रविवार, 8 सितंबर 2024
अपने मुकुट को कहाँ रखोगे, वंशी को कहाँ छिपाओगे? काले से गौर कैसे होओगे? कृष्ण
समूचे बंगाल प्रान्त का ब्रज की पुण्य भूमि से गहरा नाता रहा है, जो निरन्तर बना हुआ है। बंगाल के घर-घर में कृष्ण लीला भजन कीर्तन आदि हर समय होते रहते हैं। बंगाल की धरती ने न जाने कितने साहित्यकार, गीतकार, उपन्यासकार दिये हैं। जिनमें गीतगोविंद के रचयिता जयदेव बंगाल के व्यक्ति थे। राधा और कृष्ण के प्रेम का वर्णन करने वाले इस सुन्दर काव्य के रचयिता थे।
इनसे पहले चंडीदास हुए जो श्रीकृष्णकीर्तन के प्रणेता थे जो चैतन्य महाप्रभु के पहले, लगभग 1400 ई. में, विद्यमान थे। दूसरे चंडीदास जो चैतन्य के बाद में आये। इन्होंने ही राधा कृष्ण के प्रेमविषयक उन अधिकांश गीतों की रचना की जिनसे चंडीदास को इतनी लोकप्रियता प्राप्त हुई। तीसरे चंडीदास दीन चंडीदास हुए जो राधा कृष्ण के गीत संग्रह के तीन चौथाई भाग के रचयिता थे।
इसी समय प्रसिद्ध वैष्णव कवि चैतन्य का आविर्भाव हुआ जिनका कवियों और विचारकों पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके आविर्भाव और मृत्यु के उपरांत संतों तथा भक्तों के जीवनचरित्रों के निर्माण की परंपरा चल पड़ी। इनमें से कुछ थे जैसे वृंदावनदास जिन्होंने चैतन्यभागवत लिखी, लोचनदास ने चैतन्यमंगल लिखा, जयानंद ने भी चैतन्यमंगल तथा कृष्णदास कविरत्न द्वारा चैतन्यचरितामृत (लग. 1581) में लिखा गया। कृष्ण और राधा के दिव्य प्रेम संबंधी बहुत से गीत और पद भी इस समय रचे गए।
इसी समय बँगला भाषा पर “ब्रजबुलि“ का भी प्रभाव पड़ा। जिसमें ऐसे गीत बंगाल में बड़े लोकप्रिय हुए और उनके अनुकरण में यहाँ भी रचनाओं में ब्रजबुलि का प्रभाव दिखने लगा। बंकिमचंद्र तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर तक ने ब्रजबुलि में गीतों की रचना की है।
वैष्णव प्रेमगीतकार के रूप में जयदेव कवि के रूप में आज भी जनमानस में विद्यमान हैं। उनके बाद चंडीदास तथा चैतन्य के अनुयायी आते हैं। गोविन्ददास कविराज ने ब्रजबुलि में कितने ही सुन्दर गीत प्रस्तुत किए। बर्धमान जिले के कविरंजन विद्यापति ने भी ब्रजवुलि में प्रेमगीत लिखे जिनके कारण वे “छोटे विद्यापति“ के नाम से प्रसिद्ध हुए। वृन्दावन में रूप सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी आदि ने ब्रज में बास करते हुए भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के प्रेम को अनन्त गहराईयों तक जाना। तथा हमेषा उनके भजन में लीन रह कर जीव के कल्याण का कार्य किया। कितने ही साधु संत महात्मा यहां आये और भगवान की दिव्य लीलाओं का रसास्वादन किया। जिनमें काठिया बाबा सम्प्रदाय के संत हो, आनन्दमयी माँ, पागल बाबा महाराज हों या इस्कॉन के संस्थापक ए. सी. भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी हों जिन्होंने अपने देष से जाकर विदेष में कृष्ण भक्ति का प्रचार प्रसार किया।
श्रीकृष्ण के प्राकट्य से अप्राकट्य तक उनकी वृन्दावन, मथुरा, द्वारिका की अगणित लीलायें सबने लिखीं और बताईं। पूतना वध, ऊखल-बन्धन, महारास, कंसवध, कुरुक्षेत्र-युद्ध आदि प्राय सभी लीलाओं से आम जन परिचित है। किन्तु एक परम गूढ़ लीला है, जो सामान्यतः न पढ़ने में आती है, न सुनने में। फिर उसकी प्रामाणिकता क्या ? प्रामाणिकता! यह सन्देह और अनिश्चय ही आदमी की सबसे बड़ी समस्या है।
राधारानी का नाम पूरे भागवत महापुराण में नहीं आता है। तो क्या वे कल्पना की वस्तु हैं? कुछ बातें होती हैं, जिन्हें छिपाने की विवशता होती है, जिसे हर कोई हर जगह नहीं कह सकता। ऐसी ही एक विरल कृष्णलीला द्वापर में हमारे वृन्दावन में निधुवन में घटित हुई। इस घटना का वर्णन किया है बंगाल के बलराम दास, वैष्णव दास आदि कुछेक वैष्णव पदकर्ताओं ने और उसका सम्यक विस्तार-आस्वादन किया है ’पाठबाड़ी’ आश्रम कोलकाता के प्रसिद्ध वैष्णवाचार्य श्रीपाद रामदास बाबाजी महाराज ने, अपने बंगला ’आँखर कीर्तन’ में। यह कीर्तन ’निधुवने स्वप्नविलास’ नाम के ग्रन्थ में मिलता है।
पूज्यपाद श्रीकृष्णदास कविराज ने अपने सुप्रसिद्ध बंगला ग्रन्थ’ श्रीचैतन्य चरितामृत’ में किया है कि कृष्ण के मन में तीन बातें जानने का लोभ उत्पन्न हुआ, तो उन्होंने हमारे कलियुग में शचीमाँ के गर्भ से जन्म लिया।
ये तीन विषय थे प्रथम- मेरे प्रति राधा का प्रेम क्या वस्तु है ?
द्वितीय- मेरा अद्भुत माधुर्य कैसा है?
और तीसरा- उस माधुर्य का आस्वादन कर राधा को जो सुख प्राप्त होता है, वह सुख कैसा है ?
“राधिकार भावकान्ति अंगीकार बिने। सेइ तिन सुख कभु नहे आस्वादने।। तिन सुख आस्वादिते होबो अवतीर्ण।“- चै. च. आदि-4
(अर्थात् कृष्ण ने निश्चय किया कि वे उक्त तीन सुखों का आस्वादन करने के लिये राधिका का भाव और उनकी कान्ति अंगीकार कर अवतरित होंगे, क्योंकि इस भाव-कान्ति के बिना वह आस्वादन सम्भव नहीं है।)
ठाकुर लोचनानन्द ने अपने ’चैतन्यमंगल’ ग्रन्थ में स्पष्ट वर्णन किया है कि देवर्षि नारद द्वारका गये उन्होंने यह रहस्योद्घाटन किया-
श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि ‘‘तो कृष्ण जन्म आबार लयिबो’’।।
“नवद्वीपे शचीगृहे गौर दीर्घ कलेवर बाहु जानुसम। सुमेरु सुन्दर तनु अति अनुपम।। कहिते कहिते प्रभु गौरतनु होइला। देखिया नारद अति आरति बाड़िला।।“
(अर्थात् ‘मैं नवद्वीप में शची के यहाँ जन्म लूँगा। मेरी देह होगी सुन्दर सुमेरु की तरह दीर्घ गौर वर्ण और भुजायें घुटनों तक लम्बी !’ यह कहते-कहते कृष्ण गौर वर्ण हो गये। यह देखकर नारद के मन में उस भावी अवतरण को देखने की बड़ी लालसा हुई।) अवतार हुआ, उसकी ये सभी सन्दर्भ इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस कलियुग में जो चैतन्य-लिखी जा चुकी थी।
उसकी भूमिका द्वापर में कृष्णलीला में ही बना ली गई थी। उसी गूढ़ कृष्णलीला (’निधुवने स्वप्न-विलास’) का भाव-सार प्रस्तुत हैं राधा और कृष्ण निधुवन में सुख-निद्रा में मग्न थे। राधा ने एक स्वप्न देखा, उनकी निद्रा भंग हुई और वे व्याकुल होकर रो-रोकर कहने लगीं-’उठो, उठो प्राणनाथ, कि देखिलाम अकस्मात्, एकटी युवा गौर-वरण। अश्रु कम्प पुलकादि, भाव-भूषा निरवधि, नाचे गाय महामत्त होइया। मन धाय ताहारे देखिया।।’’ (उठो प्राणनाथ! मैंने अकस्मात् यह क्या देखा! ? अश्रु-कम्प-पुलक आदि सात्विक भाव-भूषणों से विभूषित एक गौर-वर्ण युवक उन्मत्त होकर नाच रहा है, गा रहा है। उसे देखकर मेरा मन उसी ओर दौड़ रहा है।) “नव जलधररूप, रसमय रसकूप, इहा बूझिना हरि नयने। तबे केनो विपरीत, हेनो होइलो आचम्बित, कहो नाथ इहार कारणे।।“
(मैं तो तुम्हारे इस नवीन मेघ रसमय स्वरूप को छोड़ और किसी को नहीं जानती, फिर आज यह विपरीत बात क्यों हुई? नाथ, इसका कारण बताओ।)
नय गो, राधे- (राधा को इस तरह व्याकुल और मूर्छित होते देखकर कृष्ण ने कहा-“ से तो परपुरुष मिछामिछि तुमि केंदो ना राधे। तोमार प्रेम-ऋण शोधिबारे, आमि जे गौरांग होवो..... व्यर्थ ही क्यों रो रही हो ? जिसे तुमने देखा है, वह परपुरुष नहीं है। तुम्हारे प्रेम का ऋण चुकाने के लिये अब मैं गौरांग बनूँगा।) “ए तिन वांछित धन, ब्रजे नहिलो पूरण...... ए वासना पूर्ण कभु नय। तूया भावकान्ति धरि, नदीयाते करबो उदय।। घरे-घरे बिलाबो प्रेमधन।।“ (राधे, मेरी तीन इच्छायें ब्रज में पूरी नहीं हुईं, इसलिये मैंने निश्चय किया है कि अब मैं तुम्हारा भाव और तुम्हारी कान्ति धारण कर नवद्वीप में जन्म लूँगा। घर-घर प्रेम बहाहूँगा। मैं तो प्रेम का ’विषय’ हूँ, तुम्हारे ’आश्रय’-जातीय प्रेमरस का आस्वादन तभी सम्भव होगा, जब मैं तुम्हारी भाव-कान्ति धारण करूँगा।) चले जायेंगे, राधा काँप गईं। बोलीं- “जल बिनु मीन, जान।।“ (जब यह सुनकर कि कृष्ण ब्रज छोड़कर नवद्वीप फणी मणि बिनु, तेजये आपन पराण। तिल आध तुहारि दरश बिनु तोइछन, व्रजपुर गति तँहु आबार कोन् खेला खेल्बे, एइ ब्रजजन बधिवे की....किन्तु हरि मुझे बताओ तो कि, प्रेम प्रकाश जल के बिना मछली और मणि के बिना साँप अपने प्राण त्याग देते हैं। इसी तरह तुम्हें पलभर देखे बिना ब्रजवासियों की जो दशा होती है, उसे क्या तुम जानते हो। अब इन्हीं ब्रजवासियों का वध कर कौन-सा खेल खेलोगे? मुझे छोड़कर प्रेम बाँटोगे! ?)
राधा की बात पर कृष्ण ने कहा- ’सकलेइ आमार संगे जाईबे। काकेओ छेड़े जाबो ना राइ! गोप गोपाल सब जन मिलिया। नदीया नगर रे कोरिबो केलि।। तनु-तनु मेलि होइ एक ठाम। अविरत वदने बोलबो हरिनाम।। हरि बोलबो बोलाइबो, दुजने मिले गौर होईबो“ (राइ! किसी को भी छोड़कर नहीं जाऊँगा। सारे व्रजवासी मेरे साथ जायेंगे। नदीया में खेलेंगे। हम दोनों हरि बोलेंगे, बुलवायेंगे।)
एई जे हरि- दोनों मिलकर गौर बनेंगे, दोनों मिलकर एक होंगे, यह सुनकर राधा आश्वस्त तो हुईं, पर सन्देह नहीं गया। बोलीं- “बड़ो असम्भव कथा। चूड़ा धड़ा कोथाय थोबे, बाँशी कोथाय लुकाइबे, कालो गौर होइबे केमने? “ (यह बड़ी असम्भव बात है। अपने मुकुट को कहाँ रखोगे, वंशी को कहाँ छिपाओगे? काले से गौर कैसे होओगे? )
यह सुनकर ने अपनी कौस्तुभ मणि के प्रतिबिम्ब में राधा का श्रीअंग दिखाया और प्रवेश कर गये। इस प्रकार राधा-राधारमण, महाभाव-रसराज मिलकर एक हो गये। इस प्रकार “नदीयाते कोरिलो उदय। संगेते से भक्तगणे, हरिनाम संकीर्तने, प्रेम-वन्याय जगत् भासाय।। बाहिरे जीव उद्धारणे, अन्तरे रस आस्वादन.... (राधा-श्याम-एकाकृति गौरांगदेव ने भक्तों के साथ नवद्वीप में संकीर्तन कर जगत् को प्रेम-की बाढ़ में डुबो दिया। बाहरी तौर पर जीवो का उद्धार किया, आन्तरिक रूप से ब्रज प्रेमरस का आस्वादन किया)।
इसी के साथ जय श्रीकृष्ण, राधे राधे!
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