बोलन्त हेला वचनन्त गारी। करीलके झाड़ कूप जलखारी। देखी कांन व्रज तुम्हारी
जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ वसुदेव जी यमुना पार कर कंस के भय से उन्हें नन्द यशोदा के यहां छोड़ आये थे। श्रीकृष्ण के जन्म के वाद उनके दर्शन करने के लिए सभी देवतागण यहां तक कि त्रिपुरारी ईश कैलाश पति भगवान शंकर भी स्वयं गोकुल में पधारे थे। ब्रज गोकुल में ब्रह्मा आदि सब देवता ऋषिमुनी तथा पृथ्वी के संपूर्ण तीरथ आये इसी लिए चर्तुमास में सदाकाल निरन्तर यहां वास करते हैं। भगवान शंकर तो अपने प्रभु श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को देखने तथा उसका आनन्द लेने के लिए कैलाश पर्वत से यहां पधारे थे।
जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तब योगद्वारा श्रीशंभु ने पार्वती जी से कहा कि ‘‘हे प्रिये मेरे प्रभू साक्षात् अजर अमर अविनाशी श्रीकृष्ण पृथ्वी का भार उतारने के लिए सोलह कलाओं के साथ पृथ्वी पर पधारे हैं। वो इस पृथ्वी का भार दूर करेंगे श्रीगोकुल धाम में अंश रूप में मनुष्य देह धारण करके बाल क्रीडा करेंगे’’। उन्होंने पार्वती जी से कहा कि ‘‘हम तीन शक्ति एक ही हैं। प्रभू विष्णु और श्रीकृष्ण एक ही रूप हैं, जो सदा ब्रज में लीला करेंगे और एक रूप में मैं हूं श्रीगोकुल में प्रभू की लीला को देखूगा’’, हे प्रिये जब ब्रज गोकुल गोलोक से ही आया है। तब तो मैं इस दुर्लभ स्वरूप में प्रभु की क्रीडा का आनन्द लूंगा। मैं मेरे प्रभू की बाल लीला का दर्शन अवश्य ही करूंगा। मेरा मन उसी आनंद की अनुभूति को देखने को कर रहा है। अब तो मैं गोकुल में जाऊंगा और मेरे प्रभू के दर्शन करूंगा। पार्वती जी बोली हे प्रभो। "हे नांथ ये आपने क्या कहा, मेरे प्रभू क्या वह सिर्फ आपके ही प्रभू हैं और किसी नहीं हैं।" महाराज अब तो श्रीकृष्ण जी के दर्शन करने के लिए, मैं भी आपके साथ चलूंगी।", तब महादेवजी बोले। "हे प्रिये तुम मत चलो। तुमको आनंद की प्राप्ति नहीं होयेगी। महादेव जी ने कहा कि ‘‘देखो बृजभूमी देखने में बड़ी कठिन हैं। पर भीतर से बहुत ही कोमल भी हैं। वहां के ब्रजवासी बड़े भोले हैं। परन्तु उनके स्वभाव कैसे हैं। मैं आपको बताता हूँ।"
दोहा- बोलंत हेला वचनंत गारी। करीलके झाड कूपजल खारी। ऐसी कृष्णकी व्रजहै प्यारी।
इस लिये हे प्रिये तुम्हारा स्वभाव बहुत ही सरल है और कुछ क्रोध युक्त भी है। तुम अगर चलीं और व्रजवासियों ने आपसे कुछ कह दिया तो तुमको क्रोध आ जायगा और क्रोध में तुमने किसी को कुछ श्राप दे दिया तो उलटा पुण्य के स्थान पर पाप हो जायेगा। वहां जितनीं वस्तु हैं। सब स्वरूपात्मक हैं। प्रिये जो मनुष्य जन प्रभू के दर्शन यात्रा करने जाते हैं। और ब्रजभूमि वृजवासियों का अनर्थ करने के लिए वहां आते हैं, उनकी तीर्थ यात्रा नहीं हो पाती है। वह तो उलटे पुण्य के बदले पाप के भागीदार बन जाते हैं। इस लिए "हे प्रिये तुम मत चलो।" पार्वती जी बोली ‘‘महाराज अब तो मैं अवस्य ही चलूंगी’’।
भोलेनाथ ने पार्वती जी को बहुत समझाया पर वह नहीं मानी। तब महादेव जी, कहने लगे कि जेसी तुम्हारी मर्जी। पर मुझको एक बचन दो तब में ले चलुंगा। ‘‘व्रजवासी चाहे सो बोलें। चाहे सो कहें। पर तुम किसी को श्राप मत देना। पार्वतीजी बोली महाराज मैं किसी से कुछ नहीं कहुंगी। महादेव जी कहने लगे। एक और बात अपने वाहन सिंह को संग में मत ले चलो। तुम्हारा वाहन सिंह है, उसको देख कर सब लोग डर जायेंगे। पार्वतीजी बोली ‘‘महाराज जो आज्ञा आपकी’’। हम तुम दोनों नंदीश्वर पर बैठ कर ही चलेंगे, व्रज गोकुल के लिए। यह कह कर दोनों नंदीश्वर पर विराजमान हो कर चल दिये, रास्ते में तो किसी ने कुछ नहीं कहा, जब व्रज में प्रवेश किया तो बृजवासियों ने इन दोनो को बैल पर बैठे देख कर खूब हंसने लगे हैं, यहां वृज में कोई बैल पै बैठतें नहीं हैं। इन दोनों को बैल पर बैठे देख ब्रजवासी खूब हसी करे है सो इन दोनोन को बैल पे बैठे देखि हसि के कहन लगे हैं। आपस में ‘‘अरे भैया हो देखो केसो आयो है। मोटे-मोटे दो जने, जाने खसम लुगाई हैं कै कोन है। सो मस्ताते दोंनों जने एक वेल पे बेठे हैं’’, और उनको देखि देखि के व तांई एकत्र ब्रजवासीन उनमें सो केहबे लगे हैं। ‘‘जो अरे भले आदिमीयो या विचारे वेल को तो कछू तरस करो। एक जनो उतरि परो ये वैल मरि जायग़ो। तुम मोटे ताजे हल मस्ता से बैठे हो’’। तब तो इतनों सुनि के पारवती जी कछु बोली नहीं है और सोचवे लागीं कि जो याके मन में दया आय गई है। व्रजवासी तो बड़े दयालू है’’ सो पारवती जी नंदीस्वरते उतरिके पांवन पांवन चलन लागी। तब पारवती जी के पांवन में गोखरून के कांटे लगन लागे है सो चल्यो जाये नहीं है कबहूं वैठि जांय कबहूं फेरि चलें हैं। बिचारी बोहोत दुखित भई हैं।
तब अगारी ब्रजवासी और मिले सो इनकी ओर देखि के कहेन लगे है। जो देखो भैया और केसी सुंदर रूपवारी लुगाई पावन तों चलें है और ये हल मस्ता वावा बैल पै बेठों है। व्रजवासी कहेन लागे हैं। जो अरे सुने नहीं है। जा बिचारी सुंदरी कों तो पांवन पांवन चलावे हैं और आप बेल पै वेठयो है। उतर मैं बाबा फावा नहीं जानु हूँ बैल पैते टांग पकरिके डारि देंऊंगो। ब्रजवासी पार्वती से कहन लागे हैं कि ‘‘कही अरी ओरी तेरे कैसे कैसे कांटे लगि गये है। दे दें तेरे कांटे निकासि देवें इतनो सुनि पारवती जी को इतनों गुस्सां आयो है सो जो महादेवजी को वचन न दीयो होतो तो जरूर श्राप दै देतीं। परि वचन यादकरि चुपहोय रहीं है कही महाराज मैंने तुम्हारे प्रभूकी व्रज देखि लीनीं। आप कहेते सो सब सांच है। क्रूबान के जल खारी हैं। हेलान सो बोले है। करील के झाड़ है। बात बात में गारी दें हैं। सो महाराज मैंने तो ब्रज देखि लीनी।
मैं तो जहां मेरे लक्ष्मी के भक्त हैं तहां जाऊंगी। सों पास ही में हातरस गांम हतो। सो तामें ही रहि गई और महादेव जी सों कही जो आप कैलास को चलोगे। तब मैं यहां सो तुम्हारे संग चलोंगी। तुम भले ही दर्शन करि आवो एसेई तुह्मारे प्रभू होयगे जेसी ब्रज और व्रजवासी हैं।
दोहा- बोलन्त हेला वचनन्त गारी। करीलके झाड़ कूप जलखारी। देखी कांन व्रज तुम्हारी।।
पार्वती जी नहीं आई है तब नंदीस्वर को वहां ही छोड़ि दीने है और श्री शंकर आप अपनो स्वरूप प्रगट करि गोकुल में नंद भवन में यशोदा के सामने आय के कहिवे लगे है अलख-अलख भोमातभिक्षां देही। श्रीयशोदा जी हंसि हंसि गोपीन सों कहन लगी हैं जो अरी देखो या बाबा को स्वरूप कैसो है जसोदा जी गायबे लगी है संगमें महादेवजी हू गायबे लगे है
(सोपद) देखोरी एक बाला जोगी द्वार हमारे आयो हैरी। अंग भभूति गले मृग छाला शेष नाग लपटायो हैरी।।1।। वाघंबर ओढ़े है ओघड़ शिर गंग चंद्र दिखाये हैरी। गल याके मुंडन की माला। सींगी नाद बजायो हैरी।।2।। लै भिक्षा निकरी नंदरानी कंचन थार भरायो हैरी। ले भिक्षा जाओ बाबा अपने घर मेरो गुपाल डरायो हैरी।।3।। (महादेव जी कहने लगे) नां चहीये तेरी दौलत दुनियां नां चहीये तेरी माया है। अपने गोपाल को दरस कराय दे या कारन जोगी आयो हैरी ।।४।। (जसोदा जी कहन लगी है) बाबा मैं तो लाला को नहीं दिखाऊंगी। तोको देखि मेरो लाला डरेगो। मैंने जांने कौन बडे पुन्यनते ये लाला पायो। तेरे तो सांप डेंडुआ लटक रहे हैं। तांते भिक्षा ले अपने घर जावो। महादेवजी कहन लगे है। अरी मैया तेरो लाला स्थावर जंगमको स्वामी जानें जगत रचायो हैरी। जाको कोन डरावन हारो। सो तेरे भवन छिपायो है।। देखो।।
महादेव जी कहन लगे है। जो मैया मोकों दरसन नहीं करावेगी तो मैं भी दरसन करे बिना जाऊंगो नहीं। ऐसे कहि अलख अलख कहि भगवान को ध्यान करि वहां सूं चले है। तब भगवान श्रीकृष्ण वडे जोर सो रोयबे लगे है श्रीयशोदा जी घनी वहलावैंदैं। परंतु रहे नाहीं हैं। तब जसोदा जी गोपींन को टेरें हैं। अरी रोहिणी ! अरी गोपीयो ! आज लाला बोहोत रोवे है। जाने जाकों आज कहा भयो है काऊ की नजर लगी कहा। तब गोपी राई नोंन करे है अनेक उपाय करे परि लाला तो रोवतते रहे है तब गोपी कहे है। अरी महरि तेरे घर आज कोई आयो है तो नाहि तब नन्द रानी कहन लगी है एक बावा जी अलख अलख कहेतो आयो हतो। सोवह कहेत हौ जो मोंको लाला के दरसन करवाय देउ। सो मैंने नांही करी। तब गोपी कहन लगी। अरी वह कछू अपनों नांम भी बताय गयो है। तब कही जो अलख अलख कहेते हतो। तब तो गोपी गोकुल की गलीन में अलख अलख पुकारन लागी है तव इतने में एक गोपी ने कही जो अरी यहां आवो ये बैठ्यों हैं। येही अलख अलख दीखे है। तब गोपीनने कही जो अरे वावा जी चलि हमारो लाला रोवे है। तोकों दरसन करावेंगी। चलिरे जोगी नंद भवन में जसुमति माय बुलावै। लटकत लटकत शंकर आये मन में मोद बढ़ावै। तव जसुमति अंचल छाया करि जोगी को दरस करावे। करि परिक्रमां महादेव जी वघ नखा कंठ पहिरावे ।।२।। तब भगवान जोगीको देखि वोहोत जोर सों हसें हैं सो महादेव बड़े आनंद में मगन होय नांचन गावन लागें हैं
सोपद- दिलदा मनहरन सांवला यार दरस तो दिखाया। मोकों दरस तो दिखाया प्रभू दरस तो दिखाया। हां हां तेरी जाघन जाघन काछन झगुली पीताम्बर कानन कुंडल मोर मुकुट घूंघर वारी अलके झलके नैनो ंमें समाय जा मेरे नयनों मै समाय जा दिलदा
या प्रकार महादेव जी मगन होय भगवान के गुणगांन करत बोहोत गाये नांचे तब भगवान वोहोत प्रसन शंकर को देखिके भये हैं। तब जसोदाजी और गोपी महादेवजी सों कहन लगी हैं। तूर हिरे बाबा नंदभवन में उर में आनंद लीजै । जब जब मेरो लाला रोवे तव तव दरसन दीजै।।1।।
अरे बाबा तू यहां ही रहि तेरो नाम कहा है महादेव जी कहेन लगे है। जो मैया एक स्वरूपते तो में यहां हीं रहूं हूं तव तुलारे बृजवासीन के व्याह होंय हैं। तब प्रथम मेरी पूजा करिके पाछे विवाह होय हैं। सुनि मैया मेरो नाम। श्रीकंठ शिवकंठ शिव शंभू ईस महादेवरी। बूढ़ो बाबूनाम हमारो सुरश्यांम मोय जानेरी। तब महादेवजी कहे जो मैया मैंनें भिक्षा पाय लीनी अब मैया याके गुणानवाद गाऊंगो। ऐसे कहि महादेवजी कैलास को चले। सो एकरूप सो शंकर सदा यहां ही विराजे हैं सो वृज में सब जाति में लगन व्याह होय है तव पहले बूढ़ो बाबू पूजें है। यह रीति सर्वत्र बृज में अभी ताई हैं।


