मंगलवार, 26 दिसंबर 2023
अगर व्यवस्थाऐं न सभल पायें, तो आरोप प्रत्यारोप लगा दो
विदेशों में ब्रजभाषा को गायन से पहचान दिलाने वाली माधुरी शर्मा
मंगलवार, 12 सितंबर 2023
निर्मला सुन्दरी से श्री श्रीमाँ आनन्दमयी
रविवार, 10 सितंबर 2023
मथुरा वृन्दावन रेल लाइन का परिवर्तन समस्या या समाधान
शुक्रवार, 1 सितंबर 2023
सनातन, वैष्णव धर्म को विश्व के कौने-कौने में पहुंचाने का श्रेय श्रील ए. सी. भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी को जाता है।
सोमवार, 28 अगस्त 2023
लंकाधिपति रावण शिवजी का परम भक्त था।
बुधवार, 23 अगस्त 2023
दीघ्र जीवन की कहानियाँ
गुरुवार, 27 जुलाई 2023
अतीत की कहानियां कहती संग्रहालय की शिव मूर्तियां
2 हजार वर्ष पूर्व में होती थी पंच मुखी शिव लिंग की पूजा
श्रावण मास में महादेव के पांच मुख की पूजा का बड़ा महत्व माना गया है। अनेक विद्वानों के अनुसार सृष्टि, स्थिति, लय, अनुग्रह एवं निग्रह- इन 5 कार्यों की निर्मात्री 5 शक्तियों के संकेत शिव के 5 मुख से मिलते हैं। पूर्व मुख सृष्टि, दक्षिण मुख स्थिति, पश्चिम मुख प्रलय, उत्तर मुख अनुग्रह (कृपा) एवं ऊर्ध्व मुख निग्रह (ज्ञान) का सूचक माना जाता है। किन्तु अब मथुरा में कहीं भी पंच मुखी शिव लिंग की पूजा नहीं होती है, जनपद में कहीं भी पाँच मुखी शिव लिंग नहीं हैं। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व में मथुरा जनपद में पंच मुखी शिव की पूजा के प्रमाण राजकीय संग्रहालय, मथुरा में मिलते हैं। मथुरा संग्रहालय में एक मुखी शिव लिंग, दो मुखी शिव लिंग, चार मुखी शिव लिंग तथा पाँच मुखी शिव लिंग की मूर्तियाँ यहां पर दर्शनीय हैं।
किस प्रकार भगवान शंकर के हुए पांच मुख
भगवान शंकर के पांच मुखों में ऊर्ध्व मुख ईशान दुग्ध जैसे रंग का, पूर्व मुख तत्पुरुष पीत वर्ण का, दक्षिण मुख अघोर नील वर्ण का, पश्चिम मुख सद्योजात श्वेत वर्ण का और उत्तर मुख वामदेव कृष्ण वर्ण का है। भगवान शिव के पांच मुख चारों दिशाओं में और पांचवा मध्य में उपर की ओर है। भगवान शिव के पश्चिम दिशा का मुख सद्योजात बालक के समान स्वच्छ, शुद्ध व निर्विकार है। उत्तर दिशा का मुख वामदेव अर्थात् विकारों का नाश करने वाला है। दक्षिण मुख अघोर अर्थात निन्दित कर्म करने वाला है। निन्दित कर्म करने वाला भी शिव की कृपा से ही निन्दित कर्म को शुद्ध बना लेता है। शिव के पूर्व मुख का नाम तत्पुरुष अर्थात अपनी आत्मा में स्थित रहने वाला है। वहीं ऊर्ध्व मुख का नाम ईशान अर्थात जगत का स्वामी का प्रतीक है।
शिवपुराण में भगवान शिव शंकर कहते हैं
सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह- ये मेरे पांच कृत्य (कार्य) मेरे पांचों मुखों द्वारा धारित हैं। कथा अनुसार एक बार भगवान विष्णु ने अत्यन्त मनोहर किशोर रूप धारण किया। उस मनोहर रूप को देखने के लिए चतुर्भुज ब्रह्मा, बहुमुख वाले शेष, सहस्त्राक्ष मुख धारण कर इन्द्र आदि देवता आए। सभी ने भगवान के इस रूप का आनंद लिया तो भगवान शिव सोचने लगे कि यदि मेरे भी अनेक मुख होते तो मैं भी अनेक नेत्रों से भगवान के इस किशोर रूप का सबसे अधिक दर्शन करता। कैलाशपति के मन में इस इच्छा के उत्पन्न होते ही वे पंचमुख के हो गए। भगवान शिव के पांच मुख-सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान हुए और प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र बन गए। तभी से वे ‘पंचानन’ या ‘पंचवक्त्र’ कहलाने लगे। भगवान शिव के इन पंचमुख के अवतार की कथा पढ़ने और सुनने का बड़ा माहात्म्य है। यह प्रसंग मनुष्य के अंदर शिव-भक्ति जाग्रत करने के साथ उसकी समस्त मनोकामनाओं को पूरा कर परम गति को देने वाला है।
शिव शंकर की व्यापकता
हमारे देश के विभिन्न प्रांतों में अनेक देवताओं का पूजन होता रहा है और होता है, किंतु शिव की व्यापकता ऐसी है कि वह हर जगह पूजे जाते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथ, जो हर जिज्ञासा को शांत करने में समर्थ हैं, जो श्रुति स्मृति के दैदीप्यमान स्तंभ हैं, ऐसे वेदों के वाग्मय में जगह-जगह शिव को ईश्वर या रुद्र के नाम से संबोधित कर उनकी व्यापकता को दर्शाया गया है।
यजुर्वेद के एकादश अध्याय के 54वें मंत्र में कहा गया है कि रुद्रदेव ने भूलोक का सृजन किया और उसको महान तेजस्विता से युक्त सूर्यदेव ने प्रकाशित किया। उन रुद्रदेव की प्रचंड ज्योति ही अन्य देवों के अस्तित्व की परिचायक है। शिव ही सर्वप्रथम देव हैं, जिन्होंने पृथ्वी की संरचना की तथा अन्य सभी देवों को अपने तेज से तेजस्वी बनाया।
शिव को पंचमुखी, दशभुजा युक्त माना गया है। पांच तत्वों का निर्माण भगवान सदाशिव से ही हुआ है। इन्हीं पांच तत्वों से संपूर्ण चराचर जगत का निर्माण हुआ है। तभी तो देवराज पुष्पदंत महिम्न में कहते हैं - हे सदाशिव! आपकी शक्ति से ही इस संपूर्ण संसार का चर-अचर निर्माण हुआ है।
शिव का वर्णन शब्दों से नहीं किया जा सकता
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवान शिव उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के दृष्टा हैं। निर्माण, रक्षण एवं संहरण कार्यों का कर्ता होने के कारण उन्हें ही ब्रम्हा, विष्णु एवं रुद्र कहा गया है। शिव के विषय में उनका वर्णन शब्दों से नहीं किया जा सकता है। शिव की महिमा वाणी का विषय नहीं है। मन का विषय भी नहीं है। वे तो सारे ब्रह्मांड में तद्रूप होकर विद्यमान होने से सदैव श्वास-प्रश्वास में अनुभूत होते रहते हैं। इसी कारण ईश्वर के स्वरूप को अनुभव एवं आनंद की संज्ञा भी दी गई है।
भगवान शिव को लिंग रूप में क्यों पूजा जाता है
इसकी वजह बेहद दिलचस्प है जबकि शिव शंभु आदि और अंत के देवता है और इनका न कोई स्वरूप है और न ही आकार वे निराकार हैं। आदि और अंत न होने से लिंग को शिव का निराकार रूप माना जाता है, केवल शिव ही निराकार लिंग के रूप में पूजे जाते हैं। लिंग रूप में समस्त ब्रह्मांड का पूजन हो जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन के समय सभी देवता अमृत के आकांक्षी थे लेकिन भगवान शिव के हिस्से में भयंकर हलाहल विष आया। उन्होंने बड़ी सहजता से सारे संसार को समाप्त करने में सक्षम उस विष को अपने कण्ठ में धारण किया तथा ‘नीलकण्ठ’ कहलाए। समुद्र मंथन के समय निकला विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ़ गया। उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई, जो आज तक चली आ रही है।
शिव, हिंदू मतानुसार त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के रूप में एक महत्वपूर्ण देवता हैं, जिन्हें कई रूपों में दर्शाया गया है। वह एकमात्र देवता हैं जिनकी प्रतीकात्मक पूजा उन्होंने मानवरूपी रूप के साथ-साथ जारी रखी। इस उप-प्रकट रूप को लिंग (फालस) के माध्यम से दिखाया गया है। कभी-कभी लिंग पहलू को उनके मानव रूप के साथ भी जोड़ा जाता है।
मथुरा संग्रहालय में दर्षनीय शिव प्रतिमाएं
मथुरा संग्रहालय में रखी शिव प्रतिमाओं के पास जाने से ज्ञात होता है कि यहां संरक्षित मूर्तियां गुप्त काल से भी पहले की हैं जिससे यह ज्ञात होता है कि यहां शिव लिंग की पूजा की जाती रही है। राजकीय संग्रहालय, मथुरा की मूर्तिकला के संग्रह में एक मुखी, दोमुखी, चार मुखी एवं पांच मुखी शिवलिंग की मूर्तियां प्रदर्शन के लिए रखी गयी हैं, जिनमें (11-15.462), जो जटायुक्त बैर, माथे पर तीसरा नैत्र और मानव खोपड़ी की एक माला (मुंड माला जोर अक्षमाला, रुद्राक्ष की माला) इनमें से एक के चेहरे पर कुछ उल्लेखनीय विशेषताएं भी देखने को मिलती हैं।
एक अन्य मूर्ति (29.1931) में वर्गाकार आधार और शीर्ष पर एक स्वतंत्र अष्टकोणीय स्तंभ पर एक बड़ा त्रिशूल (शिव का हथियार जिसे त्रिशूल के रूप में जाना जाता है और तीसरी आंख (त्रिनेत्र) के साथ एक विशाल आकृति) और दाहिने हाथ में एक शाफ्ट पकड़े हुए है। उसका निचला हिस्सा नग्न दिखता है और हो सकता है यह लकुलिश पंथ का प्रतिनिधित्व करता हो, जिसकी एक समय में मथुरा में मजबूत पकड़ थी। शिलालेख में दर्ज है कि कुछ उदिताचार्य ने गुप्त काल (380) के सम्बत् 61 वें वर्ष में दो शिवलिंग (उपमितेश्वर और कपिलेश्वर) स्थापित किए थे। यह जान कर आर्श्चय और दिलचस्प लगता है कि यह स्तंभ उसी स्थान से जहां आज भी प्रसिद्ध शिव मंदिर रंगेश्वर है इस मंदिर के पास से ही इसे प्राप्त किया गया था।
एक अन्य शिवलिंग (15.516) जिसमें चार मानव आकृति के साथ अलग-अलग दिशाओं में उभरे हुए हैं। पांचवें सिर के निशानों से ऐसा प्रतीत होता है कि पंचमूर्ति में शिव के पंचानन पहलू का प्रतिनिधित्व करने वाला पंच मुखी (पांच मुखी) शिव लिंग है। इन सिरों को क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं की ओर मुख करके तत्पुरुष, अघोरा, वामदेव और सद्योजात कहा जाता है। ऊपरी चेहरा जो ऊपर की ओर दिखता है उसे ईशान के नाम से जाना जाता है। इस मूर्ति को देखकर लगता है कि आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व में पांच मुखी शिव की पूजा मथुरा जनपद में की जाती थी। जिसमें मोतियों की माला के चारों ओर बंधे मोटे उभरे हुए बैंड के आधार पर यह मूर्ति प्रारंभिक गुप्त काल की प्रतीत होती है। इस मूर्ति को संग्रहालय में स्थित सप्त समुद्री कूप से बरामद किया गया था।
एक अन्य मूर्ति (30.2084) में शिव नंदी (बैल) और उनकी पत्नी पार्वती अपने वाहन सिंह के साथ खड़े हैं। दोनों तरफ उकेरी गई मूर्ति में शिव को उलझे हुए बालों (जटा), तीसरी आंख (त्रिनेत्र) और लिंग के साथ सीधी स्थिति में दिखाया गया है। वह बाघ की खाल (व्याघ्रजिना या व्याघ्रांबर) पहने हैं, जैसा कि दोनों के सिरों पर अंकित आभा मण्डल जैसे उकेरे गये संकेत से मिलता है। शिव और पार्वती वाली इस मूर्ति को आमतौर पर उमामहेश्वर के नाम से जाना जाता है। उमा संभवतः अपने बाएं हाथ में एक लिली का फूल लिए हुए हैं। शिव के एक मुखी लिंग पहलू को शिव के सिर के रूप में भी दर्शाया गया है।
शिव एवं पार्वती के अर्धनारीश्वर स्वरूप के दर्शन
गुप्त काल के पांच सिरों वाले शिव को दर्शाया गया है, जिनमें अलग-अलग हेयर स्टाइल दिखाई गई हैं। यह प्रतिमा (13.362) गुप्त काल की कलाकृति उच्च कारीगरी को प्रदर्शित करती है। जिसमें पुरुष और महिला के दो अलग-अलग पहलुओं को दिखाया गया हैं। एक तरफ दाहिनी ओर ऊंचे उलझे हुए बाल के साथ दिखाई देता है, जबकि बाईं ओर सुंदर हेयर स्टाइल और ऊर्ध्वाधर मोती की माला के साथ एक बड़े गोल आकार के कान के कुंडल से सुशोभित है। इस मूर्ति में मर्दाना और स्त्रियोचित विशेषताओं को अलग-अलग दर्शाया गया है। शिव की भौंहें ऊपर की ओर खिंची हुई हैं जबकि महिला के भाग को नाजुक ढंग से संभाला गया है। एक कुशल कलाकार ही यह उत्तम संश्लेषण कर सकता था।
एक अन्य प्रदर्शित मूर्ति (15.772) में एक असाधारण सुंदर अर्धनारीश्वर की है जो शिव के ईश्वर पहलू को दर्शाती है, जो शिव और पार्वती का एक मिश्रित रूप है जो पुरुष और महिला की ऊर्जा के संलयन का संकेत देता है। ऊँचे उलझे बालों (जटाजूट) के साथ दाहिना भाग शिव का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि शेष आधा हिस्सा आकर्षक रूप से कंघी किए हुए बालों और फूलों से सजे बालों, बड़े और भारी कान की बाली के साथ, पार्वती का है। माथे पर एक ऊर्ध्वाधर तीसरी आंख है और गले में एकावली (मोती का हार) पहने हुए है। सुंदर होंठ, आधी बंद आंखें और सूक्ष्म लालित्य ने समग्र विशेषताओं के कारण आकर्षण को और बढ़ा दिया है।
पुराणों में शिव और पार्वती के विलय की कहानी अलग-अलग तरह से वर्णित की गई है। कालिका पुराण के अनुसार एक बार पार्वती ने शिव की छाती पर अपना प्रतिबिंब देखा जो एक चमकती हुई आकृति के रूप में था। उन्हें कोई अन्य स्त्री समझकर ईर्ष्या होने लगी और उन्होंने शिव से उसे एक क्षण भी अपने से अलग न करने का अनुरोध किया। शिव ने पार्वती का यह अनुरोध स्वीकार कर लिया और उन्होंने अपने और पार्वती के शरीर को एक में मिला दिया। आध्यात्मिक रूप से अर्ध न अर स्वरे रूप प्रकृति और पुरुष के अनलोन का सुझाव देता है। पुरुष और महिला पंथ का संयोजन उदारवाद को आगे बढ़ाने वाले दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है।
प्रस्तुति - सुनील शर्मा 9319225654
बुधवार, 28 जून 2023
गुरू की पूजा कर पैदल गिरिराज परिक्रमा करते हैं श्रद्धालु
सनातन गोस्वामी की स्मृति में उनके शिष्यों ने मुडिया परिक्रमा शुरू की थी
मथुरा, गोवर्धन। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समूचे ब्रजक्षेत्र में दो ही वस्तुओं का आज भी अस्तित्व विद्यमान है, इनमें एक है यमुना नदी और दूसरा गोवर्धन स्थित गिरिराज पर्वत। भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का वध करके यमुना को प्रदूषण से मुक्त कराया था और गिरिराज गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली में छाता की तरह उठाकर इंद्रदेव की अतिवृष्टि से डूबते ब्रजवासियों को बचाया था। भगवान श्रीकृष्ण के समय से आज तक यमुना और गिरिराज पर्वत गोवर्धन करोड़ों-करोड़ों भारतीयों की आस्था एसं श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। आज संपूर्ण विष्व में ब्रजभूमि को यमुना और गोवर्धन पर्वत के कारण ही जाना जाता है। इसी लिये पूरे विश्व से मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, नन्दगांव, बरसाना, गोकुल, महावन बलदेव आदि धार्मिक स्थलों को देखने व भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि का दर्शन करने प्रतिवर्ष लाखों करोड़ों तीर्थ यात्री यहां आते है। यमुना के जल को आचमन मात्र से मोक्ष प्राप्ति का अटूट विश्वास लोक जन मानस में आज भी है ओर गिरिराज गोवर्धन को साक्षात कृष्ण का ही रूप मान कर सप्तकोसीय परिक्रमा वर्ष भर करते ही रहते हैं।
मथुरा मुख्यालय से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है प्राचीन तीर्थ स्थल गोवर्धन, गोवर्धन के चारों ओर लगभग 21 किलो मीटर क्षेत्र में गिरिराज गोवर्धन अराबली पर्वत श्रृंखला है। इस पर्वत श्रृखंला की तलहटी में बारहों महीने करोड़ों लोगों को परिक्रमा कर गिरिराज गोवर्धन के प्रति अपनी आस्था और भक्ति की अभिव्यक्ति करते व अपने आपको इस ब्रज रज के साथ ऐकाकार करके पुण्य प्राप्त करते देखा जा सकता है। गुरू पूर्णिमा का लोक पर्व ‘‘मुड़िया पूनौ’’ के नाम से जाना जाता है, इस दिन बड़ी संख्या में भक्त देश के विभिन्न अंचलों से रेल मार्ग, सड़क मार्ग से या फिर अपने-अपने साधनों से बहुत बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। जिनके कारण मुड़िया पूनौ ब्रज का सबसे बड़ा राजकीय लक्खी मेला बन गया है।
गुरू पूर्णिमा के इस लोक पर्व के रूप में मनाये जाने के पीछे भगवान वेदव्यास का जन्म दिवस व चैतन्य महाप्रभु सम्प्रदाय के शिष्य आचार्य सनातन गोस्वामी का आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को निर्वाण और गिरिराज गोवर्धन को साक्षात श्रीकृष्ण के रूप में मानने की अटूट आस्था है। इस आस्था का दर्शन भक्तों द्वारा गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा लगाते समय गाये जाने वाले लोक गीतों के माध्यम से होता है। एक लोकगीत में गोवर्धन परिक्रमा को जाने के लिए मन की व्याकुलता गिर्राज जी की परिक्रमा और मानसी गंगा में स्नान की आकांक्षा श्रद्धालु इस प्रकार व्यक्त करते हैं।
नांइ माने मेरौं मनुआं मैं तो गोवर्धन कूं जाऊ मेरी वीर।
सात कोस की दे परिक्रम्मा मानसी गंगा नहाऊ मेरी वीर।।
मुड़िया पूनौं का नाम कैसे पड़ा
चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय के शिष्य विद्वान आचार्य सनातन गोस्वामी से है। जिनका निधन हो जाने पष्चात उनके शिष्यों ने शोक में अपने सिर मुड़वा कर कीर्तन करते हुए मानसी गंगा की परिक्रमा की थी। मुडे हुए सिरों के कारण शिष्य साधुओं को मुड़िया कहा गया और क्यों कि उस दिन पूनौं यानी (पूर्णिमा) का दिन था, जिसके कारण इसका नाम मुड़िया पूनौं कहा जाने लगा, सनातन गोस्वामी और उनके भाई रूप गोस्वामी गौड़ देश प्राचीन बंगाल के शासक हुसैन शाह के दरवार में मंत्री थे। चैतन्य महाप्रभु के भक्ति-सिद्धांतों से प्रभावित होकर वे दोनों मंत्री पद छोड़कर महाप्रभु के आदेष पर वृन्दावन आ गये और यहां उन्होंने चैतन्य महाप्रभु से दीक्षा प्राप्त की और उनके शिष्य हो गये। चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें यह आदेश दिया कि वे श्रीकृष्ण के समय के तीर्थ स्थलों की खोज करें और उनके प्राचीन स्वरूप को प्रदान करें साथ ही श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार-प्रसार करें। चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार दोनों भाईयों ने ब्रज के वन-उपवन और कुंज निकुंजों में भ्रमण करके भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थलियों की खोज करके उन्हें पुनः जीवित किया, वे दोनों घर-घर जाकर रोटी की भिक्षा ग्रहण करते और महामंत्र का जाप करते रहते थे।
‘‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।,
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।’’
इस प्रकार महामंत्र का कीर्तन कर कृष्ण भक्ति का प्रचार प्रसार करते-करते सनातन गोस्वामी जब गोवर्धन आये तो उन्होंने मानसी गंगा के किनारे स्थित चकलेश्वर मंदिर के निकट अपनी कुटिया बना ली और वहीं रहने लगे वह नित्य प्रति गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा किया करते थे। वह नित्य प्रति मानसी गंगा में स्नान करते थे। जब वह अत्यंत वृद्ध और अशक्त हो गये तब भी उन्होंने नित्य नियम को नहीं छोड़ा। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें साक्षात दर्शन देकर गिरिराज पर्वत की एक शिला पर अपने चरण चिन्ह अंकित कर बाबा को दिया और कहा-कि बाबा अब आप इसकी ही परिक्रमा कर लेंगे तो गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा पूरी हो जायेगी। यह गिर्राज षिला आज भी वृन्दावन के राधा दामोदर मंदिर में स्थापित है तथा इसकी पूरे वर्ष भर श्रद्धालु परिक्रमा करते हैं।
मुडिया पूर्णिमा मेला क्यों मनाया जाता है
सनातन गोस्वामी का निधन अब से 469 वर्ष पूर्व संवत् 1611 में आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को हुआ था। उनके निधन पर उनके ष्ष्यि अनुयायियों ने सिर मुड़वाकर चकलेश्वर मंदिर से शोभायात्रा के रूप में निकाली थी, वहीं परम्परा आज भी उनके शिष्यों व अनुयायियों के द्वारा प्रत्येक वर्ष निकाली जाती है। आज यह विषाल मेला का रूप ले चुका है और परिक्रमा मार्ग खचाखच भरा रहता है। जिसके कारण जिलाप्रषासन को इस राजकीय मेले की व्यापक व्यवस्थाएं करनी पड़ती हैं।
इस दिन श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के चकलेष्वर स्थित मंदिर के सामने परमपूज्य सनातन गोस्वामी जी की समाधि स्थल पर अधिवास, संकीर्तन का शुभारम्भ किया जाता है। इसके पष्चात एक शोभायात्रा सांय के समय निकलती है, तथा एक अन्य शोभायात्रा सुबह राधाष्याम सुन्दर मंदिर से निकाली जाती है इसके मुड़िया महन्त राम कृष्ण दास हैं, दूसरी शोभायात्रा चकलेष्वर महाप्रभु मंदिर से सायं के समय निकलती है इस मंदिर के महन्त श्री गोपाल दास जी महाराज ने बताया कि इस वर्ष 1 जुलाई को अधिवास, 2 जुलाई को अखण्ड हरिनाम संर्कीतन, 3 जुलाई को सुबह गुरू पूजन दोपहर को साधु सेवा ब्राह्मण भोजन भण्डारा और सांय 5 बजे से मुडिया परिक्रमा निकाली जायेगी। जिसमें आश्रम के साधु-संत झांझ, मंजीरे, हारमोनियम व ढोलक की लय ताल पर नृत्य करते हुए निकलेंगे।
रघुनाथ दास जी गोस्वामी की गद्दी राधाकुंड में पूज्य सनातन गोस्वामी के निकुंज लीला में प्रवेश करने के बाद गुरू भक्ति की याद में मुड़िया पर्व को मनाया जाता है। इसमें राधाकुंड-श्यामकुंड से सनातन गोस्वामी के चिन्हों को लेकर साधु-संत इस शोभायात्रा में नाचते कूदते हुए शामिल होते हैं और मानसी गंगा और गिरि गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं।
इस दिन ब्रज क्षेत्र में हर मंदिर और आश्रम में लोग अपने-अपने गुरू की पूजा अर्चना करने पहुंचते हैं
मुडिया पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है पूरे ब्रज क्षेत्र में प्रत्येक मंदिर और आश्रम में लोग अपने-अपने गुरू की पूजा अर्चना करते हैं तथा गुरू स्थान की भी पूजा करते है और इस दिन जगह-जगह भंडारे लगते हैं जहां श्रृद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं और पूर्ण भक्ति भाव, और आस्था के साथ अपने-अपने गुरू से आर्शीवाद ग्रहण करते हैं। कुछ लोग इस दिन को पवित्र मान कर अपने जीवन को सफल व पूर्व जन्म को सुधारने व भगवत प्राप्ति का मार्ग पाने के लिए गुरू बनाते है और उनकी पूजा अर्चना करते हैं तथा गुरू को उपहार स्वरूप फल, वस्त्र आदि भेंट करते हैं। गुरू द्वारा बताये मार्ग पर चल कर भजन पूजा शुरू करते हैं।
लाखों परिक्रमार्थी गोवर्धन पहुंच रहे हैं
मुडिया पूर्णिमा 3 जुलाई को श्रद्धालु मानसी गंगा में स्नान कर परिक्रमा शुरू करेंगे
इस राजकीय लक्खी मेले को देखते हुए जिला प्रशासन प्रत्येक वर्ष श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को लेकर व्यवस्था करता है। सम्पूर्ण मेला क्षेत्र को विभिन्न सैक्टरों में बांटकर पेयजल, सफाई, शुद्ध खाद्य पदार्थ, विद्युत व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था, दुग्ध आपूर्ति, यातायात व्यवस्था का व्यापक इंतजाम जिला प्रषासन द्वारा किया जाता है। पूरे मेला क्षेत्र में पुलिस चौकी तथा वाच टावर के माध्यम से नियंत्रण की व्यवस्था की जाती है। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की घोषित व्यवस्थाओं के अभाव में प्राइवेट बसों द्वारा यात्रियों को भूसे की तरह भर कर मेला स्थल तक पहुंचाया जाता है यात्री छतां पर यात्रा करने को मजबूर होते है। जगह-जगह बैरियर लगे होने के कारण यात्रीयों को परिक्रमा के अलावा अधिक पैदल चलना पड़ता है।
गोवर्धन परिक्रमा मार्ग में कुसुम सरोवर, राधाकुण्ड, जतीपुरा आदि अनेक दर्शनीय स्थल पड़ते हैं तथा यह सम्पूर्ण ब्रज क्षेत्र का एक मात्र धार्मिक आस्था का केन्द्र है। गोवर्धन मथुरा से 26 किलोमीटर की दूरी पर है, गोवर्धन में पूछरी का लौठा, अप्सरा कुण्ड, कृष्ण दास का कुआ, सुरभि कुण्ड जैसे रमणीक स्थल हैं। गोवर्धन की तलहटी में सूरदास, कुंभनदास आदि अष्ट छाप के कावियों, सखाओं एवं सिद्ध भक्तों के स्थल आज भी आस्था के केंद्र बने हुए हैं।
प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी ब्रज क्षेत्र के प्रसिद्ध गोवर्धन गिरिराज महाराज की मुड़िया पूर्णिमा मेला में बीते वर्ष से अधिक संख्या में श्रद्धालुओं के यहां पहुंचने की संभावना है। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार लगभग एक करोड़ श्रद्धालु मुड़िया पूर्णिमा मेला पर गिरिराज महाराज की परिक्रमा करेंगे। इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के गिरिराज गोवर्धन पहुंचने को लेकर जिला प्रशासन ने व्यापक व्यवस्थाएं की हैं। मुड़िया पूर्णिमा मेले में बड़ी संख्या में वाहनों के आवागमन को देखत हुए पार्किंग स्थलों के लिये अलग से जगह-जगह व्यवस्था की गयी है। निजी पार्किंग स्थलों के लिये लोक निर्माण विभाग द्वारा पार्किंग के लिये ठेकेदारों को स्थान उपलब्ध कराये जायेंगे। पार्किंग स्थलों की रूपरेखा तैयार कर ली गयी है।
इस अवसर पर गोवर्धन में 24 घंटे विद्युत आपूर्ति के शासन द्वारा निर्देश दिये गये हैं। मानसी गंगा पर मेले के दौरान प्रकाश व्यवस्था को अनवरत किये जाने के लिये जैनरेटर सैट लगाये गये हैं सड़क मार्ग पर प्रकाश व्यवस्था के लिये गोवर्धन तथा राधाकुण्ड नगर पंचायतों को पर्याप्त लाइट लगवाने के निर्देश भी जिलाधिकारी पुलकित खरे द्वारा दिये गये हैं।
प्रस्तुति : सुनील शर्मा मथुरा
रविवार, 25 जून 2023
“ब्रज रज“ : ब्रज की मिट्टी को रज क्यों बोला गया है ??
ब्रज की धूलि की क्या महिमा है ?
सम्पूर्ण कामनाओं और श्रीकृष्ण भक्ति को प्राप्त करने के लिए “ब्रज“ रज की प्राप्ति ही मात्र साधन
ब्रज के वन-उपवन, कुन्ज-निकुन्ज, श्री यमुना व गिरिराज अत्यन्त मोहक हैं। पक्षियों का मधुर स्वर एकांकी स्थली को मादक एवं मनोहर बनाता है। साहित्य और कलाओं के विकास के लिए यह उपयुक्त स्थली है। संगीत, नृत्य एवं अभिनय ब्रज संस्कृति के प्राण बने हैं। ब्रजभूमि अनेकानेक मठों, मन्दिरों, महंतों, महात्माओं और महामनीषियों की महिमा से वन्दनीय है। यहाँ सभी सम्प्रदायों की आराधना स्थली है। ब्रज की रज का माहात्मय भक्तों के लिए सर्वोपरि है। सन्त गोस्वामी नरायणभट्ट कहते हैं-‘‘जैसे शास्त्रों में श्रेष्ठ श्रीमद्भागवत श्रीकृष्ण का विग्रह है वैसे ही पृथ्वी लोक में बनों सहित व्रजमण्डल भी श्रीकृष्ण का स्वरुप है।’’ श्रीराधामाधव एवं उनके सखा एवं गोपियों की नित्य लीलाओं को जहां आधार प्राप्त हुआ है उस धाम को रसिकों भक्तों ने ब्रजधाम कहा है। ब्रज की महिमा के बारे में कुछ पंक्तियां प्रस्तुत है-
ब्रज रज की महिमा अमर, ब्रज रस की है खान,
ब्रज रज माथे पर चढ़े, ब्रज है स्वर्ग समान।
भोली-भाली राधिका, भोले कृष्ण कुमार,
कुंज गलिन खेलत फिरें, ब्रज रज चरण पखार।
ब्रज की रज चंदन बनी, माटी बनी अबीर,
कृष्ण प्रेम रंग घोल के, लिपटे सब ब्रज वीर।
ब्रज की रज भक्ति बनी, ब्रज है कान्हा रूप,
कण-कण में माधव बसे, कृष्ण समान स्वरूप।
राधा ऐसी बावरी, कृष्ण चरण की आस,
छलिया मन ही ले गयो, अब किस पर विश्वास।
ब्रज की रज मखमल बनी, कृष्ण भक्ति का राग,
गिरिराज की परिक्रमा, कृष्ण चरण अनुराग।
वंशीवट यमुना बहे, राधा संग ब्रजधाम,
कृष्ण नाम की लहरियां, निकले आठों याम।
गोकुल की गलियां भलीं, कृष्ण चरणों की थाप,
अपने माथे पर लगा, धन्य भाग भईं आप।
ब्रज की रज माथे लगा, रटे कन्हाई नाम,
जब शरीर प्राणन तजे मिले, कृष्ण का धाम।
वृंदावन भक्ति क्षेत्र है और वृंदावन की रज भी पवित्र है। ब्रज रज को अति आराध्य कहा गया है। इस रज में कीट-पतंग भी प्रवेश करें तो भगवान स्वरूप है। फिर मानव की तो महिमा को क्या कहें। लेकिन तीर्थ का सेवन संयम नियम से करना है। शास्त्र आज्ञा है। अन्य क्षेत्र में किया पाप तीर्थ में समाप्त होता है। लेकिन तीर्थ में किया गया पाप लोहे के कवज जैसा होता है। जो कहीं साफ नहीं होता।
फ़ोटो - गुड्डू गोतमब्रज की धूलि की क्या महिमा है ?
भागवत जी में कहा गया है कि महान आत्मा के चरणों की धूल में नहाए बिना, कोई भी अन्य माध्यम से भगवान को जानने की उम्मीद नहीं कर सकता है। वृंदावन की विशेषता यह है कि यहां न केवल राधा और कृष्ण के चरणों की धूल आज भी मौजूद है। साथ ही प्रति वर्ष यहां लाखों तीर्थ यात्री आते हैं सभी भक्तों के नंगे पैरों के स्पर्श से यहां की जमीन भी पवित्र बन जाती हैं, क्योंकि वे यहां के सभी मंदिरों में जाते हैं और पवित्र भूमि की परिक्रमा भी करते हैं। यह ऐसा है मानो उनकी पूरी आध्यात्मिक ऊर्जा उनके पैरों के माध्यम से धूल के रूप में चली गई हो। भक्ति जितनी अधिक होती है, उतनी ही अधिक ऊर्जा उस जमीन में प्रवाहित होती है।
’वृंदावन के ’धूलोट’ उत्सव का महत्व क्या है’
महोत्सव यानी ब्रज की पवित्र धूल ’ब्रज रज’ में लोटने का पर्व। ब्रज रज की वंदना वृंदावन के दिव्य युगल की भक्ति और उनकी कृपा पाने की शुरुआत करना है। आपको ब्रज रज की महिमा को जानने के लिए पहले श्री राधा कृष्ण को जानना होगा।
फ़ोटो - गुड्डू गोतमब्रज रज का इतिहास और उसकी महत्ता
ब्रज की माँटी को ब्रज रज कहा जाता है। यूं तो माँटी को मिट्टी, बालू, इत्यादि भी कहा जाता है परन्तु ब्रज की माँटी को विशेषकर धार्मिक आस्था और परंपरा के अनुसार ब्रज रज कहते हैं। ब्रज रज से लोग तिलक लगाते हैं तथा हवन आदि में भी ब्रज रज का उपयोग किया जाता हैं। जिसे भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी की लीला भूमि की माँटी भी कहा जाता है। धार्मिक आस्थावान लोग इसे बहुत ही पवित्र मान कर इसे माथे पर लगाते है।इतिहासकारों के अनुसार ब्रज के तीन अर्थ बतलाये गये हैं - (गायों का खिरक), मार्ग और वृंद (झुंड) - सामान्यतः व्रज का अर्थ गोष्ठ किया है। गोष्ठ के दो प्रकार हैं - खिरक वह स्थान जहाँ गायें, बैल, बछड़े आदि को बाँधा जाता है। गोचर भूमि- जहाँ गायें चरती हैं। इन सब से भी गायों के स्थान का ही बोध होता है।
इस कारण इस भूमण्डल को ब्रज मण्डल कहा गया है। यमुना को विरजा भी कहते हैं। विरजा का क्षेत्र होने से मथुरा मंडल विरजा या व्रज कहा जाने लगा। महाभारत के युद्धोपरांत जब द्वारका नष्ट हो गई, तब श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्र (वज्रनाभ) मथुरा के राजा हुए थे। उनके नाम पर मथुरा मंडल भी वज्र प्रदेश या व्रज प्रदेश कहा जाने लगा।
कुल मिलाकर वेदों से लेकर पुराणों तक ब्रज का संबंध गायों से रहा है। चाहे वह गायों के बाँधने का बाड़ा हो, चाहे गोशाला हो, चाहे गोचर- भूमि हो और चाहे गोप- बस्ती हो। भागवत वक्ताओं की दृष्टि में गोष्ठ, गोकुल और ब्रज समानार्थक शब्द हैं। भागवत के आधार पर सूरदास आदि कवियों की रचनाओं में भी ब्रज इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। मथुरा और उसका निकटवर्ती भू-भाग प्रागैतिहासिक काल से ही अपने सघन वनों, विस्तृत चरागाहों, सुंदर गोष्ठों ओर दुधारू गायों के लिए प्रसिद्ध रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म यद्यपि मथुरा में हुआ था, उनका शैशव एवं बाल्यकाल गोपराज नंद और उनकी पत्नी यशोदा के लालन-पालन में बीता था। उनका सान्निध्य गोपों, गोपियों एवं गो-धन के साथ रहा था। वस्तुतः वेदों से लेकर पुराणों तक ब्रज का संबंध अधिकतर गायों से रहा है। चाहे वह गायों के चरने की गोचर भूमि हो चाहे उन्हें बाँधने का खिरक (बाड़ा) हो, चाहे गोशाला हो, और चाहे गोप-बस्ती हो।
दक्षिण भारत से एक समय एक कृष्ण भक्त वैष्णव साधु वृंदावन की यात्रा के लिए आए थे। एक बार वे गोवर्धन (गिरिराज) की परिक्रमा के लिए गए। हाथ में करमाला लेकर जप करते हुए परिक्रमा मार्ग पर मंद गति से चल रहे थे। दोपहर हो गई। बाबा की भिक्षा शेष थी, परंतु परिक्रमा मार्ग पर भिक्षा मिलना संभव नहीं है, यह मानकर वे चलते रहे।’
थोड़ी देर तक इस प्रकार चलने के बाद सामने से आती हुई एक किसान स्त्री दिखाई दी। वह अपने घर से खेत में जा रही थी। उसके सिर पर टोकरी में भोजन था। दोपहर का समय है, और बाबा भूखे होंगे, यह सोचकर उसने बाबा से पूछा कि बाबा भोजन पाओगे (करेंगे) ? दोपहर का समय था, बाबा को भूख भी लगी थी और यह भोजन तो अनायास ही सामने आया जानकर बाबा ने भोजन के निमंत्रण को स्वीकार किया।
उस स्त्री ने खाद्य सामग्री से भरा टोकरा सिर से उतार कर नीचे रखा। गेहूं की रोटी, सब्जी और दाल इत्यादि से टोकरा पूरा भरा हुआ था। सारी सामग्री एक कपड़े से ढकी हुई थी। उस कपड़े पर उस स्त्री ने अपनी चप्पले रखी हुंई थी। यह गांव की औरतों की आदत होती है कि कई बार वे अपनी चप्पले सिर पर रखे टोकरे में रख देती है, और खुद नंगे पैर चलती है। इस स्त्री ने भी अपनी चप्पले भोजन के टोकरे पर ही रखी हुईं थीं।
बाबा जी की स्वीकृति पाकर चप्पले नीचे रखकर उसने भोजन पर ढका हुआ कपड़े का टुकड़ा हटाया और भोजन परोसने की तैयारी करने लगी। यह देखकर वैष्णव संस्कार में पले बढ़े साधु महाराज चौंक उठे, उन्होंने लगभग गर्जना करते हुए कहा कि ‘‘अरे तुमने अपनी धूल से सनी जूतियां भोजन पर रखी हैं’’। और ऐसा अशुद्ध भोजन मुझे दे रही हो? क्या ऐसा धूल वाला भोजन हम ग्रहण करें ? तुममें तो बिलकुल भी अक्ल नही है। तुम्हारी ऐसी धूल वाली गंदी जूतियों ने भोजन अशुद्ध कर दिया है। रखो अपना भोजन अपने पास। अप्रसन्न साधु भोजन का त्याग करके चल दिए, परंतु वह बृजवासी स्त्री तनिक भी विचलित नहीं हुई और मुस्कुराने लगी।
बृज नारी देवी ने बाबा को मर्म वेदी उत्तर दिया कि ‘‘अरे ! तेरे को बाबा किसने बनाया? तू सच्चा बाबा नहीं है। अरे यह धूल नहीं है, यह तो ब्रजरज है। यह ब्रजरज तो राधा- कृष्ण की चरणरज है। ब्रजरज को कौन धूल कहता है? तू बाबा बना है और तुझे इतना भी मालूम नहीं है ? साधु बाबा को ब्रज का मर्म मानो बिंद गया हो। एक भोली भाली अनपढ़ किसान स्त्री के द्वारा कहे गये सही शब्द साधु बाबा के दिल पर उतर गए।
इस सीधी-सादी ब्रजनारी के ऐसे प्रेमयुक्त कथन सुनकर साधु बाबा की आंखों में से सावन भादां की बरसात होने लगी। चेहरा कृष्ण प्रेम से भाव विभोर हो गया। शरीर कांपने लगा। साधु महाराज हाथ जोड़कर अपने अपराध के लिए क्षमा मांगने लगे। कहने लगे कि मईया मुझसे गलती हो गई, मैया मुझे क्षमा कर दे। सच बताया, कि यह धूल नहीं है। यह तो ब्रजरज है, राधा कृष्ण की चरणरज है। तुमने मेरी आंखें खोल दी। मैया, मुझे क्षमा कर दो। बाबा ने बार-बार उस बृजवासी महिला को साष्टांग प्रणाम किया, और फूट-फूट कर रोते हुए व्रज की रज को बार बार अपने शरीर पर मलने लगे।
बाबा की यह दशा देखकर उन्हें आश्वासन देते हुए उसने कहा कि ‘‘अरे कोई बात नहीं बाबा। हमारी राधारानी बहुत बड़े दिलवाली हैं। वह सबको माफ करती रहती है। इतना शोक मत करो। यह कहकर उसने साधु बाबा को भोजन परोस दिया। बाबा ‘‘राधे कृष्ण ‘‘राधे कृष्ण” बोलते हुए भोजन को पा लिया और गोवर्धन की वह गोपी अपने खेत की ओर चली गयी।
“ब्रज रज” : ब्रज की मिट्टी को रज क्यों बोला गया है ??
सम्पूर्ण कामनाओं और श्रीकृष्ण भक्ति को प्राप्त करने के लिए “ब्रज” रज ही है।
भगवान ने बाल्यकाल में यहाँ अनेकां लीलाएं की हैं ! उन सभी लीलाओं का प्रत्यक्ष द्रष्टा है श्री गोवर्धन पर्वत, श्री यमुना जी और यहाँ की “रज”। यहाँ की मिट्टी को रज बोला गया है इसके पीछे जो कारण है वह यह कि भगवान ने इसको खाया और माता यशोदा के डाँटने पर इस मिट्टी को उगल भी दिया था। इसके पीछे बहुत कारण हैं जिनमें सबसे मुख्य इसको अपना प्रसादी बना देना था क्योंकि ऐसा कोई प्रसाद नहीं जो जन्म जन्मांतर यथावत बना रहे इसीलिए भगवान ने ब्रजवासियों को ऐसा प्रसाद दिया जो न तो कभी दूषित होगा और न ही इसका कभी अंत होगा।
भगवान श्री कृष्ण ने अपने “ब्रज“ यानि अपने निज गोलोक धाम में समस्त तीर्थों को स्थापित कर दिया चूँकि जहाँ परिपूर्णतम ब्रह्म स्वयं वास करें वहां समस्त तीर्थ स्वतः ही आने की इच्छा रखते हों, लेकिन बृजवासियों को किसी प्रकार का भ्रम न हो इसके लिए भगवान ने उनके सामने ही समस्त तीर्थ स्थानो को सूक्ष्म रूप में यहाँ स्थापित किया था।
श्रीकृष्ण का मानना था कि केवल ब्रजवासियों को ही ये उत्तम रस प्राप्त है क्योंकि इनके रूप में मैं स्वयं विद्यमान हूँ ये मेरी अपनी निजी प्रकृति से ही प्रगट हैं, अन्य जीव मात्र में मैं आत्मा रूप में विराजित हूँ लेकिन ब्रजजनों का और मेरा स्वरुप तो एक ही है, इनका हर एक कर्म मेरी ही लीला है, इसमें कोई संशय नहीं समझना चाहिए।
माता यशोदा को तीर्थाटन की जब इच्छा हुई तो भगवान ने चारों धाम यहाँ संकल्प मात्र से ही प्रगट कर दिए थे। यहाँ रहकर जीव की जन्म और मृत्यु मात्र लीला है मेरा पार्षद मेरे ही निज धाम को प्राप्त होता है इसलिए संस्कार का भी यहाँ कोई महत्त्व नहीं ऐसी प्रभु वाणी में है !
यहाँ जन्म और मृत्यु दोनों मेरी कृपा के द्वारा ही जीव को प्राप्त होते है एवं प्रत्येक जीव मात्र जो यहाँ निवास करता है वह नित्य मुक्त है। उसकी मुक्ति के उपाय के लिए किये गए कर्मो का महत्त्व कुछ नहीं है। मेरे इस परम धाम को प्राप्त करने के लिए समस्त ब्रह्मांड में अनेकों ऋषि, मुनि, गन्धर्व, यक्ष, प्रजापति, देवतागण, नागलोक के समस्त प्राणी निरंतर मुझे भजते हैं लेकिन फिर भी उनको इसकी प्राप्ति इतनी सहज नहीं है।
मेरी चरण रज ही इस ब्रज (गोलोक धाम) की रज है जिसमें मेरी लीलाओं का दर्शन है।
राधाकुण्ड के भजनानन्द साधु अनाथ बन्धुदास ने इस सम्बन्ध में बताया कि जेष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को माँ जह्नवा जब ब्रज में अपने शिष्यों के साथ आगमन हुआ था और उन्होंने यहां जीव गोस्वामी पाद से मिल कर वह कामा काम्यवन में भी गयीं थी वहां वह गोपीनाथ जी के मंदिर के श्रीविग्रह को माला पहनाने गयीं थीं, उस समय मंदिर के पट बन्द हो गये थे बाद में देखा गया कि राधारानी को दायें तरफ करके वह स्वयं वायें तरफ में खड़ी हैं यह चमत्कार लोगों ने उस समय देखा था। माँ जहनवा के गोपीनाथ से यह परम्परा चली आ रही है एकादशी को भक्त लोग कुण्ड की परिक्रमा करके कीर्तन, आरती के पश्चात धूलोट उत्सव शुरू करते हैं।
महाप्रभु जी का उस समय का एक पद है
नाचिते न जानी तबहु नाचिया गौरांग बोली।
गाइते न जानी तबहु गायी, सुखे थाकी,
दुःखेते थाकी हा गौरांग, ऐई भाव ही निरन्तर चाही।
ऐई तो ब्रजेर धूला रे भाई ऐई तो ब्रजेर धूला।
ऐई धूला मेखे छीलो नन्देर बेटा कानू,
गाय तो माखो रे भाई ऐई ब्रजेर धूला।।
उन्होंने कहा कि यह कोई सामान्य धूल नही है यह ब्रज की गोपियों और राधारानी का स्थान है यह राधा की पद रेनु है। धूला उत्सव एक परम्परा है कृष्ण जब बाल्य काल में इस रज में लोट पोट हुए, यहां पर राधारानी के चरणों की धूल भी है।
इस धूलोट उत्सव में हम लोग भी अपने जीवन को धन्य करने के लिए इस ब्रज रज में लोट लगाते हैं। सबसे पहले गुरूजनों को यह रज लगाकर फिर हम सभी इसमें लोटते हैं कीर्तन करते हैं यह परम्परा सदियों से इसी प्रकार से चली आ रही है जिसे हम धूलोट उत्सव के रूप में मनाते हैं।
इसी प्रकार वृन्दावन भागवत निवास के महन्त श्री युगल चरण दास ने धूलोट उत्सव के विषय में बताते हुए कहा कि धूल्ट उत्सव माँ जह्नवा के आगमन के साथ शुरू हो गया था नित्यानन्द प्रभु जब ब्रज में पधारे थे तब उन्होंने कामा स्थित गोपीनाथ मंदिर की स्थापना के वाद में उन्होंने ब्रज में वास किया था इसी उपलक्ष्य में धूलोट उत्सव को मनाया जाता है यह करीब 9 वीं या 10 वीं सदी की वात है, जब माँ जह्नवा का आगमन ब्रज में हुआ था उस समय को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। जिसमें संकीर्तन, भण्डारा आदि का आयोजन भी किया जाता है।
धूलोट उत्सव क्यों मनाया जाता है
ब्रज की धूल कोई साधारण धूल नही है इसे ब्रहमा आदि ने भी अपने शरीर पर धारण किया था। भगवान श्रीकृष्ण ने जब उद्धव जी को ब्रज में भेजा था तब उन्होंने भी यही कामना की थी कि मेरा भी इसी भूमि में, और इसी धूली में जन्म हो, ऐसी कृपा प्रभु मुझ पर करें। षिव जी भी इस धूल को अपने माथे पर लगाते हैं और आज भी वृन्दावन में गोपेश्वर महादेव के रूप में विराजमान हैं। इन्हीं परम्पराओं के साथ आचार्यों की परम्पराओं और भागवत परम्पराओं को लेकर ही हम लोग धूलोट उत्सव मनाते हैं इस भूमि की इस धूलि में लोट पोट होना ब्रज की रज को अपने उपर लपेटना होता है क्यों कि हमारा जन्म भी रज से ही हुआ है इसी रज से सभी प्रकार के अन्न की उत्पत्ति होती है और उसी से वीर्य बनता है और उसी से जीव मात्र की उत्पत्ति होती है। और अन्त में हमें इसी रज में ही मिल जाना है तीन तरह की गति होती है जला दिया जाता है, जल में वहा दिया जाता है, या जमीन में समाधि दी जाती है तीनों ही स्थिति में रज में ही मिलना होता है चाहें यमुनाजी या गंगा जी में भी रज ही मिलेगी कुल मिला कर रज में ही मिल जाना है।
फ़ोटो - गुड्डू गोतमउन्होंने बताया कि यह धूलट उत्सव जेष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को शुरू होता है और तीन दिनों तक चलता है यह आयोजन विशेष कर राधाकुण्ड में मनाया जाता है क्यों कि माँ जह्नवा का आगमन इसी समय हुआ था। माँ जह्नवा नित्यानन्द प्रभु की आदि शक्ति हैं शक्ति स्वरूपा हैं नित्यानन्द प्रभु के पारायण करने के उपरान्त वह ब्रज में अपने शिष्यों के साथ आयीं थीं। तब गोडीय सम्प्रदाय के षठ गोस्वामी पाद आचार्यों ने यह उत्सव को शुरू किया था।
फ़ोटो - गुड्डू गोतमयह उत्सव वृन्दावन स्थित भागवत निवास में भी मनाया जाता है रघुनाथ गोस्वामी पाद को चैतन्य महाप्रभु ने एक गिर्राज शिला जो कि उनकी सेवा में थी को जगन्नाथकुटी के गम्भीरा में उनको दी थी गोस्वामी पाद नियमित उसकी सेवा पूजा करते थे, भाव विभोर होकर सेवा करते समय वह अपने अंगूठे के उपर गिर्राज शिला को रख कर जल प्रदान करते थे। जिसके कारण गोस्वामी पाद का अंगूठा ही गिर्राज शिला में समा गया था आज भी वह दिव्य गिर्राज शिला भागवत निवास में पूजित है लगभग 500 वर्षों पूर्व के गिर्राज जी यहां सेवित हैं जिन्हें गिरेन्द्र बिहारी जी के नाम से जाना जाता है जिसकी अनवरत सेवा पूजा यहां चल रही है।
उन्होंने बताया कि नित्यानन्द प्रभु के ब्रज में आगमन के पश्चात माँ जह्नवा का जब ब्रज में आगमन हुआ था उस समय को धूलोट उत्सव के रूप में मनाया जाता है स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गोचारण लीला करने जाते थे उस समय कृष्ण बलराम के शरीर पर यह धूली यह रज गायों के खुरों के माध्यम से उड़ कर उनके शरीर को स्पर्श करती है यानी लिपट जाती है।
इसको लेकर एक सुन्दर भाव प्रकट करते हुए बताया कि राधारानी कह रही हैं कि वह सब समय कृष्ण से नहीं मिल पाती हैं क्यों कि माता पिता हैं, गुरूजन हैं, भाई बन्धु हैं, हर समय श्रीकृष्ण से मिल पाना सम्भव नही हो पाता है तो वह ललिता सखी से कहती हैं कि ‘‘है ललिते सखी मैं क्यों न भई ब्रज की धूल, होती यदि ब्रज की धूल तो, लिपटती श्याम सुन्दर के अंग सों, न रहती लोक लाज, न रहती कुल की मर्यादा’’ गौ खुरों से स्पर्श करके श्याम के अंग से लिपट जाती, मुख मण्डल से लिपट जाती, उनकी अलकावली में भी लिपट जाती, इसके पीछे गहरा भाव छिपा है।
हम सब इसी रज के जरिये मुक्ति को प्राप्त करते हैं यह भजन साधना राधारानी के ब्रज की रज को प्राप्ति का माध्यम है, प्रिया प्रियतम की कृपा हमें मिले भगवत प्राप्ति हमें मिले, राधारानी की कृपा प्राप्ति के लिए ब्रज रज की प्राप्ति हो, यही कामना के साथ धूलोट उत्सव मनाया जाता है।
जय जय ब्रज रज, जय जय श्री राधे
प्रस्तुति - सुनील शर्मा, मथुरा।