बुधवार, 29 जनवरी 2020

ब्रजभूमि में मसजिदों के लिए हिन्दुओं का योगदान

हिन्दुओं की उदारता या घोर उदासीनता
मथुरा की एक मसजिद पहचान भी और विवाद से परे शान भी
सुनील शर्मा, मथुरा
मथुरा, ।  ब्रज क्षेत्र में यों तो अब सैकड़ों मसजिदें और कई गिरजाघर होंगे किन्तु एतिहासिकता की दृष्टि से इन मसजिदों का भी एक इतिहास है जो हिन्दुओं की उदारता या यों कहें कि घोर उदासीनता को भी प्रकट करता है। मथुरा में एतिहासिक दृष्टि से दो ही प्राचीन मसजिदें हैं। जो कि प्राचीन भी हैं तथा विशाल भी हैं। एक तो केशवदेव जी के मंदिर को तोड़कर औरंगजेब द्वारा बनवायी गयी और दूसरी मसजिद चौक बाजार में अब्दुलनवी खाँ ने बनवायी।

यह मसजिद सन् 1662 ईस्वीं में बनी बतलायी जाती है। इस मसजिद के वारे में बताया जाता है कि जहां यह मसजिद है वहाँ पहले बस्ती हुआ करती थी, कुछ कसाइयों की झौपड़िया भी यहाँ थीं। अब्दुलनवी खाँ ने जो कि एक नवमुस्लिम फकीर थे, उन्होंने मुसलमानों को समझा दिया कि देखो, मथुरा में तुम्हारी एक मसजिद बन जायेगी और हिन्दुओं को यह कह कर समझाकर राजी कर लिया कि देखो, यह मसजिद बनने से यहाँ से कसाई हट जायँगे और यह रहेगी भी मथुरा के बाहर। इस पर हिन्दु और वहां रह रहे मुसलमान मान गये और इस प्रकार इस मसजिद को नवी खाँ ने बनवा दिया और फिर इसमें चार ब्राह्मणों को घण्टा बजाने के लिये नियुक्त कर दिया। इन घण्टा बजाने वाले ब्राह्मणों में से एक ब्राह्मण का वंश अब तक मथुरा में विद्यमान रहा है और वह घण्टापाँडे़ के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। मसजिद के पास दुकानें बनवायी जिसमें आठ दुकानों का किराया उन चार ब्राह्मणों को आजीविका चलाने की व्यवस्था नवी खाँ ने कर दी। कुछ ब्राह्मण वहाँ दुर्गापाठ, विष्णुसहस्त्रनाम तथा गोपालसहस्त्रनाम का पाठ किया करते थे, उन्हें भी एक दुकान सौंप दी गयी। इस प्रकार से मसजिद बनकर भी इस पर अधिकार हिन्दुओं का ही रहा। एक मुल्ला भी वहाँ रहता था, पर उसे भी हिन्दू ही नियुक्त किया करते थे। पर इधर कुछ समय पश्चात हिन्दुओं ने मूर्खतावश अपना अधिकार इस पर से छोड़ दिया। अपनी दुकानें मुसलमानों को बेच दीं, और तब से मसजिद सच्ची मसजिद का रूप ले सकी।
कुछ समय के पश्चात मथुरा में एक बार पेशवा की सवारी आयी थी। उन्हें यहाँ मसजिद देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ और गुस्सा भी आया उन्होंने तुरन्त इसे तोड़ देने का हुक्म दे दिया, पर हिन्दुओं ने ही पेशव से खुशामद करके इसे टूटने से बचा लिया था, जो आज भी मथुरा के अब के पुराने शहर के बीचों बीच में स्थित है।

इस मसजिद के पास से होकर एक रास्ता स्टेशन की ओर जाता है एक रास्ता यमुना किनारे तथा प्रसिद्ध द्वारकाधीश मंदिर की ओर जाता है बाकी दो रास्तों में से एक शाही ईदगाह व श्रीकृष्ण जन्मस्थान की तरफ जाता है तो दूसरा रास्ता वृन्दावन के लिए जाता है। आज भी इस मसजिद के सामने एक सब्जी बाजार लगता है तथा मसजिद के नीचे दो तरफ सर्राफा बाजार व कपड़े आदि की दुकाने हैं। बडे़ आश्चर्य की बात है कि मसजिद के नीचे की तमाम सभी दुकाने हिन्दुओं की हैं और सब्जी की दुकाने मसजिद के सामने मुसलमानों की हैं दोनों समुदायों का मेलजोल भाईचारा देखने लायक है यह एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं तथा हर त्योहार में ईद हो या होली आपस में गले मिल कर बधाई दे कर मनाते हैं और आपस में मिलजुल कर रहते हैं। यह मसजिद मथुरा की एक पहचान भी है और विवाद से परे एक शान भी है।

सुनील शर्मा, मथुरा

सोमवार, 28 अक्टूबर 2019

परिक्रमा के बहाने 13 हजार लोगों की जान जाखिम में डालने की जिम्मेदारी किसकी

-दो निर्दोष लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन ?
-इतने बड़े आयोजनों पर लापरबाही करने से कैसे बच सकता है प्रशासन
-आयोजकों ने क्या कोई अनुमति ली थी, आपदा से निपटने के लिए कितने सतर्क थे।
मथुरा। अब छोटे-छोटे आयोजन के लिए जिला प्रशासन की अनुमति आवश्यक है फिर 13 हजार लोगों को परिक्रमा कराने के बहाने यमुना मे बीच से होकर जाने की जानकारी जिला प्रशासन को क्यो नहीं हो पाई वो भी एक नही दो प्रदेशों की सरकार ने आँख मूंद ली और यमुना नदी को पार मथुरा की सीमा में प्रवेश कर रही ब्रजयात्रा में बडा हादसा हो गया। 250 लोग यमुना पार करते समय डूबे और उनकी तबियत खराब हो गयी उसमें से दो लोगों की मौत तक हो गयी। जिला प्रशासन ने तो इस घटना को ज्यादा महत्व नहीं दिया वहीं कुछ मीडिया संस्थानों ने भी इस घटना से अपने को बचाने का प्रयास किया।
मानमंदिर बरसाना के संत रमेशबाबा की राधारानी ब्रजयात्रा में इतना बडा हादसा हो गया। जिसमें प्रशासन की लापरवाही, यात्रा संयोजकों की अदूरदर्शिता और यमुना नदी के जल के आचमन से यदि लोगों का स्वास्थ्य खराव हो जाये तो उसकी विषाक्तता सबके समाने आ गयी। लेकिन यमुना शुद्धिकरण के नाम पर जिन्होंने वर्षों आन्दोलनों के जरिये सरकारों की नाक में नकेल कसने का काम किया हो वही अब इस प्रदूषित यमुना की धारा को पार कराने के लिये क्या सोच कर तेरह हजार लोगों को लेकर निकले थे। हजारों श्रद्धालुओं की जान जोखिम में डालने वाली इतनी बडी घटना की लीपा पोती कर दी जैसे कुछ हुआ ही नहीं। 13 हजार परिक्रमार्थी रस्सी के सहारे यमुनापार कर रहे थे। खुद यात्रा संयोजक सुनील सिंह ने यह कई बार स्वीकार किया है कि हरियाणा प्रशासन से पांच दिन तक लगातार संपर्क किया गया और प्रशासन आश्वासन देता रहा कि यमुना पर यात्रा के लिए वैकिल्पक पुल की व्यवस्था करा दी जाएगी। लेकिन जब समय पर पुल की व्यवस्था नहीं हो सकी तो श्रद्धालुओं को स्टीमर या नावों के सहारे यमुना पार करा कर दो लोगों की जान भी बचाई जा सकती थी। जिला प्रशासन ने तो ‘‘मरें तो मर जायें’’ ऐसा सोच कर भगवान भरोसे छोड दिया। प्रशासन चाहता तो 13 हजार श्रद्धालुओं को जान जोखिम में डालने के बजाय इस यात्रा को आगे बढने से रोक देना चाहिए था। यह यात्रा कोई सदियों पुरानी सनातन परंपरा का हिस्सा नहीं थी, जिसे रोका ही नहीं जा सकता था।
अपने आर्थिक लाभ, शिष्यों की संख्या बढाने, प्रभाव बढाने और शिष्यों को सततरूप से खुद से जोडे रखने के लिए तमाम भागवताचार्यों, मठों, मंदिरों और संतों ने इस तरह की वार्षिक ब्रज चैरासी कोसी यात्राओं की शुरूआत करा दी है। प्रतिवर्ष एक नई यात्रा शुरू हो जाती है इन यात्राओं के जरिये अपने-अपने शिष्यों को जोडे़ रखने का माध्यम बना लिया है। यह बृजयात्रा भी अपने अनुयाईयों को खुद से जोडे रखने का ही एक प्रयास है और इस तरह की शोभायात्राएं भी होती हैं। हजारों श्रद्धालुओं की जानजोखिम में डालने के लिए यात्रा संयोजकों पर किसी तरह की कोई कार्यवाही प्रशासन की ओर से नहीं की जाती है। सबसे पहले अनुमति के बिना इस प्रकार के आयोजन कैसे हो सकते हैं। जिसमें हजारों लोगों की संख्या, पैदल चनले के रूट के साथ-साथ यात्रा में अग्निशमन से लेकर अन्य आपदाओं के लिए बचाव के उपायों की जानकारी जिला प्रशासन को क्यों नही दी गई। दो लोगों की मौत के बाद इतने बडे़ हादसे के वाद जिला प्रशासन ने अभी तक आयोजकों के खिलाफ इस सम्बन्ध में कोई कार्यवाही क्यों नहीं की। हजारों श्रद्धालुओं की जान जोखिम में डालने के जोखिम को कम करके आंका गया। इतना ही नहीं जिन दो श्रद्धालुओं की मौत हुई है उनका जिम्मेदार कौन है इस पर भी लगता है सभी जिम्मेदार पक्ष मौन साध कर मामले पर से आम लोगों का ध्यान हटाने का काम कर रहे हैं।
समझ से परे-डूबने पर पेट में पानी का भरजाना आचमन कैसे हो सकता है।
यात्रा संयोजक सुनील सिंह ने खुद कई-कई बार यह स्वीकार किया है कि रस्सी के सहारे यात्री यमुनापार कर रहे थे। इसी दौरान कुछ की लम्बाई कम थी, कुछ कमजोर और वृद्ध थे। ऐसे में वह डूबने लगे और यमुना का पानी उनके मुहं में चला गया। इस तरह से किसी के पेट में पानी के चले जाने को आचमन कैसे कहा जा सकता है। जबकि हर ओर से इसे आचमन से श्रद्धालुओं के बीमार होने की बात कह कर प्रचारित प्रसारित किया जा रहा है।
दूसरी तरफ- चिकित्सक इसे फूडपोइजनिंग बता रहे हैं और प्रशासन लगा रहा खाने के नमूने लेने में।
हद तो तब हो गई जब इस घटना को पहले फूड पोइजनिंग कह कर नकारने का प्रयास किया गया। प्रशासन ने यात्रा के दौरान दिये जा रहे भोजन के नमूने लिए। यमुनाजल के नमूने लेने की भी नमूनागीरी की गई। जबकि यमुना का जल कितना विषाक्त है इस पर तामाम रिपोर्ट पहले से ही मौजूद हैं। मगर 13 हजार लोगों को बृजयात्रा के बहाने यमुना में उतारना उनकी जान जोखिम में डालने की जिम्मेदारी किसकी बनती है तथा दो निर्दोष लोगों की जान चली गई इसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है।

बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

मथुरा के गांव में पति और पुत्रों की रक्षा को नही रखा जाता वृत।

करवा चौथ और अहोई अष्टमी का वृत सती के श्राप से बचने को नहीं रखती हैं।
मथुरा। पति की लम्बी उम्र के लिए रखा जाने वाला करवा चौथ का वृत और बेटों के लिए मां अहोई अष्टमी का वृत रखने से बचती हैं। ऐसी मान्यता है कि यह वृत इस गांव में एक शती के कारण शापित हैं। वृत को न करने की इस गांव में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। जब पति की लम्बी आयु के लिए सुहागिनें करवा चौथ का वृत रख कर पूजा अर्चना करेंगी और रात के समय सुहागिनें चांद को अर्घ देंगी उस समय मथुरा से करीव 40 किलोमीटर दूर सुरीर गांव में सन्नाटा पसरा रहेगा। कहा जाता है कि इस गांव में सती के श्राप से बचने के लिए इन दोनों वृतों को महिलाएं नहीं रखती हैं। एक छोटा सा सती माता का मंदिर गांव में मौजूद है।
महिलाएं इस मंदिर पर जाकर पूजा अर्चना करती हैं। गांव के मुहल्ला बाघा में ठाकुर समाज की बुर्जुग महिलाओं ने बताया कि यहां की महिलाएं वर्षों से दोनों वृत नहीं करती हैं। यहां आने वाली नवविवाहिताओं की इस वृत को करने की इच्छा मन में ही रह जाती है। जब वह यहां आकर अपने से पहले गांव में ब्याहकर आईं महिलाओं को वृत रखते नहीं देखती हैं तो वह भी वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को मानने लगती हैं। नयी नवेली विवाहिता रेखा का कहना कि शादी के बाद गांव में आने पर पता चला कि यहां यह दोनों वृत नहीं रखे जाते हैं तो मन में दुख तो हुआ गांव की बुर्जुग महिलाओं के कहने पर इस परम्परा को निभाना भी जरूरी है। एक दूसरी महिला का कहना था कि मान्यता है कि इस परंपरा को तोडने की हिम्मत करना तो दूर सोचना भी पाप है। यह हम सभी महिलाओं के दिलो दिमाग में गहरे से बैठा हुआ है। जब यह परंपरा इतने लम्बे समय से निभाई जा रही है तो इसका पालन करना ही ठीक होगा। इस परंपरा के पीछे जरूर कोई कारण छिपा होगा।
बुजर्गो की मानें तो सैकड़ों वर्ष पहले गांव रामनगला (नौहझील) का एक ब्राह्मण युवक अपनी पत्नी को गांव से विदा कराकर घर लौट रहा था। सुरीर में होकर निकलने के दौरान बाघा मोहल्ले में ठाकुर समाज के लोगों का ब्राह्मण युवक से भैंसा बुग्घी को लेकर विवाद हो गया। जिसमें इन लोगों के हाथों ब्राह्मण युवक की मौत हो गई थी। अपने सामने पति की मौत से कुपित मृतक ब्राह्मण युवक की पत्नी इन लोगों को श्राप देते हुए पति के साथ सती हो गई थी। इसे सती का श्राप कहें या बिलखती पत्नी के कोप का कहर, संयोगवश इस घटना के बाद मोहल्ले में मानो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा हो, गांव कई जवान लोगों की मौत हो गई, गांव में  महिलाएं विधवा होने लगीं। शोक, डर और दहशत से गांव में लोगों के परिवार में कोहराम मच गया। जिसे देख कुछ बुजर्ग लोगों ने इसे सती के श्राप का असर मानते हुए क्षमा याचना की और मोहल्ले में एक मंदिर स्थापना कर सती की पूजा-अर्चना शुरू कर दी। ऐसा माना जाता है कि पति और पुत्रों की दीर्घायु को मनाए जाने वाले करवाचौथ एवं अहोई अष्टमी के त्योहार पर सती बंदिश लगा गई थी। तभी से त्योहार मनाना तो दूर इस गांव की महिलाएं पूरा साज-श्रृंगार भी नहीं करती हैं। उन्हें ऐसा करने पर सती के नाराज होने का भय सताता रहता है।

सुरीर क्षेत्र में सती के श्राप के कारण यहां के सैकड़ों परिवारों की विवाहिताएं इस दिन न तो कोई साज श्रंगार करती हैं और न ही व्रत रखती हैं।
इसी गांव की बुर्जुग महिला सुनहरी देवी ने बताया कि सती की पूजा अर्चना करने के बाद से गांव में मौतों का सिलसिला तो थम गया। लेकिन सुहाग की सलामती के लिए रखा जाने वाला करवा चौथ और पुत्रों की रक्षा के लिए अहोई अष्टमी के वृतों व त्योहारों पर सती के श्राप की बजह से लगी रोक आज भी जारी है। तभी से आज तक इस मौहल्ले में सैकड़ों परिवारों में कोई भी विवाहिता न तो साज श्रंगार करती है और न ही पति की दीर्घायु की कामना के लिए करवाचौथ का व्रत ही रखती है।

सुनील शर्मा

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

पूजा पंड़ाल में देवी दुर्गा की मौजूदगी का अहसास !

मथुरा। मथुरा में कई जगहों पर देवी दुर्गा की पूजा के लिए पंडाल सजाये जाते हैं। जिसमें से एक पंडाल मथुरा शहर के बीचों बीच लाल दरवाजा, वृन्दावन दरवाजा क्षेत्र में होने वाली दुर्गा पूजा महोत्सव के पूजा पंडाल जिसमें पिछले 28 वर्षों से पूजा हो रही है बड़े ही भक्ति भाव के साथ पूजा की सभी विधियों का पालन किया जाता है। वर्ष 2017 की दुर्गा पूजा महोत्सव के नवमी के दिन की वात है जिस दिन मैरी बड़ी पुत्री की शादी के पूर्व आर्शीवाद समारोह (पक्का करने की रश्म) घर पर होनी थी। कलकत्ता से लड़के वालों को घर पर आयोजित समारोह में आना था। उनके आने में समय था और पूजा पंडाल से बार-बार फोन आ रहे थे कि यहां आकर पूजा की एक रश्म (कुंआरी पूजा) को पूरा कराना है चूंकी मैं दुर्गा पूजा महोत्सव का महासचिव भी हूँ इस नाते मुझे यह पूजा सम्पन्न करानी थी। मैं जल्दी से पूजा पंडाल पहुँचा और वहां सारी तैयारियां पूरी थीं बस पूजा सम्पन्न करानी थी।
मेरे परम मित्र व छोटे भाई की चार साल की छोटी सी चुलबुली सी नटखट सी कन्या गुनगुन को कन्या पूजन के लिए चुना गया था। माँ भगवती दुर्गा की प्रतिमा के सामने विठा कर पूजा की विधि शुरू की गई। पुरोहित गौरांग मुखर्जी मंत्रों का उच्चारण करते जा रहे थे और मैं उनके बतायें अनुसार फूल, बेलपत्र, गंगा जल तथा अन्य पूजा की समग्री उस कन्या की तरफ दे रहा था।
पूजा के दौरान अचानक इतनी छोटी सी कन्या का हाव भाव कुछ बदला-बदला नजर आने लगा मैरे भी रौंये खडे़ हो गये। उक्त कन्या ने करीब दो मिनट से भी ज्यादा समय तक भगवती दुर्गा की प्रतिमा को बडे़ ही क्रोध के भाव से निहारा फिर उसने कुछ क्षण के लिये मुझे भी कुछ क्रोधित भाव से देखा यह समय कुछ मिनटों का रहा होगा इसके वाद अचानक उसमें हुए बदलाव को मैं स्पष्ट रूप से देख सकता था। मुझे कोलकाता से पधारे पुरोहित तन्त्र साधक गौरांग मुखर्जी ने मुझे धीरे से समझाया कि छोटी बच्ची पर माँ ने कुछ क्षण के लिये प्रवेश किया था। विश्वास न करने की कोई वात ही नही थी क्यों कि एक छोटी सी कन्या मात्र चार वर्ष की उसमें पूजा के दौरान अचानक बदलाव को मैं महसूस कर सकता था। जो बच्ची चुलबुली भरपूर शैतानी करने वाली हंसमुख स्वभाव की बच्ची में एक रौद्र रूप देखकर विश्वास हो गया कि माँ भगवती दुर्गा पूजा पंडाल में आती हैं। शक्ति ने अपना परिचय दिया हम उसे समझें, महसूस करें तथा उस पराशक्ति पर विश्वास करें। तभी इस संसार में जीव का कल्याण हो सकता है। उसके पाँव पूजने के क्रम में उसको सारे बस्त्र दिये गये तथा उसको छोटी-छोटी पाजेब भी पहनाई गई सभी ने उसे उपहार स्वरूप कुछ न कुछ दिया तथा फिर वह देवी प्रतिमा के पास से नीचे आकर पहले की तरह नार्मल व्यवहार करने लगी तथा शैतानी करने लगी, उछलकूद करने लगी।

सोमवार, 2 सितंबर 2019

मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम 2019 से किसको होगा फायदा।

आम जन को, पुलिस को, या विभाग को
इसमें कोई दो राय नही है कि इस प्रकार के कडे़ कानून बना कर  अपनी जिन्दगी के प्रति लापरबाह लोगों पर कुछ हद तक लगाम लगेगी और सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सकेगी। मगर फिर भी लोग किसी न किसी तरह से जुगाड लगा कर अपने बच निकलने के रास्ते भी तलाश लेंगे। क्या इसका दुप्रयोग नही होगा। क्या इससे भ्रष्टाचार के रास्ते और बड़े नहीं हो जायेंगे।
क्या इससे आम जन को कोई लाभ होगा या पुलिस को इसका सीधा सीधा लाभ मिलेगा, या विभाग के खाते में रकम पहुंचने से सरकार का लाभ होगा। इस प्रश्न का ज्यादातर लोग यही उत्तर दे रहे हैं कि पुलिस का लाभ यानी पुलिस कर्मियों का लाभ जरूर होगा साथही कुछ लोग मानते हैं कि इसमें तीनों को लाभ मिलेगा। जबकि कुछ लोग इसका सटीक उत्तर नही दे सके।
विशाल अग्रवाल ने बताया कि चालान सिर्फ ट्रफिक पुलिस काटे सभी पुलिस कर्मियों को इसकी जिम्मेदारी न दी जाये तो 50 प्रतिशत तक सही तरीके से काम हो पायेगा। जबकि आकाशवाणी के पूर्व उद्घोषक श्रीकृष्ण शरद, राकेश रावत एडवोकेट, पी0 के0 वार्ष्णेय, अरविन्द चौधरी, जगन्नाथ पौद्दार, पवन शर्मा, महेन्द्र राजपूत, जितेन्द्र गर्ग, सपन साहा, प्रताप विश्वास इन सभी ने माना कि इसमें पुलिस का फायदा अधिक होगा।
01 सितम्बर से मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम 2019 में सड़क सुरक्षा हेतु कठोर प्रावधान किये गये हैं। चालकों पर कडे़ नियमों के जरिये सड़क पर गाड़ियां चलाने के नियमों में बदलाव करते हुए सरकार ने सीट बैल्ट नहीं पहनने पर पहले 300 रुपये का जुर्माना था यह 1000 रुपये कर दिया गया है। दोपहिया बाहन पर दो से ज्यादा सवारी होने पर पहले 100 जुर्माना था अब यह 1000 रुपये कर दिया गया है। हेलमेट नहीं पहनने पर यह जुर्माना 200 रुपये था अब यह 1000 रुपये करने के साथ ही तीन माह तक के लिए लाईसेन्स निलम्बित करने का प्रावधान रखा गया है। इमरजेन्सी बाहन (एम्बूलेन्स) को रास्ता न देने पर पहले कोई जुर्माना नहीं था अब इस कृत्य को करते पकडे़ जाने पर 10000 रुपये का जुर्माना होगा। बिना ड्राईविंग लाईसेन्स के ड्राईविंग करते पकड़े जाने पर पहले 500 रुपये का जुर्माना लगाया जाता था अब इसे 5000 रुपये कर दिया गया है। लाईसेन्स रद्द होने के बावजूद भी ड्राईविंग करने पर 500 रुपये से 10000 रुपये का जुर्माना अदा करना होगा। ओवर स्पीड में वाहन चलाने पर पहले 400 रुपये बसूले जाते थे अब 2000 रुपये कर दिया गया है। खतरनाक ड्राईविंग करने पर 1000 रुपये से बढ़ा कर 5000 रुपये कर दिया गया है। शराब पीकर वाहन चलाने पर पहने 2000 रुपये जुर्माना लगता अब इसे 10000 रुपये कर दिया गया है। ड्राईविंग के दौरान मोबाईल से वात करने पर 1000 रुपये से 5000 रुपये का जुर्माना कर दिया गया है। बिना परमिट पाये जाने पर 5000 रुपये से बढ़ा कर इसे 10000 रुपये कर दिया गया है। गाड़ियों की ओवर लोडिंग पर 2000 रुपये और उसके वाद प्रति टन 1000 था अब इसे 2000 रुपये कर दिया गया है। बिना इंश्योरेन्स के गाड़ी चलाने पर 1000 रुपये था अब इसे बढ़ा कर 2000 रुपये किया गया है। नाबालिग द्वारा वाहन चलाने पर पहले इस कर कोई जुर्माना नहीं था मगर अब इसे सबसे गम्भीर मानते हुए सरकार ने 25000 रुपये का जुर्माना और 3 साल की सजा का प्रावधान रखा है इसमें वाहन का रजिस्ट्रेशन को रद्द किया जा सकता है और गाड़ी मालिक व उसके अभिभावक दोषी माने जायेंगे साथ ही नाबालिग को 25 साल की उम्र तक लाईसेन्स नही दिया जायेगा।
सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के प्रयास के तौर पर इसे देखा जाये तो यह आम जन के सुरक्षा के लिये जरूरी माना जा सकता है। लेकिन क्या इससे जो कुछ सड़कों पर चैकिंग के नाम पर होता था उसमें वृद्धि नही होगी। अब तक 100 रुपये देकर लोग छूट जाया करते थे मगर यह रकम अब कई गुना अधिक की हो जायेगी। क्या भ्रष्टाचार को करने का सपना पाले बैठी सरकार इसे रोक पायेगी।
नम्बर प्लेट पर पुलिस का निशान व गाड़ी में कहीं न कहीं पुलिस का चिन्ह लगा कर घूमने वाले लोगों पर लगाम लग सकेगी। एडवोकेट, पुलिस, न्याय विभाग, आर्मी, प्रेस आदि लिखे वाहनों से जो लोग बच निकलते थे वो क्या अब नहीं निकल पायेंगे।
सबसे पहले तो यह काम सरकारी विभागों पर और पुलिस विभाग के तमाम सभी जो कभी हेलमेट नहीं लगाते हैं और न ही सीट बेल्ट तो इनसे जुर्माना बसूला जायेगा।
मोवाईल पर बात करते पकडे़ जाने पर जुर्माना केवल प्राइवेट वाहनों पर या दोपहिया वाहनों को चलाने वालों पर ही होगा। क्या सरकारी वाहनों पर भी इसका अंकुश लग सकेगा। सबसे ज्यादा खतरनाक खेल तो रोड़वेज बस, प्राईवेट बस, स्कूल बस के ड्राईवर करते हैं 60-70 लोगों की जिन्दगी इनके हाथों में होती है शराब पीकर गाड़ी चलाना तथा गाड़ी चलाते समय मौवाईल पर वाते करना क्या इन पर अंकुश लग पायेगा।
आम जनों के जीवन की सुरक्षा के लिहाज से तो यह कड़े कानूनों का प्रवधान ठीक है, मगर इन कानूनों का कितना अनुपालन ठीक से हो पायेगा, यह तो समय ही बतायेगा।

सुनील शर्मा, मथुरा।

रविवार, 1 सितंबर 2019

कंजूसी या जीवन की सादगी

    आज की भागदौड भरी जिन्दगी में किसी के पास किसी के लिए समय ही नहीं है, अगर है भी तो ज्यादातर समय मौबाइल ने ले लिया है। घर परिवार में, बस में, ट्रेन में, मेट्रो में, सड़क पर किसी को किसी की तरफ देखने का भी समय ही नहीं है। मौबाइल की चैटिंग और जरूरी कामों को निपटाने की आपा धापी में लोग अपने पास टू ब्हीलर और फोर ब्हीलर तक रखने से बच रहे हैं। ड्राइब करने का झंझट, पार्किंग की समस्या, जाम की समस्या। केब बुक किया और अपने काम तक जाना या आफिस तक जाना फिर बापस घर तक आना यही तो जिन्दगी का हिस्सा बन चुका है। लोगों के घरों में महंगी डाइनिंग टेबिल तो है मगर साथ-साथ खाना खाने की की फुर्सत किसी के पास नहीं है। जब पापा आते हैं तो बच्चे सौ जाते हैं, जब बच्चे स्कूल जाते हैं तब तक पापा सोये हुए होते हैं। ऐसी जिन्दगी में समय किसी के पास नहीं है अगर है भी तो मौबाइल ही सारा समय ले रहा है।


एक समय था जब मेरे एक परम प्रिय मित्र के घर मैं अक्सर जाया करता था। हम दोनों कॉमर्स के स्टुडेन्ट थे। इस लिए प्रायः उनके घर जाना होता था। अक्सर देखा कि पिता जी माता जी जमीन पर बैठ कर खाना खाते है। उनके सामने एक थाली, एक लोटा, एक चम्मच, एक कटौरी होती थी। यह परिवार कोई गरीब नहीं था मगर उन्होंने इसे अपनी जिन्दगी एक हिस्सा बना लिया था। और एक नियम भी जिसमें बड़े से छोटे को खाना खाने के नियम को पालन करना होता था।
दोस्त के पिता प्राईमरी स्कूल में एक अध्यापक थे। मगर थे तो थोडे से कंजूस एक बार मेरा मित्र किसी विषय में फेल हो गया तो उसके पिताजी वोले कि मेरा लाखों का नुकसान कर दिया। मैंने कहा कैसे, तो बोले कि देखो पूरे वर्ष भर दो टाइम खाना खाया, पढाई पर खर्च किताब कापी पर खर्च, कपड़ों पर खर्च, थोड़ा बहुत अन्य खर्चे भी इस हिसाब से लाखों का नुकसान हुआ कि नही।
उनके तीन बेटों में सबसे बड़ा बेटा वो भी एक स्कूल में मास्टर था। बीच वाला बेटा एक सरकारी विभाग में ड्राइवर, सरकारी जीप चलाता था। तीसरे नम्बर का बेटा जो मेरे साथ पढ़ता था। अभी उसने कोई काम शुरू नहीं किया था। पढ़ाई कर रहा था।
सादगी और उनके परिवार के एक साथ खाने के व्यवहार ने मेरे मन में उनको हमेशा स्मरण में रखा है। शायद आज के दौर में यह एक साधारण सी वात हो लेकिन एक मैसेज जरूर है। जब माता पिता खाना खा रहे हों तो परिवार की बड़ी बहु खाना बनाने में व्यस्त रहती थी और उसका हाथ बटाने को बीच वाली बहु भी उसके साथ-साथ काम करती थी। खाने में भी सादगी एक उर्द, चने की दाल फूली-फूली रोटी चुचेमा घी (यानी मानों रोटी घी में डूबी हुई हो) और एक आलू की सूखी सब्जी, न अब वह आटा मिलता है न अब वह आलू रहे, नाही वह घी रहा, न ही उर्द, चने की दाल ही मिलती है।
खेर दोस्त के माता पिता के खाना खाने के दौरान पिता का भोजन जब पूर्ण हो चुका होता था तो उसी थाली में बड़ा बेटा आकर माँ के साथ बैठ जाता था। फिर माँ का खाना समाप्त होने पर बीच वाला बेटा आकर बड़े भाई के साथ बैठ जाता था, बड़े बेटे का खाना जैसे ही समाप्त होता तो छोटा बेटा जो मेरे साथ पढ़ता था वह भोजन करने बैठ जाता था। बीच वाले भाई का खाना तब तक समाप्त होता था, तब जाकर बड़ी बहु अपने देवर यानी मेरे मित्र के साथ उसी खाने की थाली पर बैठ जाती और खाना शुरू करती थी। मेरा मित्र का खाना पूरा हो चुका होता है तो परिवार की वर्तमान छोटी बहु यानी बीच वाले भाई की पत्नी अपनी जिठानी के साथ भोजन पूरा करती थी। बड़ी बहु का काम खाना बनाना और छोटी का काम रसोई की साफ सफाई के वाद वही एक थाली, एक लोटा, एक चम्मच, एक कटोरी की सफाई करके रखती थी, जिससे दूसरे टाइम भी यही क्रम चल सके।
इसमें एक तो ज्यादा बर्तन उपयोग में लाने से बचा जा सकता है जिसमें या तो नौकरानी बर्तन धोने के लिये चाहिए या परिवार की कोई एक बहू सारे बर्तनों को साफ करे, साथही समय की बचत के साथ-साथ भोजन की सादगी से और घर के बने भोजन का आनन्द परिवार के सभी सदस्य बारी-बारी से ले सकेंगे। सभी एक निश्चित समय पर ही भोजन कर सकेंगे। परिवार में एक जुटता बनी रहेगी।

सुनील शर्मा, मथुरा

लन्दन रिर्टन गणेश, वृन्दावन विराजे

आपने कभी सोचा नही होगा कि गणेश जी की प्रतिमा भी लन्दन घूम कर आ सकती हैं। 
मगर यह एक सच्ची घटना है जिसमें गणेश जी लन्दन तक घूक कर आ गये और वर्षों से वृन्दावन में विराजमान हैं। और आज भी लोग माँ भगवती दुर्गा के साथ-साथ इन्हीं गणेश जी प्रतिमा के दर्शन करते हैं।
कात्यायनी पीठ, के नाम से जाना जाने वाला स्थान मथुरा जनपद के वृन्दावन में स्थित है। भगवती कात्यायनी के अनन्य साधक व  योगिराज श्री श्यामाचरण लाहिड़ी जी महाराज के परम शिष्य योगी स्वामी केशवानन्द ब्रह्मचारी जी महाराज ने अपनी कठोर साधना द्वारा प्राप्त भगवती के प्रत्यक्ष आदेशानुसार इस लुप्त स्थान श्री कात्यायनी पीठ राधा बाग, वृन्दावन नामक पावनतम पवित्र स्थान का उद्धार किया।
वृन्दावन में कात्यायनी पीठ
श्री यमुना नदी के किनारे स्थित राधाबाग़ अति प्राचीन सिद्धपीठ के रूप में श्री श्री माँ कात्यायनी देवी विराजमान हैं।
पौराणिक मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण की क्रीड़ा भूमि श्रीधाम वृन्दावन में भगवती देवी के केश गिरे थे, इसका प्रमाण प्रायः सभी शास्त्रों में मिलता ही है। आर्यशास्त्र, ब्रह्म वैवर्त पुराण एवं आद्या स्तोत्र आदि कई स्थानों पर उल्लेख है- व्रजे कात्यायनी परा अर्थात् वृन्दावन स्थित पीठ में ब्रह्मशक्ति महामाया श्री माता कात्यायनी के नाम से प्रसिद्ध है। वृन्दावन स्थित श्री कात्यायनी पीठ भारतवर्ष के उन अज्ञात 108 एवं ज्ञात 51 पीठों में से एक अत्यन्त प्राचीन सिद्धपीठ है। देवर्षि श्री वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत के दशम स्कंध के बाईसवें अध्याय में इसका उल्लेख किया है-
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥
हे कात्यायनि! हे महामाये! हे महायोगिनि! हे अधीश्वरि! हे देवि! नन्द गोप के पुत्र को हमारा पति बनाओ हम आपका अर्चन एवं वन्दन करते हैं। दुर्गा सप्तशती में देवी के अवतरित होने का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-
माँ भगवती ने मैं नन्द गोप के घर में यशोदा के गर्भ से अवतार लूंगी। श्रीमद् भावगत में भगवती कात्यायनी के पूजन द्वारा भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त करने के साधन का सुन्दर वर्णन प्राप्त होता है। यह व्रत पूरे मार्गशीर्ष (अगहन) के मास में होता है। भगवान श्री कृष्ण को पाने की लालसा में ब्रजांगनाओं ने अपने हृदय की लालसा पूर्ण करने हेतु यमुना नदी के किनारे से घिरे हुए राधाबाग़ नामक स्थान पर श्री कात्यायनी देवी का पूजन किया था। इस महान् सिद्धपीठ का उद्धार निश्चित रूप से भगवती की कृपा प्राप्त व्यक्ति संत महात्मा श्री केशवानन्द जी ने श्री कात्यायनी पीठ का पुनर्रुद्धार करके लोक कल्याण का काम किया है जिसके कारण आज वर्ष भर लाखों श्रृद्धालु सम्पूर्ण भारत वर्ष से यहां आते हैं।
कात्यायनी पीठ, वृन्दावन
कामरूप मठ के स्वामी रामानन्द तीर्थ जी महाराज से दीक्षित होकर कठोर साधना के लिए हिमालय की कंदराओं में निरन्तर साधनारत रहे स्वामी केशवानन्द जी महाराज ने सर्वशक्तिशाली माँ के आदेशानुसार वृन्दावन स्थित अज्ञात सिद्धपीठ का उन्होंने पुनरूध्दार कराया। स्वामी केशवानन्द जी महाराज द्वारा 1 फ़रवरी, 1923 माघी पूर्णिमा के दिन बनारस, बंगाल तथा भारत के विभिन्न सुविख्यात प्रतिष्ठित वैदिक याज्ञिक ब्राह्मणों द्वारा वैष्ण्वीय परम्परा से मंदिर की प्रतिष्ठा का कार्य पूर्ण कराया। माँ कात्यायनी के साथ-साथ पंचानन शिव, विष्णु, सूर्य तथा सिद्धिदाता श्री गणेश जी महाराज (जिनकी बात तो कुछ अलौकिक ही है “जिसने जाना उसने पाया“ वाली कहावत चरितार्थ है) की मूर्तियों की भी इस मंदिर में प्रतिष्ठा की गई। राधाबाग़ मंदिर के अंतर्गत गुरु मंदिर, शंकराचार्य मंदिर, शिव मंदिर तथा सरस्वती मंदिर भी दर्शनीय हैं। यहाँ की अलौकिकता का मुख्य कारण जहां साक्षात माँ कात्यायनी सर्वशक्तिस्वरूपणि, दुःखकष्टहारिणी, आल्हादमयी, करुणामयी अपनी अलौकिकता को लिए विराजमान है वहीं पर सिद्धिदाता श्री गणेश जी एवं बगीचा में अर्ध्दनारीश्वर (गौरीशंकर महादेव) एक प्राण दो देह को धारण किये हुए विराजमान हैं। लोग उन्हें देखते ही मन्त्रमुग्ध हो जाते हैं।

श्री सिद्ध गणेश कात्यायनी पीठ, वृन्दावन
श्री श्री कात्यायनी पीठ वृन्दावन में स्थित गणपति महाराज की मूर्ति का भी विचित्र इतिहास है। एक अंग्रेज़ श्री डब्लू. आर. यूल कलकत्ता में मैसर्स एटलस इंशोरेंस कम्पनी लि. जो न. 4 क्लाइव रोड पर है, में ईस्टर्न सेक्रेटरी पद पर कार्य करते थे। इनकी पत्नी श्रीमती यूल ने कोई सन् 1911 या 1912 में जबकि वह विलायत जा रही थीं, जयपुर से एक गणपति महाराज की मूर्ति ख़रीदी। वह अपने पति को कलकत्ता छोड़कर इंग्लैण्ड चली गईं तथा उन्होंने अपनी बैठक में कारनेस पर गणपति जी की प्रतिमा सज़ा दी। एक दिन श्रीमती यूल के घर भोज हुआ तथा उनके मित्रगणों ने गणेश जी की प्रतिमा को देखकर उनसे पूछा कि यह क्या है? श्रीमती यूल ने उत्तर दिया कि यह हिन्दुओं का सूंड वाला देवता है। उनके मित्रों ने गणेश जी की मूर्ति को बीच की मेज पर रखकर उपहास करना आरम्भ किया। किसी ने गणेश जी के मुख के पास चम्मच लगाकर पूछा कि इनका मुंह कहां है। जब भोज समाप्त हो गया तब रात्रि में श्रीमती यूल की पुत्री को ज्वर हो गया जो रात्रि को बड़े वेग से बढ़ गया। वह अपने तेज़ ज्वर में चिल्लाने लगी हाय मेरा सूंड़वाला खिलौना मुझे निगलने आ रहा है। डाक्टरों ने सोचा कि वह विस्मृति में बोल रही है। किन्तु वह रात दिन यही शब्द दोहराती रही एवं अत्यन्त भयभीत हो गयी। श्रीमती यूल ने यह सब वृतांत अपने पति को कलकत्ता लिखकर भेजा। उनकी पुत्री को किसी भी औषधि से लाभ नहीं हुआ। एक दिन यूल ने स्वप्न में देखा कि वह अपने बाग़ के अतिथिगृह में बैठी है। सूर्यास्त हो रहा है, अचानक एक नम्र पुरुष जिसके घुंघराले बाल, मशाल सी जलती आंख, हाथ में भाला लिए, वृषभ पर सवार बढ़ते हुए अंधकार से उसकी ओर आ रहा है एवं कह रहा है, ’ मेरे पुत्र सूंड़ वाले देवता को तत्काल भारत भेज दो अन्यथा मैं तुम्हारे सारे परिवार का नाश कर दूंगा। वह अत्यधिक भयभीत होकर जाग उठी और दूसरे दिन प्रातः ही उन्होंने उस खिलौने को पार्सल बनवाकर पहली डाक से ही अपने पति के पास भारत भेज दिया। जहां वह देवता गार्डन हेंडरसन के कार्यालय में तीन दिन तक रहे। वहां शीघ्र ही कलकत्ता के नर नारियों की सिद्ध गणेश के दर्शनार्थ कार्यालय में भीड़ लग गयी। कार्यालय का सारा कार्य रुक गया। श्री यूल ने अपने अधीन इंश्योरेंस एजेण्ट केदार बाबू से पूछा कि इस देवता का क्या करना चाहिए। अन्त में केदार बाबू गणेश जी को अपने घर 7, अभय चरण मित्र स्ट्रीट ले गए एवं वहां उनकी पूजा शुरू कर दी। तब से सब भक्तों ने केदार बाबू के घर पर जाना आरम्भ कर दिया।
इधर वृन्दावन में स्वामी केशवानन्द जी महाराज कात्यायनी देवी की पंचायतन पूजन विधि से प्रतिष्ठा के लिए सनातन धर्म की पांच प्रमुख मूर्तियों का प्रबन्ध कर रहे थे। श्री श्री कात्यायनी देवी की अष्टधातु से निर्मित मूर्ति कलकत्ता में तैयार हो रही थी तथा भैरव चन्द्रशेखर की मूर्ति जयपुर में बनाई गई थी । जबकि महाराज गणेश जी की प्रतिमा के विषय में विचार कर रहे थे, तभी उन्हें माँ का आदेश हुआ कि एक सिद्ध गणेश कलकत्ता में केदार बाबू के घर में हैं। जब तुम कलकता से प्रतिमा लाओगे तब मेरे साथ मेरे पुत्र को भी लाना। अतः जब श्री केशवानन्द जी श्री श्री कात्यायनी माँ की अष्टधातु की मूर्ति पसंद करके लाने के लिए कलकत्ता गये तब केदार बाबू ने उनके पास आकर कहा गुरुदेव मैं आपके पास वृन्दावन आने का विचार कर रहा था।
मैं बड़ी विपत्ति में हूं। मेरे पास पिछले कुछ दिनों से एक गणेश जी की प्रतिमा है। प्रतिदिन रात्रि में स्वप्न में वह मुझसे कहते हैं कि जब श्री श्री कात्यायनी माँ की मूर्ति वृन्दावन जायेगी तो मुझे भी वहां भेज देना। कृपया आप स्वीकार करें। गुरुदेव ने कहा,“ बहुत अच्छा तुम वह मूर्ति स्टेशन पर ले आना, मैं तूफ़ान से जाऊँगा। जब माँ जायेगी तो उनका पुत्र भी उनके साथ जाएगा।“
अतः जब श्री श्री स्वामी केशवानंद जी महाराज श्री श्री कात्यायनी देवी की अष्टधातु की अत्यन्त ही सुन्दर प्रतिमा लेकर कलकत्ता से वापस आ रहे थे, केदारबाबू ने स्टेशन आकर गुरुदेव को गणेश जी की प्रतिमा दे दी। वह सिद्ध गणेश इन महायोगी द्वारा श्री श्री कात्यायनी पीठ में प्रतिष्ठित किए गए हैं। इनकी स्थापना के कुछ समय बाद से ही इस अद्भुत देवता की कई आश्चर्यजनक घटीं जो कि लिपिबद्ध की जाएं तो एक पूरा ग्रन्थ ही बन जाए।
स्वामी विद्याननद जी महाराज
स्वामी श्री केशवाननद जी महाराज के परम भक्त श्री विशम्भर दयाल जी और उनकी पत्नी श्री रामप्यारी देवी जी जो प्रतिदिन महाराज जी के दर्शन करने आया करते थे, ’मां’ की भक्ति के साथ-साथ गुरु महाराज स्वामी श्री केशवानंद जी के भी कृपा पात्र हो गये। श्री विशम्भर दयाल जी के छ्ह पुत्र थे, इन छ्ह पुत्रों पर महाराज का आशीर्वाद सदा विद्यमान रहा। परन्तु चतुर्थ पुत्र पर उनकी कृपा दृष्टि अत्यधिक रही और विधुभूषण नामक यह बालक आज स्वामी विद्यानंद जी महाराज के नाम से जाने जाते हैं।