शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

किसकी सफाई किसकी मुक्ति, यमुना नहीं यह नाला है

यमुनोत्री से चली यमुना नहीं पहुंची मथुरा
किसकी सफाई किसकी मुक्ति, यमुना नहीं यह नाला है
उपेक्षा ,प्रदूषण, लापरवाही के चलते 
यमुना अब दम तोड़ चुकी है
सुनील शर्मा
मथुरा। नारद पुराण के अनुसार ‘‘अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवन्तिका पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका’’ भारत की सात मोक्ष दायिनी पुरियों में से मथुरा भी एक पुरी मानी गयी है। जिसका आज भी जनमानस में बड़ा महत्व हैं। जिसका आधार यमुना नदी है। आज यही यमुना नदी अपनी मुक्ति की वाट जोह रही है। 


यमुना अपने उद्गम स्थल से ब्रज में श्रीकृष्ण के लिए और इलाहाबाद में संगम के लिए चली थीं, वह केवल हरियाणा में अवरुद्ध किये जाने के लिए नहीं निकलीं थी। प्रदेश सरकारों की उपेक्षा पूर्ण कार्यवाही के चलते यमुना नदी दम तोड चुकी है।
आज दिल्ली से जो यमुना ब्रज में आ रही है, वह यमुनोत्री की यमुना नहीं है। वह एक नई यमुना है जिसे दिल्ली की गंदगी ने ईजाद किया है। इस क्रम में दिल्ली के वाद नदी के किनारे बसे सभी शहर यमुना नदी को गन्दा करने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
यमुना को मुक्त कराने के अभी तक किये गये सभी प्रयास विफल हो गये है। वर्तमान नाला रूपी यमुना को नदी वता कर हजारों करोड़ों रुपया प्रदूषण के नाम पर अब तक स्वाह किया जा  चुका है लेकिन छोटी छोटी नालियों के गन्दे पानी को लेकर चल रहा बड़ा नाला आज भी लोगों के जहन में यमुना नदी के रूप में है। 
अब तक यमुना प्रदूषण की बात करने वालों को जनता के सामने यह सच्चाई लानी ही होगी कि ब्रज में यमुना नहीं है, यमुना की जगह जो दिखाई दे रहा है वह केवल नाले-नालियों का गंदा पानी, मल-मूत्र, कट्टीघरों का खून एवं रासायनिक कचरा है और यही जल स्त्रोतों के माध्यम से हमारे घरों में भी जा रहा है। इस पानी से बड़ों से लेकर बच्चों तक की किडनियां फेल हो रही है, फैंफड़े संक्रमित हो चुके हैं, कैंसर के मरीजों की संख्या तेजी से बड़ रही है।
यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए भेजा गया हजारों करोड़ रुपया आखिर गया कहां। उसे कौन खा गया। अकेले दिल्ली में यमुना को साफ करने को लेकर अब तक 18 हजार करोड़ रुपया खर्च किया जा चुका है। लेकिन दिल्ली में भी आज तक यमुना शुद्ध नही हो सकी है। उसमें मिलने वाले नालों को आज तक रोका नहीं जा सका है।
योजना के अनुसार नालों का पानी साफ किये जाने के बाद फिर यमुना में समाहित नहीं किया जायेगा। उस पानी का ट्रीटमेंट करके नहरों के माध्यम से किसानों को दिया जाएगा। लेकिन इस पर भी कोई ठोस काम आज तक नही हो सका है। मथुरा वृन्दावन में इस नदी के किनारे पड़ने वाले नाले कागजों पर टेप किये जा चुके हैं लेकिन हकीकत इससे परे है। मथुरा वृन्दावन नगर के अधिकांश नाले आज भी नगर का सारा कचरा और सीवर का गन्दा पानी यमुना में पहुंचा रहे है। मथुरा स्थित मसानी नाला आज भी उसी स्थिति में है। उसमें लगाई गई जाली भी टूट चुकी है। नाले का गन्दा पानी सीधे यमुना में गिरता देखा जा सकता है। 
न्यायालय के आदेश के वाद भी यमुना के किनारे खादर की स्थिति यह है कि यहां हजारों की संख्या में अवैध काॅलोनियां बन गई हैं तथा इनमें चारों तरफ केवल घर ही घर दिखाई दे रहे हैं। विद्युत विभाग इन काॅलोनियों में एक भी कनैक्शन नहीं देने का दावा करता है। मगर इन काॅलोनियों में लोगोें के घरों में टीवी, फ्रिज, कूलर, पंखा, डिश एन्टीना हर घर की छत पर देखा जा सकता है। यहां तक कि लोगों के घरों में समरसेविल पम्प भी लगे हैं जिससे वह पानी की सप्लाई भी ले रहे हैं अगर विद्युत विभाग यहां कनैक्शन नहीं दे रहा है तो इन काॅलोनियों के लोग इन सुबिधाओं को किस प्रकार से भोग रहे हैं। इसका सीधा सा जवाब है कि इन काॅलोनियों में सब अवैध कनैक्शन के सहारे जिन्दा हैं। घाटों के करीव से यमुना अपना प्रवाह छोड़ चुकी है। जिसके कारण यमुना के किनारे अवैध कब्जे हो गये हैं। जिसे जहां जगह मिली उसने यमुना के किनारे अपने स्वार्थ में मकान, दुकान, गैराज, बगीची, डोरी निवाड का कारखाना यहां तक कि संत महन्त भी यमुना के घाटों के किनारे गौशाला बना कर ही कब्जा कर रहे हैं। इस ओर जिला प्रशासन का कोई ध्यान नही है। 
सबसे बड़ा प्रश्न कि जिले में जब एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति यमुना की देख रेख के लिये की गई है तो अब तक नोडल अधिकारी रहे जितने भी अधिकारी थे उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को ठीक से क्यों नहीं निभाया। क्या उनके खिलाफ कार्यवाही नही होनी चाहिये। अब कोरे आश्वासनों से काम नहीं चलेगा, ठोस कार्यवाही होनी चाहिये। यमुना को मुक्ति दो, मथुरा में आने दो 

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी कैसे सुरक्षित रह पायेंगे गोवर्धन में

चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी कैसे सुरक्षित रह पायेंगे गोवर्धन में
जब उनके मंदिरों की सम्पत्तियां साधु संत सुरक्षित नहीं।
गोवर्धन। गिरिराज धाम के विश्व विख्यात राजकीय मेले मुडि़या पूनौ की मुख्यतम परम्पराओं पर भूमाफियाई अतिक्रमणों के बादल छा रहे है। जिनके चलते अब भविष्य में इन परम्पराओं का निर्वहन होना भी असम्भव सा प्रतीत हो रहा है। वैष्णव सम्प्रदायी चैतन्य महाप्रभु के शिष्यों के इस प्रमुख गुरू पर्व की परम्पराओं को सहेजे उनके सन्ताश्रम अब यहां के दबंग माफियाओं के चंगुल में फंस गये है। माफियाओं ने न सिर्फ उन वैष्णव सन्तों के आश्रमों और उनकी सम्पत्तियों पर अपना कब्जा कर लिया है बल्कि वे सन्तों को उन्हीं की सम्पत्तियों से बेदखल करने में जुटे है। प्रशासनिक अफसर राजकीय मेले की परम्पराओं के उन वाहकों को संरक्षण देना तो दूर उनकी रक्षा कर पाने में भी अक्षम नजर आ रहे है। यदि ऐसा ही रहा तो बृज की करीब पाँच सौ वर्ष पुरानी जिस सभ्यता और संस्कृति को सहेजने के लिये शासन ने महत्वपूर्ण प्रयास किये थे वे सब निरर्थक हो जायेंगे और वहां सब जगह भूमाफिया काबिज नजर आयेंगे। 
ऐसे ही भूमाफियाओं ने पूर्व में मुडि़या सन्तों की कस्बे के बरसाना रोड स्थित बेशकीमती भूमि को हड़प लिया था और अब दूसरे भूमाफियाओं ने फर्जी दस्तावेज बनाकर मुडि़या सन्तो के आश्रम को ही अपना घोषित करके साधुओं को आश्रम से बेदखल कर दिया और आश्रम पर अपना कब्जा जमा लिया है। प्रशासनिक अफसरों को इसकी जानकारी होते हुए भी वे मौन साधे चुप बैठे हुए है।
बृज के जिस एक मात्र पर्व को प्रदेश शासन ने राजकीय मेले का दर्जा देकर उसका संरक्षण करने का प्रयास किया उसी मेले की मुख्यतम परम्परा के संवाहक चैतन्य महाप्रभु के शिष्य एवं उनके मठ मन्दिर आदि इन दिनों क्षेत्रीय भूमाफियाओं की दबंगई के शिकार हो रहे है। विदित हो कि बृज के गिरिराज धाम में हर वर्ष आयोजित होने वाले विश्व प्रसिद्ध मुडि़या पूनौ मेले को प्रदेश सरकार ने राजकीय मेले का दर्जा देकर इसका संरक्षण संवर्धन करने बेहतर प्रयास किया है। ये पर्व पिछले करीब पाँच सौ वर्षो से बृजनिष्ठ सन्त चैतन्य महाप्रभु की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में गौड़ीय सम्प्रदाय के सन्तों द्वारा मनाया जाता है। आषाड़ माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी से आरम्भ होने वाले पाँच दिवसीय इस मेले का समापन पूर्णिमा को सुबह श्री राधा श्याम सुन्दर मन्दिर एवं सांय श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु मन्दिर के गौड़ीय सन्तो द्वारा सिरों का मुण्डन कर संकीर्तन के साथ निकाली जाने वाली चैतन्य महाप्रभु की शोभायात्राओें के साथ होता है। इन प्राचीनतम मन्दिरों के पास मौजूद बेशुमार सम्पत्ति मन्दिरों के नाबालिक माने जाने वाले ठाकुर जी के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज है। मन्दिर के नाबालिक ठाकुर जी की सम्पत्ति कभी किसी खरीद फरोख्त, रहन गिरवी, किराये या पटटे पर नहीं नहीं दी जा सकती। इन सारे नियम कानूनों को ताक पर रखकर उप निबन्धक कार्यालयों मंे इनकी सम्पत्तियाँ लगातार खुर्द बुर्द की जा रही है। पूर्व में मुडि़या सन्तों के श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु मन्दिर के ठाकुर गोपाल जी की बरसाना रोड पर ईदगाह के बगल में स्थित अरबों रूपये कीमत की बेशकीमती भूमि पर भूमाफियाओं की नजर लगी और कस्बे के ही भूमाफियाओं ने फर्जी तरीके मन्दिर के तत्कालीन गौलोकवासी महन्त सुबल दास को बहला फुसलाकर उससे उस जमीन का फर्जी बैनामा अपने नाम कराकर उक्त भूमि पर कब्जा कर लिया। उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय ने कई बार एमवीडीए को आदेश देकर उक्त भूमि से अवैध कब्जे हटाने के आदेश दिये लेकिन अरबों की सम्पत्ति में से अपना हिस्सा पाकर एमवीडीए अधिकारी सर्वोच्च अदालतों के आदेशों को भी दरकिनार कर गये। 
अब भूमाफियाओं के एक नये मामले में मुडि़या सन्तों को उन्हीं के कस्बा स्थित आश्रम श्री राधा श्याम सुन्दर मन्दिर की बेशकीमती भूमि से बेदखल करने की साजिश सामने आयी है। माफियाओं ने ठाकुर श्री राधा श्याम सुन्दर जी की कभी भी न बेची जा सकने वाली सम्पत्ति का भी इसी प्रकार मन्दिर के महन्त तमालकृष्ण दास से बहला फुसलाकर फर्जी बैनामा करा लिया है। वास्तव में इस बार माफियाओं ने उक्त महन्त के बंगाली और अंग्रेजी भाषा के ज्ञान को ढाल एवं हिन्दी भाषा के अल्प ज्ञान को तलवार बनाकर अपनी कारगुजारी को अंजाम दिया है। इस बार ये कारगुजारी महल हंसारानी निवासी गोवर्धन निवासी इज्जतदार व्यवसाय शिक्षण से जुड़े एक शिक्षक युवक ने अपने पिता और अपनी विवाहित बहिन आदि के साथ मिलकर अन्जाम दिया है। पहले तो उक्त तथाकथित शिक्षक ने कम्प्यूटर कक्षाओं के लिये आश्रम के महन्त से एक दुकान किराये पर मांगी और फिर धीरे धीरे धोखे से उस दुकान का पटटा करा कर उसमें दो मंजिला मकान बना लिया। बाद में धोखाधड़ी कर उसने मन्दिर के पूरे ट्रस्ट और ट्रस्टियों को बदलवा कर उसमें अपना पूर्णाधिकार बना लिया। फिर एक दिन ऐसा भी आया जब उक्त तथाकथित शिक्षक ने महन्त को धोखे में रखकर उक्त आश्रम की पूरी सम्पत्ति का ही अपनी विवाहित बहिन के नाम बैनामा करा दिया। इस पूरे मामले मंे महन्त को बंगाली और अंगे्रजी भाषा का पूरा ज्ञान होने के कारण सारे कागजात हिन्दी भाषा में लिखकर महन्त के भरोसे का पूरा फायदा उठाया गया। ये सारा मामला तब खुल सका जब वे भूमाफिया उक्त आश्रम के मुडि़या महन्त और सन्तों को आश्रम से बेदखल करने लगे। अब उक्त मन्दिर के साधु मारे मारे अपनी जान बचाने को भागे फिर रहे। उन्हें डर भूमाफियाओं से डर सता रहा है कि कहीं इस सम्पत्ति के चलते उनकी हत्या न कर दी जाये। आश्रम के महन्त तमाल कृष्ण दास का कहना है कि पिछले काफी समय से वे बीमार चल रहे थे और इसी का फायदा उठा कर ये सब कारनामे अंजाम दिये जाते रहे। ऐसा नहीं है कि इस मामले की जानकारी जनपद के उच्चाधिकारियों को नहीं है बल्कि ये सारे कारनामे उन्हीं के संज्ञान में रखकर अंजाम दिये जा रहे है। अब देखना सिर्फ ये है कि संसार भर में विख्यात उत्तर प्रदेश के राजकीय मेले मुडि़या पूनौ की परम्पराओं का भविष्य में क्या हर्ष होने जा रहा है।
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शनिवार, 25 जनवरी 2014

ब्रजवासियों को चेतावनी वृन्दावन अव वनेगा वृन्दानगर।

ब्रजवासियों को चेतावनी
वृन्दावन अव वनेगा वृन्दानगर। 
लता-पता, कुण्ड-सरोवर, बाग-बगीचे, कुंज-निकुंज के अस्तित्व को मिटा फ्लैट संस्कृति में बदलता वृन्दावन।
(सुनील शर्मा)
श्री राधाकृष्ण की रासस्थली वृन्दावन का नाम लेते ही लोगों के मन में यह विचार उमड़ते हैं कि वृन्दा अर्थात तुलसी और वन अर्थात जंगल होगा तुलसीवन यानी वृन्दावन अर्थात राधाजी की वह रासस्थली जहां नूपूरों की वह मधुर आहट आने वाले हर भक्त को राधाकृष्ण की भक्तिमें लीन होने के लिए विवश कर देगी।
इसी वृन्दावन के उन वृन्दादलों की सुगन्ध ने अपनी पविव्रता और मधुरता के लिये न जाने कितने महान ऋषि-मुनियों और महान कवियों, संत-महात्माओं को और अवतारों को यहां आने के लिए प्रेरित नहीं किया, भारतवर्ष के हर कोने से असंख्य लोग यहां आते हैं। यहां की माटी ने देश के लोगों को ही नहीं विदेशी कृष्ण भक्तों को भी प्रेरित किया है।
जिस काल में उसकी गरिमा अपनी वास्तविकता और कालमहत्वता को इतिहास के अतीत में समेटे हुए लुप्त हो चुकी थी। इस समय श्री कृष्ण के अन्यन्य भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु का जब इस स्थान पर प्रथम वार आगमन हुआ तो वह विह्वल हो उठे, और उस अज्ञात आशक्ति से बंधे हुए खिंचे चले आये और आज के वृन्दावन के उस पुरातन स्वरूप की खोज की जो कृष्ण राधा के नाम से कण-कण में विंधा हुआ था।
यह कृष्ण नाम कोई एक समय रेखा से आबद्ध नहीं है कि कुछ समय के पश्चात कृष्ण का नाम वृन्दावन के साथ लुप्त या स्थिर हो जायेगा शायद यह कुछ सिरफिरों की साजिश का अंग प्राय हो सकता है।
लेकिन उस अचिर और अन्नत कृष्ण के नाम को समाप्त करना किसी की ताकत की बात नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान भी अपनी शक्ति हनुमान जी की शक्ति की तरह भूल गये हैं।
वृन्दावन से प्राचीन प्रतिमाओं की तस्करी होती थी और सुनियोजित ढंग से हो भी रही है। वर्तमान में उसका बदला हुआ स्वरूप वृन्दावन के ऐतिहासिक स्वरूप को मिटाने का एक बहुत बड़ा षड़यन्त्र चल रहा है। जिसमें बाहरी ताकतों का मिश्रण भी है। अनेक चमत्कारों से युक्त ये वृन्दावन के लाडले ठाकुर अपनी शक्ति को भूलकर विदेशी नागरिकों के घरों में भारतीय संस्कृति का एक प्रतीक बनकर चिह्न जरूर बन सकते हैं। लेकिन आराध्य या उपासना का केन्द्र नहीं बन सकते। इन अद्वितीय प्रतिमाओं की कीमत लाखों करोड़ों में आंकी जाती है, एक प्रस्तर या काठ से बनी प्रतिमा की कीमत इतनी नहीं हो सकती बल्कि वह उन लाखों करोड़ों भारतीय उपासकों की भक्ति और श्रृद्धा की कीमत है जिन्होंने अकिंचन प्रेम से उपासना की है। ये बृजवासी ही इस कलयुग में विस्मृत शक्ति को जगाकर ही वृन्दावन को बचा सकते हैं।
बंगाल के घर-घर में आज भी श्रृद्धा और भक्ति से चैतन्य महाप्रभु का नाम लिया जाता है, वह चाहे पश्चिम बंगाल हो या पूर्वी बंगाल। श्री चैतन्य महाप्रभु ने वृन्दावन से अधिक बंगाल के घर-घर में श्रीकृष्ण के नाम को बसा दिया जैसे मनुष्य के प्राण। श्री चैतन्य महाप्रभु के दिखाये श्रीकृष्ण प्रेम के मार्ग पर चलकर श्रीकृष्ण के निश्छल प्रेम से अभिभूत बंगाल से विधवायें और असहाय महिलायें वृन्दावन के नाम से नतमस्तक होकर अपने जीवन को धन्य मानते हुए यहां आने को लालायित रहतीं हैं, और आज जब वे वृन्दावन आतीं हैं तो उनका रोम-रोम काॅंप उठता है कि यहीं क्या वो चैतन्य महाप्रभु द्वारा खोजा गया ”वृन्दावन“ है।
उस चैतन्य महाप्रभु के ”वृन्दावन“ को ढूढ़ती हुयी अनेक महिलाओं के जीवन के अनेक बसन्त व्यतीत हो चुके हैं, लेकिन आज तक वही वृन्दावन खोजने का क्रम जारी है और 10-15 वर्ष की अवस्था में वृन्दावन आयीं ये बेसहारा और असहाय विधवायें और परितक्यतायें अपने यौवन और शक्ति को खोकर वृद्ध और लाचार हो चुकी हैं, आज इन महिलाओं के पास सस्ते और सुरक्षित रहने को मकान नहीं हैं। जब वे वृन्दावन आयीं थीं, उस समय इन महिलाओं के पास पचास पैसे या एक रुपया महिना पर मकान किराये पर थे।
प्रमाणिकता है कि वृन्दावन मुख्य रूप से सात देवालयों की जागीर था तथा इन देवालयों में से अधिकतर बंगालियों से सम्बन्धित थे। उस समय श्री मदन मोहन जी, गोविन्द देव जी, राधा दामोदर, श्याम सुन्दर जी, राधारमण जी, गोपी नाथ जी व गोकुलानन्द जी मुख्य सात देवालय थे। वृन्दावन की सारी जायदाद श्री मदन मोहन जी महाराज व गोविन्द देव जी के हाथों थी। बताया जाता है कि इन मन्दिरों के भक्त धनी-मानी राजाओं व व्यक्तियों ने अपने जीवन के कुछ समय के लिए वृन्दावन वास के लिए बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण कराया था। इन लोगों में कुछ धनी मानियों ने अपनी जायदाद मन्दिर को समर्पित कर दीं इन जायदादों के साथ मन्दिरों को काफी अचल सम्पत्ति प्राप्त हो गयी।
कभी जागीरदार कहीं जाने वाली इन मन्दिरों की हालात वर्तमान में काफी खस्ता नजर आने लगी है, जहां पूर्व में इन जायदादों की कोठरियों में बंगाल से आयी कृष्ण भक्त परित्यक्तायें व विधवायें काफी सस्ते व कल्पना से परे आराम से जीवन व्यतीत करती थीं। आज वे ही बेघर होकर अनिश्चित भविष्य के दौर से मोक्ष की कल्पना से आशंकित हैं। जागीरदार मन्दिरों के कुछ मन्दिरों के महन्तों ने अपने मन्दिर की वेशकीमती जायदादों को भू-माफियों को ऊँची-ऊँची कीमत पर बेचकर ऐतिहासिकता को समाप्त करना शुरू कर दिया है। क्या इन मन्दिरों के पास अपने मन्दिरों की देखभाल करने की धनराशि नहीं है या वे वर्तमान की धनपतियों के काले धन की लालच में ऐशो आराम की जिन्दगी व्यतीत करने के लिए मंदिरों की जायदादों की आहुति चढ़ा रहे हैं।
कानूनी प्रक्रिया की दृष्टि से देखा जाये तो हिन्दू देवत्व सम्पत्ति अधिनियम के अनुसार किसी भी देवालय की देवत्व सम्पत्ति को बिना आगरा मण्डल के आयुक्त महोदय की स्वीकृति के बिना बेचा नहीं जा सकता है और न ही लीज पर ही दिया जा सकता है। इसके बाद भी तथाकथित सेवायत महन्त किस प्रकार से कानून का उल्लघंन करके किसकी शय पर मंदिरों की जायदादों से भू-माफिया और भू-पतियों को जायदाद बेच रहे हैं। क्या इसमें प्रशासन की मौन स्वीकृति है या भू-माफियाओं के हाथ इतने लम्बे हैं कि प्रशासन या शासन खामोश बैठकर वृन्दावन की एतिहासिकता को समाप्त करने पर तुला हुआ है। ब्रजवासियों का ध्यान अभी इस ओर नहीं गया है कि यदि वृन्दावन की ऐतिहासिकता समाप्त हो गयी तो क्या मन्दिरों की बजाय फ्लैटों या कोठियों को देखने के लिए वृन्दावन कौन आयेगा।
यदि बात विकास की हो तो बुरा नहीं लगेगा लेकिन जब वहां की संस्कृति को बिगाड़ कर उसका स्वरूप बदल देने की योजना हो तो अवश्य ही बुरा लगेगा। वर्तमान में वृन्दावन में जो फ्लैट संस्कृति शुरू हुई है उसकी वजह से वृन्दावन में लता-पता, कुण्ड-सरोवर, बाग-बगीचे, कुंज-निकुंज के अस्तित्व को मिटा दिया गया है। और होड़ शुरू हुई है दिल्ली की पांच सितारा संस्कृति से जो और अधिक विकृत है। आज वृन्दावन में ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हो गयीं हैं। इमारतों के नीचे पार्किंग का धन्धा चल रहा है बहुमंजिली इमारतों में रहने, सोने, खाने-पीने के सभी सुख साधन मौजूद हैं गेस्ट हाउस बनाकर यात्रियों को ठहराकर यात्रियों की जेब हल्की करने का धन्धा वृन्दावन में आजकल जोरों पर है। इस प्रकार की मारा-मारी के बीच वृन्दावन में जमीनों के रेट आसमान छू रहे हैं। किसी जगह का मालिक कोई है, फर्जी झगड़ाकर मुकदमा अदालत में दाखिल करा दिया जाता है गुमराह करके स्टे आर्डर हासिल कर लिया जाता है। जब मालिक को इस घटना का मालुम होता है, तब तक वह जमीन या जायदाद बिककर असरदार लोगों के हाथ में पहुंच जाती है या उस पर जबरन कब्जा कर लिया जाता है। इस प्रकार के घटनाक्रम में पुलिस की भी अप्रत्यक्ष सहमति रहती है।
विलासिता से दूर भागते लोगों का पलायन उसी प्रकार से होने लगा है जिस प्रकार भौतिकवाद से दूर भागते अंग्रेजों को भारत में धार्मिकता में शान्ति व सुख मिलने लगा है। ऐसे ही लोग वृन्दावन में विलासिता से दूर आकर शनिवार व रविवार को वृन्दावन भ्रमण के आनन्द के साथ-साथ धार्मिक बनने का प्रयास कर रहे हैं। इन्हीं लोगों में से कुछ लोगों ने वृन्दावन में अपना स्थायी निवास बनाने का मन बना कर जमीनों को क्रय करना शुरू किया। इसकी देखा देखी अन्य स्थानीय छोटे-छोटे मध्यस्थों ने भी इस व्यवसाय को अपनाकर विवादास्पद जमीनों व मकानों को खरीदने-बेचने का धन्धा शुरू कर दिया है।
आज स्थिति यह है कि जिसको जहां जगह मिल रही है वहीं फ्लैट बनाये जा रहे हैं। बहुमंजिली इमारतों व फ्लैटों के निर्माण के लिए जमीनों की खरीद-फरोख्त का सिलसिला अधिक पुराना नहीं है। सर्वप्रथम रमणरेती मार्ग पर इस्काॅन मन्दिर की स्थापना से ही इस क्षेत्र में जमीनों व मकानों की कीमत दिन दूनी रात चैगुनी बढ़ने लगी। आज इस क्षेत्र में कीमत प्रतिवर्ग गज बीस हजार से पचास हजार रुपये के करीब है जो कि दिल्ली के किसी भी क्षेत्र की तुलना में सर्वाधिक है। 
सुनील शर्मा 9319225654 

बुधवार, 28 अगस्त 2013

मंदिरों में अलग अलग तरह से मनाई जाती है जन्माष्टमी

श्रीधाम वृंदावन आने का सौभाग्य प्राप्त होने पर भी यदि वृंदावन में बाँकेबिहारी के दर्शन न किये जाये तो तीर्थ करना अधूरा ही रह जाता है। 
बाँकेबिहारी के मंदिर का निर्माण लगभग संवत् 1921 में हुआ इस मंदिर का निर्माण स्वामी हरिदास जी के वंशजों के सामुहिक प्रयासों से हुआ। आरंभ में किसी धनी मानी व्यक्ति का धन इस मंदिर में नहीं लगाया गया। 
श्रीस्वामी हरिदास जी बाल्यकाल से ही संसार से विरक्त थे। वह एक मात्र श्यामाश्याम का ही गुणगान किया करते थे। यमुना के निकट निर्जन स्थान पर युगल छवि में ध्यान मग्न रहा करते थे। उन्होंने 25 वर्षों की अवस्था में विरक्तवेश ले लिया था।
आप ने जहां जिस स्थान पर निधिवन में युगल छवि का ध्यान किया था। वहीं पर श्रीविग्रह भूमि से बाहर निकाले जाने का स्वप्नादेशानुसार श्रीस्वामी जी की आज्ञा पाकर श्री विठल विपुल आदि शिष्यों ने बाँके बिहारी को भूमि से प्राप्त किया था। आज बाँके बिहारी अपनी रूप माधुरी से विश्व के तमाम लोगों को रिझाते हैं। यहां वर्ष में एक ही दिन हरियाली तीज को ठाकुर स्वर्ण हिंडोले में विराजते हैं जिसके दर्शनों को लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। चैत्र मास की एकादशी से श्रावण मास की हरियाली अमावस्या प्रतिदिन ठाकुर जी का फूल बंगला सजाया जाता है। 
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन बाँके बिहारी के मंदिर में कोई विशेष आयोजन तो नहीं होते है लेकिन यहां जन्माष्टमी का अभिषेक रात्री 2ः30 के करीब होता है। प्रातः 5 बजे से मंगला आरती के दर्शन होते हैं। यहां की एक विशेषता और है कि बाँके बिहारी जी की निकुंज सेवा होने के कारण आरती में कोई शंख घण्टा घडि़याल नहीं बजते शान्तभाव में आरती होती है।

गोविन्द देव जी का मंदिर
श्रीगोविंद देव जी का मंदिर वृंदावन में प्रसिद्ध व प्राचीन मंदिर है। उत्तर भारतीय स्थापत्य शैली का लाल पत्थर का बना प्राचीनतम मंदिर है वर्तमान स्वरूप में जो मंदिर दिखाई देता है यह भवन औरंगजेब के अत्याचारों एवं क्रूरता का साक्षी है। इसके ऊपर के हिस्से को तोड़ दिया गया था। आकाशचुम्बी इस मंदिर का निर्माण गौड़ीय गोस्वामी श्री रूप सनातन गोस्वामी के शिष्य जयपुर नरेश श्री मानसिंह ने सवंत् 1647 में कराया था। आताताइयों के आक्रमण करने से पूर्व ही राजा मानसिंह के जयपुर स्थित महल में यहां के श्री विग्रह को स्थानांतरित कर दिया गया था। आज भी जयपुर में गोविंददेव जी राजा के महल में विराजमान है तत्पश्चात संवत 1877 में पुनः बंगाल के भक्त श्री नंदकुमार वसु ने श्री गोविंददेव के नये मंदिर का निर्माण कराया यहां श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन विधिविधान से पूजा अर्चना अभिषेक का कार्यक्रम होता है। 

श्रीरंगजी मंदिर
श्री वृंदावन का यह भव्य विशाल मंदिर के सामने वाली मुख्य सड़क पर बना हुआ है। दक्षिण भारतीय शैली का अद्भुत मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण सेठ श्री राधाकृष्ण, उनके बड़े भाई सेठ लक्ष्मीचंद तथा छोटे भाई सेठ गोविंद दास जी ने कराया। श्रीरामानुज सम्प्रदाय का अति विशाल मंदिर स्थापत्थ कला की दृष्टि से भारत में एक अलग स्थान रखता है। यह मंदिर आकार में बहुत बड़े भूभाग को संजोये हुए है। इसमें पांच परिक्रमाएं हैं। जो ऊँचे-ऊँचे पत्थरों के परकोटों से विभक्त है। भीतरी परिक्रमा में श्री हनुमान जी, श्री गोपाल जी, श्रीनृसिंह जी के श्री विग्रह हैं। यहां एक पुष्करणी भी है जहां वर्ष में एक बार भाद्र पद मास में गजग्राह लीला का प्रदर्शन होता है। चैथे व प्रधानद्वार बैकुण्ठद्वार और नैवेद्य द्वार से तीन विशाल द्वार बने हुए है। इसी में 60 फुट ऊँचा स्वर्णमय विशाल गरूड़ स्तम्भ (सोने का खम्भा जिसे सोने के खम्भे का मंदिर भी कहा जाता है।) चैत्र मास में विशाल रथ यात्रा भी निकाली जाती है।

श्रीकृष्ण बलराम मंदिर (इस्कॉन मंदिर)
इसका निर्माण श्री एसी भक्तिवेदान्त स्वामी द्वारा स्थापित श्रीकृष्ण भावनात्मक संघ के तत्वावधान में सन् 1975 में हुआ था। प्रभुपाद के अनेक विदेशी कृष्ण भक्तों की देख-रेख में सेवा पूजा आदि समस्त व्यवस्थाएं सम्पन्न होती हैं यह मन्दिर अंग्रेज मन्दिर के नाम से भी प्रसिद्ध है। तीन सुंदर कक्षों में बायी ओर निताई गौरांग महाप्रभु मध्य में श्रीकृष्ण बलराम के अति मनोहारी छवि विराजमान है तो दायीं ओर श्रीराधाश्यामसुंदर युगल किशोर सुशोभित हैं। सभी श्री विग्रह अद्भुद वस्त्र आभूषण पुष्प मालाओं तथा मणिमय अलंकारों से श्रृंगारित होकर दर्शकों के मन को आकर्षित करते है। यहांँ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन भजन कीर्तन तथा प्रसाद वितरण होता है। रात्रि में अभिषेक का कार्यक्रम होता है, लाखों तीर्थ यात्री मंदिर में आते हैं।

मथुरा में द्वारकाधीश मन्दिर
मथुरा में असकुण्डा बाजार में स्थित यह मन्दिर सांस्कृतिक वैभवकला और सौंदर्य के लिये अनुपम है। इस मन्दिर का निर्माण सन् 1814-15 में ग्वालियर राज्य के कोषाध्यक्ष सेठ गोकुल दास पारीख ने कराया था। इनकी मृत्यु के उपरांत इनकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी सेठ लक्ष्मीचंद ने मंदिर के निर्माण को पूर्ण कराया था। 1930 में इस मंदिर की सेवा पूजा पुष्टिमार्गीय वैष्णव आचार्य गोस्वामी गिरधर लाल जी कांकरौली को भेंट स्वरूप दे दिया था। यहाँ सेवा पूजा अर्चना पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय के अनुसार ही होती है। श्रावण मास में प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु यहां सोने व चाँदी से निर्मित हिंडोले को देखने आते है। यहां जन्माष्टमी के दिन 108 सालिगराम का पंचामृत अभिषेक होता है तथा यहां अष्टभुजा द्वारकानाथ के श्रीविग्रह का भी पंचामृत अभिषेक किया जाता है। 

श्रीकृष्ण जन्मस्थान
यह मथुरा का एक मात्र पवित्र धार्मिक स्थल है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म इसी स्थान पर स्थित कंस के कारागार में हुआ था। वर्तमान समय में इस स्थान पर भव्य मंदिर स्थापित है जिसे देखने वर्ष भर लाखों तीर्थ यात्री श्रद्धालु पर्यटक आते हैं।
देश-विदेश से लाखों यात्री प्रतिवर्ष तो आते ही है लेकिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन यहां जन्माष्टमी पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यहाँ के विशाल मंच पर रासलीला नाटक, कथा प्रवचन आदि उत्सव नित्य प्रति होते रहते हैं।
जन्माष्टमी के दिन रात्रि के 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय श्रीविग्रह का पंचामृत अभिषेक होता है। इसके बाद श्रद्धालु नाचते, गाते, कीर्तन करते हुए भाव विभोर हो जाते हैं। 
इस मंदिर का निर्माण महामना मदन मोहन मालवीय जी की सद्प्रेरणा से जुगल किशोर विड़ला व जय दयाल डालमियो ने कराया था विशाल भागवत भवन का निर्माण भी उन्हीं के द्वारा कराया गया था।

केशवदेव में जन्माष्टमी एक दिन पूर्व मनाई गई
मथुरा। प्राचीन केशव मंदिर में एक दिन पूर्व मनाई गई जन्माष्टमी पंचामृत अभिषेक के पश्चात आकर्षक झांकियों में हुए दर्शन हजारों की संख्या में दर्शनार्थियों ने देर रात को भगवान केशव देव के अभिषेक के दर्शन किए। 
जन्म के दर्शन से पूर्व भजन-कीर्तन चलते रहे। महिला-पुरुष नाचते-गाते रहे। पुराने केशवदेव की प्रतिमा को जगमोहन से बाहर लाया गया। रात्रि ठीक 12 बजे गोस्वामियों ने अभिषेक कराया। दही, मधु, शक्कर, दूध, जल से अभिषेक कराने के बाद भव्य दर्शन हुए। बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। दर्शन के लिए मंदिर के पट खुलते ही सभी दोनों हाथ उठाकर जय कन्हैया लाल की, कह उठे। शंख, घंटा, घडि़याल बज उठे चारों ओर रोशनी की गई थी मंदिर में विद्युत सजावट से जगमगा रहा था। 
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श्रीकृष्णा जन्माष्टमी पर समूचा ब्रज जय कन्हैया लाल की के उद्घोषों से गूंजा
चैतरफा रही भण्डारों की धूम
तीर्थ विकास परिषद द्वारा यमुना पैलेस व कृष्णानगर में बेरीवाल कॉम्पलैक्स पर रही तीर्थयात्रियों की भीड़
मथुरा। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर सुबह से ही लोग बंदरवार, फूलमाला, केला के पत्ते आदि सामान खरीदते नजर आये। वहीं बाहर से आए श्रद्धालु श्रीकृष्ण जन्मस्थान और द्वारकाधीश मंदिर की ओर बढ़ते नजर आए टोल के टोल राधे-राधे का कीर्तन करते बोल कृष्ण कन्हैया लाल की जयकारा लगा कर मंदिरों की ओर जा रहे थे। 
नगर के चारों तरफ के रास्तों को जिला प्रशासन ने सुरक्षा के लिहाज से वाहनों को बेरीकेटिंग करके बंद करा दिया था। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को मीलों पैदल चलकर मंदिरों तक पहुंचना पड़ा। जगह-जगह भण्डारा पूड़ी, हलवा, खीचड़ी तथा व्रत का प्रसाद वितरण किया जा रहा था। 
श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर मनोहारी विद्युत लाइटों से सजावट किया गया। नगर में हर तरफ सजावट मंदिरों में जन्माष्टमी की धूम दिखाई दे रही थी। विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर जन्माष्टमी देखने पहुंचे। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व को लेकर आज समूचे बृजमण्डल में आपार श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना हुआ है। शहर के बाजार और घर-घर पर लगे वंदनवार और सजाबट देखते ही बनती है। समूचे बृज में कान्हा के जन्मोत्सव की धूम मची हुई है। मंदिर द्वारिकाधीश, श्रीकृष्णजन्मस्थान को जाने वाले सभी मार्ग सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ से भरे पड़े थे। सुदूर प्रांतों से कान्हा के जन्मोत्सव में शामिल होने आये भक्तों के स्वागत सत्कार में बृजवासियों ने भी कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। मुख्य बाजारों में स्थान-स्थान पर पूड़ी सब्जी और व्रत से जुड़े आहार के वितरण में समाजसेवी और व्यवसायिक संस्थान अग्रणी भूमिका निभा रहे थे। तीर्थ यात्रियों की सुख सुविधा के लिए स्थान-स्थान पर लगाये गये भण्डारे और ठण्डे पानी के प्याऊ के अलावा चाय का वितरण भी जगह जगह किया जा रहा था। जन्माष्टमी एवं नन्दोत्सव के मौके पर फलाहारी प्रसाद तीर्थयात्रियों एवं भक्तों में वितरित किया गया। शहर के कैन्ट रेलवे स्टेशन के निकट टैम्पू स्टैण्ड, क्वालिटी तिराहे, पुराने बस स्टैण्ड, जवाहर हाट, पुराने डाक खाने के निकट आगरा रोड व्यवसायी समिति द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के छप्पनभोगों के दर्शनों के साथ भण्डारे का आयोजन किया गया। कृष्णा नगर स्थित गोवर्धन चैराहे के निकट समाजसेवी अशोक बेरीवाल द्वारा विशाल भण्डारे का आयोजन किया गया। इसके अलावा अप्सरा सिनेमा के सामने जीएमसी सर्राफा मार्केट गुरूद्वारे के निकट मुकुंद कॉम्पलेक्स, होलीगेट चैराहे, कोतवाली रोड, भरतपुर गेट, दरेसीरोड, डीगगेट, आर्य समाज रोड, छत्ताबाजार, विश्राम बाजार, स्वामी घाट, डोरीबाजार, चैकबाजार, वृंदावन दरबाजा, घीयामण्डी क्षेत्रों में भण्डारों के आयोजन किये गये। भण्डारों के आयोजनों के कारण आज बृजभूमि में अधिकांश खान-पान की दुकाने या तो बंद रही अथवा उन पर सन्नाटा छाया रहा। इस बार  अन्ना हजारे के समर्थकों ने भी अन्ना हजारे के पोस्टर वेनर लगा कर भण्डारे का आयोजन किया और श्रद्धालुओं को प्रसाद का वितरण किया तथा जगह जगह प्याऊ भी लगाई। 

मथुरा के स्कूलों में भी मनाई गई जन्माष्टमी
मथुरा। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पूर्व वेला में स्थानीय लोग ब्रजवासियों ने लाला कन्हैया का जन्म-गीत, नृत्य, कृष्ण-झांकी और आरती के साथ हर्षोल्लास पूर्वक मनाया। घर घर  में वंदनवार बांधी गई थीं, हल्दी के मंगलसूचक थापे लगाए गये थे और कृष्णजन्म के लोकगीत गूंजते रहे। यहां स्कूल काॅलेजों में भी बाल-कलाकारों ने सामूहिक रूप से गायन किया-मथुरा में जमंन भयौ कन्हैया जू कौ हरे-हरे, कन्हैया जू कौ जनंम भयौ। ‘‘दुस्ट कंस के कारागृह में कटे देवकी फंद, कारे कजरारे मेघों में उदित भयौ एक चंद’’, अमृत रस बरस उठा। जगह जगह श्रीकृष्ण जन्म की कथाओं का वर्णन किया जा रहा था जगह जगह लोग नाच गा रहे थे। विभिन्न लीलाओं को रास के माध्यम से लोगों का मनोरंजन किया जा रहा था। 

घर घर जन्मे कृष्ण कन्हाई!

गीता के नायक, लीला पुरूषोत्तम, योगीराज श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्णा अष्टमी को हुआ था। देश के प्रायः सभी प्रान्तों में श्रीकृष्णजन्माष्टमी का पर्व असीम श्रद्धा,भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। जन्माष्टमी का यह पर्व विदेशों में भी धूम धाम से मनाया जाता है।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर ब्रज के कण कण में अपूर्व हर्षोल्लास छा जाता है। आज भी घर आगंन को गोवर से लीपा जाता है चैक पूरे जाते हैं द्वार पर बंदरवार बांधी जाती है, मंगल सूचक थापे लगाये जाते हैं और फूलों से पालने को सजाकर ब्रजकी बालाएं गाती हैं।
‘‘डोरी फूलन को पालनों, आजु नन्द लाला भए’’।
ब्रज के घर घर में भगवान को नये वस्त्र पहना कर उनका श्रंगार करके झांकियां सजाई जाती है। महिलाएं अपने यहां रखे सालिगराम की वटिया को एक खीरे में रख कर डोरे से बांध कर श्री कृष्ण के जन्म समय मध्य रात्रि को 12 बजे उसे खीरे में से निकाल कर पंचामृत स्नान कराती हैं। इस प्रकार से भगवान श्री कृष्ण का प्रतीक रूप में जन्म की भावनाएं संजोई जाती हैं। स्त्री पुरूष बच्चे भी श्री कृष्ण के जन्म के दर्शन के उपरान्त ही अपना व्रत खोलते हैं।
मथुरा स्थित कंस का कारागार स्थल भगवान केशवदेव और नगर के मध्य विराजमान ठाकुर द्वारकानाथ द्वारकाधीश मंदिर में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। इस अवसर पर अपार जनसमूह उमड़ पड़ता है।
ब्रज के प्रत्येक घर आंगन में शंख घन्टा घडि़याल की ध्वनि ऐसे गंज उठती है मानों वहां किसी बालक का जन्म हुआ हो इस प्रकार ब्रज के हर घर घर में कृष्ण जन्म लेते हैं लोग आपस में बधाईयां देते हैं भक्ति भावनाओं में विभोर होकर ब्रजवासी नांचने गाने लगते हैं ‘‘नन्द के आनन्द भए जय कन्हैया लाल की’’ गाते हुए हर तरफ टौलियां नजर आने लगती है।
भगवान श्री कृष्ण का जन्म अर्धरात्रि के समय कंस के कारागार में होने के वाद उनके पिता वसुदेव जी कंस के भय से बालक को रात्रि में ही यमुना नदी को पार कर नन्द बाबा के यहां गोकुल छोड़ आये थे। इसी लिए कृष्ण जन्म के दूसरे दिन गोकुल में नन्दोत्सव मनाया जाता है। भाद्र पद नवमी के दिन समस्त ब्रजमंड़ल में नन्दोत्सव की धूम रहती है। यह उत्सव दधिकांदों के रूप मनाया जाता है दधिकांदो का अर्थ है दही की कीच। हल्दी मिश्रत दही फेंकने की परम्परा आज भी निभाई जाती है। मंदिर के पुजारी नन्दबाबा और जशोदा के वेष में भगवान कृष्ण के पालने को झुलाते हैं। मिठाई, फल व मेवा मिश्री लुटायी जाती है। श्रद्धालु इस प्रसाद को पाकर अपने आपको धन्य मानते हैं। 
वृंदावन में उत्तर भारत के विशाल श्री रंगनाथ मंदिर में ब्रज नायक भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के दूसरे दिन नन्दोत्सव की धूम रहती है। नन्दोत्सव के दौरान सुप्रसिद्ध लठ्ठे के मेले का आयोजन किया जाता है। धर्मनगरी वृंदावन में श्री कृष्ण जन्माष्टमी जगह-जगह मनाई जाती है किन्तु उत्तर भारत के सबसे विशाल मंदिर में नन्दोत्सव की निराली छटा देखने को मिलती है। दक्षिण भारतीय शैली के प्रसिद्ध श्री रंगनाथ मंदिर में नन्दोत्सव के दिन श्रद्धालु लठ्ठा के मेला की एक झलक पाने को टकटकी लगाकर खड़े होकर देखते रहते हैं। जब भगवान रंगनाथ रथ पर विराजमान होकर मंदिर के पश्चिमी द्वार पर आते हैं तो लठ्ठे पर चढ़ने वाले पहलवान भगवान रंगनाथ को दण्डवत कर विजयश्री का आर्शीवाद लेकर लठ्ठे पर चढ़ना प्रारम्भ करते हैं। 35 फुट ऊंचे लठ्ठे पर जब पहलवान चढ़ना शुरू करते हैं उसी समय मचान के ऊपर से कई मन तेल और पानी की धार अन्य ग्वाल-वालों द्वारा लठ्ठे के सहारे गिराई जाती है। जिससे पहलवान फिसलकर नीचे जमीन पर आ गिरते हैं। जिसे देखकर श्रद्धालुओं में रोमांच की अनुभूति होती है। पुनः भगवान का आर्शीवाद लेकर ग्वाल-वाल पहलवान एक दूसरे को सहारा देकर लठ्ठे पर चढ़ने का प्रयास करते है। तो तेज पानी की धार और तेल की धार के बीच पूरे जतन के साथ ऊपर की ओर चढ़ने लगते हैं। कई घंटे की मशक्कत के बाद आखिर ग्वाल-वालों को भगवान के आर्शीवाद से लठ्ठे पर चढ़कर जीत हासिल करने का मौका मिलता है। इस रोमांचक मेले को देखकर देश-विदेश के श्रद्धालु अभिभूत हो जाते हैं। ग्वाल-वाल खम्भे पर चढ़कर नारियल, लोटा, अमरूद, केला, फल मेवा व पैसे लूटने लगते हैं। 
इसी प्रकार वृंदावन में ही क्या जगह-जगह भगवान श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर नन्दोत्सव मनाया जाता है। ब्रहमकुण्ड स्थित हनुमान गढ़ी में नन्दोत्सव के दौरान मटकी फोड़ लीला का आयोजन किया जाता है। 15 फुट ऊंची मटकी को ग्वाल-वाल पिरामिड बनाकर मशक्कत के साथ मटकी को फोड़ते हैं। एवं दधिकांधा उत्सव का आयोजन भी होता है।

झारखण्ड़ के रांची से 16 जून से लापता यूको बैंक के सीनियर मैनेजर भटटाचार्य का आज तक पता नही चला।

झारखण्ड़ के रांची से 16 जून से लापता यूको बैंक के सीनियर मैनेजर भटटाचार्य का आज तक पता नही चला। 
झारखण्ड़ में यूको बैंक की रांची की ध्रूवा शाखा के सीनियर मैनेजर मथुरा निवासी श्री सुधीरंजन भटटाचार्य 16 जून 2013 से लापता हैं। बैंक के सीनियर मैनेजर को एक षड़यत्र के तहत अगुवा किया गया हैं। परिजनों ने उसकी तलाश में डीजीपी से लेकर पुलिस के तमाम अधिकारियों के यहां दस्तक दी तथा बैंक अधिकारियों तक से सम्पर्क साधा लेकिन कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिल पाया और कहीं से अब तक कुछ पता नही चल सका है कि आखिर बैंक मैनेजर कहां गये। उनकी पत्नी के अनुसार बैंक के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि वह रांची के दो बिल्डरों द्वारा यूको बैंक ध्रूवा व्रांच के साथ करीव तीन करोड़ रुपयों की धोखाधड़ी कर ओवर ड्राफ्ट के माध्यम से बैंक के करेन्ट एकाडन्ट से रकम निकालने के वाद उस रकम को बैंक में जमा नहीं करा रहे थे। जिसे लेकर बैंक के सीनियर मैनेजर सुधीरंजन भटटाचार्य 16 जून को सिद्धार्थ गुप्ता व मनीष मुन्डा के साथ व्यक्तिगत मुलाकात कर बैंक के बकाया के भुगतान को सेटेलमेन्ट कराने की गरज से घर से निकले थे। 
मथुरा स्थित कृष्णा नगर पुलिस चैकी क्षेत्र की मधुबन एंकलेव काॅलोनी निवासी सुधीरंजन भटटाचार्य आठ माह पूर्व ही झारखण्ड के रांची की ध्रूवा शाखा में स्थानांतरित हुए थे। श्री भटटाचार्य पूर्व में मथुरा की गोविन्द गंज शाखा के अलावा आस पास के तमाम जनपदों में कार्यरत थे। मृदुभाषी किन्तु अपने में ही सीमित रहने बाले श्री भटटाचार्य किसी भी व्रांच से किसी शिकायत के दोषी नहीं थे। 
श्री भटटाचार्य ने 16 जून को रात्रि 8 बजकर 43 मिनट पर अपने छोटे भाई सुरंजन भटटाचार्य से मथुरा बात की थी। जो कि श्री भटटाचार्य की अपने परिवार से यही अन्तिम वार फोन पर वार्ता हुई थी। तब तक श्री भटटाचार्य ने पूरी तरह से ठीक हालत में बात की तथा वह किसी तरह के तनाव या अवसाद की स्थिति में बातचीत नहीं कर रहे थे। 16 जून के वाद से श्री भटटचार्य ने न तो परिवार के किसी सदस्य से बात की और न ही कोई फोन उनका मिल पाया। इसके वाद परिवार में चिन्ता होने लगी तब परिवार के सदस्यों ने जब उनके मौबाइल फोन पर सम्पर्क किया तो उनके दोनों फोन बन्द मिल रहे थे। बेटे के गम में 85 वर्षीय माँ ने बिस्तर पकड़ लिया है बहन बहनोई और परिजन परेशान हैं। आखिर झारखण्ड के रांची में कहां जाकर खोजें।उनको चिनता सता रही है कि कहीं उनकी हत्या न कर दी गयी हो। 
इसके वाद उनकी पत्नी श्रीमती सुमिता भटटाचार्य किसी तरह अपने देवर और ननद के साथ रांची पहुँची जहां उन्होंने सम्बंधित यूको बैंक की ध्रुवा रांची ब्रांच में 24 जून को बैंक के अन्य कर्मचारी श्री विश्वनाथ और श्री सी.पी सिंह से मुलाकात की तो जानकारी मिली कि उनके पति श्री सुधीरंजन भटटाचार्य करीब 8 जून से 13 जून तक छुटटी पर थे। फिर 14 जून को भी वह बैंक में डयूटी पर नहीं पहुँचे साथही 15 जून को श्री भटटाचार्य ने श्री विश्वनाथ को मैसेज किया कि वह सोमवार को बैंक जोईन करेंगे तथा उन्होंने लिखा कि वह मनीष व सिद्धार्थ से ओवर ड्राफ्ट को एडजेस्ट कराने के लिए मुलाकात भी करेंगे। श्री भटटाचार्य ने श्री विश्वनाथ को 16 जून रात्रि 8 बजकर 45 मिनट पर फिर मैसेज दिया कि मैं मनीष से मुलाकात करने के लिए बिटसा चैक पर इन्तजार कर रहा हूँ।
इसके वाद से श्री सुधीरंजन भटटाचार्य का कोई पता नहीं चल पा रहा है कि आखिर 16 जून से लापता एक बैंक के सीनियर मैनेजर कहां गये। उनकी पत्नी ने बराबर फोन पर सम्पर्क करने का प्रयास किया लेकिन उनका कोई सम्पर्क उनसे नही हो पाया है। बताया जाता है कि सिद्धार्थ गुप्ता व मनीष मुन्ड़ा काफी प्रभावशाली व बाहुबलि बिल्डर्स हैं जिनके खिलाफ झारखण्ड़ में तथा रांची मे कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। 
श्री सुधीरंजन भटटचार्य ने अपने फ्लेट 404 जगन्नाथ एपार्टमेन्टस सिंह मोड़ लातमा रोड़, हेशंग हातिया, रांची में अपने कमरे में दो पत्र लिख कर छोडे़ हैं जोकि एक सिद्धार्थ गुप्ता व मनीष मुन्डा के नाम लिखे हैं जिसमें बैंक की ओर से ओवर ड्राफ्ट की रकम शीघ्र जमा कराने के लिए लिखा है तथा न जमा कराने की स्थिति में बैंक काननी कार्यवाही करने के लिए व बसूली करने की कार्यवाही कर सकती है। मनीष मुन्डा के पत्र में श्री भटटाचार्य ने धमकी दिये जाने व जान से मारने की धमकी का जिक्र भी किया है। साथ ही जल्द मुलाकात कर ओवर ड्राफ्ट की रकम के सम्बन्ध में वार्ता करने का जिक्र भी किया है। 
श्री भटटाचार्य की पत्नी श्रीमती सुमिता भटटाचार्य के अनुसार उन्होंने प्रदेश के डीजीपी से लेकर आईजी, एसएसपी समेत सम्बधित थाने में जाकर सम्पर्क किया था लेकिन किसी ने उनकी कोई मदद नही की। उन्होंने बताया कि यूको बैंक के जोनल मैनेजर श्री जी.पी भौमिक से भी मुलाकात की वह भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके। भटटाचार्य के एक टैªवेल एजेन्ट श्री अशोक से भी सम्पर्क किया था। वह भी चुप्पी साधे हुए थे लगता है कि उनको कुछ न कुछ तो मालुम है। 
श्रीमती भटटाचार्य ने थानाध्यक्ष जगरनाथपुर थाना रांची में एक लिखित शिकायत दर्ज कराई है। जिसमें शीघ्र पति को ढूंढ कर उनके बारे सूचना देने की गुहार लगाई है।  
बैंक का स्टाफ और पुलिस पूरी तरह से बाहुबलियों के इशारे पर काम कर रही है। श्रीमती भटटाचार्य का कहना है कि बैंक से लापता बैंक अधिकारी के विषय में बैंक ने पुलिस में रिर्पोट क्यों नहीं दर्ज कराई और बैंक द्वारा समाचार पत्रों में कोई सूचना प्रकाशित क्यों नही कराई गई तथा उनके परिवार से सम्पर्क क्यों नहीं किया गया आखिर क्या बजह थी कि श्री सुधीरंजन भटटाचार्य को बैंक ने आनन फानन में निलंबित कर दिया तथा इस आशय का नोटिस भी बैक में चसपा करा दिया। बताया जाता है  िकइस घटना के वाद जोनल मैनेजर से लेकर बैंक में कार्यरत अधिकारियों को भी ट्रांसफर कर दिया गया है। 
बैंक के अधिकारियों को मनीष और सिद्धार्थ के विषय में पूरी जानकारी है। मेरे पति को किसी न किसी षड़यत्र के तहत फंसाया जा रहा है और उनके साथ कुछ भी हो सकता है। दोनो पत्रों के मजमून से और सारा घटनाक्रम तो सिद्धार्थ और मनीष की ओर इशारा करते हैं और कहीं न कहीं पुलिस और बैंक के अधिकारियों की मिलीभगत से इन दोनों ने ही बैंक के सीनियर मैनेजर को ठिकाने न लगा दिया हो एसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है, घटना जो भी हो सामने आनी चाहिए।  
  

मंगलवार, 7 मई 2013

जन-गण-मन के सामने वन्दे मातरम की हार !

वन्दे मातरम व जन-गण-मन वन्दे मातरम की कहानी ये वन्दे मातरम नाम का जो गान है जिसे हम राष्ट्रगीत के रूप में जानते हैं उसे बंकिम चन्द्र चटर्जी ने 7 नवम्बर 1875 को लिखा था। बंकिम चन्द्र चटर्जी बहुत ही क्रन्तिकारी विचार व्यक्ति थे। देश के साथ- साथ पुरे बंगाल में उस समय अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त आन्दोलन चल रहा था और एक बार ऐसे ही विरोध आन्दोलन में भाग लेते समय इन्हें बहुत चोट लगी और बहुत से ... उनके दोस्तों की मृत्यु भी हो गयी। इस एक घटना ने उनके मन में ऐसा गहरा घाव किया कि उन्होंने आजीवन अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का संकल्प ले लिया उन्होंने बाद में एक उपन्यास लिखा जिसका नाम था ‘‘आनंदमठ’’ जिसमे उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बहुत कुछ लिखा, उन्होंने बताया कि अंग्रेज देश को कैसे लुट रहे हैं, ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से कितना पैसा ले के जा रही है, भारत के लोगों को वो कैसे मुर्ख बना रहे हैं, ये सब बातें उन्होंने उस किताब में लिखी। वो उपन्यास उन्होंने जब लिखा तब अंग्रेजी सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया। जिस प्रेस में छपने के लिए वो गया वहां अंग्रेजों ने ताला लगवा दिया। तो बंकिम दा ने उस उपन्यास को कई टुकड़ों में बांटा और अलग-अलग जगह उसे छपवाया औए फिर सब को जोड़ के प्रकाशित करवाया। अंग्रेजों ने उन सभी प्रतियों को जलवा छपा और फिर जला दिया गया, ऐसे करते करते सात वर्ष के बाद 1882 में वो ठीक से छ्प के बाजार में आया और उसमे उन्होंने जो कुछ भी लिखा उसने पुरे देश में एक लहर पैदा किया। शुरू में तो ये बंगला में लिखा गया था, उसके बाद ये हिंदी में अनुवादित हुआ और उसके बाद, मराठी, गुजराती और अन्य भारतीय भाषाओँ में ये छपी और वो भारत की ऐसी पुस्तक बन गया जिसे रखना हर क्रन्तिकारी के लिए गौरव की बातहो गयी थी। इसी पुस्तक में उन्होंने जगह जगह वन्दे मातरम का घोष किया है और येउनकी भावना थी कि लो भी ऐसा करेंगे। बंकिम बाबु की एक बेटी थी जो ये कहती थी कि आपने इसमें बहुत कठिन शब्द डाले है और ये लोगों को पसंद नहीं आयेगी तो बंकिम बाबु कहते थे कि अभी तुमको शायद समझ में नहीं आ रहा है लेकिन ये गान कुछ दिन में देश के हर जबान पर होगा, लोगों में जज्बा पैदा करेगा और ये एक दिन इस देश का राष्ट्रगान बनेगा। ये गान देश का राष्ट्रगान बना लेकिन ये देखने के लिए बंकिम बाबु जिन्दा नहीं थे लेकिन जो उनकी सोच थी वो बिलकुल सही साबित हुईद्य 1905 में ये वन्दे मातरम इस देश का राष्ट्रगान बन गया। 1905 में क्या हुआ था कि अंग्रेजों की सरकार ने बंगाल का बटवारा कर दिया था। अंग्रेजों का एक अधिकारी था कर्जन जिसने बंगाल को दो हिस्सों में बाट दिया था, एक पूर्वी बंगाल और एक पश्चिमी बंगाल। इस बटवारे का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये था कि ये धर्म के नाम पर हुआ था, पूर्वी बंगाल मुसलमानों के लिए था और पश्चिमी बंगाल हिन्दुओं के लिए, इसी को हमारे देश में बंग-भंग के नाम से जाना जाता है। इस बटवारे का दंश झेलना पड़ा बंग भाषियों को और आज तक झेलते आ रहे हैं। ये देश में धर्म के नाम पर पहला बटवारा था उसके पहले कभी भी इस देश में ऐसा नहीं हुआ था, मुसलमान शासकों के समय भी ऐसा नहीं हुआ था।
खैर ............... इस बंगाल बटवारे का पुरे देश में जम के विरोध हुआ था , उस समय देश के तीन बड़े क्रांतिकारियों लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल ने इसका जम के विरोध किया और इस विरोध के लिए उन्होंने वन्दे मातरम को आधार
बनाया। और 1905 से हर सभा में, हर कार्यक्रम में ये वन्देमातरम गाया जाने लगा। कार्यक्रम के शुरू में भी और अंत में भी। धीरे धीरे ये इतना प्रचलित हुआ कि अंग्रेज सरकार इस वन्दे मातरम से चिढने लगी। अंग्रेज जहाँ इस गीत को सुनते, बंद करा देते थे और और गाने वालों को जेल में डाल देते थे, इससे भारत के क्रांतिकारियों को और ज्यादा जोश आता था और वो इसे और जोश से गाते थे। एक क्रन्तिकारी थे इस देश में जिनका नाम था खुदीराम बोस, ये पहले क्रन्तिकारी थे जिन्हें सबसे कम उम्र में फाँसी की सजा दी गयी थी मात्र 14 साल की उम्र में उसे फाँसी के फंदे पर लटकाया गया था और हुआ ये कि जब खुदीराम बोस को फाँसी के फंदे पर लटकाया जा रहा था तो फाँसी के फंदे को अपने गले में वन्दे मातरम कहते हुए पहना था। इस एक घटना ने इस गीत को और लोकप्रिय कर दिया था और इस घटना के बाद जितने भी क्रन्तिकारी हुए उन सब ने जहाँ मौका मिला वहीं ये घोष करना शुरू किया चाहे वो भगत सिंह हों, राजगुरु हों, अशफाकुल्लाह हों, चंद्रशेखर हों सब के जबान पर मंत्र हुआ करता था। ये वन्दे मातरम इतना आगे बढ़ा कि आज इसे देश का बच्चा बच्चा जानता। जन-गण-मन की कहानी सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था।
सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये।
इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director)  रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है ‘‘जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता’’ इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीकत में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था। इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है ‘‘भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero)  तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारा’ट्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो।
‘‘जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था। उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये कि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।
रविन्द्र नाथ टैगोर की अंग्रेजों के प्रति ये सहानुभूति खत्म हुई 1919 में जब जलियावाला कांड हुआ और गाँधी जी ने उनको पत्र लिखा और कहा कि अभी भी तुम्हारी अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और कहा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे। रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और (ICS) अॉफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है)। इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘‘जन गण मन’’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को न दिखायें क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी मृत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा कि ये ‘‘जन गन मन’’ गीत न गाया जाये।
1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे में बाल गंगाधर तिलक के समर्थक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु के समर्थक थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु वाला गुट चाहता था कि स्वतंत्र भारत की क्या जरूरत है, अंग्रेज तो कोई खराब काम कर नहीं रहे है, अगर बहुत जरूरी हुआ तो यहाँ के कुछ लोगों को साथ लेकर अंग्रेज साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government)  बने। जबकि बाल गंगाधर तिलक गुट वाले कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और दूसरा गरम दल। गरम दल के नेता हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे, उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना, हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत ‘‘जन गण मन’’ गाया करते थे और गरम दल वाले ‘‘वन्दे मातरम’’।
नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को  ‘‘मातरम’’ नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे, उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई। बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि ‘‘जन गन मन’’ के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया ‘‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा हमारा’’। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए। नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और ‘‘जन-गण-मन’’ ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने ‘‘जन-गण-मन’’ को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गाया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे। जन-गण-मन को इसलिए प्राथमिकता दी गयी क्यों कि यह उनके लिए गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था। तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का।
अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ? इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद्। और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये (अंग्रेजी छोड़ कर), अपने अपने ब्लॉग पर डालिए, मेरा नाम हटाइए अपना नाम डालिए मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मतलब बस इतना ही है की ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये।

जय हिंद