज के हुरंगे और फूलडोल के आयोजन होते हैं जिसमें जगह जगह होली के रसिया और गीत संगीत के आयोंजन और होली मिलन समारोह आयोजित किये जाते हैं। मुखराई, ऊमरी, रामपुर, अहमल कलां, बछगांव, सौंख आदि आठ गांवों में चरकुला नृत्य का अयोजन होता है यह ब्रज का परम्परागत लोकनृत्य है जिसमें चांदनी रात में सैकडों दीपों से जगमगाता 40 से 60 किलो वजन का चरकुला सिर पर रखकर एक नृत्यांगना होली के रसिया गीतों के लय ताल पर थिरकती है। उपस्थित गावों के लोग रात भर इसका आनन्द लेते हैं। आधुनिकता से परे आज भी विशाल बम्ब (नगाडे) की ताल और अलगोजा, थाली, करताल, और मंजीरे की मधुर स्वर लहरियों के बीच इस नृत्य की समाप्ति पर नृत्यांगना को जुग जुग जीने की का आर्शीवाद भी गायन के साथ ही दिया जाता है। ‘‘जुग जुग जीओ मेरी नाचन हारी नाचन हारी के दुई दुई हुइयें’’।

दाऊजी का प्रसिद्ध हुरंगा
मथुरा से लगभग 22 किलोमीटर दूर बलराम जी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है जहां दाऊजी का हुरंगा मंदिर प्रांगण में ही खेला जाता है। यहां महिलायें कपड़े फाड़ देती हैं और उनके कोडे बनाकर पुरूषों के नंगे शरीर पर मारती हैं। मंदिर के विशाल प्रांगण में निर्मित हौजों में टेसू के फूलों को भिगो कर रंग बनाया जाता है। हुरिहारे बाल्टियों में भर भर कर हुरिहारिनों पर डालते रहते हैं। मंदिर के छज्जों से अलग-अलग रंगों का गुलाल उडता रहता है अबीर और गुलाल का इन्द्र धनुषी छटा का आभास कराता यह हुरंगा सभी के मन को उमंगों से भर देता है।

इसी दिन कोसीकलां के निकट जाव और बठैन गांव में भी हुरंगा होता है जिसमें बलराम के प्रतीक के रूप में हरिहारों को राधारानी के प्रतीक रूप में महिलाओं से बड़ी मर्यादा के साथ होली खेलनी होती है। हुरंगा के शुरू होने से पहले शोभायात्रा के रूप में सिरदारी निकलती है इनकी यह शोभायात्रा राजा, महाराजा, जमीदारों की तरह बठैन के वयोवृद्ध जाब गांव में आते हैं उनका सम्मान किया जाता है। एक विशेष मिठाई खिलाई जाती है फिर सभी गांव के लोग एक मैदान में एकत्रित होते हैं जहां हुरिहारे हाथ में हाथ डाले एक घेरा बनाकर बीच में बलराम के प्रतीक को लेकर चलते हैं और गांव की हुरिहारिनें लाठियों से बठैन से आये हरिहारों को मारती हैं इस वार को हुरिहारे लाठीयों से ही रोकते रहते हैं घेरा के बीच में बलराम एक ध्वज को लेकर घूमता रहता है।  
बसंत पंचमी से चैत्र कृष्ण नवमी तक चलने वाला 50 दिनों का गीत, संगीत, नृत्य, भक्ति और भाव रस, रंग, उमंग का यह त्यौहार ब्रजवासियों को मन तक भिगो कर तृप्त कर देता है। सभी की कांमना होती है कि सभी चिरजीवी हों और ब्रज में प्रति वर्ष होली खेलकर आनन्द की अनुभूति के साथ साथ भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम का सन्देश जन-जन तक पहुंचाते रहें।
जयश्री कृष्ण जयश्री राधे।
भगवान श्री कृष्ण-राधे रानी के श्री चरणों में-सुनील शर्मा