मंगलवार, 26 दिसंबर 2023

अगर व्यवस्थाऐं न सभल पायें, तो आरोप प्रत्यारोप लगा दो

सौ बात की एक बात अगर व्यवस्थाऐं न सभल पायें, तो आरोप प्रत्यारोप लगा दो ‘‘राधे राधे रटो बुलायेंगे बिहारी’’ तो चले आये बिहारी जी के दर पे वृन्दावन, मथुरा। सड़क पर यातायात व्यवस्थायें न सभल पा रही हों तो चौराहों को बंद कर दो, किलो मीटर दूर तक बाहनों को मोड दो या रोक दो, मंदिरों की तरफ भींड़ जा रही हो तो उसे बैरिकेटिक करके रोक दो, तो न आयेगी भींड़, न लगेगा जाम। वृन्दावन सौ सैया हास्पीटल के पास पागल बाबा मंदिर के बाद से ट्रेफिक को मोड़ दिया जाता है, वृन्दावन की ओर से आने वाले बाहनों को टीएफसी से भी आगे भेज दिया जाता है, मथुरा में स्टेट बैंक चौराहे के पास से लोगों को एक किलो मीटर आगे धकेल दिया जाता है, कभी-कभी रूपम सिनेमा के सामने से महाविद्या कॉलोनी की तरफ ही नहीं जाने दिया जाता है, कोई पूछे तो उल्टा सीधा जबाव मिलता है, बस कह दिया जाता है ‘‘आगे जाओ’’। प्रष्न उठता है कि अगर इस प्रकार से बाहनों को डायवर्ट किया जाता है तो यह परमानेन्ट ही कर दिया जाये। फिर यदि ट्रेफिक को आगे एक किलो मीटर धकेल दिया जाता है, तो फिर चौराहों पर इतने ट्रेफिक पुलिस कर्मियों की वहां आवष्यकता ही क्या है।
सोषल मीडिया पर बॉके बिहारी मंदिर वृन्दावन में लगातार आ रही भींड़ से स्थानीय लोग खासे परेषान हैं, हों भी क्यों न, क्यों कि घरों से निकल भी नहीं पा रहे हैं। जिन्हें भींड़ के आने से कुछ फायदा होता है, वह परेषान नहीं हैं, परेषान तो वह ज्यादा हैं जिनको इस भींड़ के आने से किसी प्रकार का फायदा नहीं है, वह जरूर परेषान हैं, वह सोषल मीडिया पर तरह-तरह के सुझाव और आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं। कोई लिख रहा है कि यहां आ जाते हैं और यहीं गन्दगी करते हैं, यहीं दुकानों के पट्टे पर सो जाते हैं, यमुना में नंगे होकर नहाते हैं, चाहें जहां जो मर्जी आती है करते हैं। कोई लिख रहा है कि ऑनलाइन रजिस्ट्रेषन करा कर दर्षन कराने चाहिए, कोई लिख रहा है कि वृन्दावन में ई रिक्षा अधिक हो गये है, इससे समस्या है। तरह-तरह के सुझाव और तरह-तरह की षिकायत शासन, प्रषासन से की जा रही है। अगर शहर में गन्दगी हो तो नगर निगम है, वह व्यवस्थाऐं देखे और यदि भींड़ ज्यादा आवे तो प्रषासन को देखना है, व्यवस्थायें वह भी स्थानीय लोगों से सुझाव लेकर की जायें। मंदिर में बैरीकेटिंग लगाई गई, नहीं लगने दी गयी, उससे परेषानी होने लगी। गलियों में बैरीकेटिंग लगाई गयी, वह व्यवस्था भी रास नहीं आयी। कोरीडोर का विरोध होने लगा। इतनी भयंकर भींड़ की व्यवस्था के लिए कोई न कोई उपाय जरूर किया जाना चाहिए, दिन पर दिन भींड़ बढ़ रही है। और यह भींड़ सिर्फ वृन्दावन बॉके बिहारी जी में ही नहीं है पूरे जनपद में है बरसाना, नन्दगाँव, गोवर्धन, मथुरा जंक्षन स्टेषन से लेकर मथुरा श्रीकृष्ण जन्मस्थान जाने वाले सभी मार्ग सुबह और सांम को लोगों इतनी भींड़ का सामना करना पड़ता है, कि स्थानीय लोगों का निकलना भी दूभर हो जाता है। सावन का महिना हो अधिक मास हो, वर्ष का अन्तिम सप्ताह हो या नये साल की शुरूआत हो, सभी को पुण्य कमाना है, सभी भगवान से नैना मिला कर अपना आगे का जन्म सुधारना चाहते हैं।
वृन्दावन के कुछ लोगों के कहने भर से लोगों का आना तो रूकने वाला है नहीं, वृन्दावन धाम है, पुण्य भूमि है, राधारानी का नित्य लीला स्थान है। भगवान श्री कृष्ण की रास स्थली है, जिसने भी सुना, सोषल मीडिया पर सुना, यूट्यूब पर सुना ‘‘राधे राधे रटो चले आयेंगे बिहारी’’, लोगों ने समझ लिया ‘‘राधे राधे रटो बुलायेंगे बिहारी’’ तो चले आये बिहारी जी के दर पे अब तो तू हमें सम्भाल हम तो आ गये तेरे दर पे। भीड़ का दवाब तो प्रतिवर्ष पिछले वर्ष के मुकाबले में बढ़ ही रहा है व्यवस्थाएं तो जिला प्रषासन को करनी ही चाहिए। समय रहते व्यवस्थायें न की गयीं तो यह समस्या बिकाराल रूप ले सकती है। समाजसेवी संस्थाओं को भी इस समस्या के लिए आगे आना होगा और स्थानीय लोगों को भी जिला प्रषासन के सहयोग के लिए ठोस सुझाव देने चाहिए।

विदेशों में ब्रजभाषा को गायन से पहचान दिलाने वाली माधुरी शर्मा

लोक गायन के माध्यम से देश विदेश में प्रस्तुति देने वाली सुप्रसिद्ध ब्रज लोक गायक कलाकार माधुरी शर्मा से एक मुलाकात विदेषों में भी ब्रजभाषा के अपने कार्यक्रम प्रस्तुत कर अन्तर्राष्ट्रीय पहचान पा चुकी लोक कलाकार माधुरी शर्मा से एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि मेरी शुरूआत तो आकाशवाणी मथुरा के मंच से हुई है। आकाशवाणी मंच मर्यादा और गरिमामयी औैर बहुत ही शालीन मंच है और सबसे बड़ी बात यह है कि वहाँ बिल्कुल देशी चीज़ें मिलेंगी। वहां पर कोई मिलावट नहीं है। यानी जो भी लोक गीत गाए जायें, जो भाषा बोली जाये, वो है ब्रजभाषा, हमारे ब्रज के लोगों के लिए, हमने वहाँ आकाशवाणी मंच से देश के कोने-कोने में कोई जगह ऐसी नहीं छोड़ी जहाँ पर ब्रजभाषा को नहीं पहुँचाया हो, विदेशों में भी ब्रजभाषा में ही गाया। लोग कहते थे कि इस भाषा को कौन समझेगा। मैं ऐसी-ऐसी जगह गयी हूँ जहां इस भाषा को लोगों ने पहली बार सुना था। मैं आकाषवाणी की एक कलाकार हूँ ठाकुरजी की कृपा से आकाशवाणी का सबसे बड़ा ग्रेड मुझे मिला है टॉप ग्रेड जो कि पूरे उत्तर प्रदेश में, मैं एक अकेली कलाकार हूँ। टॉप प्लस ग्रेड जो की एक लोक कलाकार के लिए एक सपना जैसा होता है। वो कभी पूरा नहीं हो होता है और यदि पूरा हो जाए तो समझो कि ठाकुरजी की बड़ी कृपा हो गयी है। शास्त्रीय और सुगम संगीत में तो यह मिल जाता है लेकिन लोकगायन के लिए मिलना एक असंभव सी बात है, क्योंकि लोककला को लोग शौकिया तरीके से ज्यादा गाते हैं। संगीत को सीख कर बहुत कम ही लोग गाते हैं। जो संगीत को सीख कर गाते हैं वह बहुत ऊपर तक जाते हैं।
उन्होंने बताया कि मैंने तो शास्त्रीय संगीत को सीखा है। विषारद किया है एम ए किया है। हमारे घर में हमारे बड़े भाईसाहब डॉ0 सत्यभान शर्मा जो कि हबेली संगीत के जाने माने गायक कलाकार हैं, वह आगरा में दयालबाग यूनिवर्सिटी में डीन के पद पर रह चूके हैं। माधुरी शर्मा ने बताया कि मुझे शिमला में बुलाया गया था। शिमला आकाशवाणी की ओर से कुल्लू फेस्टिवल, दशहरा फेस्टिवल में तो वहाँ के एक सज्जन बोले, मैडम आप कहा से आईं हैं मेने कहा मथुरा से आयी हूँ, उन्होंने पहली बार मथुरा का नाम सुना था, मैंने जब कहा कि मैं तो उनकी मथुरा से आई हूँ, सुन कर उनके चेहरे का भाव ही बदल गया और कहने लगे अरे मैडम आपको कौन सुनेगा? मैंने कहा कि भैया यह तो समय ही बताएगा। वहाँ पर 20 और 30 के ग्रुप में लोग गाने आते हैं, वहां मैं एक अकेली कलाकार वहां कोई अकेले गाने के लिए नहीं आता हैं, उस समय मैं लहंगा नहीं पहनती थी। जब शुरूआत में 1986 की बात रही होगी, मैं चौड़े बॉर्डर की साड़ी पहन के गाने जाती थी। उस समय मेरे लोकगीत इतनी तनमयता से वहां के लोगों ने सुना। वहाँ के डाइरेक्टर कार्यक्रम के बाद तुरंत उठ के आए और हमारा सम्मान किया यह यादगार और स्मरणीय पल था, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने कहा कि आपने तो रिकॉर्ड तोड़ दिया। यहाँ यह दशहरा फेस्टिवल है, कुल्लू में इतनी बड़े मंच पर बड़े-बड़े ग्रुप आते हैं। यहाँ अकेला आदमी तो कोई आया ही नहीं और अगर आया भी तो यहां टमाटर फेंके जाते हैं और यहां से भगा देते हैं। आपको इतने प्रेम से लोगों ने सुना, मैंने कहा कि यह तो हमारे ठाकुरजी की हमारे उपर बड़ी कृपा है। मैं ब्रजभाषा में गाऊ ब्रजभाषा में बोलूं और तब भी सबकी समझ में आवे है।
आपके विदेशों के अपने अनुभव बताइए कैसा रहा? विदेशों का अनुभव भी बड़ा अच्छा अनुभव है। वहाँ पहले तो हम गए 1991 में, मैं अगर यह कहूं तो कोई गलत बात नहीं होगी कि मैं ब्रज की पहली लोक कलाकार हूँ, जिसने विदेश की धरती पर जाकर के अपना लोक गायन प्रस्तुत किया हो। वहाँ के लोगों ने कैसी प्रतिक्रिया दी? वहाँ के लोगों की प्रतिक्रिया से पहले मैं बता दूं कि हमने ना तो अपनी वेशभूषा छोड़ी, मंच के अलावा भी हमने हर जगह पर साड़ी ही पहनी ये नहीं है कि हम और कोई ड्रेस में वहां घूमे हों। पूरे एशिया, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप का वर्ड सॉन्ग फेस्टिवल था जो कि मलेशिया में हुआ था हमने वहां पर अपनी प्रस्तुति दी, मलेशिया में। सही बात कहूं कि वहाँ हमें एक बात सुनाई पड़ी क्योंकि यह आयोजन मलेशिया के कोलालम्पुर राजधानी में वर्ड सॉन्ग फेस्टिवल में हुआ था जिसमें हमने भाग लिया था भारत की ओर से आकाशवाणी महानिदेशालय ने हमको भेजा था? क्योंकि जब हम ए ग्रेड हुए थे। तो तुरंत ही हमको ये बाहर का कार्यक्रम मिला। जब हम वहाँ पहुंचे तो सब ने हमको देखा सबने तो ये कहा की भाई एक कलाकार हैं, जिनसे बिना पूछे ही हम कह सकते हैं यह भारत की आर्टिस्ट हैं क्योंकि उनका बोलना, चालना, खाना-पीना और गाना और पहनना औढ़ना, सब कुछ भारतीय है, इनसे पूछने की जरूरत ही नहीं है। वो कहां की कलाकार हैं तो यह हमारे लिए बड़े गौरव की बात रही। जो हमारे लिए यह बात वहां कही गयी थी।
हम जब वहाँ से लौट आये तो हमारे बच्चों ने हमसे कहा कि ‘‘अरे मम्मी आप तो जैसी गयीं थीं, वैसी आ गयीं’’। तो मैंने कहा तो क्या करती, ‘‘अरे नहीं, बाल वॉल कटवा के आतीं कछु न कुछ बदल के आतीं’’ तो हमने उनसे क्या कहा ‘‘हम तो अपनों रंग चढ़ाए के आये हैं, काई को रंग हम पे न चढ़ सके, हम पे किसी का रंग क्यों न चढ़ सकता क्यों कि हम तो श्याम सुन्दर के रंग में रंगे भये हैं। हम तो उन पे रंग चढाये वे गए और चढ़ाएं के आये गये, उनको रंग हम पे नाय चढ़ सके। हम ब्रज में रहे हैं जहाँ हमारे कृष्ण कन्हैया रहे हैं और कन्हैया को रंग श्याम वर्ण है, श्याम को मतलब है कारो। तो भैया सुनील जी जे बताओ या रंग पे कछु रंग चढ़ सके का, चढ़ाओगे तो का बा पे कोई रंग चढ़ जावेगो का?

मंगलवार, 12 सितंबर 2023

निर्मला सुन्दरी से श्री श्रीमाँ आनन्दमयी

ब्रज में न जाने कितने ही लोग प्रतिदिन ब्रज और वृन्दावन में दर्शन करने आते कुछ तो यहीं बसने की आश लिए यहां आते हैं। भौतिक सुख सुविधाओं को त्याग कर कितने ही लोग यहां रह कर साधना में रत रहते हैं, असंख्य सन्तों ने इस दिव्य भूमि को अपनी साधना स्थली बना लिया और यहां पर रह कर आश्रम, मठ, मंदिरों का निमार्ण कर लोक कल्याण का काम किया है। इनमें एक नाम आनन्दमयी माँ का भी है जिन्होंने वृन्दावन में विशाल मंदिर का निमार्ण कराया और असंख्य लोगों को धार्मिक आस्था और भक्ति के मार्ग से जोड़ने का कार्य किया। आनन्दमयी माँ का जन्म 30 अप्रैल सन् 1886 ई. वृहस्पतिवार के दिन रात्रि 3 बजे त्रिपुरा जिलान्तर्गत अभिवाजित बंगाल प्रान्त के ’सेउड़ा’ नामक ग्राम में हुआ था। पिता श्री विपिनबिहारी भट्टाचार्य“ तथा माँ का नाम “मोक्षदा सुन्दरी“ था। पूर्व जन्म की इन्हें स्मृति बनी रही। बचपन में माँ को खिला पिला देने पर भी वह हमेशा आकाश की ओर ही निहारती रहती थीं बाल्यावस्था में स्वाभाविक उदासीन स्वरूप देख लोग इन्हें ’ढेला’ या ’विदिशा’ भी कहने लगे थे। जिसका मतलब आजल या पागल कहते थे। इन्हें अपने देह की कोई सुधबुध नहीं रहती थी।
माँ ने बचपन में इनका नाम निर्मला सुन्दरी रखा था। आनन्दमयी माँ नाम तो बाद में ढाका के प्रसिद्ध ज्योतिष चन्द्र राय के साथ एक बार ’सिद्धेश्वरी ससान’ में जाने पर वहाँ के सन्यासी स्वामी मौनानन्द महाराज ने रखा था। शैशवकाल में अपने पितामह की सान्निध्य में गाँव की एक पाठशाला में अल्प शिक्षा ग्रहण की थी क्योंकि उस समय शिक्षा, देशकाल की सीमा तक ही सीमित थी। फिर भी तीव्र प्रतिभा एवं विलक्षण स्मरण शक्ति की धनी होने के चलते आप शिक्षा के प्रति अब जैसी इतनी जागरूकता न थी। उस समय की प्रथानुसार 13 वर्ष की आयु में सन् 1909 में ढाका विक्रमपुर आटपाड़ा गाँव के ’रमणी मोहन चक्रवर्ती’ के साथ आपका विवाह हो गया था। इनकी लघु वैवाहिक जीवन यात्रा में भी अन्तर्मुखी साधना प्रवाहित रही। माँ के कारण ही पतिदेव ’रमणीमोहन’ का नाम ’भोलानाथ’ के नाम से विख्यात हुए। विवाह के कुछ समय बाद ही पतिदेव की पुलिस नौकरी की छूट गई। परिस्थितिवश ऐसे में 4 वर्ष तक जेठ के साथ साधन निरत रहते हुए रहना पड़ा। भोजन बनाते ही कभी समाधी लग जाती। ऐसी दशा देखकर आपसे जेठ बड़े प्रसन्न थे। चूल्हे पर चढ़ा सब कुछ जल जाता तो जेठानी प्रायः नाराज रहती थीं। पर कुछ बस न चलता। कुछ वर्षो बाद पतिदेव की नौकरी नवाब की रियासत अष्टग्राम में पुनः सर्वे विभाग में लग गई। तब वहाँ जयशंकर सेन के बाड़े में आकर आप रहने लगीं थीं। सेन की पत्नी का आपके प्रति इतनी श्रद्धा थी कि आपका नाम खुशी की माँ कह कर पुकारती थीं। आप भागवत आदि सुनते-सुनते भावावेश में आ जाती थी। इसी बीच 18 वर्ष की आयु में कई बार नौकरी से स्थानान्तरण भी हुआ। आपके अन्दर तीव्र प्रकट ज्योति होते देखकर कितने ही तान्त्रिकों एवं ओझाओं को आपके पतिदेव ने दिखाया किन्तु सभी नतमस्तक होकर वापस चले जाते थे। तब कहीं पतिदेव को भी ज्ञान हुआ कि यह पूर्व अर्जित भावदशा ईश्वरीय प्रदत्त महत स्थिती है। सन् 1922 ई. श्रावण झूलन पूर्णिमा को स्वतः दीक्षा सम्पन्न हुई। एवं योगिक, तांत्रिक क्रियाओं के साथ संस्कार आदिक मंत्र जप करना चलता रहा। आपने कोई सम्प्रदाय नहीं चलाया। हिन्दू सभी देवी देवताओं में आस्था और उनका समान करती थी। इसी बीच सन् 1924 ई. में पुनः नौकरी छूट गई। अबकी बार नवाब के द्वारा ढाका मैनेजरी मिली। आप यहाँ शाहबाग में अपने देवर ’माखन’ एवं भतीजे ’आशु’ के साथ रहती थीं। यहीं पर आपकी अनन्य उपासिका गुरूप्रिया दीदी से भी प्रथम भेंट हुई। आगे चलकर माँ के चरणों में आजीवन बनी रहीं। इनके द्वारा मूलतः बंगाल में छपी ’श्री श्री माँ आनन्दमयी’ नामक संस्मरणात्मक रचनाएँ सन् 1964 ई. तक की अनुभूतियाँ 20 खण्डों में छपी है। इन रचनाओं की हिन्दी एवं अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हो चुका है। माँ की बाहरी यात्रा सन् 1927 ई. से हरिद्वार तीर्थो के कुम्भ मेले से प्रारम्भ हुई। लौटते समय मथुरा वृन्दावन आई। फिर तो काशी आदि विभिन्न तीर्थों की यात्राएँ होती रहीं। बंगीय परिवेश के कारण आप शक्ति की विशेष उपासिका थीं। किंतु साथ में गौड़ीय सम्प्रदाय चैतन्य महाप्रभु के प्रति निष्ठा थी। माँ के सम्पर्क में आने में आगे चलकर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, आचार्य जे. पी. कृपलानी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, पं. गोविन्दबल्लभ पंत, युगल किशोर विड़ला, यमुनालाल बजाज, श्रीमती अपर्णा रे, श्रीमती कमला नेहरू, श्री दिलीप कुमार राय, श्री महादेव देसाई, श्रीगोपाल स्वरूप पाठक, श्रीमती सुचेता कृपलानी, जवाहरलाल नेहरू एवं श्रीमती इन्द्रा गाँधी आदि थे। वृन्दावन धाम आश्रम में एक बार मैंने भी साक्षात् दर्शन किये थे। उस समय उनका स्वास्थ्य खराब चल रहा था मैंने दर्शन किये और फिर 27 अगस्त सन् 1982 ई. 96 वर्ष की आयु में माँ ने देहरादून स्थित अपने किशनपुरा आश्रम में इस धाम को छोड़ कर हमेशा के लिए सभी को छोड़ कर चलीं गयीं। चमत्कार की वात तो यह थी कि इतनी वृद्धावस्था होने पर भी आपके एक भी बाल सफेद नहीं बल्कि स्याह काले ही बने रहे। आपके आश्रम वृन्दावन में छलिया राधाकृष्ण की सेवा पूजा होती है
मन्दिर का निर्माण सन् 1950 ई. के लगभग सुश्री माँ आनन्दमयी जी के द्वारा किया गया। मंदिर में ठाकुर छलिया राधाकृष्ण विराजते हैं। बगल में गौर निताई भी है। मंदिर एक विशालकाय अहाते के में बना हुआ है। ठाकुर के छलिया नाम पड़ने का कारण बड़ा विचित्र है एकबार ग्वालियर के महाराज जियाजी राव सिंधिया ने अपने लिए अष्टधातु निर्मित एक भव्य मूर्ति बनवायी। स्थापना उत्सव में माँ को भी बुलवाया किन्तु उत्सव के पहले ही अचानक महाराज परलोकवासी हो गये। घटना से पत्नी जियाजी राव सिंधिया बड़ी मर्माहत हो गयीं। माँ के समझाने बुझाने पर अचानक यह आया कि छलिया यह वृन्दावन धाम में ही वसना चाहते है। माँ से वार्तालाप हुयी। माँ ने स्वीकार कर लिया। और वृन्दावन स्थित रामकृष्ण मिशन हास्पीटल के सामने आनन्दमयी माँ का आश्रम है। जहां राधारानी विग्रह, छलिया ठाकुर के साथ गौर निताई विग्रह भी स्थापित किये गए। तभी से ठाकुर का नाम छलिया पड़ गया। एकबार काशी पक्के मोहल्ले में कोई बंगीय भक्त जमींदार का गोपाल मंदिर था। गरीबी के कारण आने वाला खर्च बन्द हो गया। भक्तराज तीन बार गोपालजी को गंगाजी में पधराने का प्रयास किया। दो बार व्यवधान पड़ने से गोपाल रुक गये। तीसरी बार ठाकुर ने स्वप्न दिया मुझे आनन्दमयी माँ को भेंट कर दो। माँ के आश्रम का पता लगाते हुए भक्त पहुँच गया। और घटना सुनाते हुए माँ को भेंट कर दिया। माँ ने वहीं काशीपुरी में गंगा के तट पर आनन्द ज्योति नामक मंदिर का निर्माण कराकर वहीं लड्डू गोपाल का विग्रह विराजित कर दिया। माँ के जीवन की ऐसी ही अनेक घटनाऐं है। राधाकृष्ण एवं गौर निताई विग्रह पूना आश्रम, उत्तरकाशी एवं देहरादून आदि सभी आश्रमों में विराजमान है। दीपावली कृष्णाष्टमी, एवं राधाष्टमी पर्व पर वृन्दावन में धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है।

रविवार, 10 सितंबर 2023

मथुरा वृन्दावन रेल लाइन का परिवर्तन समस्या या समाधान

मथुरा और वृन्दावन के बीच चलने वाली रेलवे की नयी व्यवस्था के वारे में कुछ वात कर लें। जानकारी के अनुसार इस रेलवे लाइन का निर्माण वृन्दावन स्थित राधा माधव जयपुर मंदिर के निर्माण के लिए उस समय पत्थरों की ढुलाई के लिए किया गया था। करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले मथुरा-वृंदावन के बीच यह मीटर गेज रेल लाइन डाली गयी थी, कुछ सालों के वाद यह इतिहास में यादगार बन कर रह गई। जयपुर घराने के राजा सवाई माधव सिंह (द्वितीय) द्वारा वृंदावन में जयपुर मंदिर (राधा माधव) का निर्माण कराया गया था। इसके लिए 1905 से 1908 के बीच जयपुर और धौलपुर से लाल पत्थरों की ढुलाई के लिए राजा सवाई माधव सिंह द्वारा तत्कालीन ब्रिटिश शासकों से विशेष अनुमति लेकर यह मीटर गेज लाइन बिछाई गई थी। मंदिर परिसर में ही अस्थायी रूप से स्टेशन भी बनाया गया था। राधा माधव मंदिर के निर्माण में रेल से पत्थरों की ढुलाई के कारण मंदिर का निर्माण 23 मई 1917 में पूरा हुआ और इस अवसर पर ठाकुरजी का पाटोत्सव मनाया गया। इस मंदिर के निर्माण में 40 वर्ष का समय लगा था।
इस रेल लाइन को अब डेढ़ सौ वर्ष के वाद गेज परिवर्तन करने का काम उत्तर मध्य रेलवे ने शुरू किया। यह रेलवे लाइन मथुरा वृंदावन के बीच 12 किलोमीटर के मीटर गेज रेल ट्रैक के रूप में थी, जिस पर कभी वृन्दावन से बैशाली एक्सप्रेस नोर्थ बंगाल के न्यू जलपाईगुड़ी स्टेषन तक सवारी गाड़ी के रूप में अप एण्ड डाउन किया करती थी तथा मालगाड़ी भी वृन्दावन के कुछ व्यापारियों के लिए नोर्थ बंगाल से कुछ माल लेकर आती व जाती थी। दिलचस्प बात यह है कि वृन्दावन में नगरवासी कुंज, छोटे पागल बाबा मंदिर में दुर्गा पूजा के लिए गौर कृष्ण दास उर्फ सुरेस्वरानन्द जी ने सन् 1963 में प्रथम बार एक दुर्गा की प्रतिमा को जलपाईगुड़ी से बनवा कर यहां पूजा के लिए मंगाई थी। मंदिर के सेवायत नवद्वीप दास ने बताया कि मूर्ति प्रतिवर्ष वृन्दावन इसी ट्रेन के लगेज में लाई जाती रही, सन् 2000 के बाद मूर्ति अब यहां नहीं आती है, क्यों कि अब सवारी गाड़ी व माल गाड़ी का चलन इस रूट पर बन्द कर दिया गया। इसके कुछ समय के बाद इस रेल रूट पर बैटरी से चलने वाली दो डिब्बों की रेल बस को शुरू किया गया जिसे तत्कालीन रेलमंत्री रामविलास पासवान ने शुरू किया था। कुछ समय तक ठीक से चलने के बाद आयदिन इसमें खराबी आने लगी। कभी इसे चालू किया जाता फिर खराब होने पर बन्द कर दिया जाता था। रेल बस दिन में केवल तीन चक्कर लगाती थी, तथा इसमें एक समय में 72 से अधिक यात्रियों को नहीं ले जाया जा सकता था। इसलिए दोनों शहरों के बीच पूरे यातायात का भार मथुरा-वृंदावन मार्ग पर पड़ने लगा। इस स्थिति को देखते हुए यातायात को आसान बनाने की दृष्टि से एक अन्य विकल्प को विकसित करना अत्यावश्यक हो गया। अब मथुरा-वृंदावन रेल लाइन को डबल रोड के रूप में बदला जाएगा, साथ ही एलिवेटेड को ट्विन मेट्रो ट्रैक के रूप में विकसित किये जाने की योजना है। मथुरा-वृंदावन मेट्रो जो भाजपा सांसद (मथुरा) हेमा मालिनी का लंबे समय से सपना रहा है, जल्द ही यह वास्तविकता बदलने जा रही है। इसके लिए रेल मंत्रालय और संबंधित अधिकारियों ने कम उपयोग में आ रही मथुरा-वृंदावन रेल लाइन को डबल रोड में बदलने और एलिवेटेड पाथवे को मेट्रो ट्रैक के रूप में विकसित करने के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।
श्रीमती हेमा मालिनी और ब्रज तीर्थ विकास परिषद् के उपाध्यक्ष शैलजा कांत मिश्रा ने रेल मंत्री श्री पीयूष गोयल को मथुरा वृन्दावन में अनियंत्रित यातायात के समाधान के रूप में मेट्रो चलाने का प्रस्ताव दिया था, जो मथुरा और वृंदावन के बीच यात्रा को असुविधाजनक और कम समय लेने वाला बनाना है। यूपी के तत्कालीन ऊर्जा मंत्री वर्तमान विधायक श्री श्रीकांत शर्मा ने उनसे ‘ब्रज हेरिटेज मेट्रो ट्रेन कॉरिडोर’ पर भी चर्चा की थी। मंत्रालय से मंजूरी अनिवार्य थी क्योंकि संपत्ति रेलवे की है। रेल भूमि विकास प्राधिकरण (दिल्ली) के अधिकारी अंजनी कुमार और आगरा के डीआरएम ने स्थिति और परियोजना के दायरे का अध्ययन करने के लिए जिला प्रशासन के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक की जिसमें यह निर्णय लिया गया कि रेल लाइन को डबल रोड में बदल दिया जाएगा, साथ ही एलिवेटेड का उपयोग मेट्रो के लिए किया जाएगा। मेट्रो के दो ट्रैक मथुरा और वृन्दावन के बीच आने-जाने से सहायता मिलेगी। मथुरा के लोगों के लिए मेट्रो की सवारी अपने आप में एक आकर्षण के रूप में देखा जा रहा है जो यात्रियों को मथुरा-वृंदावन के प्रतिष्ठित मंदिरों जैसे श्री कृष्ण जन्मस्थान, बिड़ला मंदिर और पागल बाबा मंदिर को उपर से देखने का अवसर प्रदान करेगा। इसके अलावा, मेट्रो लाइन के दोनों ओर जहां स्टेशनों की योजना है, वहां शॉपिंग मॉल और पार्किंग सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी। मथुरा वृंदावन के बीच रेल ट्रैक 12 किमी. का है मथुरा वृंदावन के बीच करीब 12 किलोमीटर का रेल ट्रैक है। इस मीटर गेज को परिवर्तित करने के लिए रेलवे ने प्रोजेक्ट तैयार कर काम भी शुरू कर दिया था। रेलवे द्वारा तैयार प्रोजेक्ट के अनुसार इस ट्रैक के ब्रॉड गेज में कन्वर्ट करने के दौरान 2 आरओबी, 17 आरयूबी के अलावा 23 छोटे ब्रिज भी बनाए जाने की योजना थी। इस ट्रैक पर 6.6 किलोमीटर का एलिवेटेड इंबैंकमेंट ट्रैक रहेगा इसके अलावा 4.5 किलोमीटर लेबल ट्रैक बनाया जायेगा यानी जमीन के लेबल पर बनाया जाता फिलहाल इसका काम बन्द करा दिया गया है। 2 स्टेशनों के साथ 4 हॉल्ट स्टेशन भी बनाए जाने थे मथुरा वृंदावन के बीच गेज ट्रैक परिवर्तन के बाद इस रूट पर 4 हॉल्ट स्टेशन के साथ 2 रेलवे स्टेशन बनाए जाने की योजना थी। मथुरा जंक्शन से शुरू होने वाले इस रेल ट्रैक पर पहला हॉल्ट स्टेशन शिव ताल पर होता। इसके बाद श्री कृष्ण जन्मस्थान और फिर मसानी पर क्रॉसिंग रेलवे स्टेशन बनाया जाना था। यहां से आगे चामुंडा देवी मंदिर के पास और चैतन्य बिहार वृन्दावन में हॉल्ट स्टेशन बनना था। अंत में वृंदावन स्टेशन टर्मिनल विकसित करने की योजना थी। गेज ट्रैक परिवर्तन का काम जनवरी 2023 सें शुरू हो चुका था गेज कन्वर्ट करने का काम 14 जनवरी 2023 से शुरू किया गया था। 10 चरण में शुरू होने वाले इस गेज परिवर्तन का काम 14 जनवरी 2025 को काम पूरा किया जाना था। इसके लिए अर्थ वर्क और ब्लैंकेटिंग का काम शुरू किया गया। यह काम 15 जुलाई 2024 तक पूरा होना था। तथा मार्च 2023 से सितम्बर 2024 तक पुल बनाने का काम भी पूरा करना था। स्टेशन की इमारत और प्लेटफार्म बनाने का काम भी इसी दौरान पूरा किया जाना था। ट्रैक लिंक करने का काम फरवरी 2024 से नवम्बर 2024 तक किया जाना था। इस ट्रैक पर विद्युतीकरण भी किया जाना था। यह काम अप्रैल 2023 से शुरू होकर दिसंबर 2024 तक पूरा करना था। इस दौरान सिगनल और टेलीग्राफ सिस्टम पर भी काम किया जाना था। इसके बाद टेस्टिंग, ट्रायल आदि का काम जनवरी 2025 तक पूरा कर लिये जाने की योजना थी, यानी 2 साल के भीतर गेज परिवर्तन कर रेलवे इस ट्रैक को पूरी तरह से चालू कर देता। श्रद्धालुओं को मिलती सुबिधाएं स्थानीय व्यापारियों को होता फायदा गेज परिवर्तन होने के बाद मथुरा वृंदावन आने वाले श्रद्धालुओं को बड़ी राहत मिलती। अभी श्रद्धालु मथुरा जंक्शन स्टेशन पर उतरते हैं और उसके बाद वह विभिन्न माध्यम से वृंदावन तक आते हैं। वृंदावन स्टेशन से लंबी दूरी की ट्रेन शुरू होने से न केवल श्रद्धालुओं को राहत मिलती बल्कि स्थानीय लोगों और स्थानीय व्यापारियों को भी पुनः सहूलियत मिल सकती थी। मथुरा वृंदावन में करोड़ों श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन करने आते हैं। इस ट्रैक के परिवर्तन के बाद श्रद्धालुओं को जहां राहत मिलने की सम्भावना थी वहीं शहर में लगने वाले जाम की समस्या से भी निजात मिल सकती थी। रेलवे वंदे भारत की तरह की ट्रेन चलाने की योजना बना रहा था रेलवे मथुरा वृंदावन के बीच कम कोच की वंदे भारत जैसी ट्रेन चलाने की योजना बना रहा था। इसके साथ ही वृंदावन स्टेशन से लंबी दूरी की भी कुछ ट्रेन चला कर श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों को भी सुबिधा मिल सकती थी। हालांकि मथुरा वृंदावन के बीच चलने वाली ट्रेन के नाम और इसकी टाइमिंग क्या होती इस पर अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया। मथुरा वृन्दावन के मध्य गेज परिवर्तन कर रेलवे ट्रैक को पूरी तरह से चालू करने में 402 करोड़ 88 लाख के इस गति शक्ति प्रोजेक्ट पर उत्तर मध्य रेलवे ने काम करना शुरू कर दिया था कुछ लोगों को यह विकास कार्य रास नहीं आया और विरोध के चलते फिलहाल इस योजना को ब्रेक लग गया है।
रेलवे को पूरे ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा क्षेत्र को रेल ट्रेक से जोड़ना चाहिए रेलवे को ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा में पड़ने वाले पडाव स्थलों को जोड़कर तीन फेज में मेट्रो की तर्ज पर पिलर्स डाल कर यहां भी मेट्रो चलाने की योजना बनानी चाहिए। प्रथम फेज में मथुरा से वृन्दावन तक मेट्रो ट्रेक डालने पर विचार किया जाना चाहिए। दूसरे चरण में वृन्दावन से राधाकुण्ड़ बरसाना होते हुए गोवर्धन से मथुरा तक मेट्रो ट्रेक डालना चाहिए, तीसरे चरण में मथुरा से गोकुल महावन बलदेव होकर वृन्दावन तक का मेट्रो ट्रेक विकसित किया जाना चाहिए। जिससे रेलवे को अत्यधिक आय का अवसर मिलेगा, क्यों कि मथुरा वृन्दावन में प्रतिवर्ष करोड़ों श्रद्धालु यहां आते हैं तथा ब्रज के सभी प्राचीन धार्मिक व आस्था के केन्द्रों में जहां-जहां श्रीकृष्ण राधारानी की लीला स्थलियों का दर्षन करते हैं। इस योजना से रेलवे को भारी लाभ का अनुमान लगाया जा सकता है तथा मथुरा वृन्दावन तथा ब्रजचौरासी कोस परिक्रमा का विकास भी सम्भव है जिससे रोजगार की अपार सम्भावनाओं की आषा की जा सकती है।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

सनातन, वैष्णव धर्म को विश्व के कौने-कौने में पहुंचाने का श्रेय श्रील ए. सी. भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी को जाता है।

सनातन धर्म और वैष्णव धर्म के प्रचार प्रसार को विश्व के कौने-कौने में पहुंचाने का श्रेय एक मात्र श्रील ए. सी. भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी को जाता है। आज 01 सितम्बर 1896 ई0 प्रतिपदा के दिन आपका जन्म पश्चिम बंगाल प्रान्त के “कलकत्ता“ शहर में हुआ था। आपने 81 वर्ष आयु तक सन् 1977 ई. को मिती मार्गशीर्ष कृष्णा चतुर्दशी को वृन्दावन में रमणरेती की रज प्राप्ति की। आपके गुरू श्रील विमलानन्द (भक्ति सिद्धान्त सरस्वती) ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में दीक्षा दी थी। तत्पश्चात् 11 वर्ष अखण्ड गौड़ीय ग्रन्थों को पढ़ने के बाद ही दीक्षा ले ली थी। आपका पहले का नाम ’अभय चरन डे’ था। श्री गुरु महाराज ने आपका नाम अभय का ’ए’ तथा ’चरन’ का सी., अँग्रेजी के पहले अक्षर को मिलाकर अपनी तरफ से सन्यास का नाम ’भक्ति वेदान्त’ को जोड़कर “ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी“ बना दिया। श्रील से तात्पर्य जो धन धान्य लक्ष्मी से परिपूर्ण हो। तात्पर्य-श्रीः लास्यति इति श्रीलः।
संगम-प्रयागराज तीर्थ में दीक्षा लेते ही धर्म प्रचार कार्य में जुट गए। गुरु जी ने वैदिक ज्ञान के प्रचार हेतु अंग्रेजी भाषा में करने को कहा क्योंकि अंग्रेजी भाषा में आप कुशल दक्षता प्राप्त थे। अतः गौड़ीय मठों को सहयोग देते हुए सन् 1933 ई. में गीता पर एक टीका लिखी। कितने वर्षों तक आप भारत में ही धर्म प्रचार करते रहे। सन् 1944 ई. में आपने बिना किसी के सहयोग लिए अंग्रेजी में एक ’पाक्षिक पत्रिका’ निकाली जो कभी भी बन्द न होकर बल्कि अब तक तीस भाषाओं में छप रही है। सन् 1959 ई. में आपने ‘वानप्रस्थ’ सन्यास लेकर कितने ही वर्षों तक वृन्दावन ’राधादामोदर’ मन्दिर में रहकर यहां से धर्मग्रन्थों का अनुवाद किया, विषेष कर श्रीमद्भगवत गीता का अनुवाद अंग्रेजी में करके विष्व में जन-जन तक पहुंचाने का पुनीत कार्य किया। सन् 1965 ई. में श्री गुरुदेव द्वारा चलाया हुआ धर्मानुष्ठान अभियान पूरा करने के लिए सितम्बर मास में ‘‘संयुक्तराज्य अमेरिका’ गए। वहाँ पहुँचकर प्रथम् “न्यूयार्क“ नगर से अपना अभियान प्रारम्भ किया। फिर सन् 1966 ई. में ‘‘आंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ“ की स्थापना की। आपके प्रचार, प्रसार, विस्तार विषय में जितना कुछ कहा जाय वह कम है। जीवन का एक-एक दिन अमूल्य घटनाओं से भरा पड़ा है।
आपने अपनी वृद्धावस्था की भी परवाह न करते हुए ग्यारह वर्षों के अन्तराल में विश्व के छहों महाद्वीपों की चौदह बार परिक्रमा की। आप की उर्वरा शक्ति सम्पन्न लेखनी अविरत चलती ही रहती थी। सौ से अधिक ग्रन्थों को पच्चास भाषाओं में छापकर करोड़ से अधिक संख्या में वितरित किया। एक बार “हरे कृष्ण“ आन्दोलन के उपर शुरूआती समय में ’रूस जैसे कम्युनिज्म देश में प्रतिबंध लगा दिया गया था। फिर भी न मानने से ’हरेकृष्ण’ भक्तों को पागलों के साथ जेल में ठूंस दिया गया। जेल में भी जमकर कीर्तन होता रहा। नाम के प्रताप से कितने ही पागल तो ठीक भी हो गए। ऐसा चमत्कार देखकर वहाँ की सरकार को हार मान कर ढाई वर्षों बाद इन्हें छोड़ना पड़ा था। रूसी भाषा में लाखों गीता भागवत छपवा कर वितरित की गई, जो परम्परा अभी भी चली आ रही है। परिणामतः कितने ही रूसी भक्त वर्तमान में पश्चिम बंगाल के मायापुर एवं मथुरा के वृन्दावन धाम की यात्रा पर निरन्तर आते हैं।
गुरू षिष्य परम्परा का निर्वहन करते हुए प्रभु प्रेरित दैवी शक्ति सम्पन्न गुरु, कृपा से धराधाम पर गौड़ीयमठ के माध्यम से प्रचारकों के रूप में आए। केवल विदेशों में “अन्तर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ“ प्रचार केन्द्रों की संख्या आज लगभग 200 से अधिक मंदिरों के साथ शाखाएं हो गई हैं। जहाँ मन्दिरों में ’राधाकृष्ण’ चैतन्य-नित्यानन्द श्रीविग्रह के साथ विशुद्ध वैष्णव पद्धति से सेवा पूजा होती है। भक्त सदाचार का समुचित पालन करते हैं। श्री गौराङ्ग, नित्यानन्द, राधाकृष्ण नाम संकीर्तन के माध्यम से मात्र 11 वर्षों में भारतीय धर्म संस्कृति का प्रचार प्रसार विश्व क्षितिज पर जिस प्रकार उनकी कृपा से छा गया है इस प्रकार की सफलता विश्व के इतिहास में एक मात्र बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार काल में सम्राट ’अशोक’ ही एक बार कर पाया था । ’हरे कृष्ण’ आन्दोलन सफलता पूर्वक समस्त विश्व में छा गया है। नास्तिकों के हृदय रूपी मरुभूमि में भी आस्तिकता की निष्ठा जाग गई है। यह पूरा श्रेय श्रील ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी को ही जाता है जिन्होंने सनातन धर्म वैष्णव धर्म का प्रचार प्रसार पूरे विष्व में किया है। श्रीचैतन्य देव ने जो एक बार कहा था उन्हीं के शब्दों में “पृथ्वी पर्यन्त यत आछे देश ग्राम, सर्वत्र प्रचार होइवेक मोर नाम“।। (चै० चरि० 2/4/26)

सोमवार, 28 अगस्त 2023

लंकाधिपति रावण शिवजी का परम भक्त था।

लंकाधिपति रावण शिवजी का परम भक्त था। रावण की शिवभक्ति के किस्से हम सुनते ही रहते हैं, उसकी शिवभक्ति के अनेक रोचक किस्से प्रचिलित हैं। इसी कथानक को प्रमाणित करती राजकीय संग्रहालय, मथुरा की मूर्ति रावणानुग्रह
कहा जाता है कि एक बार रावण जब अपने पुष्पक विमान से यात्रा कर रहा था तो रास्ते में एक वन क्षेत्र से गुजर रहा था। उस क्षेत्र के पहाड़ पर शिवजी ध्यानमग्न बैठे हुए थे। शिव के गण नंदी ने रावण को रोकते हुए कहा कि इधर से गुजरना सभी के लिए निषिद्ध कर दिया गया है, क्योंकि भगवान तप में मग्न हैं। रावण को यह सुनकर क्रोध उत्पन्न हो गया। उसने अपना विमान नीचे उतारकर नंदी और वहां उपस्थित गणों का अपमान किया और फिर जिस पर्वत पर शिव जी विराजमान थे, उसे उठाने लगा, यह देख शिव जी ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को दबा दिया जिस कारण रावण का हाथ उस पर्वत के नीचे दब गया। जिसके कारण रावण को असहनीय कष्ट होने लगा जिससे वह रोने लगा और शिव से प्रार्थना करने लगा कि मुझे इस कष्ट से मुक्त कर दें। इस घटना के बाद रावण शिव का परम भक्त बन गया। यह भी कहा जाता है कि एक बार नारदजी के उकसावे पर रावण अपने प्रभु महादेव को कैलाश पर्वत सहित उठाकर लंका में लाने की सोचने लगा। वह अपने विमान से कैलाश पर्वत गया और वहां जाकर वह पर्वत को उठाने लगा। पर्वत हिलने लगा तो माता पार्वती ने पूछा कि यह पर्वत क्यों हिल रहा है प्रभु। तब शिवजी ने कहा कि मेरा भक्त रावण मुझे पर्वत सहित लंका ले जाना चाहता है। तब भगवान शंकर ने अपना भार बड़ा करके अपने अंगूठे से तनिक-सा दबाया तो कैलाश पर्वत फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया। इससे रावण का हाथ दब गया और वह क्षमा मांगते हुए कहने लगा- ’शंकर शंकर’- अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया। यह क्षमा याचना और स्तुति ही कालांतर में ’शिव तांडव स्तोत्र’ की रचना हुई। इसी घटना को दर्षाती एक दुर्लभ मूर्ति राजकीय संग्रहालय मथुरा की वीथिका में पर्दषित है। यह प्राप्त मूर्ति से इस कथानक का पता चलता है कि यह मूर्ति मध्यकाल की मूर्ति है। जिसे रावणानुग्रह - के रूप में प्रर्दषित किया गया है। Ravana Lifting Uma Maheshvara With Kailash Mound gupta Period यह मूर्ति गुप्तकाल की है और यह मूर्ति (34.2577) में रावण द्वारा कैलाष पर्वत उठाने का प्रयास किया जा रहा है, जिस पर पार्वती और शिव एक साथ बैठे हुए हैं, उस प्रसंग को यहां दर्शाया गया है। कहानी के अनुसार जब रावण कैलाष से गुजर रहा था, तो उनके रथ को शिव के एक सेवक नंदिकेश्वर ने रोका था। पूछताछ करने पर रावण को बताया गया कि यह क्षेत्र निषिद्ध है, क्योंकि शिव और पार्वती एकांतवास में थे। लंकाधिपति को क्रोध आ गया। क्रोधित राक्षस राजा ने उस पर्वत को उठाना शुरू कर दिया। डावांडोल होते कैलाष पर्वत के कारण शिव का ध्यान भंग हुआ और कैलाष पर अशांति का कारण जानकर शिव ने पर्वत को अपने पैर से दबा दिया। उसका भार रावण को असहनीय हो गया और शक्तिशाली राक्षस रोने लगा। उसके रोने के कारण उसे रावण कहा जाने लगा। कई बार प्रार्थनाओं के बाद जब शिव प्रसन्न हुए तो रावण को भारी बोझ से राहत मिली। वर्तमान मूर्तिकला में रावण की शक्ति को उसके मजबूत शरीर, भारी भरकम सिर और भयानक रूप के माध्यम से दिखाया गया है। साथ ही उभरे हुए चेहरे से उनकी चिंता साफ झलक रही है। पार्वती अपने पति से लिपटी हुई हैं जो ऊर्ध्वलिंग रूप (अंग सीधा) में दिखाई दे रहा हैं और अपने दाहिने पैर से रावण को दबा भी रखा हैं।

बुधवार, 23 अगस्त 2023

दीघ्र जीवन की कहानियाँ

रामकृष्ण देव की तीन ही फोटो पूरे विश्व में सबसे ज्यादा देखने को मिलती हैं, किन्तु उनकी और भी पाँच-पाँच फोटो हैं, यह किसी को नहीं पता था। इन पाँचो फोटो के विषय में हम आगे चल कर चर्चा करेंगे। हम पहले-पहले तीन फोटो के विषय में जानते हैं, दीघ्र जीवन की कहानियाँ में प्रथम फोटो केशव चन्द्र सेन के निवास कमल कुटी पर उस समय ली गयी थी, जब रामकृष्ण देव ध्यान मुद्रा में थे तथा पीछे से उन्हें पकड़े हुए हैं उनके भांजे विनय मुखोपाध्याय, उनकी दूसरी तस्वीर खींची गयी थी श्रीराधा बाजार के एक स्टुडियों में यह फोटो रामकृष्ण देव एक स्टेन्ड के सहारे हाथ रख कर खडे हैं, मगर तीसरी तस्वीर जो पूरे विश्व में विख्यात हैं इस तस्वीर को खीचा गया था दक्षिणेष्वर मंदिर के राधा कान्त, मंदिर के प्रांगण में, उस समय बंगाल के एक नामी फोटोग्राफर अविनाश चन्द्र दा ने यह फोटो खींची थी, परन्तु इस फोटो को खीचते समय बड़ी मुसीबत खड़ी हो गयी। रामकृष्ण देव के फोटो खींचने की व्यवस्था भवनाथ नामक एक प्रिय भक्त ने की थी, रामकृष्ण देव किसी भी तरह से अपना प्रचार प्रसार नहीं चाहते थे, फोटो खींचने के लिए तो वह किसी भी तरह से राजी नहीं होते थे।
जब उन्होंने फोटोग्राफर को देखा तो वह वहाँ से सीधे चल दिये राधा कान्त मंदिर की ओर, और उनके पीछे-पीछे भवनाथ व वह फोटोग्राफर उस समय यह लुका छुपी के मध्य हाजिर हो जाते हैं नरेन्द्र नाथ तब उन्होंने तस्वीर खीचने की सभी व्यवस्था खुद करने की जिम्मेदारी ले ली। नरेन्द्र नाथ जी ने जिम्मेदारी तो ले ली मगर यह व्यवस्था होगी कैसे यह सभी सोच रहे थे कि रामकृष्ण देव तो केमरा देखकर ही विगड जा रहे थे। तब एक युक्ती लगाई गई नरेन्द्र नाथ उनके साथ कुछ बातचीत में व्यस्त हो गये, बातचीत का विषय था ईश्वर व भगवत कथा, भगवत चर्चा शुरू होते ही रामकृष्ण देव समाधिस्थ हो गये, इसी समय का अवसर भांपकर फोटोग्राफर को इशारा किया गया नरेन्द्र नाथ जी की तरफ से, फिर एक समस्या उत्पन्न हो गयी कि समाधिस्थ अवस्था में रामकृष्ण देव का शरीर एक तरफ झुक गया था। इस प्रकार की तस्वीर खींचना ठीक नहीं होगा जानकर अविनाश बाबू ने रामकृष्ण देव के शरीर को पकड़ कर थोड़ा सा सीधा करने की कोशिश की जब उनके मुह को पकड़ कर थोड़ा सीधा करने का प्रयास अविनाश बाबू करने लगे तो उन्हें रामकृष्ण देव का शरीर इतना हलका महसूस हुआ जैसे मानों किसी पतले कागज की भाँति हां, अविनाश बाबू घबरा गये नरेन्द्र देव भी इस दृश्य को देख कर उस तरफ दौड लिये फोटोग्राफर को निर्देश दिया कि रामकृष्ण देव जैसे हैं वैसे ही फोटो खींच लें, फिर किसी ने मारे डर के उनके शरीर को हाथ भी नहीं लगाया, दूर से ही तस्वीर खीच कर फोटोग्राफर हट गये। रामकृष्ण परमहंस को जरा सा भी आभास नहीं हो पाया, कुछ दिनों के बाद उन तस्वीरों के प्रिन्ट निकलवा कर लाये गये उन फोटोग्राफ को देखकर रामकृष्ण देव खूब आनन्दित हुए बाद में अपने इसी फोटोग्राफ को स्वयं रामकृष्ण देव फूल चढ़ा कर पूजा भी करने लगे थे, इनको देखकर उन्हें आनन्द जरूर हुआ मगर बाद के फोटो देखकर उन्हें अच्छा नही लगा। 1883 से लेकर 1886 साल के बीच रामकृष्णदेव के और पाँच फोटो लिये गये थे वह उन्हें जरा भी पसन्द नहीं आये जो तस्वीर उन्हें पसन्द नही आयी वो तस्वीर किसी भी तरह से प्रचार का हिस्सा न बनें, यह बात गिरीश चन्द्र बोस की समझ में आ गयी और उन्होंने उन पाँचों तस्वीरों के नैगेटिव्स को लेकर टुकडे-टुकड़े करके गंगा में वहा दिये, फिर उन तस्वीरों का तो कोई अस्तित्व ही नहीं बचा था। घटना केवल यहीं तक नहीं थी रामकृष्ण देव के प्रचलित तस्वीर में जो उनकी बैठी हुई तस्वीर है उसका नैगेटिव्स भी धीरे-धीरे समय के साथ खराब हो गया था, उसे कैसे भी ठीक नहीं किया जा सकता था। ऐसी स्थिति में उस नैगेटिव्स को रामकृष्ण मिशन के स्वामी चेतना नन्द जी के हाथ में ब्रज किशोर सिन्हा ने वह नैगेटिव्स सौंप दिया, समय था 1982 के साल का उस समय वह विक्टोरिया मैमोरियल के क्यूरेटर थे उस नैगेटिव्स को लेकर वह जोन हेन्स के पास पहुंचे यह वह व्यक्ति थे जिन्होंने 65 वर्षों तक आर्ट और डिजायन पर कार्य किया था। वह एक नामी गिरामी आर्टिस्ट थे। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि राम कृष्ण देव का नैगेटिव्स उनके हाथ में आयेगा। उन्होंने कड़ी मेहनत से इस नेगेटिव्स पर कार्य किया। जोन हेन्स भारतीय दर्शन के गहराई से अनुरागी थे, वह हिन्दू सनातन धर्म के प्रति आस्था रखते थे। रामकृष्ण देव का औरीजनल नैगेटिव्स जो उनके पास उनके हाथ में आएगा यह उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था, यह नैगेटिव्स हाथ में आने के बाद पूरे दो वर्षों की कड़ी मेहनत से जोन हेन्स ने एकाग्रता के साथ कड़े परिश्रम से उस नैगेटिव्स से समस्त काले दाग, डॉट्स एवं उसमें अन्यान्य कमियों को उन्होंने दूर किया, जबकि 100 वर्ष पुराने मूल नैगेटिव्स के उपर उन्होंने कोई भी परिवर्तन नहीं किया उसके बाद उसी नैगेटिव्स से फिर रामकृष्ण परमहंस जी के फोटो की कॉपी तैयार होने लगी। आज समूचे विश्व में यदि रामकृष्ण देव जी की तस्वीर देखने को मिल रही है इसके पीछे यही जोन हेन्स हैं जिनकी बजह से तैयार किये गये नैगेटिव्स से यह सम्भव हो सका। बंगाल के अविनाष चन्द्र दा के नैगेटिव्स से तमाम देशों में घूम-घूम कर फिर भारत देश में आकर प्रतिष्ठित हुए रामकृष्ण परमहंस देव। उन्होंने और उनकी इस तस्वीर ने मिलकर एक आर्ष्चयजनक सफर तय किया, जिससे सारा विश्व रामकृष्ण देव को जान सका।

गुरुवार, 27 जुलाई 2023

अतीत की कहानियां कहती संग्रहालय की शिव मूर्तियां

2 हजार वर्ष पूर्व में होती थी पंच मुखी शिव लिंग की पूजा

        श्रावण मास में महादेव के पांच मुख की पूजा का बड़ा महत्व माना गया है। अनेक विद्वानों के अनुसार सृष्टि, स्थिति, लय, अनुग्रह एवं निग्रह- इन 5 कार्यों की निर्मात्री 5 शक्तियों के संकेत शिव के 5 मुख से मिलते हैं। पूर्व मुख सृष्टि, दक्षिण मुख स्थिति, पश्चिम मुख प्रलय, उत्तर मुख अनुग्रह (कृपा) एवं ऊर्ध्व मुख निग्रह (ज्ञान) का सूचक माना जाता है। किन्तु अब मथुरा में कहीं भी पंच मुखी शिव लिंग की पूजा नहीं होती है, जनपद में कहीं भी पाँच मुखी शिव लिंग नहीं हैं। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व में मथुरा जनपद में पंच मुखी शिव की पूजा के प्रमाण राजकीय संग्रहालय, मथुरा में मिलते हैं। मथुरा संग्रहालय में एक मुखी शिव लिंग, दो मुखी शिव लिंग, चार मुखी शिव लिंग तथा पाँच मुखी शिव लिंग की मूर्तियाँ यहां पर दर्शनीय हैं।


किस प्रकार भगवान शंकर के हुए पांच मुख

        भगवान शंकर के पांच मुखों में ऊर्ध्व मुख ईशान दुग्ध जैसे रंग का, पूर्व मुख तत्पुरुष पीत वर्ण का, दक्षिण मुख अघोर नील वर्ण का, पश्चिम मुख सद्योजात श्वेत वर्ण का और उत्तर मुख वामदेव कृष्ण वर्ण का है। भगवान शिव के पांच मुख चारों दिशाओं में और पांचवा मध्य में उपर की ओर है। भगवान शिव के पश्चिम दिशा का मुख सद्योजात बालक के समान स्वच्छ, शुद्ध व निर्विकार है। उत्तर दिशा का मुख वामदेव अर्थात् विकारों का नाश करने वाला है। दक्षिण मुख अघोर अर्थात निन्दित कर्म करने वाला है। निन्दित कर्म करने वाला भी शिव की कृपा से ही निन्दित कर्म को शुद्ध बना लेता है। शिव के पूर्व मुख का नाम तत्पुरुष अर्थात अपनी आत्मा में स्थित रहने वाला है। वहीं ऊर्ध्व मुख का नाम ईशान अर्थात जगत का स्वामी का प्रतीक है।




शिवपुराण में भगवान शिव शंकर कहते हैं

        सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह- ये मेरे पांच कृत्य (कार्य) मेरे पांचों मुखों द्वारा धारित हैं। कथा अनुसार एक बार भगवान विष्णु ने अत्यन्त मनोहर किशोर रूप धारण किया। उस मनोहर रूप को देखने के लिए चतुर्भुज ब्रह्मा, बहुमुख वाले शेष, सहस्त्राक्ष मुख धारण कर इन्द्र आदि देवता आए। सभी ने भगवान के इस रूप का आनंद लिया तो भगवान शिव सोचने लगे कि यदि मेरे भी अनेक मुख होते तो मैं भी अनेक नेत्रों से भगवान के इस किशोर रूप का सबसे अधिक दर्शन करता। कैलाशपति के मन में इस इच्छा के उत्पन्न होते ही वे पंचमुख के हो गए। भगवान शिव के पांच मुख-सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान हुए और प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र बन गए। तभी से वे ‘पंचानन’ या ‘पंचवक्त्र’ कहलाने लगे। भगवान शिव के इन पंचमुख के अवतार की कथा पढ़ने और सुनने का बड़ा माहात्म्य है। यह प्रसंग मनुष्य के अंदर शिव-भक्ति जाग्रत करने के साथ उसकी समस्त मनोकामनाओं को पूरा कर परम गति को देने वाला है।


शिव शंकर की व्यापकता

        हमारे देश के विभिन्न प्रांतों में अनेक देवताओं का पूजन होता रहा है और होता है, किंतु शिव की व्यापकता ऐसी है कि वह हर जगह पूजे जाते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथ, जो हर जिज्ञासा को शांत करने में समर्थ हैं, जो श्रुति स्मृति के दैदीप्यमान स्तंभ हैं, ऐसे वेदों के वाग्मय में जगह-जगह शिव को ईश्वर या रुद्र के नाम से संबोधित कर उनकी व्यापकता को दर्शाया गया है।

        यजुर्वेद के एकादश अध्याय के 54वें मंत्र में कहा गया है कि रुद्रदेव ने भूलोक का सृजन किया और उसको महान तेजस्विता से युक्त सूर्यदेव ने प्रकाशित किया। उन रुद्रदेव की प्रचंड ज्योति ही अन्य देवों के अस्तित्व की परिचायक है। शिव ही सर्वप्रथम देव हैं, जिन्होंने पृथ्वी की संरचना की तथा अन्य सभी देवों को अपने तेज से तेजस्वी बनाया। 

        शिव को पंचमुखी, दशभुजा युक्त माना गया है। पांच तत्वों का निर्माण भगवान सदाशिव से ही हुआ है। इन्हीं पांच तत्वों से संपूर्ण चराचर जगत का निर्माण हुआ है। तभी तो देवराज पुष्पदंत महिम्न में कहते हैं - हे सदाशिव! आपकी शक्ति से ही इस संपूर्ण संसार का चर-अचर निर्माण हुआ है।


शिव का वर्णन शब्दों से नहीं किया जा सकता

        इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवान शिव उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के दृष्टा हैं। निर्माण, रक्षण एवं संहरण कार्यों का कर्ता होने के कारण उन्हें ही ब्रम्हा, विष्णु एवं रुद्र कहा गया है। शिव के विषय में उनका वर्णन शब्दों से नहीं किया जा सकता है। शिव की महिमा वाणी का विषय नहीं है। मन का विषय भी नहीं है। वे तो सारे ब्रह्मांड में तद्रूप होकर विद्यमान होने से सदैव श्वास-प्रश्वास में अनुभूत होते रहते हैं। इसी कारण ईश्वर के स्वरूप को अनुभव एवं आनंद की संज्ञा भी दी गई है।

भगवान शिव को लिंग रूप में क्यों पूजा जाता है

        इसकी वजह बेहद दिलचस्प है जबकि शिव शंभु आदि और अंत के देवता है और इनका न कोई स्वरूप है और न ही आकार वे निराकार हैं। आदि और अंत न होने से लिंग को शिव का निराकार रूप माना जाता है, केवल शिव ही निराकार लिंग के रूप में पूजे जाते हैं। लिंग रूप में समस्त ब्रह्मांड का पूजन हो जाता है। 

        पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन के समय सभी देवता अमृत के आकांक्षी थे लेकिन भगवान शिव के हिस्से में भयंकर हलाहल विष आया। उन्होंने बड़ी सहजता से सारे संसार को समाप्त करने में सक्षम उस विष को अपने कण्ठ में धारण किया तथा ‘नीलकण्ठ’ कहलाए। समुद्र मंथन के समय निकला विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ़ गया। उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई, जो आज तक चली आ रही है।


        शिव, हिंदू मतानुसार त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के रूप में एक महत्वपूर्ण देवता हैं, जिन्हें कई रूपों में दर्शाया गया है। वह एकमात्र देवता हैं जिनकी प्रतीकात्मक पूजा उन्होंने मानवरूपी रूप के साथ-साथ जारी रखी। इस उप-प्रकट रूप को लिंग (फालस) के माध्यम से दिखाया गया है। कभी-कभी लिंग पहलू को उनके मानव रूप के साथ भी जोड़ा जाता है।

मथुरा संग्रहालय में दर्षनीय शिव प्रतिमाएं

        मथुरा संग्रहालय में रखी शिव प्रतिमाओं के पास जाने से ज्ञात होता है कि यहां संरक्षित मूर्तियां गुप्त काल से भी पहले की हैं जिससे यह ज्ञात होता है कि यहां शिव लिंग की पूजा की जाती रही है। राजकीय संग्रहालय, मथुरा की मूर्तिकला के संग्रह में एक मुखी, दोमुखी, चार मुखी एवं पांच मुखी शिवलिंग की मूर्तियां प्रदर्शन के लिए रखी गयी हैं, जिनमें (11-15.462), जो जटायुक्त बैर, माथे पर तीसरा नैत्र और मानव खोपड़ी की एक माला (मुंड माला जोर अक्षमाला, रुद्राक्ष की माला) इनमें से एक के चेहरे पर कुछ उल्लेखनीय विशेषताएं भी देखने को मिलती हैं।


        एक अन्य मूर्ति (29.1931) में वर्गाकार आधार और शीर्ष पर एक स्वतंत्र अष्टकोणीय स्तंभ पर एक बड़ा त्रिशूल (शिव का हथियार जिसे त्रिशूल के रूप में जाना जाता है और तीसरी आंख (त्रिनेत्र) के साथ एक विशाल आकृति) और दाहिने हाथ में एक शाफ्ट पकड़े हुए है। उसका निचला हिस्सा नग्न दिखता है और हो सकता है यह लकुलिश पंथ का प्रतिनिधित्व करता हो, जिसकी एक समय में मथुरा में मजबूत पकड़ थी। शिलालेख में दर्ज है कि कुछ उदिताचार्य ने गुप्त काल (380) के सम्बत् 61 वें वर्ष में दो शिवलिंग (उपमितेश्वर और कपिलेश्वर) स्थापित किए थे। यह जान कर आर्श्चय और दिलचस्प लगता है कि यह स्तंभ उसी स्थान से जहां आज भी प्रसिद्ध शिव मंदिर रंगेश्वर है इस मंदिर के पास से ही इसे प्राप्त किया गया था। 


        एक अन्य शिवलिंग (15.516) जिसमें चार मानव आकृति के साथ अलग-अलग दिशाओं में उभरे हुए हैं। पांचवें सिर के निशानों से ऐसा प्रतीत होता है कि पंचमूर्ति में शिव के पंचानन पहलू का प्रतिनिधित्व करने वाला पंच मुखी (पांच मुखी) शिव लिंग है। इन सिरों को क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं की ओर मुख करके तत्पुरुष, अघोरा, वामदेव और सद्योजात कहा जाता है। ऊपरी चेहरा जो ऊपर की ओर दिखता है उसे ईशान के नाम से जाना जाता है। इस मूर्ति को देखकर लगता है कि आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व में पांच मुखी शिव की पूजा मथुरा जनपद में की जाती थी। जिसमें मोतियों की माला के चारों ओर बंधे मोटे उभरे हुए बैंड के आधार पर यह मूर्ति प्रारंभिक गुप्त काल की प्रतीत होती है। इस मूर्ति को संग्रहालय में स्थित सप्त समुद्री कूप से बरामद किया गया था।


        एक अन्य मूर्ति (30.2084) में शिव नंदी (बैल) और उनकी पत्नी पार्वती अपने वाहन सिंह के साथ खड़े हैं। दोनों तरफ उकेरी गई मूर्ति में शिव को उलझे हुए बालों (जटा), तीसरी आंख (त्रिनेत्र) और लिंग के साथ सीधी स्थिति में दिखाया गया है। वह बाघ की खाल (व्याघ्रजिना या व्याघ्रांबर) पहने हैं, जैसा कि दोनों के सिरों पर अंकित आभा मण्डल जैसे उकेरे गये संकेत से मिलता है। शिव और पार्वती वाली इस मूर्ति को आमतौर पर उमामहेश्वर के नाम से जाना जाता है। उमा संभवतः अपने बाएं हाथ में एक लिली का फूल लिए हुए हैं। शिव के एक मुखी लिंग पहलू को शिव के सिर के रूप में भी दर्शाया गया है।

शिव एवं पार्वती के अर्धनारीश्वर स्वरूप के दर्शन 

        गुप्त काल के पांच सिरों वाले शिव को दर्शाया गया है, जिनमें अलग-अलग हेयर स्टाइल दिखाई गई हैं। यह प्रतिमा (13.362) गुप्त काल की कलाकृति उच्च कारीगरी को प्रदर्शित करती है। जिसमें पुरुष और महिला के दो अलग-अलग पहलुओं को दिखाया गया हैं। एक तरफ दाहिनी ओर ऊंचे उलझे हुए बाल के साथ दिखाई देता है, जबकि बाईं ओर सुंदर हेयर स्टाइल और ऊर्ध्वाधर मोती की माला के साथ एक बड़े गोल आकार के कान के कुंडल से सुशोभित है। इस मूर्ति में मर्दाना और स्त्रियोचित विशेषताओं को अलग-अलग दर्शाया गया है। शिव की भौंहें ऊपर की ओर खिंची हुई हैं जबकि महिला के भाग को नाजुक ढंग से संभाला गया है। एक कुशल कलाकार ही यह उत्तम संश्लेषण कर सकता था।


        एक अन्य प्रदर्शित मूर्ति (15.772) में एक असाधारण सुंदर अर्धनारीश्वर की है जो शिव के ईश्वर पहलू को दर्शाती है, जो शिव और पार्वती का एक मिश्रित रूप है जो पुरुष और महिला की ऊर्जा के संलयन का संकेत देता है। ऊँचे उलझे बालों (जटाजूट) के साथ दाहिना भाग शिव का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि शेष आधा हिस्सा आकर्षक रूप से कंघी किए हुए बालों और फूलों से सजे बालों, बड़े और भारी कान की बाली के साथ, पार्वती का है। माथे पर एक ऊर्ध्वाधर तीसरी आंख है और गले में एकावली (मोती का हार) पहने हुए है। सुंदर होंठ, आधी बंद आंखें और सूक्ष्म लालित्य ने समग्र विशेषताओं के कारण आकर्षण को और बढ़ा दिया है।


        पुराणों में शिव और पार्वती के विलय की कहानी अलग-अलग तरह से वर्णित की गई है। कालिका पुराण के अनुसार एक बार पार्वती ने शिव की छाती पर अपना प्रतिबिंब देखा जो एक चमकती हुई आकृति के रूप में था। उन्हें कोई अन्य स्त्री समझकर ईर्ष्या होने लगी और उन्होंने शिव से उसे एक क्षण भी अपने से अलग न करने का अनुरोध किया। शिव ने पार्वती का यह अनुरोध स्वीकार कर लिया और उन्होंने अपने और पार्वती के शरीर को एक में मिला दिया। आध्यात्मिक रूप से अर्ध न अर स्वरे रूप प्रकृति और पुरुष के अनलोन का सुझाव देता है। पुरुष और महिला पंथ का संयोजन उदारवाद को आगे बढ़ाने वाले दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है।

प्रस्तुति - सुनील शर्मा 9319225654

बुधवार, 28 जून 2023

गुरू की पूजा कर पैदल गिरिराज परिक्रमा करते हैं श्रद्धालु

सनातन गोस्वामी की स्मृति में उनके शिष्यों ने मुडिया परिक्रमा शुरू की थी 

            मथुरा, गोवर्धन। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समूचे ब्रजक्षेत्र में दो ही वस्तुओं का आज भी अस्तित्व विद्यमान है, इनमें एक है यमुना नदी और दूसरा गोवर्धन स्थित गिरिराज पर्वत। भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का वध करके यमुना को प्रदूषण से मुक्त कराया था और गिरिराज गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली में छाता की तरह उठाकर इंद्रदेव की अतिवृष्टि से डूबते ब्रजवासियों को बचाया था। भगवान श्रीकृष्ण के समय से आज तक यमुना और गिरिराज पर्वत गोवर्धन करोड़ों-करोड़ों भारतीयों की आस्था एसं श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। आज संपूर्ण विष्व में ब्रजभूमि को यमुना और गोवर्धन पर्वत के कारण ही जाना जाता है। इसी लिये पूरे विश्व से मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, नन्दगांव, बरसाना, गोकुल, महावन बलदेव आदि धार्मिक स्थलों को देखने व भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि का दर्शन करने प्रतिवर्ष लाखों करोड़ों तीर्थ यात्री यहां आते है। यमुना के जल को आचमन मात्र से मोक्ष प्राप्ति का अटूट विश्वास लोक जन मानस में आज भी है ओर गिरिराज गोवर्धन को साक्षात कृष्ण का ही रूप मान कर सप्तकोसीय परिक्रमा वर्ष भर करते ही रहते हैं।


        मथुरा मुख्यालय से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है प्राचीन तीर्थ स्थल गोवर्धन, गोवर्धन के चारों ओर लगभग 21 किलो मीटर क्षेत्र में गिरिराज गोवर्धन अराबली पर्वत श्रृंखला है। इस पर्वत श्रृखंला की तलहटी में बारहों महीने करोड़ों लोगों को परिक्रमा कर गिरिराज गोवर्धन के प्रति अपनी आस्था और भक्ति की अभिव्यक्ति करते व अपने आपको इस ब्रज रज के साथ ऐकाकार करके पुण्य प्राप्त करते देखा जा सकता है। गुरू पूर्णिमा का लोक पर्व ‘‘मुड़िया पूनौ’’ के नाम से जाना जाता है, इस दिन बड़ी संख्या में भक्त देश के विभिन्न अंचलों से रेल मार्ग, सड़क मार्ग से या फिर अपने-अपने साधनों से बहुत बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। जिनके कारण मुड़िया पूनौ ब्रज का सबसे बड़ा राजकीय लक्खी मेला बन गया है।

        गुरू पूर्णिमा के इस लोक पर्व के रूप में मनाये जाने के पीछे भगवान वेदव्यास का जन्म दिवस व चैतन्य महाप्रभु सम्प्रदाय के शिष्य आचार्य सनातन गोस्वामी का आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को निर्वाण और गिरिराज गोवर्धन को साक्षात श्रीकृष्ण के रूप में मानने की अटूट आस्था है। इस आस्था का दर्शन भक्तों द्वारा गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा लगाते समय गाये जाने वाले लोक गीतों के माध्यम से होता है। एक लोकगीत में गोवर्धन परिक्रमा को जाने के लिए मन की व्याकुलता गिर्राज जी की परिक्रमा और मानसी गंगा में स्नान की आकांक्षा श्रद्धालु इस प्रकार व्यक्त करते हैं।


नांइ माने मेरौं मनुआं मैं तो गोवर्धन कूं जाऊ मेरी वीर।

सात कोस की दे परिक्रम्मा मानसी गंगा नहाऊ मेरी वीर।।

मुड़िया पूनौं का नाम कैसे पड़ा

         चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय के शिष्य विद्वान आचार्य सनातन गोस्वामी से है। जिनका निधन हो जाने पष्चात उनके शिष्यों ने शोक में अपने सिर मुड़वा कर कीर्तन करते हुए मानसी गंगा की परिक्रमा की थी। मुडे हुए सिरों के कारण शिष्य साधुओं को मुड़िया कहा गया और क्यों कि उस दिन पूनौं यानी (पूर्णिमा) का दिन था, जिसके कारण इसका नाम मुड़िया पूनौं कहा जाने लगा, सनातन गोस्वामी और उनके भाई रूप गोस्वामी गौड़ देश प्राचीन बंगाल के शासक हुसैन शाह के दरवार में मंत्री थे। चैतन्य महाप्रभु के भक्ति-सिद्धांतों से प्रभावित होकर वे दोनों मंत्री पद छोड़कर महाप्रभु के आदेष पर वृन्दावन आ गये और यहां उन्होंने चैतन्य महाप्रभु से दीक्षा प्राप्त की और उनके शिष्य हो गये। चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें यह आदेश दिया कि वे श्रीकृष्ण के समय के तीर्थ स्थलों की खोज करें और उनके प्राचीन स्वरूप को प्रदान करें साथ ही श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार-प्रसार करें। चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार दोनों भाईयों ने ब्रज के वन-उपवन और कुंज निकुंजों में भ्रमण करके भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थलियों की खोज करके उन्हें पुनः जीवित किया, वे दोनों घर-घर जाकर रोटी की भिक्षा ग्रहण करते और महामंत्र का जाप करते रहते थे।


‘‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।, 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।’’

        इस प्रकार महामंत्र का कीर्तन कर कृष्ण भक्ति का प्रचार प्रसार करते-करते सनातन गोस्वामी जब गोवर्धन आये तो उन्होंने मानसी गंगा के किनारे स्थित चकलेश्वर मंदिर के निकट अपनी कुटिया बना ली और वहीं रहने लगे वह नित्य प्रति गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा किया करते थे। वह नित्य प्रति मानसी गंगा में स्नान करते थे। जब वह अत्यंत वृद्ध और अशक्त हो गये तब भी उन्होंने नित्य नियम को नहीं छोड़ा। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें साक्षात दर्शन देकर गिरिराज पर्वत की एक शिला पर अपने चरण चिन्ह अंकित कर बाबा को दिया और कहा-कि बाबा अब आप इसकी ही परिक्रमा कर लेंगे तो गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा पूरी हो जायेगी। यह गिर्राज षिला आज भी वृन्दावन के राधा दामोदर मंदिर में स्थापित है तथा इसकी पूरे वर्ष भर श्रद्धालु परिक्रमा करते हैं।


मुडिया पूर्णिमा मेला क्यों मनाया जाता है

        सनातन गोस्वामी का निधन अब से 469 वर्ष पूर्व संवत् 1611 में आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को हुआ था। उनके निधन पर उनके ष्ष्यि अनुयायियों ने सिर मुड़वाकर चकलेश्वर मंदिर से शोभायात्रा के रूप में निकाली थी, वहीं परम्परा आज भी उनके शिष्यों व अनुयायियों के द्वारा प्रत्येक वर्ष निकाली जाती है। आज यह विषाल मेला का रूप ले चुका है और परिक्रमा मार्ग खचाखच भरा रहता है। जिसके कारण जिलाप्रषासन को इस राजकीय मेले की व्यापक व्यवस्थाएं करनी पड़ती हैं।

        इस दिन श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के चकलेष्वर स्थित मंदिर के सामने परमपूज्य सनातन गोस्वामी जी की समाधि स्थल पर अधिवास, संकीर्तन का शुभारम्भ किया जाता है। इसके पष्चात एक  शोभायात्रा सांय के समय निकलती है, तथा एक अन्य शोभायात्रा सुबह राधाष्याम सुन्दर मंदिर से निकाली जाती है इसके मुड़िया महन्त राम कृष्ण दास हैं, दूसरी शोभायात्रा चकलेष्वर महाप्रभु मंदिर से सायं के समय निकलती है इस मंदिर के महन्त श्री गोपाल दास जी महाराज ने बताया कि इस वर्ष 1 जुलाई को अधिवास, 2 जुलाई को अखण्ड हरिनाम संर्कीतन, 3 जुलाई को सुबह गुरू पूजन दोपहर को साधु सेवा ब्राह्मण भोजन भण्डारा और सांय 5 बजे से मुडिया परिक्रमा निकाली जायेगी। जिसमें आश्रम के साधु-संत झांझ, मंजीरे, हारमोनियम व ढोलक की लय ताल पर नृत्य करते हुए निकलेंगे। 

        रघुनाथ दास जी गोस्वामी की गद्दी राधाकुंड में पूज्य सनातन गोस्वामी के निकुंज लीला में प्रवेश करने के बाद गुरू भक्ति की याद में मुड़िया पर्व को मनाया जाता है। इसमें राधाकुंड-श्यामकुंड से सनातन गोस्वामी के चिन्हों को लेकर साधु-संत इस शोभायात्रा में नाचते कूदते हुए शामिल होते हैं और मानसी गंगा और गिरि गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं।


इस दिन ब्रज क्षेत्र में हर मंदिर और आश्रम में लोग अपने-अपने गुरू की पूजा अर्चना करने पहुंचते हैं 

        मुडिया पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है पूरे ब्रज क्षेत्र में प्रत्येक मंदिर और आश्रम में लोग अपने-अपने गुरू की पूजा अर्चना करते हैं तथा गुरू स्थान की भी पूजा करते है और इस दिन जगह-जगह भंडारे लगते हैं जहां श्रृद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं और पूर्ण भक्ति भाव, और आस्था के साथ अपने-अपने गुरू से आर्शीवाद ग्रहण करते हैं। कुछ लोग इस दिन को पवित्र मान कर अपने जीवन को सफल व पूर्व जन्म को सुधारने व भगवत प्राप्ति का मार्ग पाने के लिए गुरू बनाते है और उनकी पूजा अर्चना करते हैं तथा गुरू को उपहार स्वरूप फल, वस्त्र आदि भेंट करते हैं। गुरू द्वारा बताये मार्ग पर चल कर भजन पूजा शुरू करते हैं।

लाखों परिक्रमार्थी गोवर्धन पहुंच रहे हैं

मुडिया पूर्णिमा 3 जुलाई को श्रद्धालु मानसी गंगा में स्नान कर परिक्रमा शुरू करेंगे

        इस राजकीय लक्खी मेले को देखते हुए जिला प्रशासन प्रत्येक वर्ष श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को लेकर व्यवस्था करता है। सम्पूर्ण मेला क्षेत्र को विभिन्न सैक्टरों में बांटकर पेयजल, सफाई, शुद्ध खाद्य पदार्थ, विद्युत व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था, दुग्ध आपूर्ति, यातायात व्यवस्था का व्यापक इंतजाम जिला प्रषासन द्वारा किया जाता है। पूरे मेला क्षेत्र में पुलिस चौकी तथा वाच टावर के माध्यम से नियंत्रण की व्यवस्था की जाती है। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की घोषित व्यवस्थाओं के अभाव में प्राइवेट बसों द्वारा यात्रियों को भूसे की तरह भर कर मेला स्थल तक पहुंचाया जाता है यात्री छतां पर यात्रा करने को मजबूर होते है। जगह-जगह बैरियर लगे होने के कारण यात्रीयों को परिक्रमा के अलावा अधिक पैदल चलना पड़ता है।

        गोवर्धन परिक्रमा मार्ग में कुसुम सरोवर, राधाकुण्ड, जतीपुरा आदि अनेक दर्शनीय स्थल पड़ते हैं तथा यह सम्पूर्ण ब्रज क्षेत्र का एक मात्र धार्मिक आस्था का केन्द्र है। गोवर्धन मथुरा से 26 किलोमीटर की दूरी पर है, गोवर्धन में पूछरी का लौठा, अप्सरा कुण्ड, कृष्ण दास का कुआ, सुरभि कुण्ड जैसे रमणीक स्थल हैं। गोवर्धन की तलहटी में सूरदास, कुंभनदास आदि अष्ट छाप के कावियों, सखाओं एवं सिद्ध भक्तों के स्थल आज भी आस्था के केंद्र बने हुए हैं।


        प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी ब्रज क्षेत्र के प्रसिद्ध गोवर्धन गिरिराज महाराज की मुड़िया पूर्णिमा मेला में बीते वर्ष से अधिक संख्या में श्रद्धालुओं के यहां पहुंचने की संभावना है। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार लगभग एक करोड़ श्रद्धालु मुड़िया पूर्णिमा मेला पर गिरिराज महाराज की परिक्रमा करेंगे। इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के गिरिराज गोवर्धन पहुंचने को लेकर जिला प्रशासन ने व्यापक व्यवस्थाएं की हैं। मुड़िया पूर्णिमा मेले में बड़ी संख्या में वाहनों के आवागमन को देखत हुए पार्किंग स्थलों के लिये अलग से जगह-जगह व्यवस्था की गयी है। निजी पार्किंग स्थलों के लिये लोक निर्माण विभाग द्वारा पार्किंग के लिये ठेकेदारों को स्थान उपलब्ध कराये जायेंगे। पार्किंग स्थलों की रूपरेखा तैयार कर ली गयी है। 

        इस अवसर पर गोवर्धन में 24 घंटे विद्युत आपूर्ति के शासन द्वारा निर्देश दिये गये हैं। मानसी गंगा पर मेले के दौरान प्रकाश व्यवस्था को अनवरत किये जाने के लिये जैनरेटर सैट लगाये गये हैं सड़क मार्ग पर प्रकाश व्यवस्था के लिये गोवर्धन तथा राधाकुण्ड नगर पंचायतों को पर्याप्त लाइट लगवाने के निर्देश भी जिलाधिकारी पुलकित खरे द्वारा दिये गये हैं।

प्रस्तुति : सुनील शर्मा मथुरा

रविवार, 25 जून 2023

“ब्रज रज“ : ब्रज की मिट्टी को रज क्यों बोला गया है ??

ब्रज की धूलि की क्या महिमा है ?

सम्पूर्ण कामनाओं और श्रीकृष्ण भक्ति को प्राप्त करने के लिए “ब्रज“ रज की प्राप्ति ही मात्र साधन

        ब्रज के वन-उपवन, कुन्ज-निकुन्ज, श्री यमुना व गिरिराज अत्यन्त मोहक हैं। पक्षियों का मधुर स्वर एकांकी स्थली को मादक एवं मनोहर बनाता है। साहित्य और कलाओं के विकास के लिए यह उपयुक्त स्थली है। संगीत, नृत्य एवं अभिनय ब्रज संस्कृति के प्राण बने हैं। ब्रजभूमि अनेकानेक मठों, मन्दिरों, महंतों, महात्माओं और महामनीषियों की महिमा से वन्दनीय है। यहाँ सभी सम्प्रदायों की आराधना स्थली है। ब्रज की रज का माहात्मय भक्तों के लिए सर्वोपरि है। सन्त गोस्वामी नरायणभट्ट कहते हैं-‘‘जैसे शास्त्रों में श्रेष्ठ श्रीमद्भागवत श्रीकृष्ण का विग्रह है वैसे ही पृथ्वी लोक में बनों सहित व्रजमण्डल भी श्रीकृष्ण का स्वरुप है।’’ श्रीराधामाधव एवं उनके सखा एवं गोपियों की नित्य लीलाओं को जहां आधार प्राप्त हुआ है उस धाम को रसिकों भक्तों ने ब्रजधाम कहा है। ब्रज की महिमा के बारे में कुछ पंक्तियां प्रस्तुत है-

ब्रज रज की महिमा अमर, ब्रज रस की है खान,

ब्रज रज माथे पर चढ़े, ब्रज है स्वर्ग समान।

भोली-भाली राधिका, भोले कृष्ण कुमार,

कुंज गलिन खेलत फिरें, ब्रज रज चरण पखार।

ब्रज की रज चंदन बनी, माटी बनी अबीर,

कृष्ण प्रेम रंग घोल के, लिपटे सब ब्रज वीर।

ब्रज की रज भक्ति बनी, ब्रज है कान्हा रूप,

कण-कण में माधव बसे, कृष्ण समान स्वरूप।

राधा ऐसी बावरी, कृष्ण चरण की आस,

छलिया मन ही ले गयो, अब किस पर विश्वास।

ब्रज की रज मखमल बनी, कृष्ण भक्ति का राग,

गिरिराज की परिक्रमा, कृष्ण चरण अनुराग।

वंशीवट यमुना बहे, राधा संग ब्रजधाम,

कृष्ण नाम की लहरियां, निकले आठों याम।

गोकुल की गलियां भलीं, कृष्ण चरणों की थाप,

अपने माथे पर लगा, धन्य भाग भईं आप।

ब्रज की रज माथे लगा, रटे कन्हाई नाम,

जब शरीर प्राणन तजे मिले, कृष्ण का धाम।


        वृंदावन भक्ति क्षेत्र है और वृंदावन की रज भी पवित्र है। ब्रज रज को अति आराध्य कहा गया है। इस रज में कीट-पतंग भी प्रवेश करें तो भगवान स्वरूप है। फिर मानव की तो महिमा को क्या कहें। लेकिन तीर्थ का सेवन संयम नियम से करना है। शास्त्र आज्ञा है। अन्य क्षेत्र में किया पाप तीर्थ में समाप्त होता है। लेकिन तीर्थ में किया गया पाप लोहे के कवज जैसा होता है। जो कहीं साफ नहीं होता। 

                                                                                फ़ोटो  - गुड्डू गोतम

ब्रज की धूलि की क्या महिमा है ?

        भागवत जी में कहा गया है कि महान आत्मा के चरणों की धूल में नहाए बिना, कोई भी अन्य माध्यम से भगवान को जानने की उम्मीद नहीं कर सकता है। वृंदावन की विशेषता यह है कि यहां न केवल राधा और कृष्ण के चरणों की धूल आज भी मौजूद है। साथ ही प्रति वर्ष यहां लाखों तीर्थ यात्री आते हैं सभी भक्तों के नंगे पैरों के स्पर्श से यहां की जमीन भी पवित्र बन जाती हैं, क्योंकि वे यहां के सभी मंदिरों में जाते हैं और पवित्र भूमि की परिक्रमा भी करते हैं। यह ऐसा है मानो उनकी पूरी आध्यात्मिक ऊर्जा उनके पैरों के माध्यम से धूल के रूप में चली गई हो। भक्ति जितनी अधिक होती है, उतनी ही अधिक ऊर्जा उस जमीन में प्रवाहित होती है। 


’वृंदावन के ’धूलोट’ उत्सव का महत्व क्या है’

        महोत्सव यानी ब्रज की पवित्र धूल ’ब्रज रज’ में लोटने का पर्व। ब्रज रज की वंदना वृंदावन के दिव्य युगल की भक्ति और उनकी कृपा पाने की शुरुआत करना है। आपको ब्रज रज की महिमा को जानने के लिए पहले श्री राधा कृष्ण को जानना होगा।

                                                                                                फ़ोटो  - गुड्डू गोतम

ब्रज रज का इतिहास और उसकी महत्ता 

        ब्रज की माँटी को ब्रज रज कहा जाता है। यूं तो माँटी को मिट्टी, बालू, इत्यादि भी कहा जाता है परन्तु ब्रज की माँटी को विशेषकर धार्मिक आस्था और परंपरा के अनुसार ब्रज रज कहते हैं। ब्रज रज से लोग तिलक लगाते हैं तथा हवन आदि में भी ब्रज रज का उपयोग किया जाता हैं। जिसे भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी की लीला भूमि की माँटी भी कहा जाता है। धार्मिक आस्थावान लोग इसे बहुत ही पवित्र मान कर इसे माथे पर लगाते है।इतिहासकारों के अनुसार ब्रज के तीन अर्थ बतलाये गये हैं - (गायों का खिरक), मार्ग और वृंद (झुंड) - सामान्यतः व्रज का अर्थ गोष्ठ किया है। गोष्ठ के दो प्रकार हैं - खिरक वह स्थान जहाँ गायें, बैल, बछड़े आदि को बाँधा जाता है। गोचर भूमि- जहाँ गायें चरती हैं। इन सब से भी गायों के स्थान का ही बोध होता है। 

        इस कारण इस भूमण्डल को ब्रज मण्डल कहा गया है। यमुना को विरजा भी कहते हैं। विरजा का क्षेत्र होने से मथुरा मंडल विरजा या व्रज कहा जाने लगा। महाभारत के युद्धोपरांत जब द्वारका नष्ट हो गई, तब श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्र (वज्रनाभ) मथुरा के राजा हुए थे। उनके नाम पर मथुरा मंडल भी वज्र प्रदेश या व्रज प्रदेश कहा जाने लगा।

        कुल मिलाकर वेदों से लेकर पुराणों तक ब्रज का संबंध गायों से रहा है। चाहे वह गायों के बाँधने का बाड़ा हो, चाहे गोशाला हो, चाहे गोचर- भूमि हो और चाहे गोप- बस्ती हो। भागवत वक्ताओं की दृष्टि में गोष्ठ, गोकुल और ब्रज समानार्थक शब्द हैं। भागवत के आधार पर सूरदास आदि कवियों की रचनाओं में भी ब्रज इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। मथुरा और उसका निकटवर्ती भू-भाग प्रागैतिहासिक काल से ही अपने सघन वनों, विस्तृत चरागाहों, सुंदर गोष्ठों ओर दुधारू गायों के लिए प्रसिद्ध रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म यद्यपि मथुरा में हुआ था, उनका शैशव एवं बाल्यकाल गोपराज नंद और उनकी पत्नी यशोदा के लालन-पालन में बीता था। उनका सान्निध्य गोपों, गोपियों एवं गो-धन के साथ रहा था। वस्तुतः वेदों से लेकर पुराणों तक ब्रज का संबंध अधिकतर गायों से रहा है। चाहे वह गायों के चरने की गोचर भूमि हो चाहे उन्हें बाँधने का खिरक (बाड़ा) हो, चाहे गोशाला हो, और चाहे गोप-बस्ती हो।

        दक्षिण भारत से एक समय एक कृष्ण भक्त वैष्णव साधु वृंदावन की यात्रा के लिए आए थे। एक बार वे गोवर्धन (गिरिराज) की परिक्रमा के लिए गए। हाथ में करमाला लेकर जप करते हुए परिक्रमा मार्ग पर मंद गति से चल रहे थे। दोपहर हो गई। बाबा की भिक्षा शेष थी, परंतु परिक्रमा मार्ग पर भिक्षा मिलना संभव नहीं है, यह मानकर वे चलते रहे।’

        थोड़ी देर तक इस प्रकार चलने के बाद सामने से आती हुई एक किसान स्त्री दिखाई दी। वह अपने घर से खेत में जा रही थी। उसके सिर पर टोकरी में भोजन था। दोपहर का समय है, और बाबा भूखे होंगे, यह सोचकर उसने बाबा से पूछा कि बाबा भोजन पाओगे (करेंगे) ? दोपहर का समय था, बाबा को भूख भी लगी थी और यह भोजन तो अनायास ही सामने आया जानकर बाबा ने भोजन के निमंत्रण को स्वीकार किया।

        उस स्त्री ने खाद्य सामग्री से भरा टोकरा सिर से उतार कर नीचे रखा। गेहूं की रोटी, सब्जी और दाल इत्यादि से टोकरा पूरा भरा हुआ था। सारी सामग्री एक कपड़े से ढकी हुई थी। उस कपड़े पर उस स्त्री ने अपनी चप्पले रखी हुंई थी। यह गांव की औरतों की आदत होती है कि कई बार वे अपनी चप्पले सिर पर रखे टोकरे में रख देती है, और खुद नंगे पैर चलती है। इस स्त्री ने भी अपनी चप्पले भोजन के टोकरे पर ही रखी हुईं थीं।

        बाबा जी की स्वीकृति पाकर चप्पले नीचे रखकर उसने भोजन पर ढका हुआ कपड़े का टुकड़ा हटाया और भोजन परोसने की तैयारी करने लगी। यह देखकर वैष्णव संस्कार में पले बढ़े साधु महाराज चौंक उठे, उन्होंने लगभग गर्जना करते हुए कहा कि ‘‘अरे तुमने अपनी धूल से सनी जूतियां भोजन पर रखी हैं’’। और ऐसा अशुद्ध भोजन मुझे दे रही हो? क्या ऐसा धूल वाला भोजन हम ग्रहण करें ? तुममें तो बिलकुल भी अक्ल नही है। तुम्हारी ऐसी धूल वाली गंदी जूतियों ने भोजन अशुद्ध कर दिया है। रखो अपना भोजन अपने पास। अप्रसन्न साधु भोजन का त्याग करके चल दिए, परंतु वह बृजवासी स्त्री तनिक भी विचलित नहीं हुई और मुस्कुराने लगी। 

        बृज नारी देवी ने बाबा को मर्म वेदी उत्तर दिया कि ‘‘अरे ! तेरे को बाबा किसने बनाया? तू सच्चा बाबा नहीं है। अरे यह धूल नहीं है, यह तो ब्रजरज है। यह ब्रजरज तो राधा- कृष्ण की चरणरज है। ब्रजरज को कौन धूल कहता है? तू बाबा बना है और तुझे इतना भी मालूम नहीं है ? साधु बाबा को ब्रज का मर्म मानो बिंद गया हो। एक भोली भाली अनपढ़ किसान स्त्री के द्वारा कहे गये सही शब्द साधु बाबा के दिल पर उतर गए।

        इस सीधी-सादी ब्रजनारी के ऐसे प्रेमयुक्त कथन सुनकर साधु बाबा की आंखों में से सावन भादां की बरसात होने लगी। चेहरा कृष्ण प्रेम से भाव विभोर हो गया। शरीर कांपने लगा। साधु महाराज हाथ जोड़कर अपने अपराध के लिए क्षमा मांगने लगे। कहने लगे कि मईया मुझसे गलती हो गई, मैया मुझे क्षमा कर दे। सच बताया, कि यह धूल नहीं है। यह तो ब्रजरज है, राधा कृष्ण की चरणरज है। तुमने मेरी आंखें खोल दी। मैया, मुझे क्षमा कर दो। बाबा ने बार-बार उस बृजवासी महिला को साष्टांग प्रणाम किया, और फूट-फूट कर रोते हुए व्रज की रज को बार बार अपने शरीर पर मलने लगे।

        बाबा की यह दशा देखकर उन्हें आश्वासन देते हुए उसने कहा कि ‘‘अरे कोई बात नहीं बाबा। हमारी राधारानी बहुत बड़े दिलवाली हैं। वह सबको माफ करती रहती है। इतना शोक मत करो। यह कहकर उसने साधु बाबा को भोजन परोस दिया। बाबा ‘‘राधे कृष्ण ‘‘राधे कृष्ण” बोलते हुए भोजन को पा लिया और गोवर्धन की वह गोपी अपने खेत की ओर चली गयी।

“ब्रज रज : ब्रज की मिट्टी को रज क्यों बोला गया है ??

सम्पूर्ण कामनाओं और श्रीकृष्ण भक्ति को प्राप्त करने के लिए “ब्रज रज ही है।

        भगवान ने बाल्यकाल में यहाँ अनेकां लीलाएं की हैं ! उन सभी लीलाओं का प्रत्यक्ष द्रष्टा है श्री गोवर्धन पर्वत, श्री यमुना जी और यहाँ की रज। यहाँ की मिट्टी को रज बोला गया है इसके पीछे जो कारण है वह यह कि भगवान ने इसको खाया और माता यशोदा के डाँटने पर इस मिट्टी को उगल भी दिया था। इसके पीछे बहुत कारण हैं जिनमें सबसे मुख्य इसको अपना प्रसादी बना देना था क्योंकि ऐसा कोई प्रसाद नहीं जो जन्म जन्मांतर यथावत बना रहे इसीलिए भगवान ने ब्रजवासियों को ऐसा प्रसाद दिया जो न तो कभी दूषित होगा और न ही इसका कभी अंत होगा।

        भगवान श्री कृष्ण ने अपने “ब्रज“ यानि अपने निज गोलोक धाम में समस्त तीर्थों को स्थापित कर दिया चूँकि जहाँ परिपूर्णतम ब्रह्म स्वयं वास करें वहां समस्त तीर्थ स्वतः ही आने की इच्छा रखते हों, लेकिन बृजवासियों को किसी प्रकार का भ्रम न हो इसके लिए भगवान ने उनके सामने ही समस्त तीर्थ स्थानो को सूक्ष्म रूप में यहाँ स्थापित किया था। 

        श्रीकृष्ण का मानना था कि केवल ब्रजवासियों को ही ये उत्तम रस प्राप्त है क्योंकि इनके रूप में मैं स्वयं विद्यमान हूँ ये मेरी अपनी निजी प्रकृति से ही प्रगट हैं, अन्य जीव मात्र में मैं आत्मा रूप में विराजित हूँ लेकिन ब्रजजनों का और मेरा स्वरुप तो एक ही है, इनका हर एक कर्म मेरी ही लीला है, इसमें कोई संशय नहीं समझना चाहिए।

        माता यशोदा को तीर्थाटन की जब इच्छा हुई तो भगवान ने चारों धाम यहाँ संकल्प मात्र से ही प्रगट कर दिए थे। यहाँ रहकर जीव की जन्म और मृत्यु मात्र लीला है मेरा पार्षद मेरे ही निज धाम को प्राप्त होता है इसलिए संस्कार का भी यहाँ कोई महत्त्व नहीं ऐसी प्रभु वाणी में है !

        यहाँ जन्म और मृत्यु दोनों मेरी कृपा के द्वारा ही जीव को प्राप्त होते है एवं प्रत्येक जीव मात्र जो यहाँ निवास करता है वह नित्य मुक्त है। उसकी मुक्ति के उपाय के लिए किये गए कर्मो का महत्त्व कुछ नहीं है। मेरे इस परम धाम को प्राप्त करने के लिए समस्त ब्रह्मांड में अनेकों ऋषि, मुनि, गन्धर्व, यक्ष, प्रजापति, देवतागण, नागलोक के समस्त प्राणी निरंतर मुझे भजते हैं लेकिन फिर भी उनको इसकी प्राप्ति इतनी सहज नहीं है।

मेरी चरण रज ही इस ब्रज (गोलोक धाम) की रज है जिसमें मेरी लीलाओं का दर्शन है।

        राधाकुण्ड के भजनानन्द साधु अनाथ बन्धुदास ने इस सम्बन्ध में बताया कि जेष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को माँ जह्नवा जब ब्रज में अपने शिष्यों के साथ आगमन हुआ था और उन्होंने यहां जीव गोस्वामी पाद से मिल कर वह कामा काम्यवन में भी गयीं थी वहां वह गोपीनाथ जी के मंदिर के श्रीविग्रह को माला पहनाने गयीं थीं, उस समय मंदिर के पट बन्द हो गये थे बाद में देखा गया कि राधारानी को दायें तरफ करके वह स्वयं वायें तरफ में खड़ी हैं यह चमत्कार लोगों ने उस समय देखा था। माँ जहनवा के गोपीनाथ से यह परम्परा चली आ रही है एकादशी को भक्त लोग कुण्ड की परिक्रमा करके कीर्तन, आरती के पश्चात धूलोट उत्सव शुरू करते हैं। 


महाप्रभु जी का उस समय का एक पद है

नाचिते न जानी तबहु नाचिया गौरांग बोली।

गाइते न जानी तबहु गायी, सुखे थाकी,

दुःखेते थाकी हा गौरांग, ऐई भाव ही निरन्तर चाही।

ऐई तो ब्रजेर धूला रे भाई ऐई तो ब्रजेर धूला।

ऐई धूला मेखे छीलो नन्देर बेटा कानू,

गाय तो माखो रे भाई ऐई ब्रजेर धूला।।

        उन्होंने कहा कि यह कोई सामान्य धूल नही है यह ब्रज की गोपियों और राधारानी का स्थान है यह राधा की पद रेनु है। धूला उत्सव एक परम्परा है कृष्ण जब बाल्य काल में इस रज में लोट पोट हुए, यहां पर राधारानी के चरणों की धूल भी है। 

        इस धूलोट उत्सव में हम लोग भी अपने जीवन को धन्य करने के लिए इस ब्रज रज में लोट लगाते हैं। सबसे पहले गुरूजनों को यह रज लगाकर फिर हम सभी इसमें लोटते हैं कीर्तन करते हैं यह परम्परा सदियों से इसी प्रकार से चली आ रही है जिसे हम धूलोट उत्सव के रूप में मनाते हैं।

        इसी प्रकार वृन्दावन भागवत निवास के महन्त श्री युगल चरण दास ने धूलोट उत्सव के विषय में बताते हुए कहा कि धूल्ट उत्सव माँ जह्नवा के आगमन के साथ शुरू हो गया था नित्यानन्द प्रभु जब ब्रज में पधारे थे तब उन्होंने कामा स्थित गोपीनाथ मंदिर की स्थापना के वाद में उन्होंने ब्रज में वास किया था इसी उपलक्ष्य में धूलोट उत्सव को मनाया जाता है यह करीब 9 वीं या 10 वीं सदी की वात है, जब माँ जह्नवा का आगमन ब्रज में हुआ था उस समय को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। जिसमें संकीर्तन, भण्डारा आदि का आयोजन भी किया जाता है।


धूलोट उत्सव क्यों मनाया जाता है 

        ब्रज की धूल कोई साधारण धूल नही है इसे ब्रहमा आदि ने भी अपने शरीर पर धारण किया था। भगवान श्रीकृष्ण ने जब उद्धव जी को ब्रज में भेजा था तब उन्होंने भी यही कामना की थी कि मेरा भी इसी भूमि में, और इसी धूली में जन्म हो, ऐसी कृपा प्रभु मुझ पर करें। षिव जी भी इस धूल को अपने माथे पर लगाते हैं और आज भी वृन्दावन में गोपेश्वर महादेव के रूप में विराजमान हैं। इन्हीं परम्पराओं के साथ आचार्यों की परम्पराओं और भागवत परम्पराओं को लेकर ही हम लोग धूलोट उत्सव मनाते हैं इस भूमि की इस धूलि में लोट पोट होना ब्रज की रज को अपने उपर लपेटना होता है क्यों कि हमारा जन्म भी रज से ही हुआ है इसी रज से सभी प्रकार के अन्न की उत्पत्ति होती है और उसी से वीर्य बनता है और उसी से जीव मात्र की उत्पत्ति होती है। और अन्त में हमें इसी रज में ही मिल जाना है तीन तरह की गति होती है जला दिया जाता है, जल में वहा दिया जाता है, या जमीन में समाधि दी जाती है तीनों ही स्थिति में रज में ही मिलना होता है चाहें यमुनाजी या गंगा जी में भी रज ही मिलेगी कुल मिला कर रज में ही मिल जाना है।

                                                                                               फ़ोटो  - गुड्डू गोतम

        उन्होंने बताया कि यह धूलट उत्सव जेष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को शुरू होता है और तीन दिनों तक चलता है यह आयोजन विशेष कर राधाकुण्ड में मनाया जाता है क्यों कि माँ जह्नवा का आगमन इसी समय हुआ था। माँ जह्नवा नित्यानन्द प्रभु की आदि शक्ति हैं शक्ति स्वरूपा हैं नित्यानन्द प्रभु के पारायण करने के उपरान्त वह ब्रज में अपने शिष्यों के साथ आयीं थीं। तब गोडीय सम्प्रदाय के षठ गोस्वामी पाद आचार्यों ने यह उत्सव को शुरू किया था। 

                                                                                            फ़ोटो  - गुड्डू गोतम

        यह उत्सव वृन्दावन स्थित भागवत निवास में भी मनाया जाता है रघुनाथ गोस्वामी पाद को चैतन्य महाप्रभु ने एक गिर्राज शिला जो कि उनकी सेवा में थी को जगन्नाथकुटी के गम्भीरा में उनको दी थी गोस्वामी पाद नियमित उसकी सेवा पूजा करते थे, भाव विभोर होकर सेवा करते समय वह अपने अंगूठे के उपर गिर्राज शिला को रख कर जल प्रदान करते थे। जिसके कारण गोस्वामी पाद का अंगूठा ही गिर्राज शिला में समा गया था आज भी वह दिव्य गिर्राज शिला भागवत निवास में पूजित है लगभग 500 वर्षों पूर्व के गिर्राज जी यहां सेवित हैं जिन्हें गिरेन्द्र बिहारी जी के नाम से जाना जाता है जिसकी अनवरत सेवा पूजा यहां चल रही है।

        उन्होंने बताया कि नित्यानन्द प्रभु के ब्रज में आगमन के पश्चात माँ जह्नवा का जब ब्रज में आगमन हुआ था उस समय को धूलोट उत्सव के रूप में मनाया जाता है स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गोचारण लीला करने जाते थे उस समय कृष्ण बलराम के शरीर पर यह धूली यह रज गायों के खुरों के माध्यम से उड़ कर उनके शरीर को स्पर्श करती है यानी लिपट जाती है।

        इसको लेकर एक सुन्दर भाव प्रकट करते हुए बताया कि राधारानी कह रही हैं कि वह सब समय कृष्ण से नहीं मिल पाती हैं क्यों कि माता पिता हैं, गुरूजन हैं, भाई बन्धु हैं, हर समय श्रीकृष्ण से मिल पाना सम्भव नही हो पाता है तो वह ललिता सखी से कहती हैं कि ‘‘है ललिते सखी मैं क्यों न भई ब्रज की धूल, होती यदि ब्रज की धूल तो, लिपटती श्याम सुन्दर के अंग सों, न रहती लोक लाज, न रहती कुल की मर्यादा’’ गौ खुरों से स्पर्श करके श्याम के अंग से लिपट जाती, मुख मण्डल से लिपट जाती, उनकी अलकावली में भी लिपट जाती, इसके पीछे गहरा भाव छिपा है। 

        हम सब इसी रज के जरिये मुक्ति को प्राप्त करते हैं यह भजन साधना राधारानी के ब्रज की रज को प्राप्ति का माध्यम है, प्रिया प्रियतम की कृपा हमें मिले भगवत प्राप्ति हमें मिले, राधारानी की कृपा प्राप्ति के लिए ब्रज रज की प्राप्ति हो, यही कामना के साथ धूलोट उत्सव मनाया जाता है।  

जय जय ब्रज रज, जय जय श्री राधे

प्रस्तुति - सुनील शर्मा, मथुरा।