मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

पूजा पंड़ाल में देवी दुर्गा की मौजूदगी का अहसास !

मथुरा। मथुरा में कई जगहों पर देवी दुर्गा की पूजा के लिए पंडाल सजाये जाते हैं। जिसमें से एक पंडाल मथुरा शहर के बीचों बीच लाल दरवाजा, वृन्दावन दरवाजा क्षेत्र में होने वाली दुर्गा पूजा महोत्सव के पूजा पंडाल जिसमें पिछले 28 वर्षों से पूजा हो रही है बड़े ही भक्ति भाव के साथ पूजा की सभी विधियों का पालन किया जाता है। वर्ष 2017 की दुर्गा पूजा महोत्सव के नवमी के दिन की वात है जिस दिन मैरी बड़ी पुत्री की शादी के पूर्व आर्शीवाद समारोह (पक्का करने की रश्म) घर पर होनी थी। कलकत्ता से लड़के वालों को घर पर आयोजित समारोह में आना था। उनके आने में समय था और पूजा पंडाल से बार-बार फोन आ रहे थे कि यहां आकर पूजा की एक रश्म (कुंआरी पूजा) को पूरा कराना है चूंकी मैं दुर्गा पूजा महोत्सव का महासचिव भी हूँ इस नाते मुझे यह पूजा सम्पन्न करानी थी। मैं जल्दी से पूजा पंडाल पहुँचा और वहां सारी तैयारियां पूरी थीं बस पूजा सम्पन्न करानी थी।
मेरे परम मित्र व छोटे भाई की चार साल की छोटी सी चुलबुली सी नटखट सी कन्या गुनगुन को कन्या पूजन के लिए चुना गया था। माँ भगवती दुर्गा की प्रतिमा के सामने विठा कर पूजा की विधि शुरू की गई। पुरोहित गौरांग मुखर्जी मंत्रों का उच्चारण करते जा रहे थे और मैं उनके बतायें अनुसार फूल, बेलपत्र, गंगा जल तथा अन्य पूजा की समग्री उस कन्या की तरफ दे रहा था।
पूजा के दौरान अचानक इतनी छोटी सी कन्या का हाव भाव कुछ बदला-बदला नजर आने लगा मैरे भी रौंये खडे़ हो गये। उक्त कन्या ने करीब दो मिनट से भी ज्यादा समय तक भगवती दुर्गा की प्रतिमा को बडे़ ही क्रोध के भाव से निहारा फिर उसने कुछ क्षण के लिये मुझे भी कुछ क्रोधित भाव से देखा यह समय कुछ मिनटों का रहा होगा इसके वाद अचानक उसमें हुए बदलाव को मैं स्पष्ट रूप से देख सकता था। मुझे कोलकाता से पधारे पुरोहित तन्त्र साधक गौरांग मुखर्जी ने मुझे धीरे से समझाया कि छोटी बच्ची पर माँ ने कुछ क्षण के लिये प्रवेश किया था। विश्वास न करने की कोई वात ही नही थी क्यों कि एक छोटी सी कन्या मात्र चार वर्ष की उसमें पूजा के दौरान अचानक बदलाव को मैं महसूस कर सकता था। जो बच्ची चुलबुली भरपूर शैतानी करने वाली हंसमुख स्वभाव की बच्ची में एक रौद्र रूप देखकर विश्वास हो गया कि माँ भगवती दुर्गा पूजा पंडाल में आती हैं। शक्ति ने अपना परिचय दिया हम उसे समझें, महसूस करें तथा उस पराशक्ति पर विश्वास करें। तभी इस संसार में जीव का कल्याण हो सकता है। उसके पाँव पूजने के क्रम में उसको सारे बस्त्र दिये गये तथा उसको छोटी-छोटी पाजेब भी पहनाई गई सभी ने उसे उपहार स्वरूप कुछ न कुछ दिया तथा फिर वह देवी प्रतिमा के पास से नीचे आकर पहले की तरह नार्मल व्यवहार करने लगी तथा शैतानी करने लगी, उछलकूद करने लगी।

सोमवार, 2 सितंबर 2019

मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम 2019 से किसको होगा फायदा।

आम जन को, पुलिस को, या विभाग को
इसमें कोई दो राय नही है कि इस प्रकार के कडे़ कानून बना कर  अपनी जिन्दगी के प्रति लापरबाह लोगों पर कुछ हद तक लगाम लगेगी और सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सकेगी। मगर फिर भी लोग किसी न किसी तरह से जुगाड लगा कर अपने बच निकलने के रास्ते भी तलाश लेंगे। क्या इसका दुप्रयोग नही होगा। क्या इससे भ्रष्टाचार के रास्ते और बड़े नहीं हो जायेंगे।
क्या इससे आम जन को कोई लाभ होगा या पुलिस को इसका सीधा सीधा लाभ मिलेगा, या विभाग के खाते में रकम पहुंचने से सरकार का लाभ होगा। इस प्रश्न का ज्यादातर लोग यही उत्तर दे रहे हैं कि पुलिस का लाभ यानी पुलिस कर्मियों का लाभ जरूर होगा साथही कुछ लोग मानते हैं कि इसमें तीनों को लाभ मिलेगा। जबकि कुछ लोग इसका सटीक उत्तर नही दे सके।
विशाल अग्रवाल ने बताया कि चालान सिर्फ ट्रफिक पुलिस काटे सभी पुलिस कर्मियों को इसकी जिम्मेदारी न दी जाये तो 50 प्रतिशत तक सही तरीके से काम हो पायेगा। जबकि आकाशवाणी के पूर्व उद्घोषक श्रीकृष्ण शरद, राकेश रावत एडवोकेट, पी0 के0 वार्ष्णेय, अरविन्द चौधरी, जगन्नाथ पौद्दार, पवन शर्मा, महेन्द्र राजपूत, जितेन्द्र गर्ग, सपन साहा, प्रताप विश्वास इन सभी ने माना कि इसमें पुलिस का फायदा अधिक होगा।
01 सितम्बर से मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम 2019 में सड़क सुरक्षा हेतु कठोर प्रावधान किये गये हैं। चालकों पर कडे़ नियमों के जरिये सड़क पर गाड़ियां चलाने के नियमों में बदलाव करते हुए सरकार ने सीट बैल्ट नहीं पहनने पर पहले 300 रुपये का जुर्माना था यह 1000 रुपये कर दिया गया है। दोपहिया बाहन पर दो से ज्यादा सवारी होने पर पहले 100 जुर्माना था अब यह 1000 रुपये कर दिया गया है। हेलमेट नहीं पहनने पर यह जुर्माना 200 रुपये था अब यह 1000 रुपये करने के साथ ही तीन माह तक के लिए लाईसेन्स निलम्बित करने का प्रावधान रखा गया है। इमरजेन्सी बाहन (एम्बूलेन्स) को रास्ता न देने पर पहले कोई जुर्माना नहीं था अब इस कृत्य को करते पकडे़ जाने पर 10000 रुपये का जुर्माना होगा। बिना ड्राईविंग लाईसेन्स के ड्राईविंग करते पकड़े जाने पर पहले 500 रुपये का जुर्माना लगाया जाता था अब इसे 5000 रुपये कर दिया गया है। लाईसेन्स रद्द होने के बावजूद भी ड्राईविंग करने पर 500 रुपये से 10000 रुपये का जुर्माना अदा करना होगा। ओवर स्पीड में वाहन चलाने पर पहले 400 रुपये बसूले जाते थे अब 2000 रुपये कर दिया गया है। खतरनाक ड्राईविंग करने पर 1000 रुपये से बढ़ा कर 5000 रुपये कर दिया गया है। शराब पीकर वाहन चलाने पर पहने 2000 रुपये जुर्माना लगता अब इसे 10000 रुपये कर दिया गया है। ड्राईविंग के दौरान मोबाईल से वात करने पर 1000 रुपये से 5000 रुपये का जुर्माना कर दिया गया है। बिना परमिट पाये जाने पर 5000 रुपये से बढ़ा कर इसे 10000 रुपये कर दिया गया है। गाड़ियों की ओवर लोडिंग पर 2000 रुपये और उसके वाद प्रति टन 1000 था अब इसे 2000 रुपये कर दिया गया है। बिना इंश्योरेन्स के गाड़ी चलाने पर 1000 रुपये था अब इसे बढ़ा कर 2000 रुपये किया गया है। नाबालिग द्वारा वाहन चलाने पर पहले इस कर कोई जुर्माना नहीं था मगर अब इसे सबसे गम्भीर मानते हुए सरकार ने 25000 रुपये का जुर्माना और 3 साल की सजा का प्रावधान रखा है इसमें वाहन का रजिस्ट्रेशन को रद्द किया जा सकता है और गाड़ी मालिक व उसके अभिभावक दोषी माने जायेंगे साथ ही नाबालिग को 25 साल की उम्र तक लाईसेन्स नही दिया जायेगा।
सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के प्रयास के तौर पर इसे देखा जाये तो यह आम जन के सुरक्षा के लिये जरूरी माना जा सकता है। लेकिन क्या इससे जो कुछ सड़कों पर चैकिंग के नाम पर होता था उसमें वृद्धि नही होगी। अब तक 100 रुपये देकर लोग छूट जाया करते थे मगर यह रकम अब कई गुना अधिक की हो जायेगी। क्या भ्रष्टाचार को करने का सपना पाले बैठी सरकार इसे रोक पायेगी।
नम्बर प्लेट पर पुलिस का निशान व गाड़ी में कहीं न कहीं पुलिस का चिन्ह लगा कर घूमने वाले लोगों पर लगाम लग सकेगी। एडवोकेट, पुलिस, न्याय विभाग, आर्मी, प्रेस आदि लिखे वाहनों से जो लोग बच निकलते थे वो क्या अब नहीं निकल पायेंगे।
सबसे पहले तो यह काम सरकारी विभागों पर और पुलिस विभाग के तमाम सभी जो कभी हेलमेट नहीं लगाते हैं और न ही सीट बेल्ट तो इनसे जुर्माना बसूला जायेगा।
मोवाईल पर बात करते पकडे़ जाने पर जुर्माना केवल प्राइवेट वाहनों पर या दोपहिया वाहनों को चलाने वालों पर ही होगा। क्या सरकारी वाहनों पर भी इसका अंकुश लग सकेगा। सबसे ज्यादा खतरनाक खेल तो रोड़वेज बस, प्राईवेट बस, स्कूल बस के ड्राईवर करते हैं 60-70 लोगों की जिन्दगी इनके हाथों में होती है शराब पीकर गाड़ी चलाना तथा गाड़ी चलाते समय मौवाईल पर वाते करना क्या इन पर अंकुश लग पायेगा।
आम जनों के जीवन की सुरक्षा के लिहाज से तो यह कड़े कानूनों का प्रवधान ठीक है, मगर इन कानूनों का कितना अनुपालन ठीक से हो पायेगा, यह तो समय ही बतायेगा।

सुनील शर्मा, मथुरा।

रविवार, 1 सितंबर 2019

कंजूसी या जीवन की सादगी

    आज की भागदौड भरी जिन्दगी में किसी के पास किसी के लिए समय ही नहीं है, अगर है भी तो ज्यादातर समय मौबाइल ने ले लिया है। घर परिवार में, बस में, ट्रेन में, मेट्रो में, सड़क पर किसी को किसी की तरफ देखने का भी समय ही नहीं है। मौबाइल की चैटिंग और जरूरी कामों को निपटाने की आपा धापी में लोग अपने पास टू ब्हीलर और फोर ब्हीलर तक रखने से बच रहे हैं। ड्राइब करने का झंझट, पार्किंग की समस्या, जाम की समस्या। केब बुक किया और अपने काम तक जाना या आफिस तक जाना फिर बापस घर तक आना यही तो जिन्दगी का हिस्सा बन चुका है। लोगों के घरों में महंगी डाइनिंग टेबिल तो है मगर साथ-साथ खाना खाने की की फुर्सत किसी के पास नहीं है। जब पापा आते हैं तो बच्चे सौ जाते हैं, जब बच्चे स्कूल जाते हैं तब तक पापा सोये हुए होते हैं। ऐसी जिन्दगी में समय किसी के पास नहीं है अगर है भी तो मौबाइल ही सारा समय ले रहा है।


एक समय था जब मेरे एक परम प्रिय मित्र के घर मैं अक्सर जाया करता था। हम दोनों कॉमर्स के स्टुडेन्ट थे। इस लिए प्रायः उनके घर जाना होता था। अक्सर देखा कि पिता जी माता जी जमीन पर बैठ कर खाना खाते है। उनके सामने एक थाली, एक लोटा, एक चम्मच, एक कटौरी होती थी। यह परिवार कोई गरीब नहीं था मगर उन्होंने इसे अपनी जिन्दगी एक हिस्सा बना लिया था। और एक नियम भी जिसमें बड़े से छोटे को खाना खाने के नियम को पालन करना होता था।
दोस्त के पिता प्राईमरी स्कूल में एक अध्यापक थे। मगर थे तो थोडे से कंजूस एक बार मेरा मित्र किसी विषय में फेल हो गया तो उसके पिताजी वोले कि मेरा लाखों का नुकसान कर दिया। मैंने कहा कैसे, तो बोले कि देखो पूरे वर्ष भर दो टाइम खाना खाया, पढाई पर खर्च किताब कापी पर खर्च, कपड़ों पर खर्च, थोड़ा बहुत अन्य खर्चे भी इस हिसाब से लाखों का नुकसान हुआ कि नही।
उनके तीन बेटों में सबसे बड़ा बेटा वो भी एक स्कूल में मास्टर था। बीच वाला बेटा एक सरकारी विभाग में ड्राइवर, सरकारी जीप चलाता था। तीसरे नम्बर का बेटा जो मेरे साथ पढ़ता था। अभी उसने कोई काम शुरू नहीं किया था। पढ़ाई कर रहा था।
सादगी और उनके परिवार के एक साथ खाने के व्यवहार ने मेरे मन में उनको हमेशा स्मरण में रखा है। शायद आज के दौर में यह एक साधारण सी वात हो लेकिन एक मैसेज जरूर है। जब माता पिता खाना खा रहे हों तो परिवार की बड़ी बहु खाना बनाने में व्यस्त रहती थी और उसका हाथ बटाने को बीच वाली बहु भी उसके साथ-साथ काम करती थी। खाने में भी सादगी एक उर्द, चने की दाल फूली-फूली रोटी चुचेमा घी (यानी मानों रोटी घी में डूबी हुई हो) और एक आलू की सूखी सब्जी, न अब वह आटा मिलता है न अब वह आलू रहे, नाही वह घी रहा, न ही उर्द, चने की दाल ही मिलती है।
खेर दोस्त के माता पिता के खाना खाने के दौरान पिता का भोजन जब पूर्ण हो चुका होता था तो उसी थाली में बड़ा बेटा आकर माँ के साथ बैठ जाता था। फिर माँ का खाना समाप्त होने पर बीच वाला बेटा आकर बड़े भाई के साथ बैठ जाता था, बड़े बेटे का खाना जैसे ही समाप्त होता तो छोटा बेटा जो मेरे साथ पढ़ता था वह भोजन करने बैठ जाता था। बीच वाले भाई का खाना तब तक समाप्त होता था, तब जाकर बड़ी बहु अपने देवर यानी मेरे मित्र के साथ उसी खाने की थाली पर बैठ जाती और खाना शुरू करती थी। मेरा मित्र का खाना पूरा हो चुका होता है तो परिवार की वर्तमान छोटी बहु यानी बीच वाले भाई की पत्नी अपनी जिठानी के साथ भोजन पूरा करती थी। बड़ी बहु का काम खाना बनाना और छोटी का काम रसोई की साफ सफाई के वाद वही एक थाली, एक लोटा, एक चम्मच, एक कटोरी की सफाई करके रखती थी, जिससे दूसरे टाइम भी यही क्रम चल सके।
इसमें एक तो ज्यादा बर्तन उपयोग में लाने से बचा जा सकता है जिसमें या तो नौकरानी बर्तन धोने के लिये चाहिए या परिवार की कोई एक बहू सारे बर्तनों को साफ करे, साथही समय की बचत के साथ-साथ भोजन की सादगी से और घर के बने भोजन का आनन्द परिवार के सभी सदस्य बारी-बारी से ले सकेंगे। सभी एक निश्चित समय पर ही भोजन कर सकेंगे। परिवार में एक जुटता बनी रहेगी।

सुनील शर्मा, मथुरा

लन्दन रिर्टन गणेश, वृन्दावन विराजे

आपने कभी सोचा नही होगा कि गणेश जी की प्रतिमा भी लन्दन घूम कर आ सकती हैं। 
मगर यह एक सच्ची घटना है जिसमें गणेश जी लन्दन तक घूक कर आ गये और वर्षों से वृन्दावन में विराजमान हैं। और आज भी लोग माँ भगवती दुर्गा के साथ-साथ इन्हीं गणेश जी प्रतिमा के दर्शन करते हैं।
कात्यायनी पीठ, के नाम से जाना जाने वाला स्थान मथुरा जनपद के वृन्दावन में स्थित है। भगवती कात्यायनी के अनन्य साधक व  योगिराज श्री श्यामाचरण लाहिड़ी जी महाराज के परम शिष्य योगी स्वामी केशवानन्द ब्रह्मचारी जी महाराज ने अपनी कठोर साधना द्वारा प्राप्त भगवती के प्रत्यक्ष आदेशानुसार इस लुप्त स्थान श्री कात्यायनी पीठ राधा बाग, वृन्दावन नामक पावनतम पवित्र स्थान का उद्धार किया।
वृन्दावन में कात्यायनी पीठ
श्री यमुना नदी के किनारे स्थित राधाबाग़ अति प्राचीन सिद्धपीठ के रूप में श्री श्री माँ कात्यायनी देवी विराजमान हैं।
पौराणिक मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण की क्रीड़ा भूमि श्रीधाम वृन्दावन में भगवती देवी के केश गिरे थे, इसका प्रमाण प्रायः सभी शास्त्रों में मिलता ही है। आर्यशास्त्र, ब्रह्म वैवर्त पुराण एवं आद्या स्तोत्र आदि कई स्थानों पर उल्लेख है- व्रजे कात्यायनी परा अर्थात् वृन्दावन स्थित पीठ में ब्रह्मशक्ति महामाया श्री माता कात्यायनी के नाम से प्रसिद्ध है। वृन्दावन स्थित श्री कात्यायनी पीठ भारतवर्ष के उन अज्ञात 108 एवं ज्ञात 51 पीठों में से एक अत्यन्त प्राचीन सिद्धपीठ है। देवर्षि श्री वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत के दशम स्कंध के बाईसवें अध्याय में इसका उल्लेख किया है-
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥
हे कात्यायनि! हे महामाये! हे महायोगिनि! हे अधीश्वरि! हे देवि! नन्द गोप के पुत्र को हमारा पति बनाओ हम आपका अर्चन एवं वन्दन करते हैं। दुर्गा सप्तशती में देवी के अवतरित होने का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-
माँ भगवती ने मैं नन्द गोप के घर में यशोदा के गर्भ से अवतार लूंगी। श्रीमद् भावगत में भगवती कात्यायनी के पूजन द्वारा भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त करने के साधन का सुन्दर वर्णन प्राप्त होता है। यह व्रत पूरे मार्गशीर्ष (अगहन) के मास में होता है। भगवान श्री कृष्ण को पाने की लालसा में ब्रजांगनाओं ने अपने हृदय की लालसा पूर्ण करने हेतु यमुना नदी के किनारे से घिरे हुए राधाबाग़ नामक स्थान पर श्री कात्यायनी देवी का पूजन किया था। इस महान् सिद्धपीठ का उद्धार निश्चित रूप से भगवती की कृपा प्राप्त व्यक्ति संत महात्मा श्री केशवानन्द जी ने श्री कात्यायनी पीठ का पुनर्रुद्धार करके लोक कल्याण का काम किया है जिसके कारण आज वर्ष भर लाखों श्रृद्धालु सम्पूर्ण भारत वर्ष से यहां आते हैं।
कात्यायनी पीठ, वृन्दावन
कामरूप मठ के स्वामी रामानन्द तीर्थ जी महाराज से दीक्षित होकर कठोर साधना के लिए हिमालय की कंदराओं में निरन्तर साधनारत रहे स्वामी केशवानन्द जी महाराज ने सर्वशक्तिशाली माँ के आदेशानुसार वृन्दावन स्थित अज्ञात सिद्धपीठ का उन्होंने पुनरूध्दार कराया। स्वामी केशवानन्द जी महाराज द्वारा 1 फ़रवरी, 1923 माघी पूर्णिमा के दिन बनारस, बंगाल तथा भारत के विभिन्न सुविख्यात प्रतिष्ठित वैदिक याज्ञिक ब्राह्मणों द्वारा वैष्ण्वीय परम्परा से मंदिर की प्रतिष्ठा का कार्य पूर्ण कराया। माँ कात्यायनी के साथ-साथ पंचानन शिव, विष्णु, सूर्य तथा सिद्धिदाता श्री गणेश जी महाराज (जिनकी बात तो कुछ अलौकिक ही है “जिसने जाना उसने पाया“ वाली कहावत चरितार्थ है) की मूर्तियों की भी इस मंदिर में प्रतिष्ठा की गई। राधाबाग़ मंदिर के अंतर्गत गुरु मंदिर, शंकराचार्य मंदिर, शिव मंदिर तथा सरस्वती मंदिर भी दर्शनीय हैं। यहाँ की अलौकिकता का मुख्य कारण जहां साक्षात माँ कात्यायनी सर्वशक्तिस्वरूपणि, दुःखकष्टहारिणी, आल्हादमयी, करुणामयी अपनी अलौकिकता को लिए विराजमान है वहीं पर सिद्धिदाता श्री गणेश जी एवं बगीचा में अर्ध्दनारीश्वर (गौरीशंकर महादेव) एक प्राण दो देह को धारण किये हुए विराजमान हैं। लोग उन्हें देखते ही मन्त्रमुग्ध हो जाते हैं।

श्री सिद्ध गणेश कात्यायनी पीठ, वृन्दावन
श्री श्री कात्यायनी पीठ वृन्दावन में स्थित गणपति महाराज की मूर्ति का भी विचित्र इतिहास है। एक अंग्रेज़ श्री डब्लू. आर. यूल कलकत्ता में मैसर्स एटलस इंशोरेंस कम्पनी लि. जो न. 4 क्लाइव रोड पर है, में ईस्टर्न सेक्रेटरी पद पर कार्य करते थे। इनकी पत्नी श्रीमती यूल ने कोई सन् 1911 या 1912 में जबकि वह विलायत जा रही थीं, जयपुर से एक गणपति महाराज की मूर्ति ख़रीदी। वह अपने पति को कलकत्ता छोड़कर इंग्लैण्ड चली गईं तथा उन्होंने अपनी बैठक में कारनेस पर गणपति जी की प्रतिमा सज़ा दी। एक दिन श्रीमती यूल के घर भोज हुआ तथा उनके मित्रगणों ने गणेश जी की प्रतिमा को देखकर उनसे पूछा कि यह क्या है? श्रीमती यूल ने उत्तर दिया कि यह हिन्दुओं का सूंड वाला देवता है। उनके मित्रों ने गणेश जी की मूर्ति को बीच की मेज पर रखकर उपहास करना आरम्भ किया। किसी ने गणेश जी के मुख के पास चम्मच लगाकर पूछा कि इनका मुंह कहां है। जब भोज समाप्त हो गया तब रात्रि में श्रीमती यूल की पुत्री को ज्वर हो गया जो रात्रि को बड़े वेग से बढ़ गया। वह अपने तेज़ ज्वर में चिल्लाने लगी हाय मेरा सूंड़वाला खिलौना मुझे निगलने आ रहा है। डाक्टरों ने सोचा कि वह विस्मृति में बोल रही है। किन्तु वह रात दिन यही शब्द दोहराती रही एवं अत्यन्त भयभीत हो गयी। श्रीमती यूल ने यह सब वृतांत अपने पति को कलकत्ता लिखकर भेजा। उनकी पुत्री को किसी भी औषधि से लाभ नहीं हुआ। एक दिन यूल ने स्वप्न में देखा कि वह अपने बाग़ के अतिथिगृह में बैठी है। सूर्यास्त हो रहा है, अचानक एक नम्र पुरुष जिसके घुंघराले बाल, मशाल सी जलती आंख, हाथ में भाला लिए, वृषभ पर सवार बढ़ते हुए अंधकार से उसकी ओर आ रहा है एवं कह रहा है, ’ मेरे पुत्र सूंड़ वाले देवता को तत्काल भारत भेज दो अन्यथा मैं तुम्हारे सारे परिवार का नाश कर दूंगा। वह अत्यधिक भयभीत होकर जाग उठी और दूसरे दिन प्रातः ही उन्होंने उस खिलौने को पार्सल बनवाकर पहली डाक से ही अपने पति के पास भारत भेज दिया। जहां वह देवता गार्डन हेंडरसन के कार्यालय में तीन दिन तक रहे। वहां शीघ्र ही कलकत्ता के नर नारियों की सिद्ध गणेश के दर्शनार्थ कार्यालय में भीड़ लग गयी। कार्यालय का सारा कार्य रुक गया। श्री यूल ने अपने अधीन इंश्योरेंस एजेण्ट केदार बाबू से पूछा कि इस देवता का क्या करना चाहिए। अन्त में केदार बाबू गणेश जी को अपने घर 7, अभय चरण मित्र स्ट्रीट ले गए एवं वहां उनकी पूजा शुरू कर दी। तब से सब भक्तों ने केदार बाबू के घर पर जाना आरम्भ कर दिया।
इधर वृन्दावन में स्वामी केशवानन्द जी महाराज कात्यायनी देवी की पंचायतन पूजन विधि से प्रतिष्ठा के लिए सनातन धर्म की पांच प्रमुख मूर्तियों का प्रबन्ध कर रहे थे। श्री श्री कात्यायनी देवी की अष्टधातु से निर्मित मूर्ति कलकत्ता में तैयार हो रही थी तथा भैरव चन्द्रशेखर की मूर्ति जयपुर में बनाई गई थी । जबकि महाराज गणेश जी की प्रतिमा के विषय में विचार कर रहे थे, तभी उन्हें माँ का आदेश हुआ कि एक सिद्ध गणेश कलकत्ता में केदार बाबू के घर में हैं। जब तुम कलकता से प्रतिमा लाओगे तब मेरे साथ मेरे पुत्र को भी लाना। अतः जब श्री केशवानन्द जी श्री श्री कात्यायनी माँ की अष्टधातु की मूर्ति पसंद करके लाने के लिए कलकत्ता गये तब केदार बाबू ने उनके पास आकर कहा गुरुदेव मैं आपके पास वृन्दावन आने का विचार कर रहा था।
मैं बड़ी विपत्ति में हूं। मेरे पास पिछले कुछ दिनों से एक गणेश जी की प्रतिमा है। प्रतिदिन रात्रि में स्वप्न में वह मुझसे कहते हैं कि जब श्री श्री कात्यायनी माँ की मूर्ति वृन्दावन जायेगी तो मुझे भी वहां भेज देना। कृपया आप स्वीकार करें। गुरुदेव ने कहा,“ बहुत अच्छा तुम वह मूर्ति स्टेशन पर ले आना, मैं तूफ़ान से जाऊँगा। जब माँ जायेगी तो उनका पुत्र भी उनके साथ जाएगा।“
अतः जब श्री श्री स्वामी केशवानंद जी महाराज श्री श्री कात्यायनी देवी की अष्टधातु की अत्यन्त ही सुन्दर प्रतिमा लेकर कलकत्ता से वापस आ रहे थे, केदारबाबू ने स्टेशन आकर गुरुदेव को गणेश जी की प्रतिमा दे दी। वह सिद्ध गणेश इन महायोगी द्वारा श्री श्री कात्यायनी पीठ में प्रतिष्ठित किए गए हैं। इनकी स्थापना के कुछ समय बाद से ही इस अद्भुत देवता की कई आश्चर्यजनक घटीं जो कि लिपिबद्ध की जाएं तो एक पूरा ग्रन्थ ही बन जाए।
स्वामी विद्याननद जी महाराज
स्वामी श्री केशवाननद जी महाराज के परम भक्त श्री विशम्भर दयाल जी और उनकी पत्नी श्री रामप्यारी देवी जी जो प्रतिदिन महाराज जी के दर्शन करने आया करते थे, ’मां’ की भक्ति के साथ-साथ गुरु महाराज स्वामी श्री केशवानंद जी के भी कृपा पात्र हो गये। श्री विशम्भर दयाल जी के छ्ह पुत्र थे, इन छ्ह पुत्रों पर महाराज का आशीर्वाद सदा विद्यमान रहा। परन्तु चतुर्थ पुत्र पर उनकी कृपा दृष्टि अत्यधिक रही और विधुभूषण नामक यह बालक आज स्वामी विद्यानंद जी महाराज के नाम से जाने जाते हैं।

गुरुवार, 22 अगस्त 2019

मथुरा-वृन्दावन की सडकों पर अब नही दौडती घोडागाडी


घोडों के टाप की टक टक टक टक की आवाज अब मथुरा-वृन्दावन की सडकों पर सुनाई नही देती है अब यह वीते जमाने की वात बन कर रह गई है बच्चे भी कितावों में ही टमटम घोडा गाडी देखेंगे। एक जमाना था जब मथुरा शहर के चौक बाजार के गुडहाई बाजार से घोडा गाडी वृन्दावन और स्टेशन के लिये जाया करते थे। व्यस्त सडकों के बीच से होकर यह घोडा गाडी चला करती थी। बाहर से आने वाले तीर्थ यात्री, पर्यटक, इन घोडा गाडी में बेठ कर सेर करने निकल जाते थे वृन्दावन के रास्ते में ठन्डी ठन्डी हबा का आनन्द भी और वृन्दावन-मथुरा के बीच हरियाली का आनन्द भी लेते थे। यही व्यवस्था वृन्दावन के तांगा अडडा पत्थर पुरा में और रंगजी मंदिर के सामने से तांगे चला करते थे। यह तांगे की सबारी कर लोग मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, महावन दाउजी, गोवर्धन, बरसाना, नन्दगांव तक जाया करते थे। एक समय था जब मथुरा के अंग्रेज कलेक्टर भी घोडा गाडी में ही चला करते थे। कई जगह इसका वर्णन भी मिलता है। मुगलकाल में भी घोडा गाडी का चलन था शासक घोडा गाडी में ही शहर का भ्रमण करते थे। घोडा गाडी का चलन मथुरा में बग्घी के रूप में भी हुआ पहले शहर के रहीशों के यहां घोडा गाडी यानी बग्घी के रूप में थी। जिसमें बेठकर नगर के गण्मान्य सेठ लोग अपने मील कारखाने या किसी आयोजन में जाया आया करते थे। कुछ घराने ऐसे भी थे जिनके बच्चे भी स्कूल बग्घी में बैठ कर जाते थे उस समय की शान शौकत का हिस्सा थी बग्घी लोगों की हैसियत भी घोडा बग्घी से ही होती थी। समय के साथ मोटर कार ने यह जगह ले ली।



 फिर यह बग्घी तो शादी बिवाह में चलने लगी दुल्हा को लाने के काम में आने लगी अब बग्घी भी दर्शनीय हो गयी है। मगर घोडा गाडी आम आदमी के आवागमन का साधन बन गयी पहले शान से घोडा-गाडी में बैठा करते थे। लेकिन साबन भादों के महिने में मथुरा-वृन्दावन में गांव से भी घोडा गाडियों के आ जाने के कारण यहां चारों तरुफ घोडा गाडी दिखाई देती थी। शहर में घोडा गाडी चलाने वालों को बडा ही हेय दृष्टि से देखा जाता था भींड वाले इलाके में जाते समय गालियां खानी पडती थी कभी कभी तो टकराने की स्थिति में पिटाई भी कर देते थे। महंगाई की मार ने अब घोडा गाडी को भी आम आदमी के व्यवहार से दूर कर दिया है यदा कदा कोई घोडा गाडी दिखाई दे जाती है लेकिन अब इनकी सबारी कोई करता नहीं है। लेकिन मथुरा-वृन्दावन में घोडा गाडी की कभी यात्रा कर चुके यात्री आज भी मथुरा वृन्दावन आकर घोडा गाडी को ढूंडते हैं और मिलने पर उसकी सबारी भी मजे से अपने परिवार के साथ करते हैं।
घोडा गाडी रखने वालों का कहना हैं कि अब हर चीज के इतने दाम हो गये हैं कि इन्हें रखना और इनका रख रखाव काफी महंगा हो गया है उपर से पशु क्रूरता अधिनियम का डर, घोडे को खिलाना उसकी देख रेख करना जगह का अभाव हारी बीमारी अलग से है। इस लिये इस धन्धे को छोड कर किसी और काम में लग गये हैं। अब केबल शगुन के लिये वारात चढाने के लिये केबल घोडा ही रखते हैं। दुल्हे की वारात की चढाई के लिये काम में आ रहे हैं घोडे गाडियों का अब पता नही। एक समय ऐसा भी था जब आगरा से मथुरा नरी सेमरी तक घोडा गाडियों की दौड. हुआ करती थी। जिसमें बडी रकम का सटटा तक होता था। प्रशासन ने घोडा गाडी दौड. को बन्द करा दिया। पुलिस भी मेले आदि में घोडे से निगरानी रखती थी अब यह व्यवस्था भी धीरे धीरे समाप्ति के कगार पर है। एतिहासिकता को बनाये रखने के लिये घोडा गाडी को हेरीटेज प्लान में शामिल किया जाना चाहिये।
सुनील शर्मा, मथुरा

जन्माष्टमीः ठाकुर जी की पोषाक मुस्लिम सिलते हैं, बधाई गीत भी मुसलमान गाते हैं



जन्माष्टमीः ठाकुर जी की पोषाक मुस्लिम सिलते हैं, बधाई गीत भी मुसलमान गाते हैं
मथुरा। कान्हा की पोशाकों को तैयार करने मे दिन रात मुस्लिम कारीगर लगे हुए हैं, ये पीढ़ी दर पीढ़ी इनका कारोबार चला आ रहा है ,इस तरह मुस्लिम समाज के ये लोग सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश समाज में दे रहे हैं। मथुरा में भगवान श्री कृष्ण के जन्म उत्सव को लेकर सभी तैयारियों में लगे हुए हैं, वहीं प्रशासन भी पूरी तरह भगवान श्रीकृष्ण के जन्म उत्सव को अबकी बार दिव्य और भव्य बनाने के लिए कमर कसे हुए हैं। गोकुल में सुबह जब कान्हा के जन्म की खुशियां मनाई जायेंगी तो बधाई गीत भी मुसलमान गाते हैं और शहनाई भी मुसलमान ही बजाते हैं।
मुस्लिम कारीगर भगवान श्रीकृष्ण और राधाजी की सुंदर और आकर्षक पोशाक तैयार करने में लगे हैं। कन्हैया के जन्म उत्सव की तैयारियों में मुस्लिम लोग सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दे रहे हैं। अल्लाह के बंदे श्रद्धा के साथ कृष्ण के जन्मोत्सव के दिन ठाकुरजी के श्रंगार में पहनाई जाने वाली पोशाकों के निर्माण में जुटे हुए हैं। , इन पोशाक की भारत के विभिन्न शहरों में ही नहीं विदेशों में भी मांग है। मुस्लिम समाज के यह लोग भगवान श्रीकृष्ण की पोशाक बनाने का काम अब से नहीं कर रहे। इनके पूर्वज भी इसी तरह भगवान श्रीकृष्ण के आभूषण बनाकर समाज मे सौहार्द का संदेश देते रहे हैं।
मुस्लिम कारीगरों ने बताया कि 40 साल हो गये काम करते, विदेशों में भी जाती हैं हमारी पौषाक, फक्र महसूस करता हूं, हमारी किस्मत है कि ठाकुर जी ने हमें अपने कपडों को सिलने पर लगा रखा है। यह संदेश पूरा भारत में जाना चाहिए, भाईचारा सीखना है तो हमारे वृंदावन से सीखें जो हमें लडाते हैं वह गलत आदमी है।
बांकेबिहारी जी मंदिर भी जाते हैं वृंदावन में, पांच फुट के ठाकुर जी होंगे तो पौषाक सिलने में पूरा एक महीना लगता है। एक पोषाक में करीब पांच आदमी लगते हैं। हमें अच्छा लगता है, दिल को सुकून मिलता है, ठाकुर जी की पोषाक बनाने में, भरत और भारत के बाहर के मंदिरों में हमारी पोषाक पहनाई जाती है।
100 से अधिक कारखाने हैं पौषाक तैयार करने के
मथुरा में पोशाक और मुकुट श्रृंगार का व्यवसाय फैला हुआ है। 100 से अधिक कारखानों में अधिकांश कारीगर मुस्लिम समाज के हैं, जो दिन-रात भगवान श्रीकृष्ण के पोशाक और श्रृंगार का सामान तैयार करने में जुटे हुए हैं, वह इन लोगों की रोजी-रोटी का भी एक साधन है।
कान्हा के जन्मोत्सव का इंतजार इन्हें बेसब्री से रहता है।
विदेशों में भी भारी मांग है।
जन्माष्टमी से महीनों पहले से ही ये भगवान श्रीकृष्ण की पोशाकों को तैयार करने में लग जाते हैं। भगवान के मुकुट, गले का हार, पायजेब, बगल बंदी, चूड़ियां, कान के कुंडल जैसे आभूषणों को तैयार किया जाता है। तैयार होने के बाद इन्हें विदेशों में भी भेजा जाता है। इन लोगों पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड कनाडा, नेपाल और अफ्रीका से भी ऑर्डर आते हैं।

शनिवार, 11 मई 2019

सुगन्ध और अनुपम छटा बिखेरते वृन्दावन के फूल बंगले

मथुरा से सुनील शर्मा

108 दिन फूलबंगलों में बांके बिहारी के दर्शन होते हैं।
भक्त मनोकांमना पूर्ति व आत्मिक शान्ति के लिए बनवाते हैं फूल बंगले।

(सुनील शर्मा)
मथुरा, फूलों की डेकोरेशन आज हर आयोजन की शान बन गयी हैं। चाहें शादी-विवाह हो या कोई उत्सव हर जगह फूलों की सजाबट को प्रमुखता दी जाती है। विशेष कर ब्रज के मंदिरों में फूलबंगलों की बहार देखने को मिलती है। ब्रज के मंदिरों में भी फूलों का विशेष महत्व है तपती दुपहरी, गर्मी के दिनों में मंदिरों में भगवान को सुगन्ध व ठंडक का अहसास कराने के लिए मंदिरों में फूल बगलों का आयोजन किया जाता है। भीषण गर्मी में भी मंदिरों में शीतलता का अहसास फूलबंगले कराते हैं। तरह-तरह के फूलों की सुगन्ध प्रभुभक्ति में लीन हो जाने को विवश करते हैं। मंदिरों में तरह-तरह के फूलों का अलग-अलग महत्व होता है, देव प्रतिमाओं के श्रृंगार में फूल चार चाद लगा देते हैं। फूलों के बिना श्रृंगार अधूरा ही प्रतीत होता है। ग्रीष्म काल में भगवान के मंदिरो में गर्मी से राहत दिलाने को श्रद्धालु फूलों का बगंला बनवाते है। यह क्रम पहले गर्मियों के दिनों में चलता था आज फूलबंगले वर्ष भर सजाये जाते हैं।
वृन्दावन में प्रसिद्ध मंदिरों में फूल बंगलों का यह क्रम चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी से श्रावण कृष्ण पक्ष अमावस्था (हरियाली अमावस्था) तक चलता है। इन दिनों फूल बंगलों की बड़ी जबर्दस्त बहार रहती है। फूलों के यह बंगले मुख्यतः यहां के ठाकुर श्री बांके बिहारी मंदिर, राधावल्लभ मंदिर, राधारमण मंदिर एवं राधा दामोदर मंदिर आदि में श्रद्धालु, भक्तगणों द्वारा मंदिरों के गोस्वामियों के सहयोग से नित नए रूप से बनवाए जाते हैं, जिनमें कि प्रतिदिन सांयकाल ठाकुर जी मंदिर के गर्भ गृह से बाहर निकल कर जगमोहन में विराजते हैं। साथ ही वे मंदिर प्रांगण में उपस्थित हजारों श्रद्धालु भक्तों को अपने दर्शन देकर कृतार्थ करते हैं। फूलों के इन बंगलों को देखने के लिए देश के कोने-कोने से असंख्य लोग वृंदावन पहुंचते है। फूल बंगले धर्म, संस्कृति एवं कला के अद्भुत समन्वय का मिलाजुला रूप होने के साथ-साथ प्रभु को रिझाने का एक सशक्त माध्यम भी हैं। प्रभु को प्रसन्न करने वाली यह फूल सेवा पहले प्रतीकात्मक रूप से की जाती रही है परंतु अब यह अपने पूरे वैभव पर है।
भीषण गर्मी की झुलसाने वाली तपिश में अपने आराध्य ठाकुर जी को गर्मी के प्रकोप से बचाने एवं उन्हें पुष्प सेवा से आह्लादित कर रिझाने के लिये वृंदावन के प्रायः सभी प्रमुख मंदिरों में फूल बंगले बनते हैं परंतु फूल बंगले बनाने का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप यहां के विश्व प्रसिद्ध ठाकुर श्री बांके बिहारी मंदिर में देखने को मिलता है। बताया जाता है कि प्राचीन काल में ठाकुर बांके-बिहारी महाराज की सेवा करने हेतु उनके प्राकट्यकर्ता स्वामी हरिदास व उनके शिष्य जंगलों से तरह-तरह के फूल बीन कर लाते थे, जिन्हें बिहारी जी के सम्मुख रख दिया जाता था। साथ ही हरिदास जी, बिहारी जी को रायबेल व चमेली के फूलों की माला भी पहना दिया करते थे। बाद में वे फूलों से छोटी मोटी सजावट करने लगे। इस प्रकार वृंदावन में सर्वप्रथम फूल बंगला रसिकेश्वर स्वामी हरिदास ने ठाकुर बल्लभाचार्य महाराज, विट्ठलनाथ गोस्वामी, अलबेली लाल गोस्वामी, लक्ष्मीनारायण गोस्वामी, ब्रजवल्लभ गोस्वामी, छबीले बल्लभ गोस्वामी आदि के द्वारा संबर्धन हुआ। इन सभी से यह कला बिहारी जी के अन्य गोस्वामियों ने सीखी। गोस्वामियों के द्वारा बिहारी जी के मंदिर में फूल बंगलों को बनाए जाने के मूल में यह भावना निहित थी कि इससे उनके ठाकुर जी को गर्मियों में फूलों से कुछ ठंडक मिलेगी।
अतएवं वह प्रतिवर्ष गर्मियों में उनके मंदिर में अपने निजी खर्चे पर फूलों के बंगले बनाते थे। बाद में इन फूल बंगलों को बाहर के भक्तों के द्वारा बनाए जाने का खर्चा उठाया जाने लगा किंतु इनको बनाने का कार्य आज भी बिहारी जी के गोस्वामियों के द्वारा ही किया जाता है। क्योंक यह कला इनको अपने पूर्वजों से विरासत में प्राप्त हैं, इसलिए वह फूल बंगलों को बनाए जाने का कार्य बगैर किसी पारिश्रमिक के अत्यंत श्रद्धाभाव के साथ करते हैं। बिहारी जी के लगभग डेढ़ सौ गोस्वामी परिवारों में आज कोई भी परिवार ऐसा नहीं है, जिसमें कि कोई न कोई व्यक्ति फूल बंगलों को बनाने का काम न जानता हो और सब अपनी सुविधानुसार फूल बंगले बनाते हैं। फूल बंगलों में केवल केले के पत्ते आदि का कार्य करने के लिए ही कुछ व्यक्ति मजदूरी पर बाहर से बुलाने पड़ते है। फूल बंगलों के बनाने में रायबेल, बेला, चमेली, चंपा गुलाबी, गुलदाऊदी, सोनजूही, मोतिया, मौलसिरि, लिली, रजनीगंधा, गुलाब, कमल, कनेर गेंदा आदि के फूलों का उपयोग किया जाता है।
एक दिन के छोटे से छोटे फूल बंगले में पचास क्विंटल तक फूल लग जाते हैं। इतनी बड़ी तादात में फूल वृन्दावन में उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, इसके लिये अन्य जनपदों से भी फूल मगांने पड़ते हैं अब कुछ भक्त विदेशों से भी विदेशी फूल मंगवाने लगे हैं। दूरवर्ती स्थानों से फूलों को बर्फ की सिल्लियों पर रखकर वायुयान से दिल्ली, आगरा तक मंगाया जाता है। तत्पश्चात् उन्हें सड़क मार्ग से वृंदावन लाया जाता है। फूल बंगलों में फूलों के अलावा तुलसी दल, केले के पत्तों, सब्जियों, फलों, मेवों, मिठाइयों और रुपयों का भी इस्तेमाल होता है।
एक दिन का फूल बंगला बनाने में पाँच लाख रुपयों से लेकर बीस-पच्चीस लाख रुपये तक व्यय हो जाते है। फूल बंगलों को बनाने का कार्य यद्यपि ब्रज की एक लोक कला हैं किन्तु यह धार्मिकता से जुड़ी होने के कारण यहां का प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान बन गई है। इस सम्बन्ध में ठाकुर बांके बिहारी के अनन्य सेवक व स्वामी हरिदास जी के वंशज सेवायत शेलेन्द्र गोस्वामी ने बताया कि ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में दूर दराज से आए उनके तमाम श्रद्धालु प्रायः मनौतियां पूर्ण होने पर फूल बंगला ठाकुर जी की सेवा में अर्पित करते हैं। मनौतियों के पूरे होने पर श्रद्धालु भक्त यहां अपने खर्चे पर मंदिर के गोस्वामियों के द्वारा फूल बंगले बनवाते हैं। इस कार्य में सभी जाति संप्रदाय के लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते है।
बाँके बिहारी मंदिर के व्यवस्थापक मनीष कुमार शर्मा ने बताया कि यहां प्रतिवर्ष गर्मियों में फूल बंगलों के बनाए जाने के जो लगभग चार महीने होते हैं, उनमें किस दिन किस व्यक्ति के खर्चे पर फूल बंगला बनेगा, इसकी बुकिंग लगभग एक वर्ष पूर्व ही हो जाती है। फिर भी फूल बंगला बनवाने के इच्छुक तमाम लोगों को निराश होना पड़ता है। ठाकुर बांके बिहारी मंदिर पर चैत्र शुक्ल एकादशी से श्रावण कृष्ण हरियाली अमावस्या तक बिना नागा नित्य-प्रति फूलों के बंगले बनते हैं। इस वर्ष यह फूल बंगले 15 अप्रैल से 01 अगस्त तक 108 दिन फूल बंगले बनाये जायेंगे। उन्होंने बताया कि भक्तों की अधिक मांग होने के कारण अब फूलबंगले दोनों टाइम सजाये जाते हैं। लगभग 216 फूलबंगले सजाये जायेंगे।
बाँके बिहारी जी मंदिर प्रबन्ध कमेटी के पूर्व सदस्य व अनन्य भक्त विकास वार्ष्णेय ने इस सम्बन्ध में बताया कि वृंदावन के ठाकुर श्री बांके बिहारी मंदिर में फूल बंगलों को बनाने का कार्य बड़े जोर-शोर से होता है। यहां से गोस्वामी कलाकारों का उत्साह व तल्लीनता देखते ही बनती है। वे यहां नित्यप्रति बनने वाले फूल बंगलों को बनाने का कार्य एक दिन पूर्व ही शुरू कर देते हैं, तब कहीं जाकर दूसरे दिन फूल बंगला बन कर तैयार हो पाते हैं। फूलों के बंगले बनाने हेतु सर्वप्रथम बांस की खपच्चियों से बने फ्रेमों पर डोरे, सुतली व कीलों आदि की मदद से रायबेल के फूलों के द्वारा विभिन्न प्रकार के जाल बुने जाते है।
इन जालों के चौमासी, छैमासी, आठमासी, बारहमासी, सांकर व सतिया आदि नाम होते हैं। फिर इन जालों के उपर फूलों को गोस्वामी कलाकार अपने हाथों से इधर उधर सरका कर चक्रव्यूह प्रणाली में तरह-तरह की डिजायनें डालते हैं, जिन्हें फूल बंगले बनाने की भाषा में जाल का तोड़ना कहते हैं। इन जालों की यह विशेषता होती है कि इनका आदि व अंत ढूंढे़ नहीं मिलता है। तत्पश्चात चार-चार मंजिल तक के फूलों के बंगले देखते ही देखते खड़े कर दिए जाते हैं, जिनमें खिड़कियां, दरवाजे, छज्जे, जीने, अट्टालिकाएं आदि सभी कुछ होते हैं। इन बंगलों की छतें पिरामिड नुमा होती है। साथ ही इनकी संरचना उद्यान की तरह होती है। इन बंगलों में प्रतिदिन सायंकाल बिहारी जी विराजते है। बिहारी जी की पोशाक व आभूषण आदि भी फूलों से ही बनाए जाते हैं केले के वृक्ष के तने को काटकर उसमें से निकाली गई परतों के द्वारा बिहारी जी का बिछौना बनाया जाता है। कलाकारों द्वारा लकड़ी के चौखटों पर केले के तने की परतें लगाकर उन पर रंगीन कपड़ा या कागज व गोटा आदि चिपका कर भगवान श्री कृष्ण की लीलाओें का सजीव चित्रण भी किया जाता है। साथ ही मंदिर प्रांगण में विभिन्न प्रकार के फूलों से बड़े-बड़े झाड़ व फानूस बनाए जाते है। फूलों के द्वारा गाय, मोर, तोता आदि पशु-पक्षियों की रचना करके उनकों फूल बंगलों में विचरण करते हुए दिखाया जाता है।
मंदिर में स्वामी हरिदास जी के वंशज व सेवायत रजत गोस्वामी व ब्रजेश गोस्वामी बताते हैं कि फूल बंगलों का निर्माण करते समय इसके कारीगरों का ध्यान निकुंज भाव में ललिता व विशाखा आदि सहचारियो की लीला पर केंद्रित रहता है। इन फूल बंगलों पर गोस्वामीगण निरंतर गुलाब जल छिड़कते रहते है, जिससे उनकी सुगंध व ठंडक में इर्द-गिर्द शीतल जल के फब्बारे भी चला करते हैं। इसके अलावा बिहारी जी को विभिन्न शीतल पेय पदार्थो से भोग भी लगाए जाते है। फूल बंगले नित्य प्रति नई-नई डिजाईन के बनाए जाते हैं। यह डिजाईनें यहां के गोस्वामीगण स्वयं ही पूरे वर्ष ग्राफ पेपर पर आड़ी तिरछी रेखाएं खींच कर ईजाद करते है। फूल बंगले के दर्शन केवल सायंकाल मंदिर खुलने के समय ही होते थे लेकिन हाल के कुछ वर्षों से भक्तों की अत्यधिक मांग के कारण फूल बंगलों की संख्या में वृद्धि को देखते हुए अब एक दिन में दो फूल बंगले सजते हैं।
मंदिर के उप प्रबन्धक उमेश सारस्वत ने बताया कि एक बंगले को बनाए जाने में जो फूल प्रयोग में आ जाता है, उसे दूसरा फूल बंगला बनाने हेतु किसी भी सूरत में प्रयेग में नहीं लाया जाता है। एक बार प्रयोग में आ चुका फूल बतौर प्रसाद भक्तगणों में वितरित किया जाता है अथवा यमुना में विसर्जित कर दिया जाता है। फूल बंगले बनाने हेतु प्रतिदिन ताजा फूल ही इस्तेमाल होते है। दोपहर के समय यहां के मंदिरों में फूल बंगले बनाने का कार्य अपने चरमोत्कर्ष पर होता है। वृंदावन के विभिन्न मंदिरों में कभी-कभी एक रूपये से लेकर दो हजार रुपये तक के नोटों को कलात्मक रूप से सजा कर भी फूलों के बंगले बनने लगे है। इन बंगलों की लागत चार-पांच लाख से लेकर बीस व पच्चीस लाख रुपयों तक जा पहुंचती है। इन बंगलों में सिक्कों का भी प्रयोग होता है। आजकल गुब्बारों से फल-फूल सब्जियों व अन्य सामग्री से भी बंगले बनने लगे हैं जो अत्यंत चित्ताकर्षक होते है। देश के कौने कौने से श्रद्धालु अपने मनोकामंना के पूर्ण होने पर भगवान बाँके बिहारी जी को फूल बंगला अर्पित करते हैं। इन फूल बंगलों को देखने के लिए दूर-दराज से अंसख्य दर्शक वृंदावन प्रतिदिन पहुंचते हैं।
(सुनील शर्मा)