बुधवार, 28 अगस्त 2013

घर घर जन्मे कृष्ण कन्हाई!

गीता के नायक, लीला पुरूषोत्तम, योगीराज श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्णा अष्टमी को हुआ था। देश के प्रायः सभी प्रान्तों में श्रीकृष्णजन्माष्टमी का पर्व असीम श्रद्धा,भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। जन्माष्टमी का यह पर्व विदेशों में भी धूम धाम से मनाया जाता है।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर ब्रज के कण कण में अपूर्व हर्षोल्लास छा जाता है। आज भी घर आगंन को गोवर से लीपा जाता है चैक पूरे जाते हैं द्वार पर बंदरवार बांधी जाती है, मंगल सूचक थापे लगाये जाते हैं और फूलों से पालने को सजाकर ब्रजकी बालाएं गाती हैं।
‘‘डोरी फूलन को पालनों, आजु नन्द लाला भए’’।
ब्रज के घर घर में भगवान को नये वस्त्र पहना कर उनका श्रंगार करके झांकियां सजाई जाती है। महिलाएं अपने यहां रखे सालिगराम की वटिया को एक खीरे में रख कर डोरे से बांध कर श्री कृष्ण के जन्म समय मध्य रात्रि को 12 बजे उसे खीरे में से निकाल कर पंचामृत स्नान कराती हैं। इस प्रकार से भगवान श्री कृष्ण का प्रतीक रूप में जन्म की भावनाएं संजोई जाती हैं। स्त्री पुरूष बच्चे भी श्री कृष्ण के जन्म के दर्शन के उपरान्त ही अपना व्रत खोलते हैं।
मथुरा स्थित कंस का कारागार स्थल भगवान केशवदेव और नगर के मध्य विराजमान ठाकुर द्वारकानाथ द्वारकाधीश मंदिर में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। इस अवसर पर अपार जनसमूह उमड़ पड़ता है।
ब्रज के प्रत्येक घर आंगन में शंख घन्टा घडि़याल की ध्वनि ऐसे गंज उठती है मानों वहां किसी बालक का जन्म हुआ हो इस प्रकार ब्रज के हर घर घर में कृष्ण जन्म लेते हैं लोग आपस में बधाईयां देते हैं भक्ति भावनाओं में विभोर होकर ब्रजवासी नांचने गाने लगते हैं ‘‘नन्द के आनन्द भए जय कन्हैया लाल की’’ गाते हुए हर तरफ टौलियां नजर आने लगती है।
भगवान श्री कृष्ण का जन्म अर्धरात्रि के समय कंस के कारागार में होने के वाद उनके पिता वसुदेव जी कंस के भय से बालक को रात्रि में ही यमुना नदी को पार कर नन्द बाबा के यहां गोकुल छोड़ आये थे। इसी लिए कृष्ण जन्म के दूसरे दिन गोकुल में नन्दोत्सव मनाया जाता है। भाद्र पद नवमी के दिन समस्त ब्रजमंड़ल में नन्दोत्सव की धूम रहती है। यह उत्सव दधिकांदों के रूप मनाया जाता है दधिकांदो का अर्थ है दही की कीच। हल्दी मिश्रत दही फेंकने की परम्परा आज भी निभाई जाती है। मंदिर के पुजारी नन्दबाबा और जशोदा के वेष में भगवान कृष्ण के पालने को झुलाते हैं। मिठाई, फल व मेवा मिश्री लुटायी जाती है। श्रद्धालु इस प्रसाद को पाकर अपने आपको धन्य मानते हैं। 
वृंदावन में उत्तर भारत के विशाल श्री रंगनाथ मंदिर में ब्रज नायक भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के दूसरे दिन नन्दोत्सव की धूम रहती है। नन्दोत्सव के दौरान सुप्रसिद्ध लठ्ठे के मेले का आयोजन किया जाता है। धर्मनगरी वृंदावन में श्री कृष्ण जन्माष्टमी जगह-जगह मनाई जाती है किन्तु उत्तर भारत के सबसे विशाल मंदिर में नन्दोत्सव की निराली छटा देखने को मिलती है। दक्षिण भारतीय शैली के प्रसिद्ध श्री रंगनाथ मंदिर में नन्दोत्सव के दिन श्रद्धालु लठ्ठा के मेला की एक झलक पाने को टकटकी लगाकर खड़े होकर देखते रहते हैं। जब भगवान रंगनाथ रथ पर विराजमान होकर मंदिर के पश्चिमी द्वार पर आते हैं तो लठ्ठे पर चढ़ने वाले पहलवान भगवान रंगनाथ को दण्डवत कर विजयश्री का आर्शीवाद लेकर लठ्ठे पर चढ़ना प्रारम्भ करते हैं। 35 फुट ऊंचे लठ्ठे पर जब पहलवान चढ़ना शुरू करते हैं उसी समय मचान के ऊपर से कई मन तेल और पानी की धार अन्य ग्वाल-वालों द्वारा लठ्ठे के सहारे गिराई जाती है। जिससे पहलवान फिसलकर नीचे जमीन पर आ गिरते हैं। जिसे देखकर श्रद्धालुओं में रोमांच की अनुभूति होती है। पुनः भगवान का आर्शीवाद लेकर ग्वाल-वाल पहलवान एक दूसरे को सहारा देकर लठ्ठे पर चढ़ने का प्रयास करते है। तो तेज पानी की धार और तेल की धार के बीच पूरे जतन के साथ ऊपर की ओर चढ़ने लगते हैं। कई घंटे की मशक्कत के बाद आखिर ग्वाल-वालों को भगवान के आर्शीवाद से लठ्ठे पर चढ़कर जीत हासिल करने का मौका मिलता है। इस रोमांचक मेले को देखकर देश-विदेश के श्रद्धालु अभिभूत हो जाते हैं। ग्वाल-वाल खम्भे पर चढ़कर नारियल, लोटा, अमरूद, केला, फल मेवा व पैसे लूटने लगते हैं। 
इसी प्रकार वृंदावन में ही क्या जगह-जगह भगवान श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर नन्दोत्सव मनाया जाता है। ब्रहमकुण्ड स्थित हनुमान गढ़ी में नन्दोत्सव के दौरान मटकी फोड़ लीला का आयोजन किया जाता है। 15 फुट ऊंची मटकी को ग्वाल-वाल पिरामिड बनाकर मशक्कत के साथ मटकी को फोड़ते हैं। एवं दधिकांधा उत्सव का आयोजन भी होता है।

झारखण्ड़ के रांची से 16 जून से लापता यूको बैंक के सीनियर मैनेजर भटटाचार्य का आज तक पता नही चला।

झारखण्ड़ के रांची से 16 जून से लापता यूको बैंक के सीनियर मैनेजर भटटाचार्य का आज तक पता नही चला। 
झारखण्ड़ में यूको बैंक की रांची की ध्रूवा शाखा के सीनियर मैनेजर मथुरा निवासी श्री सुधीरंजन भटटाचार्य 16 जून 2013 से लापता हैं। बैंक के सीनियर मैनेजर को एक षड़यत्र के तहत अगुवा किया गया हैं। परिजनों ने उसकी तलाश में डीजीपी से लेकर पुलिस के तमाम अधिकारियों के यहां दस्तक दी तथा बैंक अधिकारियों तक से सम्पर्क साधा लेकिन कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिल पाया और कहीं से अब तक कुछ पता नही चल सका है कि आखिर बैंक मैनेजर कहां गये। उनकी पत्नी के अनुसार बैंक के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि वह रांची के दो बिल्डरों द्वारा यूको बैंक ध्रूवा व्रांच के साथ करीव तीन करोड़ रुपयों की धोखाधड़ी कर ओवर ड्राफ्ट के माध्यम से बैंक के करेन्ट एकाडन्ट से रकम निकालने के वाद उस रकम को बैंक में जमा नहीं करा रहे थे। जिसे लेकर बैंक के सीनियर मैनेजर सुधीरंजन भटटाचार्य 16 जून को सिद्धार्थ गुप्ता व मनीष मुन्डा के साथ व्यक्तिगत मुलाकात कर बैंक के बकाया के भुगतान को सेटेलमेन्ट कराने की गरज से घर से निकले थे। 
मथुरा स्थित कृष्णा नगर पुलिस चैकी क्षेत्र की मधुबन एंकलेव काॅलोनी निवासी सुधीरंजन भटटाचार्य आठ माह पूर्व ही झारखण्ड के रांची की ध्रूवा शाखा में स्थानांतरित हुए थे। श्री भटटाचार्य पूर्व में मथुरा की गोविन्द गंज शाखा के अलावा आस पास के तमाम जनपदों में कार्यरत थे। मृदुभाषी किन्तु अपने में ही सीमित रहने बाले श्री भटटाचार्य किसी भी व्रांच से किसी शिकायत के दोषी नहीं थे। 
श्री भटटाचार्य ने 16 जून को रात्रि 8 बजकर 43 मिनट पर अपने छोटे भाई सुरंजन भटटाचार्य से मथुरा बात की थी। जो कि श्री भटटाचार्य की अपने परिवार से यही अन्तिम वार फोन पर वार्ता हुई थी। तब तक श्री भटटाचार्य ने पूरी तरह से ठीक हालत में बात की तथा वह किसी तरह के तनाव या अवसाद की स्थिति में बातचीत नहीं कर रहे थे। 16 जून के वाद से श्री भटटचार्य ने न तो परिवार के किसी सदस्य से बात की और न ही कोई फोन उनका मिल पाया। इसके वाद परिवार में चिन्ता होने लगी तब परिवार के सदस्यों ने जब उनके मौबाइल फोन पर सम्पर्क किया तो उनके दोनों फोन बन्द मिल रहे थे। बेटे के गम में 85 वर्षीय माँ ने बिस्तर पकड़ लिया है बहन बहनोई और परिजन परेशान हैं। आखिर झारखण्ड के रांची में कहां जाकर खोजें।उनको चिनता सता रही है कि कहीं उनकी हत्या न कर दी गयी हो। 
इसके वाद उनकी पत्नी श्रीमती सुमिता भटटाचार्य किसी तरह अपने देवर और ननद के साथ रांची पहुँची जहां उन्होंने सम्बंधित यूको बैंक की ध्रुवा रांची ब्रांच में 24 जून को बैंक के अन्य कर्मचारी श्री विश्वनाथ और श्री सी.पी सिंह से मुलाकात की तो जानकारी मिली कि उनके पति श्री सुधीरंजन भटटाचार्य करीब 8 जून से 13 जून तक छुटटी पर थे। फिर 14 जून को भी वह बैंक में डयूटी पर नहीं पहुँचे साथही 15 जून को श्री भटटाचार्य ने श्री विश्वनाथ को मैसेज किया कि वह सोमवार को बैंक जोईन करेंगे तथा उन्होंने लिखा कि वह मनीष व सिद्धार्थ से ओवर ड्राफ्ट को एडजेस्ट कराने के लिए मुलाकात भी करेंगे। श्री भटटाचार्य ने श्री विश्वनाथ को 16 जून रात्रि 8 बजकर 45 मिनट पर फिर मैसेज दिया कि मैं मनीष से मुलाकात करने के लिए बिटसा चैक पर इन्तजार कर रहा हूँ।
इसके वाद से श्री सुधीरंजन भटटाचार्य का कोई पता नहीं चल पा रहा है कि आखिर 16 जून से लापता एक बैंक के सीनियर मैनेजर कहां गये। उनकी पत्नी ने बराबर फोन पर सम्पर्क करने का प्रयास किया लेकिन उनका कोई सम्पर्क उनसे नही हो पाया है। बताया जाता है कि सिद्धार्थ गुप्ता व मनीष मुन्ड़ा काफी प्रभावशाली व बाहुबलि बिल्डर्स हैं जिनके खिलाफ झारखण्ड़ में तथा रांची मे कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। 
श्री सुधीरंजन भटटचार्य ने अपने फ्लेट 404 जगन्नाथ एपार्टमेन्टस सिंह मोड़ लातमा रोड़, हेशंग हातिया, रांची में अपने कमरे में दो पत्र लिख कर छोडे़ हैं जोकि एक सिद्धार्थ गुप्ता व मनीष मुन्डा के नाम लिखे हैं जिसमें बैंक की ओर से ओवर ड्राफ्ट की रकम शीघ्र जमा कराने के लिए लिखा है तथा न जमा कराने की स्थिति में बैंक काननी कार्यवाही करने के लिए व बसूली करने की कार्यवाही कर सकती है। मनीष मुन्डा के पत्र में श्री भटटाचार्य ने धमकी दिये जाने व जान से मारने की धमकी का जिक्र भी किया है। साथ ही जल्द मुलाकात कर ओवर ड्राफ्ट की रकम के सम्बन्ध में वार्ता करने का जिक्र भी किया है। 
श्री भटटाचार्य की पत्नी श्रीमती सुमिता भटटाचार्य के अनुसार उन्होंने प्रदेश के डीजीपी से लेकर आईजी, एसएसपी समेत सम्बधित थाने में जाकर सम्पर्क किया था लेकिन किसी ने उनकी कोई मदद नही की। उन्होंने बताया कि यूको बैंक के जोनल मैनेजर श्री जी.पी भौमिक से भी मुलाकात की वह भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके। भटटाचार्य के एक टैªवेल एजेन्ट श्री अशोक से भी सम्पर्क किया था। वह भी चुप्पी साधे हुए थे लगता है कि उनको कुछ न कुछ तो मालुम है। 
श्रीमती भटटाचार्य ने थानाध्यक्ष जगरनाथपुर थाना रांची में एक लिखित शिकायत दर्ज कराई है। जिसमें शीघ्र पति को ढूंढ कर उनके बारे सूचना देने की गुहार लगाई है।  
बैंक का स्टाफ और पुलिस पूरी तरह से बाहुबलियों के इशारे पर काम कर रही है। श्रीमती भटटाचार्य का कहना है कि बैंक से लापता बैंक अधिकारी के विषय में बैंक ने पुलिस में रिर्पोट क्यों नहीं दर्ज कराई और बैंक द्वारा समाचार पत्रों में कोई सूचना प्रकाशित क्यों नही कराई गई तथा उनके परिवार से सम्पर्क क्यों नहीं किया गया आखिर क्या बजह थी कि श्री सुधीरंजन भटटाचार्य को बैंक ने आनन फानन में निलंबित कर दिया तथा इस आशय का नोटिस भी बैक में चसपा करा दिया। बताया जाता है  िकइस घटना के वाद जोनल मैनेजर से लेकर बैंक में कार्यरत अधिकारियों को भी ट्रांसफर कर दिया गया है। 
बैंक के अधिकारियों को मनीष और सिद्धार्थ के विषय में पूरी जानकारी है। मेरे पति को किसी न किसी षड़यत्र के तहत फंसाया जा रहा है और उनके साथ कुछ भी हो सकता है। दोनो पत्रों के मजमून से और सारा घटनाक्रम तो सिद्धार्थ और मनीष की ओर इशारा करते हैं और कहीं न कहीं पुलिस और बैंक के अधिकारियों की मिलीभगत से इन दोनों ने ही बैंक के सीनियर मैनेजर को ठिकाने न लगा दिया हो एसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है, घटना जो भी हो सामने आनी चाहिए।  
  

मंगलवार, 7 मई 2013

जन-गण-मन के सामने वन्दे मातरम की हार !

वन्दे मातरम व जन-गण-मन वन्दे मातरम की कहानी ये वन्दे मातरम नाम का जो गान है जिसे हम राष्ट्रगीत के रूप में जानते हैं उसे बंकिम चन्द्र चटर्जी ने 7 नवम्बर 1875 को लिखा था। बंकिम चन्द्र चटर्जी बहुत ही क्रन्तिकारी विचार व्यक्ति थे। देश के साथ- साथ पुरे बंगाल में उस समय अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त आन्दोलन चल रहा था और एक बार ऐसे ही विरोध आन्दोलन में भाग लेते समय इन्हें बहुत चोट लगी और बहुत से ... उनके दोस्तों की मृत्यु भी हो गयी। इस एक घटना ने उनके मन में ऐसा गहरा घाव किया कि उन्होंने आजीवन अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का संकल्प ले लिया उन्होंने बाद में एक उपन्यास लिखा जिसका नाम था ‘‘आनंदमठ’’ जिसमे उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बहुत कुछ लिखा, उन्होंने बताया कि अंग्रेज देश को कैसे लुट रहे हैं, ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से कितना पैसा ले के जा रही है, भारत के लोगों को वो कैसे मुर्ख बना रहे हैं, ये सब बातें उन्होंने उस किताब में लिखी। वो उपन्यास उन्होंने जब लिखा तब अंग्रेजी सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया। जिस प्रेस में छपने के लिए वो गया वहां अंग्रेजों ने ताला लगवा दिया। तो बंकिम दा ने उस उपन्यास को कई टुकड़ों में बांटा और अलग-अलग जगह उसे छपवाया औए फिर सब को जोड़ के प्रकाशित करवाया। अंग्रेजों ने उन सभी प्रतियों को जलवा छपा और फिर जला दिया गया, ऐसे करते करते सात वर्ष के बाद 1882 में वो ठीक से छ्प के बाजार में आया और उसमे उन्होंने जो कुछ भी लिखा उसने पुरे देश में एक लहर पैदा किया। शुरू में तो ये बंगला में लिखा गया था, उसके बाद ये हिंदी में अनुवादित हुआ और उसके बाद, मराठी, गुजराती और अन्य भारतीय भाषाओँ में ये छपी और वो भारत की ऐसी पुस्तक बन गया जिसे रखना हर क्रन्तिकारी के लिए गौरव की बातहो गयी थी। इसी पुस्तक में उन्होंने जगह जगह वन्दे मातरम का घोष किया है और येउनकी भावना थी कि लो भी ऐसा करेंगे। बंकिम बाबु की एक बेटी थी जो ये कहती थी कि आपने इसमें बहुत कठिन शब्द डाले है और ये लोगों को पसंद नहीं आयेगी तो बंकिम बाबु कहते थे कि अभी तुमको शायद समझ में नहीं आ रहा है लेकिन ये गान कुछ दिन में देश के हर जबान पर होगा, लोगों में जज्बा पैदा करेगा और ये एक दिन इस देश का राष्ट्रगान बनेगा। ये गान देश का राष्ट्रगान बना लेकिन ये देखने के लिए बंकिम बाबु जिन्दा नहीं थे लेकिन जो उनकी सोच थी वो बिलकुल सही साबित हुईद्य 1905 में ये वन्दे मातरम इस देश का राष्ट्रगान बन गया। 1905 में क्या हुआ था कि अंग्रेजों की सरकार ने बंगाल का बटवारा कर दिया था। अंग्रेजों का एक अधिकारी था कर्जन जिसने बंगाल को दो हिस्सों में बाट दिया था, एक पूर्वी बंगाल और एक पश्चिमी बंगाल। इस बटवारे का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये था कि ये धर्म के नाम पर हुआ था, पूर्वी बंगाल मुसलमानों के लिए था और पश्चिमी बंगाल हिन्दुओं के लिए, इसी को हमारे देश में बंग-भंग के नाम से जाना जाता है। इस बटवारे का दंश झेलना पड़ा बंग भाषियों को और आज तक झेलते आ रहे हैं। ये देश में धर्म के नाम पर पहला बटवारा था उसके पहले कभी भी इस देश में ऐसा नहीं हुआ था, मुसलमान शासकों के समय भी ऐसा नहीं हुआ था।
खैर ............... इस बंगाल बटवारे का पुरे देश में जम के विरोध हुआ था , उस समय देश के तीन बड़े क्रांतिकारियों लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल ने इसका जम के विरोध किया और इस विरोध के लिए उन्होंने वन्दे मातरम को आधार
बनाया। और 1905 से हर सभा में, हर कार्यक्रम में ये वन्देमातरम गाया जाने लगा। कार्यक्रम के शुरू में भी और अंत में भी। धीरे धीरे ये इतना प्रचलित हुआ कि अंग्रेज सरकार इस वन्दे मातरम से चिढने लगी। अंग्रेज जहाँ इस गीत को सुनते, बंद करा देते थे और और गाने वालों को जेल में डाल देते थे, इससे भारत के क्रांतिकारियों को और ज्यादा जोश आता था और वो इसे और जोश से गाते थे। एक क्रन्तिकारी थे इस देश में जिनका नाम था खुदीराम बोस, ये पहले क्रन्तिकारी थे जिन्हें सबसे कम उम्र में फाँसी की सजा दी गयी थी मात्र 14 साल की उम्र में उसे फाँसी के फंदे पर लटकाया गया था और हुआ ये कि जब खुदीराम बोस को फाँसी के फंदे पर लटकाया जा रहा था तो फाँसी के फंदे को अपने गले में वन्दे मातरम कहते हुए पहना था। इस एक घटना ने इस गीत को और लोकप्रिय कर दिया था और इस घटना के बाद जितने भी क्रन्तिकारी हुए उन सब ने जहाँ मौका मिला वहीं ये घोष करना शुरू किया चाहे वो भगत सिंह हों, राजगुरु हों, अशफाकुल्लाह हों, चंद्रशेखर हों सब के जबान पर मंत्र हुआ करता था। ये वन्दे मातरम इतना आगे बढ़ा कि आज इसे देश का बच्चा बच्चा जानता। जन-गण-मन की कहानी सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था।
सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये।
इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director)  रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है ‘‘जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता’’ इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीकत में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था। इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है ‘‘भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero)  तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारा’ट्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो।
‘‘जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था। उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये कि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।
रविन्द्र नाथ टैगोर की अंग्रेजों के प्रति ये सहानुभूति खत्म हुई 1919 में जब जलियावाला कांड हुआ और गाँधी जी ने उनको पत्र लिखा और कहा कि अभी भी तुम्हारी अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और कहा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे। रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और (ICS) अॉफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है)। इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘‘जन गण मन’’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को न दिखायें क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी मृत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा कि ये ‘‘जन गन मन’’ गीत न गाया जाये।
1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे में बाल गंगाधर तिलक के समर्थक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु के समर्थक थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु वाला गुट चाहता था कि स्वतंत्र भारत की क्या जरूरत है, अंग्रेज तो कोई खराब काम कर नहीं रहे है, अगर बहुत जरूरी हुआ तो यहाँ के कुछ लोगों को साथ लेकर अंग्रेज साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government)  बने। जबकि बाल गंगाधर तिलक गुट वाले कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और दूसरा गरम दल। गरम दल के नेता हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे, उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना, हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत ‘‘जन गण मन’’ गाया करते थे और गरम दल वाले ‘‘वन्दे मातरम’’।
नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को  ‘‘मातरम’’ नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे, उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई। बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि ‘‘जन गन मन’’ के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया ‘‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा हमारा’’। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए। नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और ‘‘जन-गण-मन’’ ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने ‘‘जन-गण-मन’’ को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गाया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे। जन-गण-मन को इसलिए प्राथमिकता दी गयी क्यों कि यह उनके लिए गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था। तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का।
अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ? इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद्। और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये (अंग्रेजी छोड़ कर), अपने अपने ब्लॉग पर डालिए, मेरा नाम हटाइए अपना नाम डालिए मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मतलब बस इतना ही है की ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये।

जय हिंद

बुधवार, 27 मार्च 2013

चैतन्य महाप्रभु यदि वृन्दावन न आये होते तो शायद ही कोई पहचान पाता कान्हा की लीला स्थली को,

चैतन्य महाप्रभु यदि वृन्दावन न आये होते तो शायद ही कोई पहचान पाता कान्हा की लीला स्थली को,

क्यों कि उस समय वैष्णव आन्दोलन जन-जीवन के अति करीब था। यह केवल पंण्डितों तक सीमित नहीं था यह समस्त जीव मात्र के लिए था। सिद्धान्तों का मनन चिन्तन सबके लिए था। यह वैष्णव आन्दोलन एक नैतिक और सामाजिक आन्दोलन के रूप में सामने आया, जिसमें समाज में व्याप्त कुरितियों छुआछूत और जाति-पाँति का कोई विचार न था। ईश्वर भक्ति में सबका समान रूप से अधिकार था। ईश्वर भक्ति ही महत्वपूर्ण है भक्तिपरक सिद्धान्त एवं भक्ति सभी के लिए था। लेकिन इस आन्दोलन में साधारण लोग भी शामिल थे। मुगलों का शासन था समाज में उनका आतंक व्याप्त था। समाज रूढि़वादी और छूआछूत जैसी कठिन समस्याओं से अछूता न था। ऐसे में हिन्दुत्व की भावना को सुरक्षित रखने के लिए वैष्णव आन्दोलन का प्रचार प्रसार चल रहा था। वैष्णव धर्म तो पहले से था लेकिन उसे भारतवर्ष में लोकप्रिय बनाने का श्रेय श्रीचैतन्य को ही जाता है। 
 इसका ऋण चुकाने को बंगाल ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पंद्रहवीं शताब्दी में बंगक्षेत्र ने उस भक्तिवीर को जन्म दे दिया, जिसने कृष्ण के वृंदावन को पुनः जागृत कर कृष्ण भक्ति को जन जन में प्रचारित कर दिया। भक्ति आंदोलन की तारीखें गवाह हैं कि पश्चिमोत्तर के कान्हा श्याम की बांसुरी की तान को पुनर्जीवित करने का श्रेय पूरब के गौरांग को ही जाता है। यह थे चैतन्य, जिन्हें उनके भक्त आज भी महाप्रभु के नाम से बुलाते हैं। उनके भक्त तो आज भी चैतन्य महाप्रभु में दुर्गा या काली के बजाय कृष्ण और राधा के एक रूप को ही देखते हैं।
चैतन्य महाप्रभु का नाम वैष्णव सम्प्रदाय के भक्तियोग शाखा के शीर्श कवियों और संतों में होती है। वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की शुरुआत भी चैतन्य महाप्रभु ने की है। भजन गायकी की अनोखी शैली प्रचलित कर उन्होंने तब की राजनैतिक अस्थिरता से अशांत जनमानस को सूफियाना संदेश दिया था। लेकिन वे कभी भी कहीं टिक कर नहीं रहे, बल्कि लगातार देशाटन करते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ ईश-प्रेम और भक्ति की वकालत करते रहे। जात-पांत, ऊंच-नीच की मानसिकता की उन्होंने भर्त्सना की, लेकिन जो सबसे बड़ा काम उन्होंने किया, वह था वृन्दावन को नये सिरे से भक्ति आकश में स्थापित करना। सच बात तो यह है कि तब लगभग विलुप्त हो चुके वृंदावन को चैतन्य महाप्रभु ने ही नये सिरे से बसाया। अगर गौरांग के चरण वहां न पड़े होते तो कृष्ण -कन्हाई की यह लीला भूमि, किल्लोल-भूमि केवल एक मिथक बन कर ही रह जाती।
पश्चिम बंगाल के नादिया जिला तब इसे नवदीप कहा जाता था। में 19 फरवरी सन् 1486 संवत् 1542 शनिवार को फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को जन्मकाल था संध्या में सिंह लग्न और चन्द्रग्रहण के उपलक्ष्य में लोग गंगा स्नान, हरिनाम संकीर्तन आदि कर रहे थे। नवद्वीप के मायापुर में पिता जगन्नाथ एवं माता शची देवी के घर श्री चैतन्य अवतीर्ण हुए। उस समय शची माता की नौ सन्तानों में से एकमात्र पुत्र श्री विश्वरूप ही विद्यमान थे। अतः श्री चैतन्य के जन्म से उन्हें अत्यधिक हर्ष हुआ। 
माता ने शिशु का नाम रखा निमाई और निमाई के विद्वान नाना नीलाम्बर चक्रवर्ती ने विष्वम्भर नाम से उन्हें सुशोभित किया परन्तु स्वर्ण की भाँति उज्जवल पीत कान्ति होने के कारण समस्त नगरवासी इन्हें गौरसुन्दर, गौरांग, गौरहरि इत्यादि नामों से पुकारते थे। प्यार से निमाई भी बुलाया जाने लगा। कारण यह था कि इनका जन्म नीम के पेड़ के नीचे हुआ था। बचपन से ही निमाई की मुखाकृति सरल, सहज और आकर्शक थी। कैशोर्यावस्था तक निमाई न्याय और व्याकरण में पारंगत हो गये। 
श्री चेतन्य के अग्रज विश्वरूप कुछ ही समय में विद्वान हो गये थे। और इस असार संसार को नश्वर जान कर सोलह वर्ष की अवस्था में उन्होंने गृह त्याग कर दिया था। माता पिता के साथ घर पर चैतन्य ही अकेले रह गये थे। अधिक विद्वत्ता का परिणाम विश्वरूप का गृहत्याग माता-पिता देख चुके थे। अतः एक मात्र सहायक श्री चैतन्य का अध्ययन बन्द करा दिया। जिसके परिणाम स्वरूप चैतन्य अत्यधिक चंचल हो गये थे। इससे परेशान माता-पिता ने चैतन्य को पुनः अध्ययन आरम्भ करा दिया। कुछ समय पश्चात पिता का देहावसान हो गया और तब माता व घर की जिम्मेदारी इन्हीं पर आ पड़ी। अध्ययनरत श्री चैतनय का अल्पायु में ही श्री वल्लभ मिश्र की सुयोग्य कन्या लक्ष्मीप्रिया से विवाह सम्पन्न हुआ। चैतन्य ने कुछ दिन विद्यालय भी चलाया। इसके वाद पूर्वी बंगाल में श्री चैतन्य ने सर्वप्रथम हरिनाम संकीर्तन का प्रचार-प्रसार आरम्भ किया। इधर उनकी पत्नी लक्ष्मीप्रिया का सर्पदंश के कारण निधन हो गया। विधवा माता बेचारी अकेली ही एक के बाद एक कष्ट सहन कर रही थी। माता के आग्रह पर श्री चैतन्य का राजपंडि़त श्री सनातन की कन्या विष्णुप्रिया से पुनर्विवाह हुआ।
23 साल की उम्र में पिता का श्राद्ध करने जब निमाई गया पहुंचे तो ईश्वरपुरी नामक एक संत के सानिध्य में कृष्ण नाम का जाप करने लगे। नाम के साथ ही उन्होंने कृष्ण के भाव को भी जी लिया। केशव भारती से दीक्षा लेने के बाद मात्र 24 साल की उम्र में ही निमाई ने संन्यास ले लिया और चैतन्य देव हो गये। गौरांग के भक्तों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। इतना ही नहीं, तब के प्रसिद्ध संत नित्यानंद प्रभु और अद्वैताचार्य महाराज ने भी इनसे दीक्षा ले ली तो जैसे पूरा आर्यावर्त कृष्ण भक्ति में लीन हो गया। निमाई ने इनकी सहायता से अपने आंदोलन में ढोल, मृदंग, झाँझ और मजीरा आदि वाद्य यंत्र बजाकर व उच्च स्वर में नाच-गाकर हरि नाम संकीर्तन करना प्रारंभ किया।
संन्यास लेने के बाद जब गौरांग पहली बार जगन्नाथ मंदिर पहुंचे और भगवान की मूर्ति देखते ही भाव-विभोर होकर उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे। अचानक बेहोश हो गये। वहां मौजूद एक विद्वान सार्वभौम भट्टाचार्य ने चैतन्य को उठाया और अपने घर ले आये। शास्त्र-चर्चा छिड़ी तो गौरांग ने भक्ति का महत्त्व ज्ञान से कहीं ऊपर सिद्ध कर सार्वभौम को षड़भुजरूप का दर्शन करा दिया। सार्वभौम सीधे गौरांग के चरणों में गिर पड़े। बाद में सार्वभौम ने गौरांग की शत-श्लोकी स्तुति की जिसे आज चैतन्य शतक के नाम से पहचाना जाता है। 
अपनी उपासना विधि में निमाई ने 18 शब्दों का एक तारक-ब्रह्म-महामंत्र शामिल किया। 

‘‘हरे-कृष्ण, हरे-कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण, हरे-हरे । 
हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे’’।। 
उनका तर्क था कि कलियुग में जीवात्माओं के उद्धार के लिए केवल यही एक मंत्र है। दरअसल, निमाई जब पूजा करते थे तो ऐसा लगता था कि वे साक्षात ईश्वर की आराधना कर रहे हों। इसके वाद चैतन्य चैतन्य महाप्रभु बन चुके थे।
चैतन्य महाप्रभु इसके बाद दक्षिण के श्रीरंग क्षेत्र व सेतु बंध होते हुए उत्तर की ओर बढ़े और विजयादशमी के दिन वृंदावन के लिए निकले। अपार जनसमुदाय उनके साथ था। कहते हैं कि इनके हरिनाम धुन से रास्ते में जंगली जानवर तक उन्मत्त हो कर नृत्य करने लगे। कार्तिक पूर्णिमा को वे वृंदावन पहुंचे, जहां आज भी इस दिन गौरांग का आगमनोत्सव मनाया जाता है। गौरांग ने हरिद्वार, प्रयाग होते हुए काशी, हरिद्वार, शृगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु), द्वारिका, मथुरा तक पहुंच कर कृष्ण  भक्ति का डंका बजा दिया। आखिरी दौर में वे पुरी पहुंचे और महज 47 बरस की आयु में श्रीकृष्ण  के परम धाम की ओर चले गये।
चैतन्य और उनके भक्त भजन-कीर्तन में ऐसे लीन और भाव-विभोर हो जाते थे कि उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा बहने लगती थी। प्रेम, आस्था और रूदन का यह अलौकिक दृश्य हर किसी को स्तब्ध कर देता था। कृष्ण में समर्पण की इस भावनात्मक सम्बन्ध ने चैतन्य महाप्रभु की प्रतिष्ठा को और भी बड़ा दिया । उड़ीसा के सूर्यवंशी सम्राट गजपति महाराज प्रताप रुद्रदेव तो चैतन्य को अवतार तक मानकर उनके चरणों में गिर गये जबकि बंगाल के एक शासक का मंत्री रूपगोस्वामी तो अपना पद त्यागकर उनके शरणागत हो गया था। गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के आदि-आचार्य माने जाने वाले चैतन्य महाप्रभु ने अनेक ग्रंथों की रचना की, लेकिन आज आठ श्लोक वाले शिक्षाष्टक के सिवा कुछ नहीं है। शिक्षाष्टक में वे कहते हैं कि श्रीकृष्ण ही एकमात्र देव हैं। वे मूर्तिमान सौन्दर्य, प्रेमपरक हैं। उनकी तीन शक्तियाँ परम ब्रह्म, माया और विलास हैं। वे नारद की भक्ति से प्रभावित थे और उन्हीं की तरह कृष्ण-कृष्ण जपते थे। लेकिन गौरांग पर बहुत ग्रंथ लिखे गए, जिनमें प्रमुख है श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी का चैतन्य चरितामृत, श्रीवृंदावन दास ठाकुर का चैतन्य भागवत, लोचनदास ठाकुर का चैतन्य मंगल, चैतन्य चरितामृत, श्री चैतन्य भागवत, श्री चैतन्य मंगल, अमिय निमाई चरित और चैतन्य शतक आदि।
चैतन्य महाप्रभु ईश्वर को एक मानते है। उन्होंने नवद्वीप से अपने छह प्रमुख अनुयायियों को वृंदावन भेजकर वहां सप्त देवालयों की स्थापना करायी। उनके प्रमुख अनुयाइयों में गोपाल भट्ट गोस्वामी बहुत कम उम्र में ही उनसे जुड़ गये थे। रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी आदि उनके करीबी भक्त थे। इन लोगों ने ही वृंदावन में सप्त देवालयों की स्थापना की। मौजूदा समय में इन्हें गोविंददेव मंदिर, गोपीनाथ मंदिर, मदन मोहन मंदिर, राधा रमण मंदिर, राधा दामोदर मंदिर,राधा श्यामसुंदर मंदिर और गोकुलानंद मंदिर आदि कहा जाता है। इन्हें सप्तदेवालय के नाम से ही पहचाना जाता है।
चैतन्य मत का मूल आधार प्रेम और लीला है। गोलोक में श्रीकृष्ण की लीला शाश्वत है। प्रेम उनकी मूल शक्ति है और वही आनन्द का कारण भी है। यही प्रेम भक्त के चित्त में स्थित होकर महाभाव बन जाता है। यह महाभाव ही राधा की उपासना के साथ ही कृष्ण की प्राप्ति का मार्ग भी है।
सुनील शर्मा मथुरा। 09319225654

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

प्रभुपाद जी का इस्कान भी विवादों के घेरे में।


प्रभुपाद जी का इस्कान भी विवादों के घेरे में। 

एक भक्त ने यौनाचार का लगाया गम्भीर आरोप।
दूसरा भक्त वृन्दावन इस्कान के सामने होमो सैक्सुअल के खिलाफ धरने पर बैठा।
इस्कॉन संस्थान के अधिकारी परेशान, अधिकारियों के साथ बैठकों का दौर जारी।
-सुनील शर्मा
मथुरा। इस्कान के संस्थापक श्रील एसी भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी ने जिन उद्देश्‍य की पूर्ति के लिए इस्कान की आधार शिला रखी थी उन उद्देश्‍यों का पतन हो रहा है। भारतीय संस्कृति पर गोरी चमडी वालों की संस्कृति हावी हो रही है। इस्कान के अनुयायी और व्यवस्थापकों पर उडीसा व पंश्चिम बंगाल के भोले-भाले युवक-युवतियों को इस्कान में प
इस्कॉन की प्रतिष्ठा और उसके स्वरूप की आड़ में प्रबंधतंत्र द्वारा कैसे-कैसे कुकृत्‍य कर रहा है। इसका प्रमाण कई दिनों से वृंदावन इस्‍कॉन के बाहर चल रहे अनशन और 07 मई 2012 को नई दिल्‍ली की अमर कॉलोनी थाने में दर्ज अप्राकृतिक यौनाचार की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है।
पिछले करीब 6 वर्षों से अमर कॉलोनी स्थित इस्कॉन मंदिर के ब्रह्मचारी आश्रम में रहकर महाराज गोपालकृष्‍ण गोस्‍वामी की सेवा करने वाले अच्‍युत दास उर्फ अजीत कुमार द्वारा आईपीसी की धारा 377 तथा 511 के तहत दर्ज कराई गई एफआई आर के मुताबिक 15 फरवरी 2012 की रात करीब 11 बजे महाराज गोपालकृष्‍ण व उनके सेवक दयानिधि महाराज ने अच्‍युत दास के साथ आश्रम में ही तब अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने की कोशिश की, जब वह सो रहा था। 
अच्युत दास के अनुसार उसके द्वारा शोर मचा देने के कारण गोपालकृष्‍ण व दयानिधि ने क्षमा मांगते हुए माफ कर देने का अनुरोध किया और भरोसा दिलाया कि फिर कभी ऐसा अपराध नहीं करेंगे।
अच्‍युत दास का कहना है कि उसके द्वारा माफ कर देने के बाद 08 अप्रैल 2012 की रात एक बजे दयानिधि महाराज ने उसके साथ एक साउण्‍ड प्रूफ कमरे में दुराचार किया और कहा कि गोपालकृष्‍ण महाराज के रहते उसका कुछ नहीं बिगड़ सकता।
अच्‍युत दास ने सुबह मौका मिलने पर अपने साथ किये गये कुकृत्‍य की शिकायत इस्‍कॉन यूथ फॉर्म के डायरेक्‍टर सुंदर गोपाल दास तथा मैनेजर हृदय दास से की लेकिन उन्‍होंने कोई संज्ञान नहीं लिया।
गोपालकृष्‍ण महाराज को भी पूरी घटना से अवगत कराया गया पर वह चुप्‍पी साधे रहे। इसके बाद अच्‍युत दास ने पूरी घटना की लिखित जानकारी संस्‍था की गवर्निंग बॉडी को दी जिसमें 20 लोगों की टीम है।
गवर्निंग बॉडी द्वारा अच्‍युत दास की कोई मदद तो नहीं की गई अलबत्‍ता बॉडी के एक सदस्‍य मोहन रूपा दास ने अच्‍युत दास को फोन करके धमकी देते हुए कहा कि तुम जैसे बहुत लोग आये और चले गये, तुमने गोपाल महाराज की शिकायत करके बहुत बड़ी भूल की है जिसका खामियाजा तुम्‍हें भुगतना होगा।
अच्‍युत दास द्वारा दी गई इस आशय की तहरीर पर अमर कॉलोनी थाना पुलिस ने गोपालकृष्‍ण महाराज, दयानिधि महाराज, मोहन रूपा दास तथा हृदय दास के खिलाफ अपराध पंजीकृत कर लिया जिसकी विवेचना एस आई के. पी. शाह द्वारा की जा रही है।
पीडि़त अच्‍युत दास द्वारा इसके बाद 14 मई 2012 को दिल्‍ली के पुलिस आयुक्‍त को एक प्रार्थना पत्र के जरिये अवगत कराया गया कि जांच अधिकारी के. पी. शाह तथा सिपाही सुशील कुमार उसे 06 मई 2012 के दिन गोवर्घन (मथुरा) से यह कहकर दिल्‍ली ले गये कि मेडीकल करवाना है। दिल्‍ली ले जाकर बताया कि देर हो जाने के कारण मेडीकल कल होगा।
अच्‍युत दास ने पुलिस आयुक्‍त को लिखा है कि पूरी रात वह अमर कॉलोनी थाने पर रहा जहां सुबह करीब 09 बजे ब्रजेन्‍द्र नंदन, अद्वैतकृष्‍ण तथा आदियोगी आये और बात करने की कहकर थाने से बाहर निकाल लिया। वहां पहले से खड़ी गाड़ी में धक्‍का देकर बैठा दिया और मंदिर लेकर आ गये।
मंदिर में गोपालकृष्‍ण महाराज ने मु-हजयसे कहा कि सारा मामला वापस ले लो तो मैं तुम्‍हें 50 लाख रुपये दे दूंगा।
मेरे द्वारा रुपया लेने पर सहमत न होने के बाद राघव पण्‍िडत दास तथा अद्वैतकृष्‍ण ने जान से मारने की धमकी दी।
अच्‍युत दास ने दिल्‍ली के पुलिस आयुक्‍त को लिखा है कि इन लोगों का पूरा गिरोह है जिसमें भीमा दास व दयाराम दास भी शामिल हैं। इनका कहना है कि दिल्‍ली पुलिस और बड़े-बड़े नेता हमारे साथ हैं, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
अच्‍युत दास का कहना है कि उसी दिन थाना पुलिस मंदिर आई और ब्रजेन्‍द्र नंदन व अद्वैतकृष्‍ण सहित मुजये भी अपने साथ ले गई। अगले दिन उन्‍हें छोड़ दिया।
सूचना पाकर पहुंचे मेरे वकील भी मु-हजये अपने साथ वृंदावन ले आये जहां मैं उनके पास रह रहा हूं। अच्‍युत दास का कहना है कि गोपालकृष्‍ण व उनका गिरोह वृंदावन में भी उसका पीछा कर रहा है और कभी भी उसकी जान जा सकती है।
दूसरी ओर इस्‍कॉन के ही एक अन्‍य भक्‍त नवनीत दास 24 नवंबर से इस्‍कॉन मंदिर वृंदावन के सामने अनशन पर बैठे हैं। नवनीत दास ने मथुरा के जिलाधिकारी को प्रेषित पत्र में लिखा है कि मंदिर के प्रबंधतंत्र को पिछले कुछ समय से असामाजिक तत्‍वों ने कब्‍जा रखा है और यह लोग हर तरह के अनैतिक कार्यों को अंजाम दे रहे हैं।
मंदिर में दुराचार करके उसकी पवित्रता को नष्‍ट किया जा रहा है और दान के पैसों का दुरुपयोग लोगों का मुंह बंद करने में किया जा रहा है। नवनीत दास ने डीएम मथुरा को लिखा है कि जब उसने प्रबंधतंत्र के कारनामों पर उंगली उठाई तो उसके साथ मारपीट करके बाहर निकाल दिया गया और जान से मारने की धमकी दी। नवनीत दास ने डीएम को अवगत कराया है कि उसकी शिकायत पर संज्ञान लिये बिना वह अपना अनशन नहीं तोड़ेंगे, चाहे उनकी जान चली जाए।
नवनीत दास की मानें तो इस्‍कॉन का यह हाल उसके प्रबंधतंत्र ने केवल दिल्‍ली या वृंदावन में नहीं कर रखा अपितु विदेशों में भी कर रखा है।
इस्‍कॉन के गुरुकुलों में अध्‍ययनरत छात्रों के साथ पहले तो जबरन अप्राकृतिक यौन सम्‍बन्‍ध स्‍थापित करना और फिर उनका मुंह बंद कराने के लिए मंदिर में आने वाले दान के पैसों का इस्‍तेमाल करना आम बात है।
अप्राकृतिक यौनाचार के शिकार गुरुकुल न्‍यूयॉर्क के कुछ छात्रों को वहां की अदालत द्वारा मुआवजा देने का आदेश भी पूर्व में दिया जा चुका है जिसकी भरपायी दान के पैसों से मासिक किश्‍त के रूप में की जा रही है।
नवनीत दास के अनुसार दिल्‍ली और वृंदावन के अतिरिक्‍त मुम्‍बई व कोलकाता के इस्‍कॉन मंदिरों से भी ऐसी शिकायतें आती रही हैं लेकिन प्रबंधतंत्र अपने प्रभाव व पैसों के बल पर सबको दबाने में सफल रहा है। अच्‍युत दास व नवनीत दास के आरोपों में कितना दम है, यह भले ही फिलहाल साबित न हो पाये पर इसमें कोई दो राय नहीं  कि स्‍वामी प्रभुपाद के इस्‍कॉन में सब-ंउचयकुछ ठीक-ंउचयठाक नहीं चल रहा।
भारतीय व हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोग अपने बच्चों को इस्कान में मात्र आध्यात्मिक, सांस्कृतिक धार्मिक सेवाभाव के लिए भेजते हैं। कितना पैसा यहां के गुरूकुल में देकर अपने बच्चों के अन्दर भारतीय संस्कार डालने के यहां भेजते हैं जबकि इस्कान के अन्दर क्या चल रहा है इसका उन्हे आभास तक नहीं होता है। इसी के चलते वृन्दावन स्थित इस्कार मंदिर में  करीब २० वर्षों सें भगवान श्रीकृष्ण की साधना में लीन नवनीत दास ने यहां चल रहे यौन शोषण के खिलाफ बिगुल फुक दिया है। उन्होंने इस्कॉन संस्था के प्रबन्ध समिति के सदस्यों की संद्धिता का विरोध किया तो नवनीत दास को इस्कॉन मंदिर के प्रबंधक ने जबरन मंदिर से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इस मंदिर में क्या-ंउचयक्या नहीं होता इसका खुलासा नवनीत दास ने उत्तर प्रदेश सरकार व वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र के माध्यम से मय साक्ष्य के किये जाने की बात कही है।  इस्कॉन मंदिर में देह व्यापार, वैश्यावृति, गांजा, हीरोईन आदि नशीले पदार्थों की बिक्री व खरीदारी जोरों से हो रही है। तथा विदेशी भक्तों का बीजा अवधि भी समाप्त हो चुकने के बाद बंगलादेशी व अन्य विदेशीयों की शरण स्थली इस्कान संस्था हो गयी है अवैध रूप से विदेशी आराम से इस्कॉन मंदिर में शरण लिए हुए हैं, इन्टैलीजेन्स यूनिट बेखबर है।
नवनीत दास ने जिलाधिकारी को लिखे पत्र में दुष्कर्म व दान की राशि के दुरूप्रयोग का हवाला दिया है कि देश विदेश में स्थापित गुरूकुलों में वहा अध्ययनरत छात्रों के साथ विदेशी अध्यापकों द्वारा समलैंगिक दुराचार किया जा रहा है। इस्कॉन को न्यूयार्क न्यायालय ने दण्ड़ स्वरूप पीडि़त छात्रों को मुआवजा दिलाया। इन विदेशी षड़यन्त्रकारियों द्वारा किये गये अप्राकृतिक यौनाचार की दण्ड़ राशि सभी भारतीय मंदिरों से प्रति मास किश्त के रूप में अदा की जाती है जो कि करोड़ों में है। जरा सोचो दिनभर कड़ी मेहनत करके पैसा कमाने वाले भारतीय अपनी श्रृद्धा भक्ति स्वरूप जो दान इन मंदिरों में देते हैं वह पैसा अवैध यौनाचार की किश्त में चला जाता है।
यौनाचार व समलैगिकता का आरोप लगाते हुए पत्र में लिखा है कि भारतीय शिक्षित युवा पी-सजय़ी को बड़े-ंउचयबड़े शिक्षा संस्थानों में अपने प्रचारक भेजकर युवाओं का मंदिरों में आजीवन ब्रह्मचारी बनाकर उनमें समलैंगिक गु्रप बनाये जा रहे है। कुछ भारतीयों की गोरी चमड़ी में विशेष आस्था उत्पन्न होती है। ऐसे ही लोगों का उपयोग करके इन्होंने समलैंगिक दुराचार का षड़यन्त्र उन शिक्षित युवा भारतीय ब्रह्मचारियों में भी फैलाया जिसके फलस्वरूप प्रायः बडे मंदिरों में समलैंगिकों के गुट प्रकाश में आये। जब भी जो भी मामला प्रकाश में आया उसे इन्होंने अपने प्रभाव व पैसे से बड़ी आसानी से दबा दिया। विगत दो वर्षों में चैपाटी मुम्बई, मायापुर कोलकाता, पंजाबी बाग, ईस्ट अॉफ कैलाश तथा वृंदावन स्थित मंदिरों में रह रहे ब्रह्मचारियों के मामले प्रकाश में आये हैं। इस सन्दर्भ में जब कोई इनका विरोध करता है तो संस्था का प्रबंध तन्त्र पीडि़त व प्रार्थी के विरूद्ध ही कार्यवाही करता है। अगर मामला ब-सजय़ता है तो उसे पैसे से दबा दिया जाता है। भगवान की सेवा तथा सामाजिक कार्यों के लिये आने वाले दान को ये अपने कुकृत्यों को दबाने के लिये दुरूपयोग करते हैं, श्रीला प्रभुपाद ने कहा था कि जहां हमारे मंदिर है वहां एक किलो मीटर तक कोई भूखा नहीं रहे परन्तु ये तो अपने आजीवन सदस्यों को भी भोजन बिना पैसे के नहीं कराते हैं मंदिरों में दातव्य संस्था से सम्बन्धित कोई भी सेवा समाज हित में व जन हित में संचालित नहीं है। उल्टा मंदिरों को अच्छे व्यापारिक प्रतिष्ठानों का रूप दे दिया है। वृंदावन में भी हरिविजय दास, वैष्णदास, माखनचोर दास, रामहरिदास, पंचतत्वदास, रमाकान्तदास आदि इसी दल के सदस्य हैं अन्य भी हो सकते हैं परन्तु इनमें से रामहरि, रमाकान्त हरिविजय आदि के मामले काफी प्रकाश में आ चुके हैं। नवनीत दास ने आरोप लगाया है कि वृन्दावन इस्कान प्रेसीड़ेट पंचगौडा दास, बाइस प्रेसीड़ेंट वैष्ण दास, जीएम जर्नादन दास व गैस्ट हाउस मैनेजर गणपति दास महाभष्ट्र व सैक्सुअल व्यक्ति है इनमें से किसी पर यौनाचार तो किसी भी भष्ट्राचार के आरोप पूर्व में लग चुके है और आज भी लगते रहे हैं। नवीनत दास को इस्कान प्रबंधन द्वारा धन प्रलोभन व न मामने पर धमकी मिल रही है। 

शनिवार, 22 सितंबर 2012

आधुनिक तकनीक से बनी अक्षयपात्र की रसोई का उदघाटन

मथुरा, मा0 मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने वृन्दावन में आधुनिक तकनीक से बनी अक्षयपात्र की रसोई का उदघाटन एवं लोकार्पण कर जनसभा को सम्बोधित करते हुए मथुरा-वृन्दावन-गोवर्धन में 50 करोड़ रूपये से अधिक के विभिन्न विकास एवं पर्यटन कार्यों को करने की घोषणा करते हुए कहा कि प्रदेश में औद्योगिक स्थापना एवं आई0टी0 सेक्टर को बढ़ाने का माहौल बनाया जा रहा है। 
 श्री अखिलेश यादव ने अपने सम्बोधन में कहा कि मथुरा को पर्यटन की दृष्टि से मेगाडेस्टीनेशन में 30 करोड़ रूपये से यहाॅ के घाटों का सुन्दरीकरण , पर्यटन विकास, कुण्डों-सरोवरों का जीर्णोद्धार आदि कार्य कराये जायेगे जो यहॅा आने वाले पर्यटकों के लिये आकर्षण का केन्द्र हांेगे। बरसात के बाद क्षतिग्रस्त हुई सड़कों को मरम्मत कराया जायेगा जिस पर 8 करोड़ रू0 व्यय होगे। बरसाना-कोसीकलाॅ मार्ग को चैड़ीकरण व सुदृड़ीकरण पर 4 करोड़ रू0 व्यय किये जायेगे। गोवर्धन कच्ची परिक्रमा मार्ग का चैड़ीकरण व सौन्दर्यीकरण के कार्यों पर एक करोड़ रुपये व्यय ं किये जायेगे। 
 मा0 मुख्यमंत्री जी ने घोषणा की कि मथुरा में यमुना नदी पर बना पुल जीर्णषीर्ण हो जाने से यमुना पर नया पुल बनाया जायेगा। उन्होंने कहा कि मथुरा,वृन्दावन, गोवर्धन में देश ही नहीं विदेशों से लोग आते है, यहॅा साफ सफाई अच्छी हो इसके लिये आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था की जायेगी। 
 श्री अखिलेश जी ने कहा कि मथुरा में विकास के भरपूर कार्य किये जायेगे। सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के सम्बन्ध में मा0 मुख्यमंत्री जी ने कहा कि कन्या विद्या धन योजना एवं बेरोजगारी भत्ता का वितरण शुरू हो गया है। कन्या विद्या धन योजना से बालिका शिक्षा का विकास होगा। योजनाओं के लिये पर्याप्त धनराशि की व्यवस्था बजट में प्राविधानित कर दी गई है। मुस्लिम समुदाय की लड़कियों की शिक्षा में बढ़ावा के लिये सहायता राशि की व्यवस्था की गई है। देश के पहले प्रदेश उत्तर प्रदेश में कक्षा 10 व 12वी पास छात्रों को कम्प्यूटर टेबलेट व लैपटाॅप दिये जाने का कार्य किया जा रहा है। यह  कम्प्यूटर व लैपटाॅप हिन्दी ,अंगे्रजी व उर्दू में कार्य करेगें इससे किसी भी ग्रामीण छात्र को कोई दिक्कत नहीं होगी। बड़े पैमाने पर कम्प्यूटर लैपटाॅप खरीदने का कार्य हो रहा है। ंमा0 मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने कहा कि प्रदेश सरकार ने किसानों पर लगे झुठे मुकद्दमें वापस लेने का कार्य शुरू कर दिया। प्रदेश में विद्युत उत्पादकता बढ़ाने का कार्य सरकार करेगी। विद्युत आपूर्ति बढ़ाने के इन्तजाम किये जा रहे है। उन्होंने कहा कि मथुरा, भगवान श्रीकृष्ण व श्रीकृष्ण की लीलायें विश्व विख्यात है। यहॅा के विकास को भरपूर सहयोग दिया जायेगा। इस अवसर पर स्थानीय पत्रकारों द्वारा पे्रस क्लव की माॅग पर मा0 मुख्यमंत्री जी ने कहा कि इसे दिखवाकर पे्रस क्लव की व्यवस्था करायी जायेगी। 
 मा0 मुख्यमंत्री जी ने अक्षयपात्र की माॅडर्न रसोई के वृन्दावन में स्थापना पर अक्षयपात्र संस्था को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि इससे छात्रों को स्वच्छ, पौष्टिक व समय पर खाना उपलब्ध होता है। ऐसी संस्थाओं को प्रदेश में अन्य स्थानों पर कार्य करने के लिये सरकार सहयोग करेगी ताकि अधिक से अधिक स्कूली बच्चों को पौ’िटक

खाना मिले। लोकार्पित माॅडर्न रसोई से जनपद मथुरा के 1633 स्कूलों में एक लाख 65 हजार बच्चों को प्रतिदिन मिड-डे-मील वितरित किया जा रहा है। इस रसोई में 40 हजार रोटी प्रति घंटा बनाने की आॅटोमेटिक मशीन है। आॅटोमेटिक व्यवस्था से सब्जी की सफाई, कटाई व बनाने का कार्य होता हैं। खाना स्कूलों में ले जाने के लिये 70 वाहन द्वारा भेजा जाता हैं। इस अवसर पर मा0 मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने अक्षयपात्र द्वारा लागू नईं अक्षय थाली योजना में थाली वितरित कर योजना का शुभारम्भ किया। 
 मथुरा भ्रमण के दौरान मा0 मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने फोगला आश्रम में आयोजित स्वामी हरिदास संगीत एवं नृत्य समारोह का दीप प्रज्वलित कर उदघाटन किया। अपने सम्बोधन में श्री यादव ने कहा कि यमुना की सफाई हम सभी के प्रयासों से सम्भव हो सकती है और इस कार्य में समाजिक संगठनों, संस्थाओं तथा जनसहभागिता की बहुत बड़ी आवश्यकता हैं, शासन स्तर से जो भी सहयोग अपेक्षित होगा प्रदान किया जायेगा।
 अपने उदगारों में उन्होंने कहा कि संगीत एवं नृत्य जन जीवन की प्राणदायिनी है जो सदियों से हमें भाई-चारे और मेलमिलाप से मिलजुल कर रहने की पे्ररणा देता है। मा0 मुख्यमंत्री जी ने कहा कि ब्रज भूमि को मैं बारंबार नमन करता हूॅ इस भूमि से जो संत-महात्मा एवं कलाकार हुए है उन्होंने हमेशा ही जन कल्याण के उपदेश दिये एवं कार्य किये है ऐसी ब्रज भूमि के लोगों के कल्याण एवं उत्थान तथा प्रोत्साहन के लिये जो भी जरूरी मदद होगी उन्हें उपलब्ध करायी जायेगी। 
 मा0 मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी ने वृन्दावन भ्रमण के दौरान ठा0 बाॅकेबिहारी जी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। भ्रमण कार्यक्रमों में प्रदेश के मा0 परिवहन मंत्री श्री राजा अरिदमन सिंह सहित विभिन्न जन प्रतिनिधिगण, इनफोसिस, मनीपाल एकेडमी के उच्चाधिकारी व अक्षयपात्र फाउन्डेशन के प्रतिनिधि, स्वामी हरिदास जयन्ती समारोह के प्रतिनिधिगण, जिलाधिकारी श्री समीर वर्मा, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्रीमती एन0 पदमजा सहित भारी संख्या में गणमान्य नागरिक व जनसामान्य उपस्थित थे।

शुक्रवार, 11 मई 2012

शस्त्र लाईसेन्स पाने वाले ठगे से रह गये। पत्रावलियां आखिर गयीं कहां।

जिलाधिकारी कैम्प कार्यालय और शस्त्र अनुभाग के बीच से फाइलें रहस्यमय ढं़ग से गायब

शस्त्र लाईसेन्स पाने वाले ठगे से रह गये। पत्रावलियां आखिर गयीं कहां।

सुनील शर्मा
मथुरा। जिलाधिकारी कार्यालय और शस्त्र अनुभाग के बीच से पूर्व जिलाधिकारी के जाते जाते पचास से अधिक स्वीकृत शस्त्र पत्रावलियों में से प्रशासनिक रिपोर्ट रहस्यमय ढं़ग से गायब होने से शस्त्र लाईसेंस प्राप्त करने वालों में आक्रोश होने के चलते यह मामला अब और गहराता जा रहा है। 

पूर्व जिलाधिकारी एन जी रवि कुमार का स्थानान्तरण गोरखपुर हो जाने के वाद यह मामला प्रकाश में आ सका जब लोग अपनी अपनी फाइलों की स्वीकृति देखकर शस्त्र लाईसेन्स लेने पहुँचे। लाईसेन्स की चाह रखने वाले लोगों के पेरों तले जमीन खिसक गई जब उन्हें पता चला कि उनकी फाइलों में से प्रशासनिक रिर्पोट रहस्यमय ढं़ग से गायव हो गयीं हैं। पूर्व जिलाधिकारी के जाने के वाद यह मामला वर्तमान जिलाधिकारी के लिये सिर का दर्द बन सकता है। 

राज्य में हुए विधान सभा चुनावों की घोषणा से पूर्व शस्त्र अनुभाग में लगभग तीन सौ शस्त्र पत्रावलियां विचाराधीन थी। जो तत्कालीन जिलाधिकारी एन जी रवि कुमार के आवास स्थित कैम्प कार्यालय तक सारी औपचारिकताऐं पूरी करती हुई पहुंच गंई। बताया जाता है कि उस समय बसपा के कुछ प्रतिष्ठित नेताओं के नजदीकी और सिफारिसियों की उसमें पचास से अधिक ऐसी पत्रावलियां थी जो बसपा नेताओं के दवाव में जिलाधिकारी कैम्प कार्यालय से पत्रावलियां स्वीकृत हो कर कलैक्ट्रेट स्थित शस्त्र अनुभाग कार्यालय में आ गयी थी। पत्रावलियां स्वीकृत होने की जानकारी होने पर शस््त्र लाईसेंस के इच्छुक लोगों ने पचास हजार से साठ हजार तक की एन0 एस0 सी0, दो-दो हजार के स्टम्प जैसी अन्य औपचारिक प्रक्रियाओं पर लगभग कुल 70-75 हजार रूपया प्रति आवेदन में लगा दिये। आवेदकों को उम्मीद थी कि आचार संहिता हटते ही वे हथियार रखने वाले प्रभावशाली व्यक्तियों में सुमार हो जायेगें। उनकी हसरत पूरी न हो सकी जब उन्हें पता चला कि जब जिलाधिकारी एन जी रवि कुमार ने अपने कैम्प कार्यालय पर पुनः इन पत्रावलियों को वापस मांगवाया और इसी बीच जब यह पत्रावलियां पुनः शस्त्र अनुभाग कार्यालय पहुंची तो इनमें से प्रशासनिक स्वीकृति से जुड़े आदेश पत्र गायब पाये गये। जिसके कारण तमाम औपचारिकताओं के बावजूद आवेदकों कों शस्त्र लाईसेंस निर्गत नहीं किये जा सके। अब यह सवाल उठता है आखिर जिलाधिकारी के कैम्प कार्यालय और शस्त्र अनुभाग के बीच किसने इतनी हिम्मत दिखाई कि प्रशासनिक पत्रावलियां हीं गायव कर दीं। इसके पीछे की मंशा आखिर क्या थी और उसने ऐसा क्यों किया। अगर आवेदकों के विचाराधीन पत्रावलियों में कोई कमी थी तो प्रशासन ने इन आवेदकों की एनएससी, स्टाम्प आदि औपचारिकताऐं क्यों और किस आधार पर पूरी करवा ली। यह भी बताया जा रहा है कि शस्त्र अनुभाग सभी औपचारिक कार्यवाही पूरी कर लेने के बाद ही अन्तिम स्वीकृति के लिये पत्रावलियों को जिलाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करता है जबकि इसके बीच पत्रावलियों पर जिलाधिकारी के अधीनस्थों की भी स्वीकृति होती है उसके वाद ही जिलाधिकारी अपनी चिडि़या बैठाते हैं तब कहीं जाकर आवेदक को शस्त्र रखने का लाईसेन्स मिलता है। शस्त्र लाईसेन्स पाने के लिए आवेदक को कहा कहा क्या क्या नहीं करना पड़ता है यह किसी से छुपा नही है। फिर भी यदि लाइसेन्स नहीं मिले तो आवेदकों का आक्रोश जायज है। ऐसे शस्त्र आवेदक मौजूदा जिलाधिकारी के समक्ष एक समस्या बने हुए है। अब देखना है कि नये जिलाधिकारी इस समस्या का क्या हल निकालते हैं।

सुनील शर्मा मथुरा

09319225654