बुधवार, 31 दिसंबर 2025

जब पार्वती जी ब्रज में आकर ब्रजवासियों पर गुस्सा होकर चली गयीं थीं।

 बोलन्त हेला वचनन्त गारी। करीलके झाड़ कूप जलखारी। देखी कांन व्रज तुम्हारी

        जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ वसुदेव जी यमुना पार कर कंस के भय से उन्हें नन्द यशोदा के यहां छोड़ आये थे। श्रीकृष्ण के जन्म के वाद उनके दर्शन करने के लिए सभी देवतागण यहां तक कि त्रिपुरारी ईश कैलाश पति भगवान शंकर भी स्वयं गोकुल में पधारे थे। ब्रज गोकुल में ब्रह्मा आदि सब देवता ऋषिमुनी तथा पृथ्वी के संपूर्ण तीरथ आये इसी लिए चर्तुमास में सदाकाल निरन्तर यहां वास करते हैं। भगवान शंकर तो अपने प्रभु श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को देखने तथा उसका आनन्द लेने के लिए कैलाश पर्वत से यहां पधारे थे। 

        जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तब योगद्वारा श्रीशंभु ने पार्वती जी से कहा कि ‘‘हे प्रिये मेरे प्रभू साक्षात् अजर अमर अविनाशी श्रीकृष्ण पृथ्वी का भार उतारने के लिए सोलह कलाओं के साथ पृथ्वी पर पधारे हैं। वो इस पृथ्वी का भार दूर करेंगे श्रीगोकुल धाम में अंश रूप में मनुष्य देह धारण करके बाल क्रीडा करेंगे’’। उन्होंने पार्वती जी से कहा कि ‘‘हम तीन शक्ति एक ही हैं। प्रभू विष्णु और श्रीकृष्ण एक ही रूप हैं, जो सदा ब्रज में लीला करेंगे और एक रूप में मैं हूं श्रीगोकुल में प्रभू की लीला को देखूगा’’, हे प्रिये जब ब्रज गोकुल गोलोक से ही आया है। तब तो मैं इस दुर्लभ स्वरूप में प्रभु की क्रीडा का आनन्द लूंगा। मैं मेरे प्रभू की बाल लीला का दर्शन अवश्य ही करूंगा। मेरा मन उसी आनंद की अनुभूति को देखने को कर रहा है। अब तो मैं गोकुल में जाऊंगा और मेरे प्रभू के दर्शन करूंगा।         पार्वती जी बोली हे प्रभो। "हे नांथ ये आपने क्या कहा, मेरे प्रभू क्या वह सिर्फ आपके ही प्रभू हैं और किसी नहीं हैं।" महाराज अब तो श्रीकृष्ण जी के दर्शन करने के लिए, मैं भी आपके साथ चलूंगी।", तब महादेवजी बोले। "हे प्रिये तुम मत चलो। तुमको आनंद की प्राप्ति नहीं होयेगी। महादेव जी ने कहा कि ‘‘देखो बृजभूमी देखने में बड़ी कठिन हैं। पर भीतर से बहुत ही कोमल भी हैं। वहां के ब्रजवासी बड़े भोले हैं। परन्तु उनके स्वभाव कैसे हैं। मैं आपको बताता हूँ।" 

                दोहा- बोलंत हेला वचनंत गारी। करीलके झाड कूपजल खारी। ऐसी कृष्णकी व्रजहै प्यारी। 

        इस लिये हे प्रिये तुम्हारा स्वभाव बहुत ही सरल है और कुछ क्रोध युक्त भी है। तुम अगर चलीं और व्रजवासियों ने आपसे कुछ कह दिया तो तुमको क्रोध आ जायगा और क्रोध में तुमने किसी को कुछ श्राप दे दिया तो उलटा पुण्य के स्थान पर पाप हो जायेगा। वहां जितनीं वस्तु हैं। सब स्वरूपात्मक हैं। प्रिये जो मनुष्य जन प्रभू के दर्शन यात्रा करने जाते हैं।  और ब्रजभूमि वृजवासियों का अनर्थ करने के लिए वहां आते हैं, उनकी तीर्थ यात्रा नहीं हो पाती है। वह तो उलटे पुण्य के बदले पाप के भागीदार बन जाते हैं। इस लिए "हे प्रिये तुम मत चलो।" पार्वती जी बोली ‘‘महाराज अब तो मैं अवस्य ही चलूंगी’’। 


       भोलेनाथ ने पार्वती जी को बहुत समझाया पर वह नहीं मानी। तब महादेव जी, कहने लगे कि जेसी तुम्हारी मर्जी। पर मुझको एक बचन दो तब में ले चलुंगा। ‘‘व्रजवासी चाहे सो बोलें। चाहे सो कहें। पर तुम किसी को श्राप मत देना। पार्वतीजी बोली महाराज मैं किसी से कुछ नहीं कहुंगी। महादेव जी कहने लगे। एक और बात अपने वाहन सिंह को संग में मत ले चलो। तुम्हारा वाहन सिंह है, उसको देख कर सब लोग डर जायेंगे। पार्वतीजी बोली ‘‘महाराज जो आज्ञा आपकी’’। हम तुम दोनों नंदीश्वर पर बैठ कर ही चलेंगे, व्रज गोकुल के लिए। यह कह कर दोनों नंदीश्वर पर विराजमान हो कर चल दिये, रास्ते में तो किसी ने कुछ नहीं कहा, जब व्रज में प्रवेश किया तो बृजवासियों ने इन दोनो को बैल पर बैठे देख कर  खूब हंसने लगे हैं, यहां वृज में कोई बैल पै बैठतें नहीं हैं। इन दोनों को बैल पर बैठे देख ब्रजवासी खूब हसी करे है सो इन दोनोन को बैल पे बैठे देखि हसि के कहन लगे हैं। आपस में ‘‘अरे भैया हो देखो केसो आयो है। मोटे-मोटे दो जने, जाने खसम लुगाई हैं कै कोन है। सो मस्ताते दोंनों जने एक वेल पे बेठे हैं’’, और उनको देखि देखि के व तांई एकत्र ब्रजवासीन उनमें सो केहबे लगे हैं। ‘‘जो अरे भले आदिमीयो या विचारे वेल को तो कछू तरस करो। एक जनो उतरि परो ये वैल मरि जायग़ो। तुम मोटे ताजे हल मस्ता से बैठे हो’’। तब तो इतनों सुनि के पारवती जी कछु बोली नहीं है और सोचवे लागीं कि जो याके मन में दया आय गई है। व्रजवासी तो बड़े दयालू है’’ सो पारवती जी नंदीस्वरते उतरिके पांवन पांवन चलन लागी। तब पारवती जी के पांवन में गोखरून के कांटे लगन लागे है सो चल्यो जाये नहीं है कबहूं वैठि जांय कबहूं फेरि चलें हैं। बिचारी बोहोत दुखित भई हैं। 

        तब अगारी ब्रजवासी और मिले सो इनकी ओर देखि के कहेन लगे है। जो देखो भैया और केसी सुंदर रूपवारी लुगाई पावन तों चलें है और ये हल मस्ता वावा बैल पै बेठों है। व्रजवासी कहेन लागे हैं। जो अरे सुने नहीं है। जा बिचारी सुंदरी कों तो पांवन पांवन चलावे हैं और आप बेल पै वेठयो है। उतर मैं बाबा फावा नहीं जानु हूँ बैल पैते टांग पकरिके डारि देंऊंगो। ब्रजवासी पार्वती से कहन लागे हैं कि ‘‘कही अरी ओरी तेरे कैसे कैसे कांटे लगि गये है। दे दें तेरे कांटे निकासि देवें इतनो सुनि पारवती जी को इतनों गुस्सां आयो है सो जो महादेवजी को वचन न दीयो होतो तो जरूर श्राप दै देतीं। परि वचन यादकरि चुपहोय रहीं है कही महाराज मैंने तुम्हारे प्रभूकी व्रज देखि लीनीं। आप कहेते सो सब सांच है। क्रूबान के जल खारी हैं। हेलान सो बोले है। करील के झाड़ है। बात बात में गारी दें हैं। सो महाराज मैंने तो ब्रज देखि लीनी। 

        मैं तो जहां मेरे लक्ष्मी के भक्त हैं तहां जाऊंगी। सों पास ही में हातरस गांम हतो। सो तामें ही रहि गई और महादेव जी सों कही जो आप कैलास को चलोगे। तब मैं यहां सो तुम्हारे संग चलोंगी। तुम भले ही दर्शन करि आवो एसेई तुह्मारे प्रभू होयगे जेसी ब्रज और व्रजवासी हैं। 

      दोहा- बोलन्त हेला वचनन्त गारी। करीलके झाड़ कूप जलखारी। देखी कांन व्रज तुम्हारी।।

        पार्वती जी नहीं आई है तब नंदीस्वर को वहां ही छोड़ि दीने है और श्री शंकर आप अपनो स्वरूप प्रगट करि गोकुल में नंद भवन में यशोदा के सामने आय के कहिवे लगे है अलख-अलख भोमातभिक्षां देही। श्रीयशोदा जी हंसि हंसि गोपीन सों कहन लगी हैं जो अरी देखो या बाबा को स्वरूप कैसो है जसोदा जी गायबे लगी है संगमें महादेवजी हू गायबे लगे है 

(सोपद)  देखोरी एक बाला जोगी द्वार हमारे आयो हैरी। अंग भभूति गले मृग छाला शेष नाग लपटायो हैरी।।1।। वाघंबर ओढ़े है ओघड़ शिर गंग चंद्र दिखाये हैरी। गल याके मुंडन की माला। सींगी नाद बजायो हैरी।।2।। लै भिक्षा निकरी नंदरानी कंचन थार भरायो हैरी। ले भिक्षा जाओ बाबा अपने घर मेरो गुपाल डरायो हैरी।।3।। (महादेव जी कहने लगे) नां चहीये तेरी दौलत दुनियां नां चहीये तेरी माया है। अपने गोपाल को दरस कराय दे या कारन जोगी आयो हैरी ।।४।। (जसोदा जी कहन लगी है) बाबा मैं तो लाला को नहीं दिखाऊंगी। तोको देखि मेरो लाला डरेगो। मैंने जांने कौन बडे पुन्यनते ये लाला पायो। तेरे तो सांप डेंडुआ लटक रहे हैं। तांते भिक्षा ले अपने घर जावो। महादेवजी कहन लगे है। अरी मैया तेरो लाला स्थावर जंगमको स्वामी जानें जगत रचायो हैरी। जाको कोन डरावन हारो। सो तेरे भवन छिपायो है।। देखो।। 


        महादेव जी कहन लगे है। जो मैया मोकों दरसन नहीं करावेगी तो मैं भी दरसन करे बिना जाऊंगो नहीं। ऐसे कहि अलख अलख कहि भगवान को ध्यान करि वहां सूं चले है। तब भगवान श्रीकृष्ण वडे जोर सो रोयबे लगे है श्रीयशोदा जी घनी वहलावैंदैं। परंतु रहे नाहीं हैं। तब जसोदा जी गोपींन को टेरें हैं। अरी रोहिणी ! अरी गोपीयो ! आज लाला बोहोत रोवे है। जाने जाकों आज कहा भयो है काऊ की नजर लगी कहा। तब गोपी राई नोंन करे है अनेक उपाय करे परि लाला तो रोवतते रहे है तब गोपी कहे है। अरी महरि तेरे घर आज कोई आयो है तो नाहि तब नन्द रानी कहन लगी है एक बावा जी अलख अलख कहेतो आयो  हतो। सोवह कहेत हौ जो मोंको लाला के दरसन करवाय देउ। सो मैंने नांही करी। तब गोपी कहन लगी। अरी वह कछू अपनों नांम भी बताय गयो है। तब कही जो अलख अलख कहेते हतो। तब तो गोपी गोकुल की गलीन में अलख अलख पुकारन लागी है तव इतने में एक गोपी ने कही जो अरी यहां आवो ये बैठ्यों हैं। येही अलख अलख दीखे है। तब गोपीनने कही जो अरे वावा जी चलि हमारो लाला रोवे है। तोकों दरसन करावेंगी। चलिरे जोगी नंद भवन में जसुमति माय बुलावै। लटकत लटकत शंकर आये मन में मोद बढ़ावै। तव जसुमति अंचल छाया करि जोगी को दरस करावे। करि परिक्रमां महादेव जी वघ नखा कंठ पहिरावे ।।२।। तब भगवान जोगीको देखि वोहोत जोर सों हसें हैं सो महादेव बड़े आनंद में मगन होय नांचन गावन लागें हैं 

        सोपद- दिलदा मनहरन सांवला यार दरस तो दिखाया। मोकों दरस तो दिखाया प्रभू दरस तो दिखाया। हां हां तेरी जाघन जाघन काछन झगुली पीताम्बर कानन कुंडल मोर मुकुट घूंघर वारी अलके झलके नैनो ंमें समाय जा मेरे नयनों मै समाय जा दिलदा 

        या प्रकार महादेव जी मगन होय भगवान के गुणगांन करत बोहोत गाये नांचे तब भगवान वोहोत प्रसन शंकर को देखिके भये हैं। तब जसोदाजी और गोपी महादेवजी सों कहन लगी हैं। तूर हिरे बाबा नंदभवन में उर में आनंद लीजै । जब जब मेरो लाला रोवे तव तव दरसन दीजै।।1।।

        अरे बाबा तू यहां ही रहि तेरो नाम कहा है महादेव जी कहेन लगे है। जो मैया एक स्वरूपते तो में यहां हीं रहूं हूं तव तुलारे बृजवासीन के व्याह होंय हैं। तब प्रथम मेरी पूजा करिके पाछे विवाह होय हैं। सुनि मैया मेरो नाम। श्रीकंठ शिवकंठ शिव शंभू ईस महादेवरी। बूढ़ो बाबूनाम हमारो सुरश्यांम मोय जानेरी। तब महादेवजी कहे जो मैया मैंनें भिक्षा पाय लीनी अब मैया याके गुणानवाद गाऊंगो। ऐसे कहि महादेवजी कैलास को चले। सो एकरूप सो शंकर सदा यहां ही विराजे हैं सो वृज में सब जाति में लगन व्याह होय है तव पहले बूढ़ो बाबू पूजें है। यह रीति सर्वत्र बृज में अभी ताई हैं। 


शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

मार्क टुली की जुवानी, 6 दिसम्बर की कहानी

उनको कारसेवकों ने मंदिर के एक कमरे में बन्द कर दिया था

उनको जान से मारने की कोशिश भी की गई थी

प्रस्तुति- सुनील शर्मा, मथुरा

मथुरा। मार्क टुली एक ऐसा नाम जिसे पूरी दुनिया जानती है, भारत में तो उसे बच्चा-बच्चा जानता है, 06 दिसम्बर 1992 की अयोध्या की घटना ने उन्हें सबसे ज्यादा चर्चा में ला दिया था। मार्क टुली एक अंग्रेज पत्रकार और लेखक के रुप में जाने जाते हैं, उन्होंने जीवन के 80 से ज्यादा वसन्त देखें हैं। उनका भारत से काफी लगाव रहा है, उन्होंने न चाहते हुए भी पत्रकारिता के पेशे को अपना लिया और मार्क टुली को भारत बहुत भा गया और उन्होंने अपना घर भी दिल्ली में ही बना लिया। आज उनको कहीं देखा नहीं जाता है और अब कहां हैं, कैसे हैं, कहीं से भी पता नहीं चल सका। 


मार्क टुली से मेरी एक खास मुलाकात 02 अप्रैल 2023 को राजकीय संग्रहालय में हुई थी वह अपने परिवार के साथ संग्रहालय देखने आये थे उनके साथ अम्बेडकर नगर के सांसद रीतेश पाण्डेय भी थे। मार्क टुली को मथुरा का संग्रहालय बहुत अच्छा लगा और उन्होंने पूरे संग्रहालय को बडी ही बारीकी से देखा था। मेरी मुलाकात के समय वह लगभग 85 साल की अवस्था में थे, उनकी आवाज भी बहुत धीमी हो गयी, और बहुत मुश्किल से ही चल पा रहे थे।


मेरा प्रश्न था कि- आप मथुरा के लोगों के लिए क्या कहना चाहेंगे

उन्होंने उत्तर दिया कि ‘‘मैं मथुरा के लोगों को शुभकामनाएं प्रस्तुत करता हूँ।’’

मेरा अगला प्रश्न था- कि रामजन्म भूमि अयोध्या बावरी विध्ंवस के समय आप अयोध्या में थे आपने वहां क्या-क्या देखा था 06 दिसम्बर 1992 के दिन के वारे में आप क्या कहना चाहेंगे।

उनका उत्तर था कि ‘‘मैं 05 दिसम्बर 1992 को वहां पर था, मैंने स्टोरी की थी, उस समय मेरे सामने बावरी मसजिद को बरवाद किया जा रहा था। मैंने अपनी स्टोरी में बताया कि लोगों ने मसजिद को बरवाद करना शुरू कर दिया है, उसके वाद में फौरन फैजावाद गया, क्यों कि अयोध्या में समाचार भेजने की कोई व्यवस्था नहीं थी, मैं फैजावाद गया और वहाँ से रिपोर्ट भेजा मैंने उसमें कहा कि यहां यह हो गया है, सबसे पहली रिपोर्ट मेरी थी।

उन्होंने आगे बताया कि उस समय पुलिस और जबान सब भाग गये थे। युवाओं को मैंने देखा कि बड़ी संख्या में मसजिद के उपर चढ़ गये थे। उपर से तोड़-तोड़ कर पत्थर नीचे फैंके जा रहे थे, उनके हाथों में लोहे की रॉड भी थी मार-मार कर तोड़ दिया, बर्वाद कर दिया।

उन्होंने आगे बताया कि मैं उसका चश्मदीद था। उसके वाद ब्रॉडकास्ट करके जब मैं बापस आया, उस समय मुझे वहाँ पर गिरा दिया गया था। उस समय मुझसे कहा गया कि हम लोग आपको मारना चाहते हैं, आप बीबीसी ब्रॉडकास्ट को खबर पेश करते हैं, मेरा उस समय उन लोगों से कहना था कि हम लोग तो कोई खबर गलत पेश नहीं करते हैं। मैंने कहा कि आप मुझे बता दीजिए कि मैंने क्या गलत पेश किया है। तब वह आपस में ही लड़ने-झगड़ने लगे आपस में कहने लगे कि यह आदमी काफी मशहूर है। हमने अगर इनको मारा तो हमारी रिपोर्ट दर्ज हो होगी, हमारी बदनामी भी होगी, उन्हीं लोगों में से कुछ लोगों ने कहा कि हम लोग इसको कहीं बन्द कर देते हैं, मुझे वहाँ पास में ही किसी मंदिर के कमरे में बन्द कर दिया गया था। तब मेरे साथ कुछ अन्य साथी भी थे।

एक अन्य प्रश्न-आप मथुरा में इससे पहले कभी आये हैं।

उनका उत्तर था ‘‘हाँ आया हूँ ज्यादातर रेलगाड़ी से मैं मथुरा आया था, कोविड से पहले भी में मथुरा आया था’’। 

यहाँ पर आपने क्या-क्या देखा- 

उन्होंने कहा कि ‘‘मैं मथुरा को बहुत पसन्द करता हूँ, मथुरा संग्रहालय बहुत अच्छा है, यहां पर रखी कलाकृतियां बहुत ही कीमती हैं, ऐसे म्युजियम में मैं कभी नहीं गया, इस जैसा म्युजियम मैंने कहीं नहीं देखा, पूरे विश्व में अपने आप में एक अकेला म्युजियम है, मैं इस म्युजियम को बहुत पसन्द करता हूँ, यहां पर जो देख भाल की जाती है उसके लिए यहां के सभी लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूँ।’’

‘‘मैं पुनः बापिस आऊंगा, अभी आया हूँ, मेरे रिश्तेदारों ने मुझसे कहा था कि आपको मथुरा संग्रहालय को देखना चाहिए। मैं पुनः मथुरा के लोगों को शुभकामनाएं देता हूँ।’’    


मार्क टुली का जन्म 1935 में भारत के कलकत्ता शहर में नामी व्यवसायी के घर में हुआ था, जिनकी 6 संतानें थीं। एक जानकारी के मुताबिक उनकी मां के पूर्वज काफी समय से भारत में रहते थे, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के भी पहले से वे यहां रह रहे थे। उनके परदादा के पिताजी पूर्वी उत्तर प्रदेश में अफीम के कारोबारी थे और दादाजी पटसन का व्यवसाय करते थे। उनकी मां आज के बांग्लादेश में पैदा हुई थीं और उनका जन्म कलकत्ता में हुआ था। किन्तु उनकी परबरिश ब्रिटेन के लोगों की तरह से ही हुई थी, उनकी देखभाल करने वाली एक विदेशी महिला थी जिसने उन्हें भारतीय भाषाओं की जगह अंग्रेजी ही सिखाई थी।

1964 में उन्होंने बीबीसी में काम करना शुरू किया। यहां वह पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि एक मैनेजर के तौर पर कार्य करने आए थे। इसके अगले ही साल 1965 में अचानक उनको नई दिल्ली में जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव असिस्टेंट के तौर पर काम करने का अवसर मिला। कुछ ही महीनों बाद उन्हें बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के लिए भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल से रिर्पोटिंग के लिए उन्हें समाचार संवाददाता बना दिया गया।

भारत से अधिक लगाव होने के कारण उनको अपनी जन्मभूमि लौटने की बहुत खुशी हुई, क्यों कि उनकी बचपन की यादें यहां से जुड़ी हुई थीं। टुली के अनुसार, हमेशा से बीबीसी को खबरों के लिए विश्वनीय स्रोत माना जाता रहा है। भारतीय लोग सरकारी समाचार सेवाओं पर कम किन्तु बीबीसी पर भरोसा ज्यादा करते हैं। उन्होंने पूरे भारत की यात्राएं कीं। विभिन्न विषयों पर बेवाकी से अपनी रिपोर्टिग की और एक भरोसे के साथ उसे प्रस्तुत भी किया उनको भारत एक बहुत ही प्यारा देश लगता है।

आपातकाल के दौरान 1975 में टुली ने द गार्जियन और द वॉशिंगटन पोस्ट के पत्रकारों समेत 40 विदेशी पत्रकारों के साथ भारत छोड़ दिया था। वह लंदन वापस लौट गए। जब आपातकाल समाप्त हुआ तो वह बीबीसी के ब्यूरो चीफ बनकर भारत लौटे थे।

भारत सरकार ने 1992 में उन्हें पद्मश्री और 2005 में पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। 2002 में प्रिंस चार्ल्स ने मार्क टुली को बर्किंघम पैलेस में नाइट यानी सर की उपाधि प्रदान की थी, तब से लोग उन्हें सर मार्क टुली के नाम से भी जानते हैं।


शनिवार, 6 सितंबर 2025

जनजीवन को दर्शाने का माध्यम है चित्रकला- ठा0 किशन सिंह

उमा शर्मा ने अबतक सौ से अधिक चित्रकला प्रदर्शनी लगाई हैं

मथुरा। ब्रज में मंदिरों के अलावा भी ग्रामीण संस्कृति और यहां की प्राचीन कला तथा यहां का जन जीवन देखने योग्य है, सम्पूर्ण ब्रज के जनजीवन को दर्शाने का माध्यम है चित्रकला, जिससे ब्रज को प्रदर्शित किया जा सकता है, उन्होंने ब्रज लोक कला एवं शिल्प संग्रहालय के हॉल में लगाई गई चित्रकला प्रदर्शनी को देख कर कहा कि ब्रज के जन जीवन को जिस प्रकार से यहां दर्शाया गया है, वह पुरानी यादों को ताजा करता है। उक्त विचार जिला पंचायत अध्यक्ष व के. एम. यनिवर्सिटी के कुलाधिपति चौ0 किशन सिंह ने चित्रकला प्रदर्शनी के समापन के अवसर पर कहा कि आज की युवा पीढी को इस प्रकार की कला को सिखाने के प्रयास होने चाहिए जिससे युवाओं में भी अपने ग्रामीण जन जीवन से जुड़े रहने का अवसर मिलेगा। 


प्रदर्शनी के समापन अवसर पर जिला पंचायत अध्यक्ष ठा. किशन सिंह ने सभी चित्रों को बहुत रूचि के साथ देखा और चित्रकार उमाशर्मा द्वारा बनाई कलाकृतियों की प्रषन्सा की। इस अवसर पर जिला अस्पताल के सीनियर सर्जन डाक्टर विकास मिश्रा व सीमा मिश्रा व अन्य लोगों ने भी चित्रकला प्रदर्शनी को देखने में विशेष रूचि दिखाई। 


उमा शर्मा ने अबतक लगभग 100 से अधिक पेपर कोलाज व तैल चित्र बनाये हैं तथा मुम्बई, भोपाल, जयपुर, अजमेर, दिल्ली, षिमला, बेंगलौर, खजियार आदि स्थानों पर अपनी प्रदर्शनी लगायी हैं, उनको पेपर की कटिंग काट कर सीन के हिसाब से चिपका कर कोलाज तैयार करने में उन्हें महारत हांसिल है। 

उनकी कलाकृति में ब्रज का पूरा चित्रण देखने को मिलता है। उनके द्वारा बनाये गये तैल चित्रों में ब्रज की सभ्यता, संस्कृति और जनसामान्य के जीवन की झलक भी देखने को मिलती है। 


चित्रकला प्रदर्शनी देखने के उपरान्त जिला पंचाचत अध्यक्ष ने ब्रज लोक कला एवं शिल्प संग्रहालय में रखी प्राचीन ग्रामीण वस्तुओं कलाकृतियों का अवलोकन भी किया और ग्रामीण प्राचीन वस्तुओं को देख अपने पुराने समय में खो गये।


इस अवसर पर गीता शोध संस्थान वृन्दावन में ब्रज संस्कृति विशेषज्ञ डॉ० उमेश चन्द्र शर्मा ने सभी आगंतुकों का आभार प्रकट किया। सात दिन तक चलने वाली चित्रकला प्रदर्शनी को देखने पहुंचे देशी व विदेषी दर्शकों ने प्रदर्शनी को देखने में खूब रूचि दिखाई। इस अवसर पर गीता शोध संस्थान के डायरेक्टर डॉ. दिनेश खन्ना, महामण्डलेश्वर एस. एस. जौहरी, डॉ0 एस.पी. गोस्वामी, कल्पना सारस्वत, अर्चना, साधना, नंदिनी, मुकेश सारस्वत, अनिकेत, अनुकृति, कमलेश्वर, तनु शर्मा, प्रीति, शशि, गीता व्याख्याता महेश शर्मा, पत्रकार सुनील शर्मा, गीता शोध संस्थान के कोडिनेटर चन्द्र प्रताप सिंह सिकरवार, आदि उपस्थित थे।


बुधवार, 3 सितंबर 2025

मथुरा में चारों दिशाओं में स्थित ‘‘चार महादेव कोतवाल’’ रक्षा करते हैं

Mathura (Uttar Pradesh, India) मथुरा आदिकाल से चार महादेवों की पूजा सेवा चली आ रही है हालाकिं मथुरा में अब हर गली मौहल्लों में अनगिनत महादेव मंदिर बन गये हैं। लोगों ने अपनी सुविधा के अनुसार इन मंदिरों को बना लिया हैं। मथुरा शहर की हर कॉलोनी में महादेव की पूजा अर्चना होती है मगर ऐसी मान्यता है कि यहां पहले चार महादेव की ही पूजा होती थी, उसका कारण शायद मथुरा शहर जिसे आज पुराना शहर कहा जाता है। उसी के आसपास चारों महादेव हैं और आवादी भी यहीं पर ज्यादा थी जिसके कारण इन महादेवों की पूजा सदियों से की जाती रही है।
पद्मपुराण निर्वाण खण्ड में भगवान् का वचन है-
अहो न जानन्ति दुराशयाः
पुरीं मदीयां परमां सनातनीम्
सुरेन्द्रनागेन्द्रमुनीन्द्रसंस्तुतां
मनोरमां तां मथुरां पराकृतिम्।।
अर्थात् : 'दुष्ट-हृदय के लोग मेरी इस परम सुन्दर सनातन मथुरा-नगरी को नहीं जानते जिसकी सुरेन्द्र, नागेन्द्र, तथा मुनीन्द्रने स्तुति की है और जो मेरा ही स्वरूप है।मथुरा आदि-वाराह भूतेश्वर-क्षेत्र कहलाती है। मथुरा में चारों ओर चार शिवमंदिर हैं-पश्चिममें भूतेश्वर का, पूर्व में पिप्पलेश्वर का, दक्षिण में रंगेश्वर का और उत्तरमें गोकर्णेश्वर का चारों दिशाओं में स्थित होने के कारण शिवजी को मथुरा का कोतवाल कहते हैं।


भूतेश्वर महादेव

जिसमें से पश्चिम की ओर भूतेश्वर महादेव विराजमान हैं। जिनकी बड़ी मान्यता है तथा यहां प्रतिदिन दर्शनार्थी आते हैं तथा यह मथुरा की परिक्रमा के बीच में पड़ता है। तथा आसपास के या यहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति को इस महादेव के दर्शन करके अपने दिन की शुरूआत करते तथा अपने घर जाने से पूर्व भी मंदिर में दर्शन अवश्य करते हैं प्राचीन स्थापत्य कला का यह अनूठा शिव मंदिर भगवान श्रीकृष्ण के समय का बताया जाता है, साथही एक योगमाया का मंदिर भी जिसे लोग पाताल देवी के नाम आज पुकारते हैं।
पिप्पलेश्वर महादेव
पूर्व दिशा की ओर पिप्पलेश्वर महादेव का मंदिर है यह यमुना के किनारे श्यामघाट के निकट है यह मंदिर भी अति प्राचीन है तथा यमुना नदी के किनारे होने कारण निश्चित रूप से इसकी दिशा कई वार बदली हो यह भी घनी आवादी के बीच में स्थित है तथा यहां प्रतिदिन लोग महादेव को जल चढाने आते हैं। श्रावण मास में तो यहां बड़ी भींड़ होती है।
रंगेश्वर महादेव
दक्षिण दिशा में रंगेश्वर महादेव हैं यहां व्यस्त बाजार होने के कारण होलीगेट के निकट और जिलाअस्पताल के सामने महादेव का मंदिर है यहां वर्ष भर लोग महादेव के दर्शन जल चढ़ाने तथा पूजा अर्चना करने आते हैं। मगर श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को यहां मंदिर में घुसना बहुत मुश्किल होता है प्रत्येक वर्ष यहां पुलिस को मंदिर की व्यवस्था लोगों के घुसने और निकलने की व्यवस्था करनी पड़ती है।
गोकर्णेश्वर महादेव
इसी प्रकार से उत्तर में गोकर्णेश्वर महादेव का मंदिर है यह मंदिर भी अति प्राचीन मंदिरों में से एक है इस मंदिर की बनावट देखने से ही इसके प्राचीनता का अहसास होता है यह भी स्थापत्य कला का आज भी प्राचीनता का आभास कराता है। इस महादेव की आदमकद प्रतिमा सभी को आकर्षित करती है शायद ही महादेव की कहीं ऐसी प्रतिमा देखने को मिलती है। विशाल प्रतिमा बैठी हुई मुर्दा में है तथा बड़े बड़े नेत्रों के साथ यहां आने वाले हर व्यक्ति को मन मोहित भी करती है।
इस प्रकार से यह चारों महादेव यहां के कोतवाल कहलाते हैं। यह मथुरा नगरी की रक्षा करते हैं ऐसा भाव लोगों के मन में आज भी इनके प्रति है।
- सुनील शर्मा

मंगलवार, 2 सितंबर 2025

प्रसिद्ध चित्रकार उमा शर्मा की बनाई चित्रों की प्रदर्शनी

मथुरा। ब्रज कला एवं शिल्प संग्रहालय के हॉल में उमा शर्मा की चित्रकला प्रदर्शनी को देखने पहुँचे देशी विदेशी लोग। मथुरा की प्रसिद्ध चित्रकार उमा शर्मा कागज की कतरनों को चिपका कर आकर्षक पेंटिंग बनाती हैं।


प्रदर्शनी का शुभारम्भ वृन्दावन के साहित्यकार व व्यवसाई कपिल उपाध्याय तथा वृन्दावन के तीर्थ पुरोहित अजय शर्मा ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस अवसर पर ब्रज लोक कला एवं शिल्प संग्रहालय के हॉल में प्रदर्शनी लगाई गई प्रदर्शनी तीन दिनों तक चली जिसमें जर्मनी से पधारे विदेशी पर्यटकों के अलावा स्थानीय कला प्रेमियों ने भी रुचि दिखाई।


उमा शर्मा किसी परिचय मोहताज नहीं हैं। वह मथुरा की एक प्रसिद्ध चित्रकार हैं, उन्होंने कागजों की कतरनों को चिपकाकर कोलाज तैयार करने में महारत हासिल की है। उन्होंने इस प्रकार की पेंटिंग बना कर प्रसिद्धि पाई है, जो कम ही देखने को मिलती है, मथुरा की चित्रकार उमा शर्मा शांत स्वभाव और निर्मल हृदय की चित्रकार हैं उनके मन के भाव उनकी बनाई चित्रकला में भी दिखाई देती है।
वेसे तो मथुरा में कलाकारों की कोई कमी नहीं है। जनपद की ख्याति प्राप्त कलाकार की अदभुत व दुर्लभ कलाकृतियों के संग्रह को देखने में युवाओं ने भी विशेष रुचि दिखाई। बिना कूची और रंग के, कागज की कतरनों से ही तस्वीरों को आकार देने वाली मथुरा की उमा शर्मा की कलाकृति मात्र पेंटिंग ही नहीं हैं, उनमें ब्रज का पूरा चित्रण देखने को मिलता है। उनके द्वारा बनाये गये तैल चित्रों में ब्रज की सभ्यता, संस्कृति और जनसामान्य के जीवन की एक झलक देखने को मिलती है।


सन् १९५० में जन्मी चित्रकार उमा शर्मा की प्रदर्शनी देखने आये युवा कलाकारों को वह अपने बनाये चित्रों के सामने खड़े होकर समझा रहीं थीं कि इन चित्रों को रद्दी कागज के टुकड़ों को जोड़-जोड़ कर फेबिकोल की मदद से चिपका कर कैसे बनाया गया है। किस प्रकार से मन के भाव को प्रस्तुत किया गया है।
मथुरा में ब्रज की ग्रामीण संस्कृति, कला एवं शिल्प को एक स्थान पर समेटने का काम ब्रज लोक कला एवं शिल्प संग्रहालय महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ब्रज संस्कृति विशेषज्ञ डॉ० उमेश चन्द्र शर्मा ने बीड़ा उठाया है कि ब्रज क्षेत्र में विभिन्न लोक कलाओं और शिल्पकला को प्रोत्साहन दिये जाने की आवश्यकता है। इसी श्रंखला में विलक्षण चित्रकार उमा शर्मा से युवा वर्ग परिचित हो सकें ऐसा प्रयास किया गया। उमा जी की चित्रों की प्रदर्शनी का संकलन यहाँ लगाया गया, जिसे युवा ही नहीं विदेषी पयर्टकों ने भी सराहा।


इस अवसर पर पं. कपिल उपाध्याय ने उमाषर्मा की कला को कुछ इस प्रकार से समझा उन्होंने कहा कि जैसे एक चिड़िया कड़ी मेहनत से तिनका-तिनका जोड़ उससे अपना घौंसला बनाती है और उसे एक आकार देती है, ठीस उसी प्रकार से मथुरा की इस विलक्षण चित्रकार की अपनी कला व मेहनत में दीखती है।


तीन दिन तक चलने वाली इस मथुरा की प्रसिद्ध चित्रकार उमा शर्मा जो कि कागज की कतरनों को चिपकाकर आकर्षक पेंटिंग बनाती हैं। उनके साथ-साथ अनेक नवोदित कलाकारों ने भी इस स्थान पर अपनी-अपनी चित्रकला को प्रदर्षित किया, जिसमें एमिटी यूनीवर्सिटी नोयडा से बेचलर ऑफ फाइन ऑर्ट में बेचलर डिग्री प्राप्त अनुकृति षर्मा द्वारा बनाई नौ देवियों व श्रीकृष्ण की पेंटिंग भी लगाई गई जिनकों भी देख दर्षकों ने खूब सराहा। 

इस अवसर पर सपत्नी पूना से पधारे इस्कॉन मंदिर संस्था के उपाध्यक्ष संजय भौंसले सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट राजेन्द्र सिंह, महेष शर्मा, प्रांषु शर्मा, तनू शर्मा, कमलेश्वर, प्रीति, मनीषा, अनिकेत, अनुभूति, शशि चौधरी, हरीश, सविता, पत्रकार सुनील शर्मा, गीता शोध संस्थान के कोडिनेटर चन्द्र प्रताप सिंह सिकरवार, वृन्दावन गाइड़ के आषु शर्मा आदि उपस्थित थे, तीन दिन तक चलने वाली इस प्रदर्शनी को देखने के लिए पाँच सदस्यीय जर्मनी के विदेषी मेहमानों के अलावा सैकड़ों स्कूली छात्र-छात्राओं व स्थानीय कला प्रेमियों ने भाग लिया।

शनिवार, 16 अगस्त 2025

सर्घर्षों के बीच कृष्ण के जीवन की कथा

भगवान श्रीकृष्ण का जीवन हमेशा रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाओं से जुड़ा रहा है। उनके जीवन की प्रत्येक घटना हमें बताती है कि मानवीय जीवन में कितने उतार-चढ़ाव आते है।

कृष्ण को अपने जन्म के कुछ समय बाद ही कंस द्वारा भेजी गई राक्षसी पूतना का वध करना पड़ा। उसके बाद शकटासुर, तृणावर्त आदि कई राक्षसों का वध उन्होंने किया। कुछ समय बाद श्रीकृष्ण को गोकुल छोड़कर नंदगांव आकर वहीं पर बसना पड़ा जहां उन्होंने कई लीलाएं की जिनमें गोचारण लीला, गोवर्धन लीला व रास लीला आदि मुख्य हैं।

श्री कृष्ण के जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब उनको जरासंध से तंग आकर मथुरा को ही छोड़ना पड़ा और द्वारिका में एक नया नगर बसा कर वहीं रहना पड़ा। अनेक द्वारों का शहर होने के कारण इस नगर का नाम द्वारिका पड़ा। 


श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी का पूरा बचपन श्रीकृष्ण के साहस और वीरता की कहानियां सुनते हुए बीता था। ऐसा कहा जाता है श्रीकृष्ण की रानियों की संख्या सोलह हजार से अधिक थीं। इनमें से ज्यादातर उनके द्वारा किसी न किसी कष्ट से मुक्त कराई गईं रानियां या राजकुमारियां थीं।

अक्रूर जी के आग्रह पर कृष्ण व बलराम मथुरा आए थे, जहां कंस ने कृष्ण के प्राणांत के लिए योजनाएं बना रखी थी। श्रीकृष्ण ने इसी दौरान अपने मामा कंस का वध किया और मथुरा वासियों को उसके आतंक से मुक्त कराया। तत्पश्चात, श्रीकृष्ण ने अपने नाना उग्रसेन को मथुरा का राजा बनाया और जेल में बंद अपने माता-पिता को रिहा कराया। कंस वध के बाद उनके पिता वसुदेव ने दोनों भाइयों कृष्ण और बलराम को शिक्षा-दीक्षा के लिए उज्जैन स्थित सांदीपनि मुनि के आश्रम में भेज दिया। आश्रम में ही कृष्ण भगवान की मुलाकात सुदामा से हुई। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती के किस्से काफी सुने जाते हैं।

इससे पहले, महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण पांडवों के पक्ष में थे। इस युद्ध में श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने। 18 दिन तक चले युद्ध में जीत अंततः पांडवों की हुई।

भगवान कृष्ण महाभारत युद्ध में सारथी की भूमिका में थे। युद्ध के दौरान कृष्ण और अर्जुन के बीच का संवाद भगवद् गीता नामक एक ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया गया। महाभारत युद्ध के बाद जब हस्तिनापुर में युधिष्ठिर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया कि जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है, ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा। 

कहा जाता है कि एक बार श्री कृष्ण के बेटे साम्ब ने चंचलता के प्रभाव में ऋषि दुर्वासा का अपमान कर दिया। ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गए और उन्होंने यदु वंश को नष्ट करने के लिए सांब को शाप दिया। 

द्वारिका में भी लोग शक्तिशाली होने के साथ-साथ पाप और अपराध भी व्याप्त हो गए थे। अपनी प्रसन्न द्वारिका में ऐसा वातावरण देखकर श्रीकृष्ण बहुत दुखी हुए। उन्होंने अपनी प्रजा को प्रभास नदी के तट पर जाने और अपने पापों से छुटकारा पाने की सलाह दी। उसके बाद सभी लोग प्रभास नदी के तट पर चले गए लेकिन ऋषि दुर्वासा के शाप के कारण सभी लोग वहां नशे में धुत हो गए और आपस में बहस करने लगे। विवाद शुरू हुआ उनके विवाद ने एक गृहयुद्ध का रूप ले लिया, आपसी युद्ध के कारण पूरा यदुवंश नष्ट हो गया।


कहा जाता है कि चार प्रमुख व्यक्तियों ने इसमें भाग नहीं लिया, जिससे वे बच गए। ये चारों कृष्ण, बलराम, दारुक सारथी और वभ्रु थे। बलराम दुःखी होकर समुद्र की ओर चले गए और वहां से फिर उनका पता नहीं चला। कृष्ण बड़े मर्माहत हुए। वे द्वारिका से दूर जंगल की ओर चले गए और दारुक को अर्जुन के पास भेजा और उसे निर्देश दिया गया कि वह यहां से स्त्री बच्चों को हस्तिनापुर ले जाए। उस समय कुछ स्त्रियों ने जलकर प्राण दे दिए। अर्जुन आए और शेष स्त्री- बच्चों को अपने साथ ले गए।

कहा जाता है कि मार्ग में पश्चिम के जंगली आभीरों से अर्जुन को मुकाबला करना पड़ा। कुछ स्त्रियों को आभीरों ने लूट लिया। शेष को अर्जुन ने शाल्व देश और कुरु देश में बसा दिया। कृष्ण शोकाकुल होकर घने वन में पहले ही चले गए थे। ऐसे ही एक दिन ’जरा’ नामक एक बहेलिये ने हिरण के भ्रम में तीर मारा। वह बाण श्रीकृष्ण के पैर में लगा, जिससे शीघ्र ही उन्होंने इस संसार को छोड़ दिया और नारायण के रूप में बैकुंट धाम में विराजमान हो गए।

देह त्यागने के साथ ही भगवान कृष्ण द्वारा निर्मित द्वारका नगरी भी समुद्र में विलीन हो गई और यादव कुल नष्ट हो गया। कृष्ण की मृत्यु के बाद अर्जुन ने उनका अंतिम संस्कार किया। शरीर छोड़ने समय भगवान कृष्ण 125 वर्ष के थे। कृष्ण के देहांत के बाद द्वापर युग का अंत और कलियुग का आरंभ हुआ। 

कृष्ण, कन्हैया, वासुदेव, मुरारी और लीलाधर के नाम से पुकारे जाने वाले भगवान श्रीकृष्ण का 5252 वाँ जन्मोत्सव पूरे देशभर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। जन्माष्टमी पर मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण के सभी मंदिर रात भर खुले रहते हैं। इस दौरान मंदिरों में कई आयोजन किए जाते है। भगवान श्रीकृष्ण को विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। शास्त्रों अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को  16 कलाओं में निपुण माना गया है। कृष्ण एक निस्वार्थ कर्मयोगी, एक आदर्श दार्शनिक, एक बुद्धिमान व्यक्ति और दिव्य संसाधनों से संपन्न एक महान व्यक्ति थे ।


सोमवार, 11 अगस्त 2025

वृन्दावन बाँके बिहारी जी मंदिर के निकट प्राचीन मंदिरों के सेवायत भी हैं परेशान

वृन्दावन के जंगलकट्टी क्षेत्र में यमुना किनारे से करीब दो सौ मीटर अन्दर राधाबल्लभ मंदिर मार्ग पर एक और प्राचीन मंदिर है, जिसे श्री राधा गोपाल मंदिर के नाम से जाना जाता है, यह मंदिर भी गुजराती धर्मशाला के सामने गली में बांयीं तरफ पड़ता है, यह भी राधा मोहन घेरा में एक अति प्राचीन मंदिर है, मंदिर के अन्दर की बनावट को देख कर लगता है कि यह एक प्राचीन मंदिर है।


जैसा कि इस स्थान के नाम से ही जाना जा सकता है कि जंगलकट्टी क्षेत्र जो कभी घने जंगलों से घिरा रहा रहा होगा और इस स्थान के जंगलों की कटाई उस समय में की गई होगी। इस लिये इस स्थान का नाम 1930 में नगर पालिका परिषद् के गठन के वाद से यह स्थान जंगलकट्टी के नाम से प्रसिद्ध हुआ और राधामोहन घेरा का नाम आधिकारिक रिकॉर्ड से गायब हो गया। इस मंदिर में स्थित बंगला भाषा में लिखा एक षिला लेख से ज्ञात होता है कि यह पश्चिम बंगाल के जिला बर्धमान के किसी दत्त परिवार के लोगों ने इस मंदिर को बनवाया होगा और यहां सेवायतों को सेवापूजा करने के लिए सेवायतों को ही दे दिया। षिलालेख के अनुसार सन् 1299 साल लिखा हुआ है।


1870 के दशक में ब्रिटिश शासन में मथुरा के कलेक्टर रहे एफ. एस. ग्राउस ने भी अपनी पुस्तक ‘‘मथुरा-ए-डिस्ट्रिक मेमॉयर’’ में ठाकुर श्री राधागोपाल मंदिर का उल्लेख नहीं किया है। उन्होंने इन बस्तियों के बीच में स्थित राधामोहन घेरे का उल्लेख भी नहीं किया है।

श्री राधागोपाल मंदिर को भी आज न के बरावर लोग जानते हैं, इस मंदिर में पष्चिम बंगाल के बर्धमान जिला से अधिकांष भक्त आज भी वृन्दावन में आते हैं। मंदिर में चारों तरफ की दीवारों पर बंगाल के भक्तों के नाम उनके पते वाले पत्थर लगे हुए हैं यह भक्त बंगाल से आकर सेवायतों को सेवा पूजा के लिए दान देते हैं और अपने नाम से एक पत्थर अपने पूर्वर्जों के साथ-साथ अपना भी लिखवा कर लगवा देते हैं, ऐसी मान्यता है कि वृन्दावन या ब्रज में आने वाले श्रद्धालु यहां मंदिर में आयेंगे और उनके चरण इन पत्थरों पर पडेंगे जिससे उनका उद्धार हो जायेगा। इसी भावना को लेकर यह पत्थर लगाये जाते रहे हैं। मंदिर में उपर नीचे दीवारों पर भी नाम लिखे पत्थर ही लगे हुए हैं। मंदिर में लगे सभी पत्थर बंगला भाषा में ही बनाये गये हैं।     


      

आज जब बॉंके बिहारी जी मंदिर के लिए कॉरिडोर की व्यवस्था सरकार द्वारा प्रस्तावित है, जिसको लेकर वृन्दावन में कॉरिडोर को लेकर समर्थन और विरोध में एक गतिरोध बना हुआ है। पॉंच एकड़ भूमि पर कॉरिडोर का निर्माण किया जाना है, जिसको लेकर आसपास के क्षेत्र की नाप तोल किये जाने पर मंदिर के सेवायत अच्छे खासे डरे हुए हैं। क्या होगा, क्या नहीं होगा यही चिन्ता इन्हें घेरे हुए है। जरजर दशा में पहुंच चुके इस मंदिर के पीछे का हिस्सा पूरी तरह से खण्डहर में बदल चुका है। पीढ़ियों के बदल जाने के कारण अब बंगाल से भी श्रद्धालुओं का आना कम हो गया है जिससे मंदिर व उसमें विराजमान विग्रहों की स्थिति भी दयनीय बनी हुई है।


श्री राधा गोपाल मंदिर के सेवायत विवेक गौतम ने मंदिर के सम्बन्ध में बताया कि यह मंदिर पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले के श्री षिव नाथ दत्त ने सन् 1299 साल में बनबाया था जोकि मंदिर में प्राप्त एक षिलालेख से ज्ञात होता है, इस मंदिर में इनके बाबा प्रेम लाल ब्रजवासी और पिता जी गोविन्द लाल गौतम और चाचा उमाकान्त गोतम आज इस मंदिर की देखरेख कर रहे हैं।



श्री राधागोपाल जी मंदिर के सेवायत विवेक गौतम ने बताया कि जब तक यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि क्या होगा और क्या नहीं होगा हम मंदिर का जीर्णाद्धार भी नहीं करा पा रहे हैं हमें डर है कि कहीं हमारा मंदिर भी कॉरिडोर की सीमा में न चला जाये। 

वृन्दावन बॉके बिहारी मंदिर में आने बाले श्रद्धालुओं की भींड़ को देखते हुए उ0प्र0 सरकार ने कॉरिडोर के निर्माण का प्रस्ताव माननीय उच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया था, जिसके आधार पर मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंच गया। सुप्रीमकोर्ट के निर्देश पर बाँके बिहारी जी मंदिर में एक समिति का गठन किया गया है जो कि बाँके बिहारी जी मंदिर के आसपास के पुरातत्व की दृष्टि से प्राचीन व अतिप्राचीन मंदिरों को भी संरक्षित करने के लिए पुरातत्व विभाग के अधिकारी को भी समिति में रखा गया है।

प्रदेश सरकार ने इस दिशा में कार्य करना प्रारम्भ भी किया तो कॉरिडोर के विरोध करने वाले लोगों ने कॉरिडोर की सीमा में आ रहे श्री राधा मोहन मंदिर को तथा पास में ही मौजूद एक समाधि को भी बचाने की कबायद शुरू कर दी थी। 

पुरातत्व की दृष्टि से भवन इमारतों और प्राचीन मंदिरों समाधियों को संरक्षित करने की आवष्यकता है ताकि इनका प्राचीन स्वरूप बचा रह सकेगा।


शुक्रवार, 4 जुलाई 2025

अतिप्राचीन राधामोहन मंदिर वृन्दावन कॉरिडोर की सीमा में

आज वृन्दावन के इस प्राचीन मंदिर को कोई जानता तक नहीं

            वृन्दावन के जंगलकट्टी क्षेत्र में यमुना किनारे से करीब दो सौ मीटर अन्दर राधाबल्लभ मंदिर के निकट गुजराती धर्मशाला के सामने राधा मोहन घेरा में एक अति प्राचीन मंदिर स्थित है, यह मंदिर राधामोहन मंदिर के नाम से जाना जाता है।

            जैसा कि इस स्थान के नाम से ही जाना जा सकता है कि जंगलकट्टी क्षेत्र जो कभी घने जंगलों से आच्छादित रहा होगा और इस स्थान के जंगलों की कटाई उस समय में की गई होगी। इस लिये इस स्थान का नाम 1930 में नगर पालिका परिषद् के गठन के वाद से जंगलकट्टी के नाम से प्रसिद्ध हुआ और राधामोहन घेरा का नाम आधिकारिक रिकॉर्ड से गायब हो गया। 1870 के दशक में ब्रिटिश शासन में मथुरा के कलेक्टर रहे एफ0एस0 ग्राउस ने भी अपनी पुस्तक ‘‘मथुरा-ए-डिस्ट्रिक मेमॉयर’’ में भी ठाकुर राधामोहन मंदिर का उल्लेख नहीं किया है। उन्होंने इन बस्तियों के बीच में स्थित राधामोहन घेरे का उल्लेख भी नहीं किया गया है।


            श्री राधामोहन मंदिर को आज कम ही लोग जानते हों परन्तु पुराने समय में यह हितकुल का अत्यंत शोभनीय स्थल रहा है। श्रीराधामोहन मंदिर को आज कोई जानता तक नहीं है, इसका प्रमुख कारण है कि यह मंदिर सड़क से लगभग 10 फुट उंचाई पर है तथा इसमें सीढ़ियां भी हैं इस कारण से यात्री परदेशी इस मंदिर में दर्शन करने को नहीं जाते हैं। इस मंदिर से सटे कम से कम दस से बीस होटल, गेस्टहाउस भी बन गये हैं तथा मंदिर के चारों तरफ कई मकान बन जाने के कारण यह मंदिर दिखाई भी नहीं देता है। मंदिर के आसपास अनेक स्थानीय लोगों से पता करने पर भी वह बता नहीं पाते हैं। कोई कहता है कि इधर चले जाओ कोई उधर चले जाओ कह कर श्रीराधा मदनमोहन मंदिर की तरफ इशारा कर देते हैं, बहुत मश्किल से गुजराती धर्मशाला को खोजते-खोजते पहुंचना पड़ा।


            आज जब बॉंके बिहारी जी मंदिर के लिए कॉरिडोर की व्यवस्था सरकार द्वारा प्रस्तावित है, जिसको लेकर वृन्दावन में कॉरिडोर को लेकर समर्थन और विरोध में एक गतिरोध बना हुआ है। पॉंच एकड़ भूमि पर कॉरिडोर का निर्माण किया जाना है, जिसको लेकर आसपास के क्षेत्र की नाप तोल किये जाने पर स्थानीय लोगों द्वारा इस मंदिर के विषय में स्थानीय प्रशासन के पास यह मांग की गई कि इस मंदिर और इसके पास ही बनी एक समाधि को सुरक्षित किया जाये।


            राधा मोहन मंदिर के सेवायत मृदुल बल्लभ गोस्वामी ने मंदिर के सम्बन्ध में बताया कि श्री हित हरिवंश महाप्रभु के द्वितीय पुत्र गोस्वामी श्री कृष्ण चन्द्र जी महाराज जी के सेव्य ठाकुर श्रीराधामोहन जी महाराज हैं, और यह मंदिर 1584 ई. में बन कर तैयार हुआ था।

            श्री राधामोहन जी महाराज के अनन्य भक्त एवं वाणीसेवी श्री किशोरी शरण अलि जी अपनी रचना ‘‘हिंदी भक्ति काव्य में रस भक्ति धारा और उसका वाणी साहित्य’’ में प्राचीन स्थलों के भ्रमण को सहज व सरल मार्ग प्रदर्शित कर उल्लेखित करते हैं कि जुगल घाट के दाहिने पार्श्व में एक ऊँचे स्थान पर गोस्वामी श्री हित हरिवंशात्मज गोस्वामी श्री कृष्णदास जी के सेव्य ठाकुर श्री राधामोहन जी महाराज विराजे हैं। ठाकुर श्री राधामोहन जी महाराज के इस मंदिर को भव्य रूप देने और आसपास की भूमि को राधामोहन घेरे के नाम अभिसंज्ञात करने का श्रेय हितात्मज गोस्वामी श्री कृष्णदास जी के पौत्र गोस्वामी श्री सुखदेव जी को जाता है।

            पूर्व में श्री हितहरिवंश महाप्रभु के पिताजी श्री व्यास मिश्र जी के निवास देववन्द में ठाकुर श्रीराधामोहन जी महाराज की सेवा विराजमान थी।

            श्रीहित हरिवंश महाप्रभु जी 16 वीं शताव्दी में वृन्दावन आये थे। महाप्रभु के अंतर्ध्यान होने के पश्चात श्री कृष्ण चन्द्र जी महाराज सन् 1552 के लगभग वृन्दावन आए। इन्होंने कई ग्रंथों की रचना की जिनमें से एक ‘‘करणानन्द महाकाव्य’’ को यहां पर लिखा था, इसके पश्चात उन्होंने टीका लिखना प्रारम्भ किया। किन्तु वह अपने जीवनकाल में इस टीका को पूर्ण नहीं कर सके थे। श्री प्रवोधानन्द सरस्वती जी ने 1578 में इस ‘‘करणानन्द महाकाव्य’’ की टीका को पूर्ण किया।

             सन् 1585 में दिल्ली के अब्दुल रहीम खानखाना के खजांची सुन्दर दास कायस्थ ने एक लाल पत्थर का मंदिर श्री राधाबल्लभ जी के लिए बनवाया था, उसी मंदिर के बचे पत्थरों से श्री राधामोहन मंदिर का निर्माण भी किया गया था। राधाबल्लभ मंदिर में स्थित नक्काशी की तरह ही इस मंदिर में भी लाल पत्थरों पर नक्काशी की गई है। 


            श्रीराधामोहन मंदिर श्री ठाकुर बांके बिहारी जी के वर्तमान मंदिर से लगभग 300 साल पूर्व में बना बताया जाता है। बांके बिहारी जी का मंदिर सन् 1864 के आसपास में बना था। 


            सन् 1552-1578 के बीच वृन्दावन की लता-पताओं की कुंज में राधामोहन घेरा से अभिसंज्ञात कर ठाकुर जी की सेवा पधराई गई। अकबर के शासन काल में अबुफजल के द्वारा इम्प्रीरीयल ग्रान्ट के तहत ब्रज के 35 मंदिरों को चुन कर उन्हें जगह दी गई थी, उसी क्रम में 30 बीघा जमीन राधामोहन मंदिर को भी दी गयी थी। 1980 में प्रो0 तारापद मुखर्जी ने इस पर रिसर्च किया था जो कि भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार एवं अलीगढ़ मुसलिम यूनीवसिर्टी में आज भी सुरक्षित है।

            राधामोहन घेरे में हितात्मज गोस्वामी श्रीहित मोहनचन्द्र जी के वंशज श्रीहित चैन किशोर गोस्वामी जी की समाधि है जिसका निर्माण विक्रम सम्वत् 1874 में वैध श्री कृष्णप्रसाद मिश्र ने करवाया था, इसी समाधि पर एक शिलालेख को देखा जा सकता है किन्तु इस समाधि को चारों तरफ से इस प्रकार से घेर दिया गया है कि उसके पास जाना भी मुश्किल से हो पाता है, वर्तमान में एक दुकान के अन्दर से जाकर बमुश्किल ही देखा जा सकता है।   

            वृन्दावन बॉके बिहारी मंदिर में आने बाले श्रद्धालुओं की भींड़ को देखते हुए उ0प्र0 सरकार ने कॉरिडोर के निर्माण का प्रस्ताव माननीय न्यायालय में प्रस्तुत किया है, जिसके आधार पर मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंच गया। सुप्रीमकोर्ट के निर्देश पर कॉरिडोर के निर्माण को हरि झण्डी मिलने पर प्रदेश सरकार ने इस दिशा में कार्य करना प्रारम्भ किया तो कॉरिडोर के विरोध करने वाले लोगों ने कॉरिडोर की सीमा में आ रहे श्री राधा मोहन मंदिर को तथा पास में ही मौजूद एक समाधि को भी बचाने की कबायद शुरू कर दी।

            मृदूल बल्लभ गोस्वामी ने कहा कि वृन्दावन बॉके बिहारी जी मंदिर कॉरिडोर सीमा में आने वाले सांस्कृतिक व पुरातत्व महत्व के हिसाब से सर्वे करा कर ही कार्य को शुरू किया जाना चाहिए।

            


राधामोहन घेरा का जो क्षेत्रफल 200-300 साल पहले राधाबल्लभीय सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता था जो एक विशाल वन था एक कॉरिडोर जैसी संरचना पहले भी थी। राधाबल्लभ सम्प्रदाय के गोस्वामी लोगों की अपरस व उसके इतिहास को जानकर तथा उनकी सेवा को दृष्टिगत रखते हुए वर्तमान व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि गोस्वामी लोग विधिवत ठाकुर जी की सेवा कर सकें।




बुधवार, 9 अप्रैल 2025

राधाकुण्ड और उसके रज का महात्म्य

श्री राधाकुण्ड को श्री राधारानी का ही स्वरूप माना गया है।
श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं राधाकुण्ड और श्यामकुण्ड की महिमा को प्रकट किया था। गौड़ीय संप्रदाय में इसे श्री राधा-कृष्ण की माधुर्य लीलाओं का सर्वोच्च स्थल माना जाता है।
बंगाली समाज में विशेष श्रद्धा
बंगाल के भक्त राधाकुण्ड को केवल तीर्थ नहीं, बल्कि प्रेम का जीवंत स्थल मानते हैं। रज को अपने में समाहित कर लेने के लिए भाव विभोर होकर इसको अपने मस्तक पर लगा कर अपने आपको धन्य मानते हैं। 
राधाकुण्ड के रज की महिमा और इसका बंगाली समाज तथा गौड़ीय वैष्णवों के लिए महत्व अत्यंत गूढ़ और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से विशेष है। इसे समझने के लिए हमें राधाकुण्ड की उत्पत्ति, उसकी लीला-महिमा और विभिन्न भक्त-सम्प्रदायों की दृष्टि को जानना होगा।
राधाकुण्ड की महिमाः
राधाकुण्ड ब्रजधाम में स्थित एक पवित्र कुण्ड है, जिसे श्री राधारानी का प्रिय स्थान माना जाता है। इसकी महिमा श्री चैतन्य महाप्रभु, श्रील रूप गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी जैसे महान संतों द्वारा वर्णित की गई है।
शास्त्रीय प्रमाणः
पद्मपुराण और स्कंदपुराण में राधाकुण्ड की महिमा का वर्णन आता है।
श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी ने राधाकुण्ड को “प्रियतम स्थानों में सर्वाधिक प्रिय“ बताया हैः
“कृष्णस्य प्रियतमा राधिकायास्तदापि सः।
प्रियतमा तदा तस्याः कुंडं राधा समं स्मृतम् ।।“
“राधा कृष्ण के लिए जितनी प्रिय हैं, उतना ही प्रिय राधा को राधाकुण्ड है।“
राधाकुण्ड रज की महिमाः
राधाकुण्ड की रज (धूल) को अत्यंत पावन और मुक्तिदायिनी माना जाता है।
वैष्णव भक्तगण इस रज को मस्तक पर लगाकर स्वयं को राधारानी की दासी मानते हैं।
रज का एक कण भी आत्मा को शुद्ध करके भक्ति में अग्रसर कर सकता है।
बंगाली समाज के लिए राधाकुण्ड का महत्वः
बंगाली समाज के लोग राधारानी को ब्रज की स्वामिनी मानते हैं, और राधाकुण्ड को उनका हृदयस्थल।
उनके लिए यह कुण्ड केवल जल नहीं, बल्कि स्वयं श्रीराधा स्वरूप है।
यहाँ प्रतिदिन गोपियाँ, साधक, ब्रजवासी, बंगाली समाज व महिलाएँ-सभी सेवा, स्नान व परिक्रमा करते हैं।
गौड़ीय वैष्णवों के लिए महत्वः
गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय, जिसकी स्थापना श्री चैतन्य महाप्रभु ने की थी, राधाकुण्ड को सर्वोच्च तीर्थ मानते हैं।
श्री चैतन्य महाप्रभु की दृष्टिः
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ब्रज यात्रा पर आए, तो उन्होंने गोवर्धन के निकट इस कुण्ड की पहचान की और उसमें स्नान कर कहाः
“यह स्थान राधारानी के प्रेम की पराकाष्ठा का प्रतीक है।“
रघुनाथ दास गोस्वामी की सेवाः
उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राधाकुण्ड के तट पर तपस्या और सेवा में लगाया।
वे प्रतिदिन कुण्ड की परिक्रमा और रज से तिलक किया करते थे।
भक्तों की साधना का केंद्रः
आज भी गौड़ीय वैष्णव साधुजनों के लिए राधाकुण्ड साधना, सेवा और राधा-कृष्ण की भावनाओं में लीन होने का सर्वोत्तम स्थान है।
यह कुण्ड माधुर्यमयी लीलाओं का साक्षी है (राधा-कृष्ण की मधुर भाव भक्ति) की चरम अवस्था को प्रकट करता है।
राधाकुण्ड, गोवर्धन के निकट
श्रीराधा की भाव-समाधि, प्रेम की चरम अवस्था
रज की महिमा मुक्ति, भक्ति व राधा-कृष्ण सेवा की पात्रता देती है
ब्रजवासी दृष्टिकोण राधाकुण्ड = राधा स्वरूप, सेवा और श्रद्धा का केंद्र
गौड़ीय दृष्टिकोण सर्वोच्च साधना-भूमि, माधुर्य रस की चरम अनुभूति का केन्द्र बिन्दु है।

"श्याम कुण्ड, राधा कुण्ड, गिरी गोवर्धन।
मधुर मधुर वंशी बाजे, ऐई से वृन्दावन॥"

ये एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण भजन/कीर्तन की पंक्तियाँ हैं, जो वृंदावनधाम की दिव्यता और रसमयी लीलाओं का सार संजोए हुए हैं।
भावार्थ: श्याम कुण्ड और राधा कुण्ड:
श्रीकृष्ण और श्रीराधा के प्रीतिस्थल, जहाँ उनके प्रेम की सबसे गहन लीलाएँ प्रकट हुईं।

गिरी गोवर्धन:
श्रीकृष्ण का वह दिव्य पर्वत जिसे उन्होंने अपनी छोटी अंगुली पर उठाया था और जो ब्रजवासियों का रक्षक बना।

मधुर मधुर वंशी बाजे:
श्रीकृष्ण की बंसी की वह तान जो गोपियों के हृदय को खींच लाती थी, ब्रह्मांड को मोहिनी कर देती थी।

"ऐई से वृन्दावन":
यही है असली वृंदावन – लीलामय, रसमय, कृष्णमय। जहाँ हर कण में प्रेम है, और हर ध्वनि राधे-श्याम का गुणगान।

मंगलवार, 11 मार्च 2025

गधा एक बुद्धिमान प्राणी था और आज भी है

यह एक दिलचस्प और प्रेरणादायक दृष्टिकोण है! अक्सर गधे को मूर्खता का प्रतीक माना जाता है, लेकिन वास्तव में वह एक बेहद व्यावहारिक और समझदार प्राणी है। पहाड़ी रास्तों के निर्माण में उसका ऐतिहासिक योगदान रहा है जिसे सुनकर आश्चर्य होता है।


गधों की यह सहज नेविगेशन क्षमता और सुरक्षित मार्ग खोजने की प्रवृत्ति वास्तव में प्रशंसनीय है। आधुनिक तकनीकों के अभाव में हमारे पूर्वजों ने गधों की इसी स्वाभाविक बुद्धिमत्ता का उपयोग किया, और आज भी कई स्थानों पर गधे दुर्गम इलाकों में यातायात का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं।


इससे हमें यह सीख मिलती है कि किसी भी चीज़ को सतही नजरिए से आंकने की बजाय उसके वास्तविक गुणों और विशेषताओं को समझना चाहिए। क्या आपने कभी पहाड़ी क्षेत्रों में गधों के इस व्यवहार को प्रत्यक्ष रूप से देखा है?

आज के बाद कोई आपको गधा वोले तो आप वुरा न मानिए किन्तु आप गर्व महसूस करिए क्यों कि एक समय में पृथ्वी के पवर्तीय इलाकों में रास्तों की खोज, पहचान व उन्हें डिजायन करने का कार्य गधे ही किया करते थे। 


क्यों आपको विश्वास नहीं हो रहा है न तो चलिए देखते हैं। पहाडी इलाकों में रास्ता बनाना बहुत ही कठिन कार्य होता था, हम यदि एक दम नीचे से पहाड़ के सिरे तक एक रास्ता बनाते है तो ढ़ाल इतना अधिक होगा कि बैल गाड़ी, घोड़ा गाड़ी यहाँ तक कि बस व ट्रक आदि का जाना-आना अति कठिन होगा वह आसानी से आ व जा नहीं सकेंगे, रास्ते का ढाल लगभग 10 डिग्री से कम रखना होगा क्यों कि अगर एकदम सुरक्षित रास्ता बनाते हैं या एकदम कम स्लोप में रास्ता बनाते हैं तो ऊपर चढ़ने में काफी समय लग सकता है, इसके लिए इन दोनों के बीच में एक ऑप्टीमल पाथ निकालने के लिए एक गधे का उपयोग किया जाता था। गधे को पहाडी इलाकों में छोड दिया जाये तो वह इन्स्टैंटली अपना रास्ता निकाल कर चलना शुरू कर देगा। वह किसी दुर्गम या खराब रास्ते पर भी नहीं चढ़ेगा और वह एक दम कम खराब रास्ते पर भी नही जागेगा, जिसमें समय अधिक लगेगा।


एक समय था जब सेटेलाइट, मेप, फेन्सी मेजरिंग उपकरण इत्यादि की व्यवस्था नही थी, जिससे सहज ही पहाड पर्वत के मेप बनाये जा सकते, तब क्या करते थे, एक गधे को छोड़ देते थे और उसके पीछे-पीछे लोग चला करते थे और देखते थे कि गधा किस रास्ते से पहाड़ में चढ़ रहा है और उसी के अनुसार इन्सान ने रास्ते बनाये हैं।


इसी लिए कोई गधा बोलने या गाली देने पर किसी भी प्रकार से अपना मन खराब न करें, गधा एक बुद्धिमान प्राणी था और आज भी है।


मथुरा में युवा गायकों, कलाकारों को एक मंच पर लाने का श्रेय नम्रता सिंह को जाता है।

        कलाकार होना एक यात्रा है। एक ऐसी यात्रा जो कल्पना, जुनून और निरंतर अभ्यास से संवरती है। यदि आप एक उदीयमान कलाकार हैं, तो याद रखें कि हर महान कलाकार कभी न कभी इसी मुकाम पर था जहाँ आज आप हैं। सृजन की शक्ति आपके भीतर एक अनूठी दृष्टि है, एक कहानी है जिसे दुनिया तक पहुँचाना आपका कर्तव्य है। अपनी कला के माध्यम से भावनाओं को अभिव्यक्त करें, विचारों को आकार दें और अपने भीतर छुपी संभावनाओं को उजागर करें। 

        संघर्ष और धैर्य के साथ हर कलाकार को संघर्षों से गुज़रना पड़ता है। अस्वीकृति और कठिनाइयाँ इस राह के अभिन्न अंग हैं। लेकिन याद रखें, हर कठिनाई आपको और मजबूत बनाती है। धैर्य रखें, अभ्यास करें और अपनी कला में निरन्तर निखार लाने के लिए हर दिन कुछ नया सीखें। प्रेरणा और अनुशासन में प्रेरणा महत्वपूर्ण है, लेकिन अनुशासन के बिना यह अधूरी है। 

        अपनी कला को नियमित रूप से निखारें, एक रूटीन बनाएं और उसे पूरी ईमानदारी से निभाएं। महानता एक दिन में नहीं मिलती, लेकिन निरंतर प्रयास इसे संभव बनाती है। अपनी आवाज़ खोजें दूसरों से प्रेरणा लें लेकिन उनकी नकल न करें। अपनी शैली विकसित करें, अपने अंदर की आवाज़ को पहचानें और उसे अपनी कला में उकेरें। यही आपको सबसे अलग और विशिष्ट बनाएगा। 

        साझा करें और सीखें अपनी कला को दूसरों के साथ साझा करें, प्रतिक्रिया लें और उसे सुधारने का प्रयास करें। नए विचारों और नई तकनीकों के प्रति खुले रहें। प्रत्येक कलाकार हर सीखने की प्रक्रिया में होता है और यही उसे विकसित करता है। सपनों को मत छोड़िए जोश और समर्पण के साथ आगे बढ़ते रहें। जब भी संदेह हो, यह याद करें कि आपकी कला किसी न किसी के लिए प्रेरणा बन सकती है। इस सफर में आत्मविश्वास और जुनून बनाए रखें, क्योंकि एक न एक दिन आपकी कला ही आपकी पहचान बनेगी। 

        नम्रता ने भी एक ऐसे मंच की कल्पना की जिसमें ब्रज के उदीयमान कलाकारों को प्रोत्साहित किया जा सके। प्रत्येक रविवार को सांस्कृतिक कार्यक्रम व ब्रज तराना में हिन्दी गीत कला साहित्य से सम्बन्धित प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। जिसमें स्थानीय प्रतिभावान गायक कलाकारों को अपनी प्रस्तुति देने का अवसर प्रदान किया जाता है। इसमें ऐसे कलाकार जो अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर पा सकते हैं। यहां स्थानीय कलाकारों द्वारा शानदार प्रदर्शन कर मधुर संगीत के मध्य गायकी का प्रदर्शन करने का अवसर पा कर दर्शकों को मुत्रमुग्ध कर सकते हैं। 

        हाल ही में मथुरा वृन्दावन की सांसद श्रीमती हेमा मालिनी व उ0 प्र0 ब्रज तीर्थ विकास परिषद के उपाध्यक्ष शैलजा कान्त मिश्र जी ने ब्रजकला चौपाल के मंच पर पहंच कर नम्रता सिंह के प्रयास को सराहा। ब्रज कला चौपाल संस्था की संस्थापिका नम्रता सिंह ने बताया कि मथुरा में ब्रज कला चौपाल की स्थापना कलाकारों को दुनिया के सामने लाने का एक प्रयास है। लम्बे समय से नम्रता ने प्रत्येक छोटे बड़े मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां दी हैं। 

        भगवान श्रीकृष्ण के 5251 वें जन्मोत्सव, ब्रजरज उत्सव, या रंगोत्सव के मंच से नम्रता ने अपनी प्रस्तुतियां दी हैं। जिसमें उभरती हुई गायक कलाकार नम्रता सिंह की प्रस्तुति सभी के मन को भा गयी। नम्रता गरीब, असहाय व वृद्ध, बीमार लोगों की मदद करने के साथ-साथ वृद्ध महिलाओं के प्रति भी दया व उनके बीच में जाकर उनकी हर सम्भव मद्द करने का कार्य भी करती है। पशुओं  के प्रति भी दया का भाव रखती है। 

        नम्रता ने बताया कि इस मंच पर बहुत सारे बच्चे, बड़े, बूढ़े जिनका सपना था कि वे कला क्षेत्र में कुछ करें, उनको यहां एक मंच मिल गया है। जिस पर वे स्वतंत्र रूप से अपनी कला का प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि फिलहाल मथुरा-वृन्दावन शहर में प्रत्येक रविवार शाम 5 बजे से जवाहर बाग, (ब्रज तीर्थ ऑफिस के पास) में यह कार्यक्रम होता है। इस रोमांचक मंच पर बच्चे युवा अपनी प्रतिभा को निखार सकते है। नम्रता सिंह ने बताया कि संस्था का उद्देश्य समाज को मानसिक स्वस्थ्य बनाया जा सके। इसके लिए लोगों को जागरूक करना भी जरूरी है। 

        ‘‘सफलता मिलना आसान है, किन्तु उसको बनाये रखना कठिन है’’ किसी ने ठीक ही कहा है, किसी-किसी की उम्र गुजर जाती है प्रसिद्धि पाने में, यह जितनी जल्दी मिलती है, उतनी ही तेज़ी से वापस भी चली जाती है। हर किसी व्यक्ति के बस में नहीं है इसे संजोकर रखना। किसी भी परिस्थिति में सफलता को अपने व्यवहार पर हावी नहीं होने देना चाहिए। आप कितने भी सफल व्यक्ति क्यूँ ना बन जाएं परन्तु आपको अपनी वास्तविकता कभी नहीं भूलनी चाहिए। समय और परिस्थिति के साथ आगे जरूर बढ़ना चाहिए, किन्तु इस बीच सफलता दिमाग़ पर नहीं बैठनी चाहिए। व्यक्ति का अहम्, घमंड उसको कहीं का नहीं छोड़ता। आप जितने अपने पैरों को ज़मीन पर रखकर चलेंगे, आपको उतनी ही क़ामयाबी की राह मजबूती से मिलेगी।