उनको कारसेवकों ने मंदिर के एक कमरे में बन्द कर दिया था
उनको जान से मारने की कोशिश भी की गई थी
प्रस्तुति- सुनील शर्मा, मथुरा
मथुरा। मार्क टुली एक ऐसा नाम जिसे पूरी दुनिया जानती है, भारत में तो उसे बच्चा-बच्चा जानता है, 06 दिसम्बर 1992 की अयोध्या की घटना ने उन्हें सबसे ज्यादा चर्चा में ला दिया था। मार्क टुली एक अंग्रेज पत्रकार और लेखक के रुप में जाने जाते हैं, उन्होंने जीवन के 80 से ज्यादा वसन्त देखें हैं। उनका भारत से काफी लगाव रहा है, उन्होंने न चाहते हुए भी पत्रकारिता के पेशे को अपना लिया और मार्क टुली को भारत बहुत भा गया और उन्होंने अपना घर भी दिल्ली में ही बना लिया। आज उनको कहीं देखा नहीं जाता है और अब कहां हैं, कैसे हैं, कहीं से भी पता नहीं चल सका।
मार्क टुली से मेरी एक खास मुलाकात 02 अप्रैल 2023 को राजकीय संग्रहालय में हुई थी वह अपने परिवार के साथ संग्रहालय देखने आये थे उनके साथ अम्बेडकर नगर के सांसद रीतेश पाण्डेय भी थे। मार्क टुली को मथुरा का संग्रहालय बहुत अच्छा लगा और उन्होंने पूरे संग्रहालय को बडी ही बारीकी से देखा था। मेरी मुलाकात के समय वह लगभग 85 साल की अवस्था में थे, उनकी आवाज भी बहुत धीमी हो गयी, और बहुत मुश्किल से ही चल पा रहे थे।
मेरा प्रश्न था कि- आप मथुरा के लोगों के लिए क्या कहना चाहेंगे
उन्होंने उत्तर दिया कि ‘‘मैं मथुरा के लोगों को शुभकामनाएं प्रस्तुत करता हूँ।’’
मेरा अगला प्रश्न था- कि रामजन्म भूमि अयोध्या बावरी विध्ंवस के समय आप अयोध्या में थे आपने वहां क्या-क्या देखा था 06 दिसम्बर 1992 के दिन के वारे में आप क्या कहना चाहेंगे।
उनका उत्तर था कि ‘‘मैं 05 दिसम्बर 1992 को वहां पर था, मैंने स्टोरी की थी, उस समय मेरे सामने बावरी मसजिद को बरवाद किया जा रहा था। मैंने अपनी स्टोरी में बताया कि लोगों ने मसजिद को बरवाद करना शुरू कर दिया है, उसके वाद में फौरन फैजावाद गया, क्यों कि अयोध्या में समाचार भेजने की कोई व्यवस्था नहीं थी, मैं फैजावाद गया और वहाँ से रिपोर्ट भेजा मैंने उसमें कहा कि यहां यह हो गया है, सबसे पहली रिपोर्ट मेरी थी।
उन्होंने आगे बताया कि उस समय पुलिस और जबान सब भाग गये थे। युवाओं को मैंने देखा कि बड़ी संख्या में मसजिद के उपर चढ़ गये थे। उपर से तोड़-तोड़ कर पत्थर नीचे फैंके जा रहे थे, उनके हाथों में लोहे की रॉड भी थी मार-मार कर तोड़ दिया, बर्वाद कर दिया।
उन्होंने आगे बताया कि मैं उसका चश्मदीद था। उसके वाद ब्रॉडकास्ट करके जब मैं बापस आया, उस समय मुझे वहाँ पर गिरा दिया गया था। उस समय मुझसे कहा गया कि हम लोग आपको मारना चाहते हैं, आप बीबीसी ब्रॉडकास्ट को खबर पेश करते हैं, मेरा उस समय उन लोगों से कहना था कि हम लोग तो कोई खबर गलत पेश नहीं करते हैं। मैंने कहा कि आप मुझे बता दीजिए कि मैंने क्या गलत पेश किया है। तब वह आपस में ही लड़ने-झगड़ने लगे आपस में कहने लगे कि यह आदमी काफी मशहूर है। हमने अगर इनको मारा तो हमारी रिपोर्ट दर्ज हो होगी, हमारी बदनामी भी होगी, उन्हीं लोगों में से कुछ लोगों ने कहा कि हम लोग इसको कहीं बन्द कर देते हैं, मुझे वहाँ पास में ही किसी मंदिर के कमरे में बन्द कर दिया गया था। तब मेरे साथ कुछ अन्य साथी भी थे।
एक अन्य प्रश्न-आप मथुरा में इससे पहले कभी आये हैं।
उनका उत्तर था ‘‘हाँ आया हूँ ज्यादातर रेलगाड़ी से मैं मथुरा आया था, कोविड से पहले भी में मथुरा आया था’’।
यहाँ पर आपने क्या-क्या देखा-
उन्होंने कहा कि ‘‘मैं मथुरा को बहुत पसन्द करता हूँ, मथुरा संग्रहालय बहुत अच्छा है, यहां पर रखी कलाकृतियां बहुत ही कीमती हैं, ऐसे म्युजियम में मैं कभी नहीं गया, इस जैसा म्युजियम मैंने कहीं नहीं देखा, पूरे विश्व में अपने आप में एक अकेला म्युजियम है, मैं इस म्युजियम को बहुत पसन्द करता हूँ, यहां पर जो देख भाल की जाती है उसके लिए यहां के सभी लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूँ।’’
‘‘मैं पुनः बापिस आऊंगा, अभी आया हूँ, मेरे रिश्तेदारों ने मुझसे कहा था कि आपको मथुरा संग्रहालय को देखना चाहिए। मैं पुनः मथुरा के लोगों को शुभकामनाएं देता हूँ।’’
मार्क टुली का जन्म 1935 में भारत के कलकत्ता शहर में नामी व्यवसायी के घर में हुआ था, जिनकी 6 संतानें थीं। एक जानकारी के मुताबिक उनकी मां के पूर्वज काफी समय से भारत में रहते थे, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के भी पहले से वे यहां रह रहे थे। उनके परदादा के पिताजी पूर्वी उत्तर प्रदेश में अफीम के कारोबारी थे और दादाजी पटसन का व्यवसाय करते थे। उनकी मां आज के बांग्लादेश में पैदा हुई थीं और उनका जन्म कलकत्ता में हुआ था। किन्तु उनकी परबरिश ब्रिटेन के लोगों की तरह से ही हुई थी, उनकी देखभाल करने वाली एक विदेशी महिला थी जिसने उन्हें भारतीय भाषाओं की जगह अंग्रेजी ही सिखाई थी।
1964 में उन्होंने बीबीसी में काम करना शुरू किया। यहां वह पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि एक मैनेजर के तौर पर कार्य करने आए थे। इसके अगले ही साल 1965 में अचानक उनको नई दिल्ली में जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव असिस्टेंट के तौर पर काम करने का अवसर मिला। कुछ ही महीनों बाद उन्हें बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के लिए भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल से रिर्पोटिंग के लिए उन्हें समाचार संवाददाता बना दिया गया।
भारत से अधिक लगाव होने के कारण उनको अपनी जन्मभूमि लौटने की बहुत खुशी हुई, क्यों कि उनकी बचपन की यादें यहां से जुड़ी हुई थीं। टुली के अनुसार, हमेशा से बीबीसी को खबरों के लिए विश्वनीय स्रोत माना जाता रहा है। भारतीय लोग सरकारी समाचार सेवाओं पर कम किन्तु बीबीसी पर भरोसा ज्यादा करते हैं। उन्होंने पूरे भारत की यात्राएं कीं। विभिन्न विषयों पर बेवाकी से अपनी रिपोर्टिग की और एक भरोसे के साथ उसे प्रस्तुत भी किया उनको भारत एक बहुत ही प्यारा देश लगता है।
आपातकाल के दौरान 1975 में टुली ने द गार्जियन और द वॉशिंगटन पोस्ट के पत्रकारों समेत 40 विदेशी पत्रकारों के साथ भारत छोड़ दिया था। वह लंदन वापस लौट गए। जब आपातकाल समाप्त हुआ तो वह बीबीसी के ब्यूरो चीफ बनकर भारत लौटे थे।
भारत सरकार ने 1992 में उन्हें पद्मश्री और 2005 में पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। 2002 में प्रिंस चार्ल्स ने मार्क टुली को बर्किंघम पैलेस में नाइट यानी सर की उपाधि प्रदान की थी, तब से लोग उन्हें सर मार्क टुली के नाम से भी जानते हैं।


