एक समय था, जब वृन्दावन में आयोजित होने वाला स्वामी हरिदास संगीत एवं नृत्य महोत्सव देश-विदेश के प्रसिद्ध संगीतज्ञों और शास्त्रीय नर्तकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र हुआ करता था। मथुरा से भी बड़ी संख्या में संगीत एवं कला प्रेमी इस आयोजन में भाग लेने वृन्दावन पहुंचते थे।
इस परंपरा की शुरुआत बांके बिहारी मंदिर के सेवायतों से जुड़ी रही। बाद में मथुरा के श्री ए.के. जैन ने मथुरा में भी इस आयोजन को आयोजित कराया। बांके बिहारी मंदिर के सेवायत श्री गोपाल गोस्वामी ने वर्षों तक इस महोत्सव का आयोजन कर इसे एक विशिष्ट पहचान दिलाई। वर्ष 2002 से बांके बिहारी मंदिर के सेवायत श्री गोपी गोस्वामी बड़े स्तर पर इस परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं।
इस समारोह में देश के अनेक दिग्गज कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। इनमें पं. रविशंकर, उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ, पं. शिवकुमार शर्मा, उमा शर्मा, उस्ताद अमजद अली खाँ, पं. बिरजू महाराज सहित अनेक महान कलाकारों के नाम उल्लेखनीय हैं।
इसी गौरवशाली परंपरा में महान कथक नर्तक पं. गोपी कृष्ण का आगमन भी एक यादगार प्रसंग रहा। लगभग 1979 के आसपास वे वृन्दावन के स्वामी हरिदास समारोह में प्रस्तुति देने आए थे। उसी दौर में 1979 में दिल्ली में आयोजित स्वामी हरिदास पंचशती समारोह में भी गोपी कृष्ण की प्रस्तुति दर्ज है, जिसमें उनके साथ पं. रविशंकर, उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ, पं. जसराज, सितारा देवी और उमा शर्मा जैसे महान कलाकारों के नाम शामिल थे। सितारा देवी उनकी मौसी थीं।
मेरी यह स्मृति इसलिए भी विशेष है कि उस समय मैं समाचार-पत्रों के लिए फोटोग्राफी किया करता था और स्वयं इस आयोजन में उपस्थित था। महान कथक सम्राट पं. गोपी कृष्ण जी के साथ लिया गया मेरा यह फोटो आज उस दौर की एक जीवंत स्मृति के रूप में मेरे पास सुरक्षित है।
गोपी कृष्ण जी का जन्म 22 अगस्त 1935 को हुआ था और 18 फरवरी 1994 को उनका निधन हुआ। वे महान भारतीय कथक नर्तक, अभिनेता और कोरियोग्राफर थे। उन्होंने भरतनाट्यम का भी अध्ययन किया था। मात्र 17 वर्ष की आयु में, वर्ष 1952 में, उन्हें हिन्दी फिल्म जगत में नृत्य निर्देशन का अवसर मिला और वे उस समय के सबसे कम उम्र के कोरियोग्राफरों में शामिल हुए।
आज जब वृन्दावन की सांस्कृतिक विरासत की चर्चा होती है, तब स्वामी हरिदास संगीत एवं नृत्य महोत्सव की ये स्मृतियां ब्रज की उस समृद्ध सांगीतिक परंपरा की याद दिलाती हैं, जब देश के शीर्ष कलाकार वृन्दावन आकर अपनी कला से इस पावन भूमि को गौरवान्वित करते थे।
यह केवल एक समारोह की स्मृति नहीं, बल्कि वृन्दावन की सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत अध्याय है।
— सुनील शर्मा

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